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मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

जाने कैसे पडोसी हैं, उसे सोने नहीं देते.------>>>> दीपक 'मशाल'


झूठ मैं कह नहीं पाता, सच वो कहने नहीं देते
क्यों मुझको मिरे माफिक, जग में रहने नहीं देते

क्यों तुमने बनाया है, अमरित ये हलाहल सा
(ये क्या सौगात भेजी है, अमरित भी हलाहल भी)
कभी जीने नहीं देते, कभी मरने नहीं देते

हैं इतनी सख्त दिवारें, फर्श जैसे हैं दलदल से
खड़ा मैं रह नहीं पाता, क़दम गिरने नहीं देते

बेरहम कातिल कहीं अच्छा, तुम्हारे उन उसूलों से
जो मकतूल के ग़म में, उसे रोने नहीं देते
(जो मजबूर के ग़म में, मुझे रोने नहीं देते)

इकबार में बाज़ार में, मुझे नीलाम कर दो तुम
ये हरदिन के मोल-भाव, मुझे जीने नहीं देते

'मशाल' सपने मुहब्बत के, बुनना चाहता लेकिन
जाने कैसे पडोसी हैं, उसे सोने नहीं देते.
दीपक 'मशाल'

इसी ग़ज़ल का नया रूप जिसे संवारा है आदरणीया रश्मिप्रभा जी ने-
झूठ मैं कह नहीं पाता, सच वो कहने नहीं देते
क्यों मुझे  मिरे माफिक, जग में रहने नहीं देते
क्यों तुमने बनाया  अमृत को  हलाहल सा
जो कभी  जीने नहीं देते औ  कभी मरने नहीं देते
हैं इतनी सख्त दिवारें, फर्श  हैं दलदल से
खड़ा मैं रह नहीं पाता औ  क़दम गिरने नहीं देते

बेरहम कातिल कहीं अच्छा, तुम्हारे उन उसूलों से
जो मकतूल के ग़म में, उसे रोने नहीं देते
(जो मजबूर के ग़म में, मुझे रोने नहीं देते)
इकबार  बाज़ार में, मुझे नीलम कर दो तुम
ये हरदिन के मोल-भाव, मुझे जीने नहीं देते
'मशाल' सपने मुहब्बत के, बुनना चाहता लेकिन
जाने कैसे पडोसी हैं, उसे सोने नहीं देते.


चित्र साभार गूगल से..

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

मात पे भी मेरी बधाई दे दी...------->>>>>>>दीपक 'मशाल'


मैंने चाहा था उम्र भर के लिए
उसने जन्मों की जुदाई दे दी
साथ रहने का वादा करके
मुझको लोगों की दुहाई दे दी
क़ैद होकर मिरे ही दिल में
मेरी धड़कन को रिहाई दे दी
इक करम माँगा था उल्फत में
तुमने सारी ही खुदाई दे दी
आके जलसे में मेरी खुशियों के
तुमने तोहफे में रुलाई दे दी
दिल को बहला तमाम बातों से
क़त्ल कर के भी सफाई दे दी
मैं मर मिटा इस अदा पे 'मशाल'
मात पे भी मेरी बधाई दे दी...
दीपक 'मशाल'

रविवार, 31 जनवरी 2010

मंदिर में रावण मधुशाला में राम हूँ मैं**********---->>>>>>दीपक 'मशाल'

वफ़ा जो नहीं बेवफा ही सही
चलो याद तो रखोगे तुम,
मेरी खूबी नहीं खता ही सही
चलो याद तो रखोगे तुम.

मंदिर में रावण मधुशाला में राम हूँ मैं
हालात ना पहचानता इसलिए बदनाम हूँ मैं
घात को मैं प्यार दूँ प्यार को देता हूँ घात
रण में हूँ गौतम तो शयन में संग्राम हूँ मैं
हूँ तो मैं मुहूर्त मगर जरा सा बहका सा
दिवाली की सुबहा औ होली की शाम हूँ मैं
न मानता मैं जानकर जात छुपे चेहरों की
सच्चाई के दामन पे झूठा इल्जाम हूँ मैं
उलटी है चाल अब 'मशाल' मिरे मोहरों की
प्यादों से करता काम खुद का तमाम हूँ मैं
आपका-
दीपक 'मशाल'
चित्र- अपनी ही तूलिका से..

शनिवार, 21 नवंबर 2009

नया नहीं बन पाया तो सम्बन्ध पुराना बना रहे..........................'बीती ख़ुशी' ......क्या हुआ जो आरज़ू लब तलक आयी नहीं........दीपक 'मशाल'

दोस्तों आज मैं आपकी खिदमत में २ रचनाएं पेश कर रहा हूँ, जिनमे से एक तो मेरी है और दूसरी मेरे किसी ऐसे अज़ीज़ की जिनके बिना मेरा जीवन अधूरा है... उनके नाम की बजाए उन्हें 'बीती ख़ुशी' कहना ज्यादा मुनासिब होगा.. लीजिये तो पहले उन्हीं का लिखा देखिये-

नया नहीं बन पाया तो सम्बन्ध पुराना बना रहे,
आखिर जीने की खातिर कोई बहाना बना रहे.
सच कहती हूँ कभी नहीं मैं तुमसे कुछ भी मागूंगी,
बस बेगानी बस्ती में इक ठौर ठिकाना बना रहे.
सहन कभी क्या कर पाएगी मेरे दिल की आहट ये,
तुम बेगाने हो जाओ गुलशन गुलज़ार ये बना रहे.
सुबह देर से आँखें खोलीं मैंने केवल इसीलिए,
बहुत देर तक इन आँखों में ख्वाब सुहाना बना रहे...
'बीती ख़ुशी'

