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शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

देखते हैं कब तलक तुम हमको झेले जाओगे-------->>>दीपक 'मशाल'




देखते हैं कब तलक तुम हमको झेले जाओगे
ना करें कि हाँ करें हम, तुम तो पेले जाओगे

चीर उतरा द्रोपदी का आज कान्हा गुम रहा
दांव खोकर भी सभी तुम, खेल खेले जाओगे

ओए सुन लो फालतू इतना नहीं है माल ये
एक चुटकी की जगह क्या मुठ्ठी भर ले जाओगे.

हैं खड़े इक पांव पर, ये बस भरी है भीड़ से
जो पाँव भी अपना नहीं क्या उसको ठेले जाओगे

बाप की कजूंसियों का आज ये आलम हुआ
दे चवन्नी पूछता है, तुम भी मेले जाओगे

लाइफ जैकेट डाल कर, वो पूछने हमसे लगा
छेद वाली नाव को अब, किस तरफ ले जाओगे.

है ’मशाल’ हाथों में मेरे, पर जिद्द अंधेरों की रही
हम हैं जुगनु के ही साथी, तुम तो वेले जाओगे.

वेले= अकेले
ठोक पीट कर और आखिरी शेर जोड़ कर आदरणीय समीर जी ने रचना को पढ़ने लायक बना दिया..
दीपक 'मशाल'
चित्र- दीपक 'मशाल' 

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