वैसे तो ये कविता कल ही लगा देनी चाहिए थी, लेकिन आज ही सही...
आज हमें मनाना है,
उस शुभ दिवस को,
हुआ था लागू
संविधान जिस दिवस को.
वो संविधान जो जलता है,
नहीं... जलाया जाता था हर रोज
चौराहे पर....
हाँ वही.. जिसमे
संशोधनों की नई कीलें
ठोक दी जातीं हैं
जब चाहें...और जब ना चाहें तब भी.
हाँ! हाँ! वही संविधान
जिसे दुनिया के संविधानों की
नक़ल की पोथी भी कह देते हैं...
और बदल लेते हैं सफ़ेद लबादों को ओढने वाले
इसे बरसात में बरसाती में..
और सर्दी में शॉल में.
उसी संविधान के
लागू होने की शुभ तिथि
या फिर 'शायद'
एक दिन तीन सौ पैंसठ दिनों में..
कोशिश करते हैं हम मनाने की
'संविधान सराहना दिवस'
दीपक मशाल
चित्र- साभार गूगल से
