दिल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
दिल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010
मात पे भी मेरी बधाई दे दी...------->>>>>>>दीपक 'मशाल'
मैंने चाहा था उम्र भर के लिए
उसने जन्मों की जुदाई दे दी
साथ रहने का वादा करके
मुझको लोगों की दुहाई दे दी
क़ैद होकर मिरे ही दिल में
मेरी धड़कन को रिहाई दे दी
इक करम माँगा था उल्फत में
तुमने सारी ही खुदाई दे दी
आके जलसे में मेरी खुशियों के
तुमने तोहफे में रुलाई दे दी
दिल को बहला तमाम बातों से
क़त्ल कर के भी सफाई दे दी
मैं मर मिटा इस अदा पे 'मशाल'
मात पे भी मेरी बधाई दे दी...
दीपक 'मशाल'
शुक्रवार, 29 जनवरी 2010
मुझको आई ना कभी अदा-ए-इज़हार सनम--------->>>>>>>दीपक मशाल
३ रचनाएँ--
1-
मुझको आई ना कभी अदा-ए-इज़हार सनम
अदा-ए-खामोशी तुम समझ ना सके
खता लबों की है जो बयाँ ना कर पाए
मगर जुबान-ए-निगाह तुम भी तो पढ़ ना सके
मैंने दिल ही दिल में चाहा है दिल से तुमको
मुझको ग़म नहीं कोई कि प्यार कर ना सके
2-
पता नहीं
बेवफा तुम थे
हालात थे
या मेरे दिमाग के उपजे प्रेत
लेकिन
अगर तुम साथ देते
तो हम इस गिरह को सुलटा सकते थे
प्यार पे लगे इस बदनुमा दाग को
मिटा सकते थे
तुमको भुलाना तो कभी जायज़ ना था
पर हाँ बेवफाई की वजहें भुला सकते थे
अगर साथ देते जो तुम,
इक बार ज़माने से कहते तो मुझे अपना
फिर दिल-ओ-जिगर की तरह मुझको भी गिना सकते थे
बस मेरी खुशी में एकबार मुस्कुराते तो तुम
फिर चाहे तो उम्र भर मुझको रुला सकते थे...
3-
याद में तेरी ना अश्क बहायेंगे
जानते हैं वर्ना सो ना पाओगे
उम्र बिता देंगे इसी उम्मीद पे
लौट के इक दिन कभी तो आओगे
टूट के जब भी बिखर जाऊंगा मैं
बाँधने बाँहों में तुम ही आओगे
ख़ाक होके जब मिलूंगा इस हवा में
सांसों में भरने को तब तो आओगे
पूछती है हर घड़ी तुमसे जुडी
नाम आधा किस तरह भुलाओगे
बीते लम्हे बार बार आते नहीं
कम से कम इतना तो कहने आओगे....
दीपक मशाल
चित्र अपने कैमरे से...
1-
मुझको आई ना कभी अदा-ए-इज़हार सनम
अदा-ए-खामोशी तुम समझ ना सके
खता लबों की है जो बयाँ ना कर पाए
मगर जुबान-ए-निगाह तुम भी तो पढ़ ना सके
मैंने दिल ही दिल में चाहा है दिल से तुमको
मुझको ग़म नहीं कोई कि प्यार कर ना सके
2-
पता नहीं
बेवफा तुम थे
हालात थे
या मेरे दिमाग के उपजे प्रेत
लेकिन
अगर तुम साथ देते
तो हम इस गिरह को सुलटा सकते थे
प्यार पे लगे इस बदनुमा दाग को
मिटा सकते थे
तुमको भुलाना तो कभी जायज़ ना था
पर हाँ बेवफाई की वजहें भुला सकते थे
अगर साथ देते जो तुम,
इक बार ज़माने से कहते तो मुझे अपना
फिर दिल-ओ-जिगर की तरह मुझको भी गिना सकते थे
बस मेरी खुशी में एकबार मुस्कुराते तो तुम
फिर चाहे तो उम्र भर मुझको रुला सकते थे...
3-
याद में तेरी ना अश्क बहायेंगे
जानते हैं वर्ना सो ना पाओगे
उम्र बिता देंगे इसी उम्मीद पे
लौट के इक दिन कभी तो आओगे
टूट के जब भी बिखर जाऊंगा मैं
बाँधने बाँहों में तुम ही आओगे
ख़ाक होके जब मिलूंगा इस हवा में
सांसों में भरने को तब तो आओगे
पूछती है हर घड़ी तुमसे जुडी
नाम आधा किस तरह भुलाओगे
बीते लम्हे बार बार आते नहीं
कम से कम इतना तो कहने आओगे....
दीपक मशाल
चित्र अपने कैमरे से...
सदस्यता लें
संदेश (Atom)

