दोस्तों, जब से अपने देश गया शायद उसके कुछ दिन बाद से ही थोड़ी सी खांसी उठनी शुरू हो गयी थी जो कि परहेज़ ना करने, निरंतर सर्दी में यात्रा करने और दवा लेने में लापरवाही करने से आज शायद किसी गंभीर बीमारी में परिणित हो चुकी है..... सोचा यू.के. वापस आके कुछ दिन आराम करने से ठीक हो जायेगा लेकिन यहाँ तो उलट खांसी के साथ जुकाम, पीठ दर्द, सरदर्द और बुखार भी लग गए.. डॉ. को दिखाया तो उसने टी.बी. की सम्भावना व्यक्त करते हुए एक्स-रे कराने के लिए बोला.. अब चूंकि कल डॉ. से मिला था और कल शाम देर हो जाने की वजह से आज एक्स-रे कराया.. मगर रिपोर्ट सीधी डॉ. के पास भेज दी गई और डॉ.स्माइली 5 दिन की छुट्टी पे चली गयीं. तो अब तो सीधा सोमवार को ही मिलेंगीं... तब तक ये अनिश्चितता ही बनी हुई है की मुझे टी.बी. है या नहीं..{वैसे उन्होंने सिर्फ ciprofloxasin 500 mg BD लेने के लिए बोला है(ये जानकारी सिर्फ दराल सर के काम की है)}..
वैसे दिल की बात ये है कि मुझे मौत से डर तो नहीं है.. हाँ लेकिन मैं एक गुमनाम मौत नहीं मरना चाहता... मैं नहीं चाहता कि लोगों को पता भी ना चले कि दीपक मशाल नाम का कोई शख्स इस दुनिया में कभी आया भी था या नहीं.. अभी किया ही क्या है मैंने... अभी तो ईश्वर ने जो कलाएं दीं उनका दुनिया के लिए उपयोग किया ही नहीं... अभी तक तो ऐसा मंच बनाने में ही लगा हूँ जिस पे चढ़ के जब मैं कोई सही बात बोलूँ तो दुनिया मुझे सुने..
अभी तो ढंग से ये भी नहीं पता कि मेरा पहला कविता संग्रह 'अनुभूतियाँ' लोगों के बीच मुझे कितनी पहिचान दिला पाया है :)... खैर ये सब तो मजाक की बात है... लेकिन हाँ अगर मुझे ये सफ़र बीच में ही छोड़ के जाना पड़ा तो जिस उद्देश्य के लिए परमपिता ने धरती पे भेजा उसको पूरा ना कर पाने का अफ़सोस तो रहेगा ही... क्या इसका मतलब ये समझूं कि परवरदिगार को मुझपे भरोसा नहीं कि मैं उनसे किया वादा पूरा कर पाऊंगा..
ये तो पता है कि टी.बी. अब कोई जानलेवा बीमारी नहीं रही(अगर ये मुझे होती भी है तो)अगर ये कोई लाइलाज बीमारी भी हुई तो भी मैं रोते धोते तो नहीं ही मरना चाहता.. मरना चाहता हूँ तो 'आनंद' की तरह........ सबको हँसते हंसाते....लेकिन समस्या यहाँ भी खड़ी होती है, कि आनंद को तो कैंसर हो रखा होता है.. जिसमे कम से कम उसके चाहने वाले अंतिम समय में उसके करीब तो रह सकते थे.. अब यहाँ बीमारी भी ऐसी कि कौन पास आये.. और माँ, बहिन, प्रेयसी जैसे कुछ रिश्ते जो साथ रहना भी चाहें तो मैं उन्हें साथ रहने क्यों दूं... क्यों अपने साथ उनको भी इसके जीवाणु दे जाऊं???
झूठ नहीं कह रहा दोस्तों... डर मरने का नहीं मुझे बस इतना सा है कि ऐसी बीमारी ना हो कि मरते वक़्त अपनों को मुझे खुद ही दूर करना पड़े.... क्योंकि दूर मैं होना नहीं चाहूँगा और इस डर से कि उन्हें कुछ हो ना जाये पास मैं उन्हें लाऊंगा नहीं...
वैसे अन्दर से मेरी इच्छाशक्ति तो यही कहती है कि ''हमको मिटा सके ये किसी बीमारी में दम नहीं.....''
मैं कहीं से नकारात्मक नहीं होना चाहता और ना ही हो रहा हूँ बस दुनिया के एक सच को दिमाग में बिठा के रखे हूँ कि यहाँ कभी भी कुछ भी हो सकता है... और मेरे अजीजों से मेरा यही कहना है कि किसी भी बीमारी के मामले में मेरी तरह लापरवाह ना हों.. वर्ना बेवजह आपके उद्देश्य में बाधा बनते हुए, जीवन के कुछ अतिमहत्वपूर्ण दिन बर्बाद हो सकते हैं.. या क्या पता सारा जीवन भी....
इसी के साथ एक आशावादी कविता -
-उम्मीद-
हर रोज
बिस्तर पर जाने से पहिले
सहसा चली जाती है नज़र...
इन हाथों की लकीरों पर
और....
और इस उम्मीद से कि
काश....
ये कुछ बदल जाएँ कल तक..
और बदल जाए बहुत कुछ
इनके बदलने से..
जैसा कि
लोग कहते हैं अक्सर...
मगर...
हर सुबह
वही नाउम्मीदी,
ना बदलती हैं ये लकीरें
और ना ही हर शाम
बदलती है उम्मीद
इनके बदलने की.......
दीपक मशाल
चित्र- अपने ही कैमरे से...
(नोट-ये आलेख सिर्फ हलके फुल्के मजाक के लिए लिखा गया है इसे ज्यादा गंभीरता से ना लें)
