सोमवार, 23 मई 2016

प्रतिलिपि.कॉम पर

दोस्तों के लिए कुछ लघुकथाऐं प्रतिलिपि.कॉम पर
http://hindi.pratilipi.com/dipak-mashal/deepak-mashal-ki-shreshth-laghukathaye-1

रविवार, 8 मई 2016

धरती कभी बनी ही नहीं थी हमारे लिए/ मशाल

आग खतरनाक होती है 
जब पेट की नहीं होती 
जब नहीं होती सीने में 
या जब इनके लिए नहीं जलाई जाती 

सभ्यता का दूसरा पहलू 
विकास का वीभत्स चेहरा उघाड़ देती है आग 

जलकर- झुलसकर मरती जीव-जातियों की दर्दनाक चीखें 
और उससे भी भयानक खामोशियों के बीच 
बहरे बने हुए लोगों की शक्लें 
सबसे कुरुप नज़र आती हैं 

जब जलाई नहीं जाती 
आग लगती नहीं जब.... 
जब लगाई जाती है 
यह इंसानियत पर से भरोसे को सबसे पहले भस्म करती है 
यह आदमी को नंगा कर देती है 

यह आग फिर प्रमाण देती है कि 
हम आए थे यहाँ पेड़-पौधों की जूठन गैस पीने 
धरती कभी बनी ही नहीं थी हमारे लिए.... 

सोमवार, 2 मई 2016

तीन लघुकथाऐं

१- वह जो जरूरी है (लघुकथा) 


गुप्ता जी ने बाहर जाने के लिए दरवाज़ा खोला ही था कि सामने पड़ोसी वर्मा जी खड़े मिले। 

- अरे भाई सा'ब आप! आइए.. अंदर आइए बाहर क्यों खड़े हैं। 

- कैसे हो भाई गुप्ता? घंटी बजाने ही वाला था कि तुमने खुद ही दरवाज़ा खोल दिया   

भीतर आते हुए वर्मा जी बोले। 

दोनों के सोफे पर बैठते ही गुप्ता जी ने भीतर आवाज़ दी 

- पिंकी!!! बाहर आओ ज़रा 

पिंकी ने बाहर आते हुए अभिवादन किया  

- जी नमस्ते अंकल

- अरे!! खाली नमस्ते? चाय-पानी पिलाओ भई.. 

गुप्ता जी ने मजाकिया लहजे में कहा। 

इधर-उधर की बातों के दौरान घर के ऊपर वाले कमरे से दो बार पानी के लिए पुकार लगी तो अंदर से मिसेज गुप्ता ने 

रसोई में चाय बनाती पिंकी को आदेश दिया 

- पिंकी!! भईआ को पानी दे आ ज़रा, कब से माँग रहा है 

- क्या हुआ बेटे की तबियत ठीक नहीं क्या?

वर्मा जी ने शंका जाहिर की तो गुप्ता जी ने झेंपते हुए कहा  

- नहीं, पढ़ रहा होगा अपने कमरे में  

थोड़ी देर बाद पिंकी ने सबको चाय के कप पकड़ाए ही थे कि पीछे से आ रहीं मिसेज गुप्ता ने कहा  

- भैया की चाय ऊपर ही दे आ उसके कमरे मे 

इससे पहले कि पिंकी आगे बढ़ती गुप्ता जी ने आवाज़ को ऊपर वाले कमरे तक पहुँचाते हुए कहा 

- बबलू! नीचे आओ और अपनी चाय खुद लेकर जाओ। 

२- शहर में/ दीपक मशाल (लघुकथा)

वह बहुत देर तक गौर से देखता रहा कि सड़क के दूसरे किनारे खड़ा सब्जीफर्रोश किस तरह अपने हाथ ठेले के एक किनारे बैठी अपनी पाँच-छह साल की बच्ची को फुर्सत मिलते ही पढ़ाने लगता। अक्सर ऐसे दृश्यों पर नज़र रहती उसकी, जानकारी जुटाकर सचित्र अपने ब्लॉग, सोशल अकाउंट पर डाल देता। कई बार अखबारों में भी उसकी ये पोस्ट आ जातीं। 
वह धीरे-धीरे ठेले के नज़दीक आ गया और सब्जीवाले से बात करने लगा 
- तुम्हारी बेटी है?
- जी सर  
उसने जवाब दिया 

- क्या पढ़ा रहे हो?
- जित्ता खुदे आता है उत्ता बता दे रए हैं सर, स्कूल भेजे की तो औक़ात नहीं अबी 
- अरे अच्छा है, करते रहो।  कल को स्कूल भी जाएगी ही। कहाँ से हो? 
- रहे वारे तो यूं पी के हैं, लेकिन अब यहीं गुज़ारा है 
- हम्म..... तुम्हारी फोटो निकालकर डालूँगा इंटरनेट पर, मशहूर हो जाओगे। 

