मंगलवार, 27 जुलाई 2010

उस शहर की लडकियां..---------------->>>दीपक 'मशाल'







बड़ा जुझारू शहर है वो 
उसमें रहते हैं साहसी लोग
जो नहीं डरते किसी तकलीफ से
ऐसा नहीं कि वहाँ नहीं आते
दैहिक दैविक और भौतिक ताप

बेशक रामराज्य नहीं वहाँ
पर लोग जिंदादिल हैं

तभी तो उसकी जड़ें नहीं खोखला कर पाता
कोई भी दीमक 
कोई उसकी नींव को 
नोना नहीं लगा पाता 
उसके फौलादी इरादों को 
जंग नहीं लगती कभी

ना बम धमाके रोक पाए उसे बढ़ने से
ना पड़ोसी देशों के घृणित इरादे
ना राम-रहीम के दंगे
ना भाषाई लड़ाईयाँ.. ना वर्गों के बीच के पथराव
ना डिगा सका भूकंप 
ना डेंगू.. ना कोई स्वाइन या बर्ड फ़्लू 
ज़रा थम के अगले ही दिन वो लगता है दौड़ने 
शल्य चिकित्सा के बाद 
रगों में दौड़ते नए लहू की मानिंद  

ये सब सुना-पढ़ा था मैंने उसके बारे में 
कभी अख़बारों कभी टी.व्ही. पे 
करीब से जाना ये सच 
फिर उस शहर में जाके..

सच में लोग चलते रहते हैं 
बिना विचलित हुए
लपटों के बीच से.. शोलों की ज़मीन पर भी
बाढ़ के पानी में भी 

आज उस शहर के जुनून को दुनिया को दिखाने के लिए
मैं ढूँढने निकला था कुछ पात्र
करने एक नायिका की तलाश  
आज ही किसी ने बताया
उस तथाकथित हिम्मती शहर में 
लड़कियां नाटक में काम नहीं करतीं

कई साल पहले शहर की 
एक मंचीय अभिनेत्री 
पड़ गई थी प्रेम में साथी कलाकार के 
तभी से 
वहाँ की लड़कियां नाटक में काम नहीं करतीं
दीपक 'मशाल'
चित्र गूगल से मारा है दोस्तों...

बुधवार, 21 जुलाई 2010

झूठा विजेता--------------->>>दीपक 'मशाल'

ऐ इतिहासकारों!!
तुम जब लिखना मेरे बारे में 
तो मेरे बारे में लिखना..
मेरे सच के बारे में
लिखना मुझसे जुड़ी हर बात के बारे में


बेशक लिखना तुम मेरा पराक्रम
मेरी तलवार का दुधारूपन
पर इसकी चमक से अंधे हो कहीं
उन विधवाओं का विलाप न भूल जाना
जो इस धार के द्वारा बनायीं गईं हों...


गुरेज नहीं होगा 
जो तुम मुझे महान बनाने के लिए
मेरे हाथ से दान हुए
चंद सिक्कों की गिनती को असंख्य लिखो
मेरी बोली को बादल की गरज
मेरी चाल को सिंह की तरह लिखो


पर कहीं ये सच भी लिखना जरूर 
कि आबनूसी माहौल में तैर जाते हैं
मेरी भी आँखों में वासनाओं के डोरे
हर आम इंसान की तरह...
उस क्षण के बारे में भी लिखना
हवस मुझपे होती है जब हावी


गर लिखो तुम युद्ध या शांति पर
मेरे फैसलों के बारे में
तो मत चूकना तुम ये बताना कि
मैं कभी न चुन पाया अपने वस्त्रों का रंग


दुश्मनों पर मेरे खौफ का असर कहने के 
पहले या बाद अवश्य उल्लेख करना
बिल्लियों के रुदन से डर जाना मेरा..
मेरे बहादुर वक्तव्यों के साथ
कापुरुषी विचार भी बताना दुनिया को..


