आज की तारीख में वैसे तो हर कोई अपनी-अपनी मर्जी का राजा है और अपने-अपने ब्लॉग का भी.. लेकिन फिर भी मैं आप सभी से एक विनम्र निवेदन करना चाहता हूँ.. वो है अपने उद्देश्य(हिंदी का संवर्धन) से ना भटकने का.. क्योंकि आजकल कुछ ज्यादा ही उठापटक दिख रही है.. जिसका साफ़ मतलब है कि अब हम लोगों को अपनी प्रतिष्ठा बड़ी लगने लगी है और हिंदी की छोटी...
मैं चाहता तो था कि एक ऐसा दोहा लिखूं जो महाकवि बिहारी जी की तर्ज पर हो.. लिखने को शायद लिख भी लेता लेकिन अपने को उस लायक नहीं समझता कि उस कवि शिरोमणि की रचना पर पैरोडी भी बनाऊं.. और फिर वैसे भी वो प्रसिद्द प्राचीन प्रसंग यहाँ सुनाकर भी अपनी बात को स्पष्ट कर सकता हूँ.. और उम्मीद कर सकता हूँ आप सबसे कि अपनी कलम की धार को बरक़रार रखते हुए उसका उपयोग हिंदी की प्रगति की राह में उग आयी झाड-झंखाड़ को काटने में करें.. ना कि स्वयं को उभारने में और बेशक अगर आप इस पुण्य कार्य में सफल होते हैं तो दुनिया अपने आप ही आपका नाम जानेगी.. कहने की जरूरत ही नहीं.. अगर नहीं भी जानेगी तो 'नींव का पत्थर' तो याद होगा ना..
वो प्रसंग जिसको कि हमारे ब्लॉग संसार को स्मरण कराने की जरूरत है वो इस प्रकार है-
जयपुर-नरेश मिर्जा राजा जयसिंह अपनी नयी रानी के प्रेम में इतने डूबे रहते थे कि वे महल से बाहर भी नहीं निकलते थे और राज-काज की ओर कोई ध्यान नहीं देते थे। मंत्री आदि लोग इससे बड़े चिंतित थे, किंतु राजा से कुछ कहने को शक्ति किसी में न थी। बिहारी ने यह कार्य अपने ऊपर लिया। उन्होंने निम्नलिखित दोहा किसी प्रकार राजा के पास पहुंचाया -
नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास यहि काल।
अली कली ही सा बिंध्यों, आगे कौन हवाल।।
(अली- भंवरा मगर इशारा जय सिंह की तरफ था, कली- जयसिंह की नयी रानी)
इस दोहे ने राजा पर मंत्र जैसा कार्य किया। वे रानी के प्रेम-पाश से मुक्त होकर पुनः अपना राज-काज संभालने लगे।
अपने देश में मुद्दों की कमी तो है नहीं, फिर आपस में एक दूजे पर ये छींटाकशी क्यों??
बाकी आप सब स्वयं समझदार हैं इसलिए मुझे भरोसा है कि इस अल्पज्ञ की बात को अन्यथा ना लेके सार्थक रूप में लेंगे.. बुरा लगे तो अपनी भड़ास भी निकाल सकते हैं.. छोटा हूँ ना.. शायद समझ ना पा रहा होऊं.. :)
आज से कुछ दिनों के लिए ब्लॉग लेखन को विराम देता हूँ.. जल्दी ही फिर मिलेंगे, नए जोश के साथ...
दीपक 'मशाल'
चित्र साभार गूगल से
