अब जब मैगी और सुट्टे के प्रथम पान की कथा आपसे बिन पूछे ही कह सुनाई तो सोचता हूँ कि मदिरापान पुराण क्यों छोड़ा जाए??? वैसे भी इस मामले में मैं मोतीलाल नेहरु जी को ठीक मानता हूँ कि जब गांधी जी ने उनसे एक बार कहा कि, ''मोती तुम्हे अगर पीना ही है तो घर के अन्दर पियो, इस तरह महफ़िलों में लोगों के सामने पीयोगे तो तुम्हारे बारे में लोग क्या राय कायम करेंगे?''
तो पंडित मोतीलाल नेहरु जी का जवाब था, ''बापू, मैं जिस दिन पीना बंद करूंगा तो कहीं नहीं पियूंगा.. और जब तक पियूंगा तब तक सबको बता के पियूंगा.. मुझसे दिखावा नहीं होता..''..
और वैसे भी किसी शायर ने क्या खूब ही कहा है कि, 'पाल ले इक रोग नादाँ.. ज़िंदगी के वास्ते.. सिर्फ सेहत के सहारे ज़िंदगी कटती नहीं.'
तो एक दिन की बात है मैं किसी बात को लेकर जरा ज्यादा ही ग़मगीन था.. मेरे गोरखपुरी अजीजों से देखा न गया और लगे पूछने कि 'भाई बता बात क्या है?' पर मैं था कुछ अंतर्मुखी सा और फिर आपसे कोई कुछ भाव देकर पूछ रहा हो तो मनौवा लेने का मज़ा भी एक अलग ही सुख देता है. बढ़ते-बढ़ते बात यहाँ तक पहुँच गयी कि उनमे से एक भाई बोले कि 'बोल के तो तुम रहोगे.. चाहे कुछ भी हो जाये'
मैं भी अड़ गया कि 'नहीं बोलूँगा'.. कई नुस्खे आजमाए गए.. मार सेंटी-वेंटी बातां हुईं.. आखिर में शर्त लगी कि उनकी पिलाई शराब मुझे मेरे दिल का गम लोगों को बताने पर मजबूर कर देगी(सुधि पाठकों को सनद रहे कि इससे पहले तक ये शुभ हरकतें मेरी नज़र में पाप की श्रेणी में आती थीं.. ठीक वैसे ही जैसे 'झूठ बोलना पाप है, नदी किनारे सांप है').. मैंने वो भी आजमाने की हामी भर दी. पर दारु खरीदनी/पिलानी उन्हें थी, मुझे सिर्फ गटकनी थी. तो मेरे २ गोरखपुरी अज़ीज़ भाई और एक मैं एक सुनसान से ढाबे पर पहुंचे.. बाकायदा एक टेबल पर ३ कांच के सस्ते से गिलास, बर्फ, स्टील की तश्तरी में प्याज-निम्बू-मिर्ची-खीरे का सलाद सजाया गया, मूंगफली के चिरपिरे-चटपटे बेसन कोटेड दाने लाये गए(कुल मिलाके मुझ नए-नवेले पियक्कड़ के लिए वैसे ही इंतजामात थे जैसे नयी नवेली दुल्हन के लिए होते हैं). अब बस व्हिस्की का खम्बा खोला गया(वैसे ये खम्बा नाम से भी मैं पहली बार परिचित हुआ था.. खम्बे के चित्र के दर्शन के लिए कृपया ऊपर जाएँ..).. दौर चला.. चलता गया. वो दोनों महाशय माहौल को मयमय बनाने के लिए सिगरेट के लच्छे बना रहे थे... और मैं निष्क्रिय धूम्रपान कर रहा था क्योंकि तब तक मैं इस सक्रिय सुट्टापान कला से विरक्त हो चुका था.
अब हर २ पैग बाद मुझे टटोला जाता कि पट्ठा कितने पानी में उतर गया..
दोनों पूछते,''अब बता दे साले क्या हुआ? घर में कोई टेंशन है?''
