शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

कहाँ पहुँचा हूँ कहीं तो नहीं
जहाँ से चला पर वहीं तो नहीं
मंजिलें हैं ख़ामोश बैठी हुईं पर
कहीं ये रास्तों का नहीं तो नहीं।
मशाल 

सोमवार, 26 सितंबर 2016

दो कविताऐं- दीपक मशाल

फोटो: दीपक मशाल 

१- हम आश्वस्त है


 घास के तिनकों से टिके हुए दुःख
 कुतुबमीनारी सुखों को बौना बना रहे
 तुलना के तराज़ू पर रखकर

सपने फ़रार होकर आभासी संसार से
कम्प्यूटर स्क्रीन में जा समाए
और खाई गईं 'क़समें'
संतुष्ट हो रहीं कागज़ी क्रांतिकारिता से

जब भी याद आ जाती हैं वो
भूले-भटके

दुनिया बढ़-बदल रही है
हम आश्वस्त हैं

मौके-बेमौके
लोकतंत्र की इकाई की बोली लग रही है
हम खुश है कि कीमतों में उछाल आया है
चलो फिर चुनावी साल आया है।


फोटो: दीपक मशाल 

२- मानेगा नहीं आदमी


विदर्भ से बुन्देलखण्ड तक
पानी ख़त्म नहीं हुआ
सूखा नहीं
उड़ा नहीं
ग़ायब नहीं हुआ

मर गया है पानी
शज़र का
ज़मीं का
नज़र का
मारा आदमी ने.....

पर
आदमी मानेगा नहीं
आदमी का हत्यारा हो जाना...

जो सदियों पहले आरम्भ हो गया था
आदमी मानेगा नहीं
खुद के हाथों

अंतिम आदमी की हत्या होने तक।

सोमवार, 23 मई 2016

रविवार, 8 मई 2016

धरती कभी बनी ही नहीं थी हमारे लिए/ मशाल

आग खतरनाक होती है 
जब पेट की नहीं होती 
जब नहीं होती सीने में 
या जब इनके लिए नहीं जलाई जाती 

सभ्यता का दूसरा पहलू 
विकास का वीभत्स चेहरा उघाड़ देती है आग 

जलकर- झुलसकर मरती जीव-जातियों की दर्दनाक चीखें 
और उससे भी भयानक खामोशियों के बीच 
बहरे बने हुए लोगों की शक्लें 
सबसे कुरुप नज़र आती हैं 

जब जलाई नहीं जाती 
आग लगती नहीं जब.... 
जब लगाई जाती है 
यह इंसानियत पर से भरोसे को सबसे पहले भस्म करती है 
यह आदमी को नंगा कर देती है 

यह आग फिर प्रमाण देती है कि 
हम आए थे यहाँ पेड़-पौधों की जूठन गैस पीने 
धरती कभी बनी ही नहीं थी हमारे लिए.... 

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