बीते लम्हे लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बीते लम्हे लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

मुझको आई ना कभी अदा-ए-इज़हार सनम--------->>>>>>>दीपक मशाल

३ रचनाएँ--

1-
मुझको आई ना कभी अदा-ए-इज़हार सनम
अदा-ए-खामोशी तुम समझ ना सके
खता लबों की है जो बयाँ ना कर पाए
मगर जुबान-ए-निगाह तुम भी तो पढ़ ना सके
मैंने दिल ही दिल में चाहा है दिल से तुमको
मुझको ग़म नहीं कोई कि प्यार कर ना सके

2-
पता नहीं
बेवफा तुम थे
हालात थे
या मेरे दिमाग के उपजे प्रेत
लेकिन
अगर तुम साथ देते
तो हम इस गिरह को सुलटा सकते थे
प्यार पे लगे इस बदनुमा दाग को
मिटा सकते थे
तुमको भुलाना तो कभी जायज़ ना था
पर हाँ बेवफाई की वजहें भुला सकते थे
अगर साथ देते जो तुम,
इक बार ज़माने से कहते तो मुझे अपना
फिर दिल-ओ-जिगर की तरह मुझको भी गिना सकते थे
बस मेरी खुशी में एकबार मुस्कुराते तो तुम
फिर चाहे तो उम्र भर मुझको रुला सकते थे...

3-
याद में तेरी ना अश्क बहायेंगे
जानते हैं वर्ना सो ना पाओगे
उम्र बिता देंगे इसी उम्मीद पे
लौट के इक दिन कभी तो आओगे
टूट के जब भी बिखर जाऊंगा मैं
बाँधने बाँहों में तुम ही आओगे
ख़ाक होके जब मिलूंगा इस हवा में
सांसों में भरने को तब तो आओगे
पूछती है हर घड़ी तुमसे जुडी
नाम आधा किस तरह भुलाओगे
बीते लम्हे बार बार आते नहीं
कम से कम इतना तो कहने आओगे....

दीपक मशाल
चित्र अपने कैमरे से...

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...