जहाँ भी लगाओ मेरी विजय के उपलक्ष्य में स्तम्भ
वहीं मेरी हार को भी अंकित करना..
क्योंकि इतिहास की किताबों में छिप के बैठा
एक तथाकथित महान
मगर झूठा विजेता नहीं बनना मुझे..
दीपक 'मशाल'
(कविता 'परिकथा' साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित)
चित्र गूगल की देन है



एक चोरी का माल भी सुनिए..
अर्ज़ किया है ...
आओ सुलझाये मुद्दा हिन्दो पाकिस्तान का ..
भइय्या आओ सुलझाये मुद्दा हिन्दो पाकिस्तान का....
कि कश्मीर हो District पाकिस्तान का ...
और पाकिस्तान हो State हिंदुस्तान का !!
वाह वा.. वाह वा..

और चलते-चलते बारिश के मौसम में मेरा एक पसंदीदा गाना-

रविवार, 18 जुलाई 2010

देख अचरज भी है हैरानी भी है------------------>>>दीपक'मशाल'

साब जी अभी हाल में एक टूटी-फूटी रचना लिखी थी.. अब उसमे कुछ सुधार किया और गाने की गलती कर बैठा.. सोचा आपको भी सुना ही दूँ.. दिन अच्छा रहा होगा तो ख़राब हो जाएगा सुनने के बाद.. इस प्रयोग के लिए समीर सर का विशेष आभारी हूँ  :)
ध्यान दीजियेगा कि रचना में कुछ सुधार भी किया है और दो नए शेर(वैसे शेर नहीं कह सकते) भी जोड़े हैं....
इसको मेरी आवाज़ में सुनने के लिए नीचे P पर क्लिक करें...




देख अचरज भी है हैरानी भी है 


दुनिया अपनी भी है बेगानी भी है 

कैसे माने जहाँ विष पिलाए बिना
मीरा रानी भी है, दिवानी भी है 

तेरी बात पे क्या भरोसा करुँ
ये हकीकत भी है औ कहानी भी है 

ज़िंदगी तू बड़ी अजब फिल्म है
तू दहशत भी है रूमानी भी है 

आज शाम मैं तेरी याद के साथ हूँ
ये सुहानी भी है विरानी भी है

आदत-ए-वफ़ा से हूँ परेशान मैं
ये नई सी भी है औ पुरानी भी है 

ना पूछो उसकी बेरुखी को 'मशाल'
भूलने का सबब भी निशानी भी है.
दीपक'मशाल'

नीचे दिए गए P पर क्लिक करें




गुरुवार, 15 जुलाई 2010

थोड़ी लपकोईं(फेस एक्सप्रेशन प्रेक्टिस) और एक रचना..---->>> दीपक 'मशाल'

वो है क्या की महीनों से कोई प्ले/ड्रामा नहीं किया... 
आज शाम को थोडा फालतू था तो सोच कि चेहरे की मांसपेशियों को आजमा लिया जाए कि ठीक से काम कर रही हैं या नहीं??? 
याने अभिनय लायक बची हैं कि नहीं.. सो ऐसा सोचते-सोचते कई तस्वीरें निकाल डालीं 
उसके बाद अपने ही चेहरे पर रीझ कर कुछ और-कुछ और.. करता गया.. :P  
                               अंत में कई साल पहले जो भूत बना था वो फिर बनने की कोशिश की                     
                                                      और तस्वीरें भी निकाल लीं.. ज़रा देख लो भाया.. भूत वाले फोटो तेज़ी से स्क्रोल करें और भी मज़ा आएगा देखने में..

एक हाल की रचना भी है.. बुरा न मानें तो..
देख अचरज भी है हैरानी भी




दुनिया अपनी भी है बेगानी भी


कैसे माने जहाँ विष पिलाए बिना
मीरा रानी भी है, दिवानी भी

                                        तेरी बात पे क्या भरोसा करुँ
                                           ये हकीकत भी है औ कहानी भी

                                            ज़िंदगी तू बड़ी अजब फिल्म है
                                            तू दहशत भी है रूमानी भी

                                           आज शाम मैं तेरी याद के साथ हूँ
                                           ये सुहानी भी है विरानी भी..
उम्मीद है आज कि आज की बकवास के लिए माफ़ कर देंगे.. बस ऐसे ही कुछ बेमतलब का लगाने का मन हुआ सो लगा दिया..
दीपक'मशाल'
तो अब यहाँ देखिये रुपये का वो सिम्बल जिसे स्वीकार कर लिया गया है.. इसके डिजाइनर के साथ.. और नीचे बाकी ५ फाइनलिस्ट..


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