वफ़ा जो नहीं बेवफा ही सही
चलो याद तो रखोगे तुम,
मेरी खूबी नहीं खता ही सही
चलो याद तो रखोगे तुम.
मंदिर में रावण मधुशाला में राम हूँ मैं
हालात ना पहचानता इसलिए बदनाम हूँ मैं
घात को मैं प्यार दूँ प्यार को देता हूँ घात
रण में हूँ गौतम तो शयन में संग्राम हूँ मैं
हूँ तो मैं मुहूर्त मगर जरा सा बहका सा
दिवाली की सुबहा औ होली की शाम हूँ मैं
न मानता मैं जानकर जात छुपे चेहरों की
सच्चाई के दामन पे झूठा इल्जाम हूँ मैं
उलटी है चाल अब 'मशाल' मिरे मोहरों की
प्यादों से करता काम खुद का तमाम हूँ मैं
आपका-
दीपक 'मशाल'
चित्र- अपनी ही तूलिका से..
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रविवार, 31 जनवरी 2010
बुधवार, 27 जनवरी 2010
'संविधान सराहना दिवस'...........दीपक मशाल
वैसे तो ये कविता कल ही लगा देनी चाहिए थी, लेकिन आज ही सही...
आज हमें मनाना है,
उस शुभ दिवस को,
हुआ था लागू
संविधान जिस दिवस को.
वो संविधान जो जलता है,
नहीं... जलाया जाता था हर रोज
चौराहे पर....
हाँ वही.. जिसमे
संशोधनों की नई कीलें
ठोक दी जातीं हैं
जब चाहें...और जब ना चाहें तब भी.
हाँ! हाँ! वही संविधान
जिसे दुनिया के संविधानों की
नक़ल की पोथी भी कह देते हैं...
और बदल लेते हैं सफ़ेद लबादों को ओढने वाले
इसे बरसात में बरसाती में..
और सर्दी में शॉल में.
उसी संविधान के
लागू होने की शुभ तिथि
या फिर 'शायद'
एक दिन तीन सौ पैंसठ दिनों में..
कोशिश करते हैं हम मनाने की
'संविधान सराहना दिवस'
दीपक मशाल
चित्र- साभार गूगल से
आज हमें मनाना है,
उस शुभ दिवस को,
हुआ था लागू
संविधान जिस दिवस को.
वो संविधान जो जलता है,
नहीं... जलाया जाता था हर रोज
चौराहे पर....
हाँ वही.. जिसमे
संशोधनों की नई कीलें
ठोक दी जातीं हैं
जब चाहें...और जब ना चाहें तब भी.
हाँ! हाँ! वही संविधान
जिसे दुनिया के संविधानों की
नक़ल की पोथी भी कह देते हैं...
और बदल लेते हैं सफ़ेद लबादों को ओढने वाले
इसे बरसात में बरसाती में..
और सर्दी में शॉल में.
उसी संविधान के
लागू होने की शुभ तिथि
या फिर 'शायद'
एक दिन तीन सौ पैंसठ दिनों में..
कोशिश करते हैं हम मनाने की
'संविधान सराहना दिवस'
दीपक मशाल
चित्र- साभार गूगल से
सोमवार, 25 जनवरी 2010
एक गीत############### दीपक मशाल
ना मिले आसमा ना जमीं मयस्सर होवे
बस तेरी गोद हो माँ जिसमें मेरा सर होवे
अब यही ठान के हम लड़ चले हैं तूफाँ से
के तेरे पैर हों माँ काफिरां दा सर होवे.
ना मिले आसमा.........
दरिया या समंदर हो और ना कश्ती हो
देखते-देखते उस पार चले जायेंगे
इतनी अरदास है माँ मेरी तिरे चौखट पे
के तेरे बेटे पे माँ तेरी इक नज़र होवे
ना मिले आसमा..........
ख़ाक हस्ती मैं करुँ बुरी नज़र वालों की
रखके सूरज को तेरे सर पे आँख मूंदूं माँ
गिरे जब भी ये बदन मिले आँचल का कफ़न
और मेरी मौत का माँ दूर तक असर होवे
ना मिले आसमा..........
ऐसी हलचल के चिरें सीने सारी तोपों के
हौसले रकीबों के धूल में मिला डालें
कोई देखे ना पलट के भी तेरे दामन पे
इस कदर रूह का भी मेरी माँ असर होवे
ना मिले आसमा...........
जागे सिंहों के शहर राख ये पड़े जिधर
सारे देशों का शहंशाह हिन्दुस्तान बने
अश्क निकले न किसी आँख से जाने पे
जो भी निकले वो सुर्ख लहू-ए-जिगर होवे
ना मिले आसमा...........
दीपक मशाल
बस तेरी गोद हो माँ जिसमें मेरा सर होवे
अब यही ठान के हम लड़ चले हैं तूफाँ से
के तेरे पैर हों माँ काफिरां दा सर होवे.
ना मिले आसमा.........
दरिया या समंदर हो और ना कश्ती हो
देखते-देखते उस पार चले जायेंगे
इतनी अरदास है माँ मेरी तिरे चौखट पे
के तेरे बेटे पे माँ तेरी इक नज़र होवे
ना मिले आसमा..........
ख़ाक हस्ती मैं करुँ बुरी नज़र वालों की
रखके सूरज को तेरे सर पे आँख मूंदूं माँ
गिरे जब भी ये बदन मिले आँचल का कफ़न
और मेरी मौत का माँ दूर तक असर होवे
ना मिले आसमा..........
ऐसी हलचल के चिरें सीने सारी तोपों के
हौसले रकीबों के धूल में मिला डालें
कोई देखे ना पलट के भी तेरे दामन पे
इस कदर रूह का भी मेरी माँ असर होवे
ना मिले आसमा...........
जागे सिंहों के शहर राख ये पड़े जिधर
सारे देशों का शहंशाह हिन्दुस्तान बने
अश्क निकले न किसी आँख से जाने पे
जो भी निकले वो सुर्ख लहू-ए-जिगर होवे
ना मिले आसमा...........
दीपक मशाल
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