मैंने कहा ''ऊँहूँ''.. अगला सवाल- ''महबूबा से झगड़ा हुआ?''
जवाब दिया, ''ना''
''पैसे की जरूरत है?''
अबकी सर हिला के जता दिया कि ना.
कोई नहीं फिर २ दौर चले.. और फिर एक सवाल- ''घर की याद आ रही है?''
''क्क्च'' गाल अन्दर से घुमाकर मोड़ा और अजीब सी आवाज़ निकलते हुए नकारात्मक उत्तर उन्हें फिर थमा दिया.
ऐसे-ऐसे होते-होते तीन-सवा तीन घंटे में २ खम्बे और १ अद्धा तीन लोगों ने फिनिश कर दिए और जानबूझकर ज्यादातर मुझे ही पिलाई गयी कि ये गम बताएगा अपना.. पर मैं कनखजूरा चुपचाप रह कर ही गम-गलत करने के मूड में था.
बस अब वापस चलने को हुए तो तीनों की ही हालत स्प्रिंग वाले बन्दर की सी हो रही थी(आप चाहें तो अपनी समझ के कुत्ते दौड़ा इसे ब्रेकडांसर की सी हालत भी कह सकते हैं.. खैर विकल्पों पर न जाएँ अपनी अकल लगायें).. सोचा चलो ऑटो करते हैं.. बस स्टैंड से मेडिकल जाने वाले रास्ते के बीच में यूनिवर्सिटी पड़ती थी और हम लोग स्टैंड और यूनिवर्सिटी के बीच में ही कहीं थे.. पर खुद को होश नहीं आ रहा था कि दादा लोग थे कहाँ?
मेनरोड पर आकर एक ऑटो(विक्रम) रोका गया.. अब उसमे अन्दर झांक कर देखा तो ३-४ लड़कियां पहले ही विराजमान थीं.. सो संस्कारों के वशीभूत होकर मैंने बाकी के दोनों साथियों से कहा कि, ''भाई इसे जाने दो दूसरा ऑटो रोकेंगे.. इसमें लड़कियां हैं''
मेनरोड पर आकर एक ऑटो(विक्रम) रोका गया.. अब उसमे अन्दर झांक कर देखा तो ३-४ लड़कियां पहले ही विराजमान थीं.. सो संस्कारों के वशीभूत होकर मैंने बाकी के दोनों साथियों से कहा कि, ''भाई इसे जाने दो दूसरा ऑटो रोकेंगे.. इसमें लड़कियां हैं''
पर कहते हैं न कि 'जो मजबूत नहीं वो पहिये की धुरी क्या... जो आराम से मान जाये वो गोरखपुरी क्या??'(वैसे आपने इससे पहले ये सुना हो इसकी गुंजाइश मुझे तो नहीं लगती.. क्योंकि इस लोकोक्ति की प्रसूति अभी-अभी मेरे द्वारा ही हुई है..)
तो भाई को नहीं मानना था सो नईं माने.. उल्टा उस बेचारे ऑटो वाले की मातृशक्ति एवं भगिनीशक्ति को अपमान से विभूषित और उसे अविचलित करने वाली उपमाओं से नवाजने लगे और जा बैठे सबको ठेलते हुए ऑटो के अन्दर.. हमारा अन्दर घुसना था कि प्लांक सिद्धांत को सही ठहराते हुए हम तीन दिग्गजों के आयतन के अन्दर जाते ही उसी अनुपात में तीन बेबस, बेचारी, मासूम, शरीफ लड़कियों का आयतन चुपचाप ऑटो से कम हो गया.. वो बाहर आकर ऑटो वाले से बाकी के पैसे लेकर किसी नए साधन का इंतज़ार करने लगीं..
