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गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

गुरु गुलज़ार साब से मुलाक़ात------>>>दीपक 'मशाल'



कब से इक तमन्ना 

दिल में दबी हुई थी..
तुम चिंगारी कह रहे हो
पूरी आग लगी हुई थी..
सरदार संपूर्ण सिंह जी याने गीतों और नज्मों के सरताज सबके दिलों पर राज करने वाले आदरणीय गुलज़ार साब... एक ऐसी शख्सियत जो ना सिर्फ नज़्म, ग़ज़ल या गीत के मामले में बल्कि फ़िल्मकारी, निर्देशन और कहानी लेखन में भी माउंट एवरेस्ट कहे जा सकते हैं. जिनसे मिलने के लिए मैं इस बार दिसंबर में भारत जाने पर उनके एक करीबी पारिवारिक मित्र के मार्फ़त उनसे मिलने की योजनायें बना रहा था... 
आदरणीया दिव्या माथुर जी के साथ 
जिनको हमेशा लेखन में अपना आदर्श मानता रहा हूँ.. उनको विगत शनिवार तारीख ०९.१०.१० को अपने सामने पाया... लगा कि कुआँ स्वयं प्यासे के पास चला आया.. राजा आया है रंक से मिलने.. चांदनी को ओढ़े हुए, हिमालय जैसे ही सफ़ेद कुरता और पेंट एवं जरी वाली सुनहरी जूतियाँ पहने हुए वो मेरे जैसे जाने कितनों के खुदा मेरी आँखों के सामने थे.. इन्हीं आँखों के सामने जो आज ये पोस्ट लिखते वक़्त की-बोर्ड को निहार रही हैं.. जब वो स्टेज पर थे तो मैं उनकी छवि को आँखों में उतारने के बाद कैमरे में समेटने में लगा रहा.. बाद में खाने के वक़्त 2010 की अप्रवासी मैथिलीशरण गुप्त सम्मान से सम्मानित प्रतिष्ठित साहित्यकार आदरणीया दिव्या माथुर जी, जिनका हमेशा ही मुझपर पुत्रवत स्नेह रहा है, ने श्री गुलज़ार साब से मेरा परिचय कराया.. उनकी चरण रज पाकर अपने को धन्य भाग्य ही समझ रहा हूँ.. उनसे क्या बात हुई? क्या लेना देना हुआ वो सब बाद में पहले अभी सिर्फ वो चंद पंक्तियाँ जो उन्हें देखते ही मन से फूट पड़ीं.. शिल्प या शब्द सौंदर्य तो नहीं है इनमे मगर सिर्फ भाव के लिए शबरी के बेर की तरह चख लीजियेगा..

परदेस में ही सही 
पूरा मेरा इंतज़ार हुआ है
डर था
कहीं खारों के दरमियाँ ही
ना बीत जाए ज़िन्दगी..
तुम आये तो
गुलशन ये 'गुलज़ार' हुआ है..

कुछ ज़िदें हो गयीं थीं ढीठ इतनीं
उन्हें कितना ही दिखलाता बाहर का दरवाज़ा
मगर बारहा आ धमकती थीं दबे पाँव
जाने किस फ़िराक में..

उन्हीं ज़िदों में से एक तो थी 
तुमसे मिलने की ज़िद 
ख्वाहिश होती तो फिर भी समझा ही लेता

खैर.... अब वो ज़िद भी ज़िन्दा ना रही 
रहती भी क्यों भला?
उसकी आख़िरी तमन्ना जो पूरी हो गई
तुम आ गए हो ना चांदनी के लिबास में..

वैसे ये कुछ ज्यादा ही हो गया लेकिन फिर भी विशाल भारद्वाज से उनके करीबी रिश्तों को लेकर ये त्रिवेणी भी उपजी-

डर है सुलगकर ख़ाक ना हो जाऊं
शोला ही रहूँ मैं राख ना हो जाऊं

औरों से तेरी नजदीकियाँ, बहुत जलाती हैं मुझे..
दीपक 'मशाल'
११.१०.१० को एक बार फिरसे उनसे मिलने का मौक़ा मिला तभी ये वीडिओ भी बनाया.--
 

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