अब इसके बाद मेरा घटिया टूटा फूटा भी पढ़ लीजिये-

क्या हुआ जो आरज़ू लब तलक आयी नहीं,
क्या हुआ गर इश्क ने मंजिल पायी नहीं.
सीने में है महफूज़ मेरे शम्मा-ए-चाहत अभी,
क्या हुआ अरमान पे जो चाँदनी छायी नहीं.
उम्र भर से दिल पे मेरे नाम है उसका सजा,
क्या हुआ जो उसने मेरी नज़्म कोई गायी नहीं.
हाथ मेरे जब उठे मांगी दुआ उसके लिए,
क्या हुआ जो मुश्किलों में संग वो आयी नहीं.
बहार हर क़दम मिले जाए 'मशाल' वो जिस गली,
क्या हुआ जो मेरी गली खुशियाँ वो लायी नहीं..
दीपक 'मशाल'
चित्र- दीपक 'मशाल' के कैमरे से..

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

जाने क्या समझा.TTTTTTTTTTTTदीपक 'मशाल'

तूने कहा था जाने को मगर, मैं इशारा जाने क्या समझा,
था तो इंकार तेरी जानिब से, ये ज़माना जाने क्या समझा.


पानी न था मेरी आँख में जब, वो पत्थर बुलाता रहा मुझे,
तेरी चुनरी ने अश्क सोखे तो, वो फ़साना जाने क्या समझा.


मेरी खता क्या है ये बता मुझे, साज़ मेरा नहीं गलत यारा,
मैंने छेड़ी थी तान उल्फत की, तू तराना जाने क्या समझा.


तुम तो भंवर में तैरने के आदी हो, ये सुना करते हैं हम,
जो हमने अपनी नाव डाली, तो किनारा जाने क्या समझा.


किसको वफ़ा है मिली भला, ढाके यहाँ सितम-ए-जफ़ा,
उनकी मसखरी की आदत को, दिल हमारा जाने क्या समझा.


यूंही शब् भर था सिसकता रहा, मेरी कहानी सुन के 'मशाल',
मुझे था शौक गम सुनाने का, वो दीवाना जाने क्या समझा.


दीपक 'मशाल'
चित्र- दीपक 'मशाल' के कैमरे से...

शनिवार, 7 नवंबर 2009

-ग़ज़ल-----------------------------------दीपक 'मशाल'


-ग़ज़ल-
ये परिंदा इन दरख्तों से, पूछता रहता है क्या,
ये आसमां की सरहदों में, ढूंढता रहता है क्या.

जो कभी खोया नहीं, उसको तलाश क्या करना,
इन दरों को पत्थरों को, चूमता रहता है क्या.

खोलकर तू देख आँखें, ले रंग ख़ुशी के तू खिला,
गम को मुक़द्दर जान के, यूँ ऊंघता रहता है क्या.

कोई मंतर नहीं ऐसा, जो आदमियत जिला सके,
कान में इस मुर्दे के, तू फूंकता रहता है क्या.

आएँगी कहाँ वो खुशबुएँ, अब इनमें 'मशाल',
दरारों में दरके रिश्तों की, सूंघता रहता है क्या.
दीपक 'मशाल'

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009

बहुत मन से लिखी है ये पोस्ट उम्मीद है आपको पसंद आएगी.****************************


बहुत मन से लिखी है ये पोस्ट उम्मीद है आपको पसंद आएगी..............

बिक चुके इन्साफ ने जब फैसला उसका किया,
सुन के वो तो हँस दिया मुंसिफ मगर रोने लगा.


थक गया पढ़ के खबर, सच्चाइयों के क़त्ल की,
कल से कुछ उम्मीद कर वो आज फिर सोने लगा.


जाने किसने कह दिया, इंसां का खूँ पानी हुआ,
भीगे हुए हाथ अपने फिर से वो धोने लगा.

उगती कहाँ थीं बालियाँ बारिश बिना उस खेत में,
भूल के अच्छा-बुरा वो असलहे बोने लगा.


ले कलम कहता था चल असलियत ढूंढें कहीं,
अब हाथ धर के पेट पे, झूठ वो ढोने लगा.


गौर से सुनिए 'मशाल' कह रहा है क्या खुदा,
बँट चुका इतना हूँ अब पहचान मैं खोने लगा.


दीपक 'मशाल'
चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार लिया गया.

बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

तकलीफ भरा अंत भी होता है प्यार का,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,


'तकलीफ भरा अंत भी होता है प्यार का, इस अंजुमन में सिर्फ खुशियाँ नहीं मिलतीं.' इसीलिए अगर
 आपने किसी से प्यार किया है तो हर अंजाम के लिए तैयार रहें कहीं ऐसा ना हो कि अपने उन से जुदा होके आपके चोट खाए दिल को भी मजबूरी में ये कहना पड़े कि-

मैं जब इक सांस लेता हूँ तो दूजी भूल जाता हूँ,
तुम्हारे हिस्से का अब मैं हर काम भूल जाता हूँ.

सुबह होती है दिन में ये तो याद रहता है,
ना जाने क्यों हर दिन की शाम भूल जाता हूँ.


दिल सुनता नहीं मेरी जिहन से कुछ कह नहीं पाता,
मैं सुन लेता हूँ बातों को, कहना भूल जाता हूँ.


कुछ इस तरह हो गया खाना भी आजकल,
रोटियां तोड़ लेता हूँ, साग मैं भूल जाता हूँ.


तुम्हारा नाम तो हर वक़्त मुझको याद रहता है,
अक्सर ही मगर अपना नाम मैं भूल जाता हूँ.


जब कुछ सोचता हूँ 'मशाल' तुम ही याद आते हो,
प्यार तो याद रहता है, मैं झगड़े भूल जाता हूँ.

दीपक 'मशाल'
चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार प्राप्त.

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