आलेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
आलेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

प्रेम के दुश्मन.. हाय-हाय.. भारतीय किसान यूनियन.. हाय-हाय...--------->>>>दीपक 'मशाल'

'प्रेम अध्यात्म की उपज है और अध्यात्म की ओर उन्मुख करता है' यह सीधा सपाट वाक्य स्वयं में बड़ा गहरा और विस्तृत रहस्य सिमटे हुए है. खासकर जब श्रृंगारिक प्रेम की बात हो तो निश्चित ही इस शब्द की स्वाभाविक मिठास में इजाफा हो जाता है. वैसे तो ये परम सत्य है कि प्रेम की परिभाषा इतनी विस्तृत है कि इसमें ना सिर्फ प्राणिमात्र का आपस में खिंचाव प्रकट होता है बल्कि निर्जीव-सजीव का आपसी आकर्षण भी समाहित होता है.
मगर दुखद है कि मानव सभ्यता को विकसित हुए आज हजारों साल हो जाने के बाद भी ज्यादातर संयोग-श्रृंगार प्रेम जब व्यवहार में आता है तो उसका नाम ही ज्यादातर लोगों के कान खड़े और मुँह कसैला कर जाता है तो कुछ को गप्प मारने का चटपटा मसाला मिल जाता है.. जबकि वही संयोग श्रृंगार हम कविता-कहानियों और पाठ्य पुस्तकों में राधा-कृष्ण, लैला-मजनू, रोमियो-जूलियट, पृथ्वीराज-संयोगिता, अर्जुन-सुभद्रा, सोहनी-महिवाल और हीर-रांझा के रूप में पढ़ते हैं तो  बड़े खुश होते हैं... पर जब यही पात्र किसी अन्य नाम से हमारी आँखों के सामने आ जाते हैं तो हमारी नज़र ही बदल जाती है. लोग लड़के को तो बदनाम करते ही हैं, लड़कियों की तो जिन्दगी ही बर्बाद कर डालते हैं.. और ये सब उन्ही के द्वारा होता है जो रोज सबेरे मंदिर में राधे-श्याम चिल्लाते हैं या मोहब्बत को रब का दूसरा नाम कहते हैं..
जबकि ये तथ्य ना तो किसी से छुपा है और ना ही बोलने योग्य है कि प्रेम अंतरात्मा की आवाज़ है. जब प्रेम हमारे मन-मस्तिष्क पर दस्तक देता है तो पवित्र आत्मा स्वयं गवाह बन जाती है. प्रेम जैसे पवित्र शब्द के साथ सच्चा उपसर्ग जोड़ना उसका अपमान ही होगा, क्योंकि चन्दन की पवित्रता की तुलना नहीं हो सकती. जो खुद ही अपने आप में कसौटी हो उसके लिए कैसी कसौटी??
आज विज्ञान और कला के क्षेत्र में भले ही कहें कि हम २१ वीं सदीं में आ गये हैं लेकिन प्रेम का रूप कुछ स्वार्थी तत्वों की वजह से बिगड़ा ही है उसके सम्मान में कोई वृद्धि ना हो पाई. आज भी हम प्यार को उतनी ही हेय दृष्टि से देखते हैं जितने की से  आज से सदियों पहले देखते थे. वस्तुतः यही कारण है कि यदि भरे बाज़ार में, अपने परिवार या पत्नी के साथ जा रहे, किसी व्यक्ति से पूछ दिया जाये कि ''क्या आपने कभी किसी से प्रेम किया है?'' तो एक बारगी तो वो सकपका जायेगा और फिर सम्हलकर ज्यादातर झूठा ही जवाब देगा कि 'जी नहीं किया'.. जबकि ये सच है कि भले ही एक तरफ़ा हो लेकिन हर इंसां को अपने जीवन में किसी से प्रेम होता अवश्य है, ये दिल किसी ना किसी पे आता जरूर है. ये कतई संभव नहीं कि कोई ताउम्र प्रेम के मार्मिक स्पर्श से वंचित रहे. मगर लोग खुलकर डंके की चोट पर कभी ये स्वीकार नहीं कर पाते कि हाँ उन्होंने प्रेम किया है. हरबार, हर युग में जब प्रेम करते हैं तो प्रेमी-प्रेमिका परस्पर वादा करते हैं कि हम जुदा होने पर भी आजीवन एक दूसरे को याद रखेंगे और जो हमारे साथ हुआ अपने बच्चों के साथ कतई ना होने देंगे.. लेकिन होता क्या है? ठीक इसके उलट... जब वो माँ-बाप बनते हैं तो ठीक वैसे ही जो कभी प्यार के दुश्मन होते थे. क्या यही प्रेम-चक्र है?? प्रेम-स्रोत जीवन भर उनके ह्रदय में उद्गमित होते रहने के बावजूद वे इसके अस्तित्व को नकार देते हैं. यही कारण है कि संसार में आजतक ईश्वर द्वारा स्वयं के कर-कमलों द्वारा निर्मित सबसे सुन्दर भावनात्मक रिश्ते प्रेम को वह सम्मान प्राप्त नहीं जिसका कि वह हक़दार है.
रोज ना जाने कितने नए दुश्मन इसके खिलाफ मोर्चा खोल दते हैं.. कभी खुदा के नाम पर, कभी भगवान के नाम पर तो कभी गोत्र के नाम पर जैसा कि अभी भारतीय किसान यूनियन के सर्वेसर्वा महेंद्र सिंह टिकैत ने खोल दिया है... हाई कोर्ट के फरमान की उनके लिए कोई अहमियत नहीं... उन्हें अपने दिमाग घुटने में रखने की आदत सी पड़ गयी है. आपको याद हो तो ये वही रुढ़िवादी लोग हैं जो भारत को वापस १६-१७ वीं सदीं में ले जाने को आतुर है... इनकी मर्जी के खिलाफ शादी करने वाले या प्रेम करने वाले जोड़े को सरेआम फांसी दी जाती है, निर्वस्त्र पूरे गाँव में घुमाया जाता है, दोनों को पत्थर मार-मार कर मार डाला जाता है, उनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार होता है या दोनों को आपस में भाई-बहिन बना दिया जाता है और कई बार तो लडकी के साथ उसी के रिश्तेदार बलात्कार जैसे घृणित काम भी कर डालते हैं.. उस समय सारे पाप-पुण्य और खून के रिश्ते भूल जाते हैं.. ये सब हरियाणा, उत्तर-पूर्वी भारत और राजस्थान के कुछ इलाकों में तो होता ही है लेकिन भारत के कई अन्य प्रदेश भी इस बीमारी से अछूते नहीं हैं.
जबकि सब जानते हैं कि प्रेम किसी बंधन को कभी स्वीकारता ही नहीं, ना ही किसी सीमा को, जो लोग यह राज़ समझ पाते हैं वो जी जाते हैं और यह संसार उनके लिए स्वर्ग बन जाता है..
वर्ना हकीकत में हृतिक-सुजैन, शाहरुख़-गौरी, राजीव-सोनिया, नवाब पटौदी-शर्मिला टैगोर, सलीम-हैलेन, सचिन-अंजली आदि जैसे जोड़े भी इस ओछी मानसिकता के शिकार हो गये होते तो प्रेम तो मर ही गया होता. 

दीपक 'मशाल'
चित्र अपनी ही तूलिका से..  

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...