थोड़ा आगे चले तो शर्मा पी.सी.ओ. था.. बस मैं बिदक गया कि एक कॉल करके आता हूँ.. एक जगह(कहाँ का नंबर लगाया ये नहीं बताऊंगा) कॉल किया पर भेद खुलने के डर से ज्यादा बात नहीं की, अब ज्यों ही मैं फोन रखने वाला था कि दोनों में से एक मदहोश साथी मेरे पास आये और बोले,''मैं भी बात करूंगा'' किसी तरह मैंने समझाया कि ''देख तेरे मुंह से बहुत बदबू आ रही है.. दूसरी तरफ जो लाइन पर है वो सूंघ के समझ जाएगा/जायेगी'' मद्यदेवी का कमाल देखिये कि बंदा तुरंत मान गया और बोला, ''कोई नईं तो हम सुबह बात करेंगे''.. उसके बाद नवाबी में अपने खाते में पैसे लिखाये और चल दिए अपने-अपने कमरे की तरफ.. उनका तो पता नहीं कैसे कहाँ पहुंचे पर मैं उस ईद वाले दिन अपने कमरे पर सकुशल पहुँच गया.
लेकिन बिस्तर पर बैठा ही था कि जाने कहाँ बिस्तर, जाने कहाँ फर्श, जाने कहाँ छत और कहाँ दीवारें.. कुछ न पता जी. बस सीधा लहरा के बिस्तर पे धम्म.. ठीक वैसे-जैसे मैराथन जीतने के बाद खिलाड़ी ज़मीन पर गिरता है... अब हर पांच मिनट में पलंग के नीचे घूमती दुनिया देखने के लिए झांकते और सब खाया-पिया बाहर कर देते, रामजाने कित्ती देर ये सिलसिला चला होगा. वो तो भला हो एक अन्य गोरखपुरी मित्र का जो किसी काम से कमरे पर आये और आके प्रत्यक्ष नरक के भोगी बने. फिर वो विभिन्न गंधों से महकते कमरे को कब धो गए, कब मुझे पनाले पर ले जाके सामान्य किया कुच्छ न पता चला.. जाना तो बस सीधा अगले दिन जब वो अज़ीज़ अपना-अपना हैंगओवर(ये बड़ा ही शुद्ध साहित्यिक शब्द है जिससे पियक्कड़ बन्धु अच्छे से वाकिफ होंगे) उतार कर आये जिनके साथ हम हमप्याला हुए थे.. और मेरी मकान मालकिन ने उन्हें जी भर के गालियाँ दीं कि ''शरीफ लड़के की क्या दशा कर दी? कितनी शराब पिला दी.. पीना सिखा रहे हैं.. बिगाड़ रहे हैं..भागो यहाँ से. खबरदार जो कभी इस बच्चे के आसपास भी दिखाई दिए तो.''
अब मैं भी नवाज़ शरीफ बन गया.. कैसे कहता कि मैं भी महज़ जूनियर कलाकार नहीं था इस कलाकारी में..
अब जब भी कभी कहीं पार्टी में या किसी के साथ चीयर्स बोल रहे होते हैं तो वो पीने का उद्घाटन जरूर याद करते हैं और साथ ही तय कर लेते हैं कि कितना पीना है..( वैसे मैं रोज या हफ्ते वाला नहीं भाई.. इस तरह के महासम्मेलन द्विमासिक या त्रिमासिक ही होते हैं और अब ज्यादातर बीयर से ही काम चला लिया जाता है..)
और आखिर में अगर शराब, सिगरेट छुड़ाने की मुफ्त तकनीक चाहिए हो तो अगली पोस्ट में बता दूंगा जो आपकी आज्ञा हो तो..
अब मेरी पसंद के दो चिट्ठे-
पंकज उपाध्याय http://pupadhyay.blogspot.com/
शरद कोकास http://kavikokas.blogspot.com/2010/06/blog-post.html
और आखिर में अगर शराब, सिगरेट छुड़ाने की मुफ्त तकनीक चाहिए हो तो अगली पोस्ट में बता दूंगा जो आपकी आज्ञा हो तो..
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पंकज उपाध्याय http://pupadhyay.blogspot.com/
शरद कोकास http://kavikokas.blogspot.com/2010/06/blog-post.html
दीपक 'मशाल'
चित्र गूगल बाबा की किरपा से...