कहकर उसने बिना जवाब की प्रतीक्षा किए जेब से स्मार्ट फोन निकाला और बेटी समेत उस आदमी की फोटो लेने लगा। 

-  न ना सर ई सब नहीं। 
उसने कैमरे के आगे हाथ लगाते हुए उसे रोका। दो पल को कैमरे वाला स्तब्ध रह गया और फिर खीझकर दूसरी ओर जाने लगा। पीछे से सब्जी वाले ने आवाज़ दी  

- और कौनो दिक्कत नाहीं सर, बस फोटू कम्पूटर में जावेगी तो गाँव में उहाँ सब जान जावेंगे कि हम इहाँ शहर में सब्ज़ी...... । 


३- ख़बर के रास्ते में

'नया दौर' से काफी आगे का नया दौर आ चुका था। इतना कि लोगों में एक वर्गीकरण दृष्टव्य उम्र के अंतर का भी आ गया था। कुछ लोग चालीस की उम्र में भी पैंतीस नज़र आते थे तो कई अभी भी ऐसे थे जो चालीस में पैंतालीस या अधिक दिखते थे। 
चुपके से सही मगर कम दिखने की होड़ इंसान को उसकी लक़ीर से खिसका दे रही थी। 
समाचार में दिखाया जा रहा था कि इसी तरह की कुछ नई-पुरानी होड़ों में शामिल होने के उपक्रम में एक 'हवलदार जो हद से आगे चला गया था, पकड़ा गया'। कई घर, ज़मीन-जायदाद, रुपिया-पैसा जोड़ लिए थे उसने, तनख्वाह से बहुत अधिक। अनुभवों से जानता था कि सामने आई है तो यह बात कम से कम दो-चार दिन का मसाला हो जानी है।
पंसारी से कुछ सामान खरीदने निकला तो चौराहे पर भीड़ देखी, पता चला कि क़रीब की गली में रहने वाला कोई अफसर भी ऐसी ही दौड़ में शामिल मिला। जाँच दल काफी देर से घर में घुसा हुआ था। लोग, जो रामभरोसे जी रहे थे, दबी ज़ुबान से मन की बात कहते सुने
- 'खबर' न बने इसकी कोशिशें चल रही हैं।
तनिक दूरी पर खड़े दो संविधानभरोसे सिपाही भी आपस में बात कर रहे थे, एक ने कहा
- मोटी खाल है, जल्दी सब नहीं उगलेगा।
इस बात के मायने खोजता घर पहुँचा, देखा कि बाहर जाते हुए टी.वी. बंद करना भूल गया था। नए दौर में कहीं से पुराना विज्ञापन चल निकला
- जी आपकी त्वचा से तो आपकी उम्र का पता ही नहीं चलता।

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

बेचैनी / दीपक मशाल (लघुकथा)

दोनों परिवारों में दोस्ती बहुत पुरानी या गहरी तो नहीं थी लेकिन वक़्त बीतने के साथ-साथ बढ़ती जा रही थी। महीने में कम से कम एक बार दोनों एक दूसरे को खाने के बहाने, मिलने के लिए अपने घर आमंत्रित कर ही लेते थे, इस बार दूसरे वाले ने किया था। 
सुरक्षा के उद्देश्य से दोनों की ही बिल्डिंग में इस तरह का सिस्टम था कि जब तक मेजबान खुद बाहर निकल कर नीचे मुख्य द्वार तक लेने ना आये तब तक कोई मेहमान भीतर नहीं आ सकता था। पहले दोस्त ने परिवार सहित बिल्डिंग के नीचे पहुँच कर फोन किया 
- हैलो! हाँ जी, पहुँच गए हैं गेट पर 
- जी अभी दो मिनट में नीचे आता हूँ 
- जी ठीक है
मेजबान मित्र निकलने को चप्पल पहन ही रहा था कि पत्नी ने टोका 
- आपको क्या जल्दी पड़ी रहती है भागकर तुरंत जाने की, याद नहीं जब भी उनके घर आते हैं दो मिनट का कह कर दस मिनट में दरवाजे पर आते हैं। आज थोड़ी देर उन्हें भी इंतज़ार करने दीजिये, आराम से जाइये
चप्पलें उतार वो सोफे में धँस गया, लेकिन फिर एक मिनट भी न गुजरा होगा कि उठकर चहलकदमी करने लगा। बेचैनी बढ़ती जा रही थी, किसी तरह पत्नी से बोला 
- मैं सोच रहा था कि वो जान-बूझकर थोड़े करते होंगे, और फिर करते भी हों तो हम उनके जैसे क्यों..... 
बात ख़त्म भी ना हुई थी कि पत्नी बोल पड़ी 
- जी, वही मुझे लगा कि फिर उनका छोटा बच्चा भी तो बाहर सर्दी में खड़ा होगा, आप जल्दी जाइये 

और दोनों मुस्कुरा दिए.

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