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मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

एक तस्वीर बड़बड़ा रही थी ख्वाब में

मेरे अल्बम से  कुछ पुरानी तस्वीरें
झाँक रहीं थीं सूरज की ओर
उनके धुंधले पड़ते अक्स से
मानो सूरज के थे पुराने रिश्ते

तस्वीरें ढूंढ रहीं थीं 
आशा की किरण मेरे लिए

आग के महाकूप से निकलती लपटें झुलसा देतीं 
खामोश तस्वीरों की उमीदों को
मगर पगली तस्वीरें फिर नयी आस उगा लेतीं
उनके चारों कोने सोख लेते कुछ ऑक्सीजन
वो फिर लग जाती नई कोशिश में

तस्वीरें सपने नहीं देखतीं 
इसलिये कि तस्वीरें कभी नहीं सोतीं

पर आज जाने कैसे आँख लग गई उनकी
रात के तीसरे पहर
एक तस्वीर बड़बड़ा रही थी ख्वाब में
'अब तुम आ गए हो तो...
आशा की किरण का क्या करना'
पता नहीं जाने किसे देखकर
दीपक मशाल
(कविता गर्भनाल में पूर्व प्रकाशित)

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