आप में से ज्यादातर लोगों ने ये चुटकला तो सुन ही रखा होगा कि- 'एक बार एक नदीं में कोई बच्चा डूब रहा था.. काफी भीड़ जमा हो गयी किनारे पर लेकिन गहरी और ठन्डे पानी वाली उस नदी में कूदने की किसी की हिम्मत ना पड़े.. सब एक दूसरे का मुँह तक रहे थे कि अचानक एक नौजवान नदी में कूदा और देखते ही देखते बच्चे को बचा के बाहर आ गया.
अब तो वो सब का हीरो बन गया.... लगे सब वाह-वाही करने और उसकी पीठ थपथपाने. मगर वो युवक बहुत गुस्से में एक पीठ थपथपाने वाले का हाथ झटक के बोला-- ''अरे शाबाशी गयी भाड़ में..... पहले ये बताओ कि मुझे नदी में धक्का किस कमीने ने दिया था????''
कल के एक गैर महत्वपूर्ण समाचार(गैर महत्वपूर्ण इसलिए कि ये मीडिया के लिए विशेष खबर हो सकती है आम आदमी के लिए अब ये कोई न्यूज़ नहीं रही) पर अचानक नज़र पड़ गयी... हुआ ये कि मीडिया महान का कहना है कि उनके माई-बाप राहुल गाँधी मुंबई की लोकल ट्रेन में चढ़े नहीं बल्कि चढ़ाये गए थे.. :) .. हुआ ये कि राहुल का प्लान था कि स्टेशन पर ही जनता-जनार्दन को दर्शन देकर कार से काफिले को आगे बढ़ाएंगे. लेकिन इतनी सुरक्षा के बावजूद जाने किसने उसे ऐसा धक्का दिया कि वो भी आम लोगों कि तरह हवा में तैरते हुए डब्बे के अन्दर पहुँच के अमरुद बन गया(वैसे वीडियो रेकॉर्डिंग में ऐसा कुछ दिखा तो नहीं). अब जो हो गया सो हो गया.. लेकिन इस बिना पूर्वनियोजित कारनामे से अच्छी खासी प्रशंसा तो मिल गयी... और राहुल कम से कम उस चुटकुले के युवक की तरह बेवक़ूफ़ तो था नहीं कि तारीफ के बाद भी चिल्लाये कि-- '' पहले ये बताओ कि धक्का किसने दिया???'' लेकिन सुनने में आया है कि जांच एजेंसियां ये पता लगाने में दिन-रात लगीं हैं कि धक्का(वैसे पहला धक्का कहना चाहिए क्योंकि उसके बाद तो सबने ही धक्के लगा के अन्दर ठेला होगा) आखिर दिया किसने?? मैं कुछ ऐसे सोच रहा था कि भाई हमारे यहाँ कई ऐसे क्षेत्र हैं कि वहां लोग पीछे से धक्का देके, पटक के चाक़ू चलाते हैं और जान निकाल के चले भी जाते हैं, चाक़ू, छुरा लहराते हुए...मगर F.I.R. लिखने के वक़्त थाने की स्याही ख़त्म हो जाती है इसलिए शिकायत ससुरी लिखी नहीं जाती... यहाँ देखो-- एक धक्के से वाह-वाही भी मिली और फिर जांच एजेंसियां उस मरदूद के पीछे पड़ गयीं सो अलग कि 'आखिर धक्का दिया तो दिया किसने'(और जिस आतंकवादी ने सारे देश के दिलों को धक्का दिया, सदमा दिया.. वो अभी तक हिन्दुस्तानी बिरयानी खा रहा है..) मेरी बात पर भरोसा नहीं तो नीचे लिंक दिया है खुद ही देख लीजिये-
राहुल को धक्का किसने मारा...
चलिए इसी बात पर प्रेम के स्वरुप को परिभाषित करती एक और कविता का कुठाराघात सहन करिए... जिसमे बताने की कोशिश कर रहा हूँ की प्यार में मैं कैसा रिश्ता चाहता हूँ.. मुलायजा फरमाएं---
देह नहीं बस नेह का रिश्ता
बिना किसी संदेह का रिश्ता
आती-जाती साँसों जैसा
एक सरल संवेग का रिश्ता
उसके दिल में क्या चलता है
ये खुद के दिल से जान सकूं
एक स्रोत से जो निकला हो
वो दर्दों के आवेग का रिश्ता
तन को वैसे आवश्यक है
हर फल का आहार मगर
दीर्घायु से जुड़ा है जैसे
इक ताज़े अवलेह का रिश्ता
सबकुछ होकर भी कुछ ना हो
औ कुछ ना होकर भी सबकुछ
कुंती से वो जुड़ा था जैसे
सूर्यपुत्र राधेय का रिश्ता
यूँ तो यथार्थ भी निर्देशक है
कितनी सारी रचनाओं का
कल्पनाओं से कवि का हो पर
ज्यों पावन सा स्नेह का रिश्ता
दीपक 'मशाल'
चित्र-साभार गूगल से...
