आज प्रेम चतुर्दशी की पूर्व संध्या पर एक कविता, जो कि वास्तव में एक ताना है कुछ रेडियो चैनल वालों के लिए आपके सामने रख रहा हूँ... इसमें मैंने रेडियो पर प्रेम सिखाने या उसे बढ़ावा देने वालों से गुज़ारिश की है कि प्रेम के मामले में हस्तक्षेप ना ही करें.. मुझे डॉ. लव या लव गुरु जैसे लोगों से और उनकी अव्यवहारिक सलाहों से बड़ी ही कोफ़्त होती है...
साथ ही आपमें से जो भी लोग ये कहते हैं कि प्रेम के लिए एक दिन नहीं होना चाहिए उनसे पूछना चाहूंगा कि भगवान की पूजा के लिए तो सारे ही दिन शुभ हैं पर हम दिवाली, होली, संक्रांति क्यों मनाते हैं... जैसे उन दिनों से कोई ना कोई प्रसंग जुड़ा होता है ठीक वैसे ही इस दिन से भी जुड़ा है...
कविता-
ऐ डॉ. लव!
ऐ लव गुरु!!
तुम क्या समझोगे, क्या समझाओगे प्यार को..
खुद भी उलझोगे और उलझाओगे प्यार को
छोडो भी यार ये तुम्हारे बस की बात नहीं है
तुम्हारे बस का काम नहीं है.. तुम्हारे बस का रोग नहीं है...
ये शफक है आफताब की
किसी मयखाने की शाम नहीं है
तुम तो उलझे हो और उलझे रहोगे
खुद भी उलझोगे और लोगों को उलझाते रहोगे
हकीकत ये है कि ये समझने समझाने का खेल नहीं है
रूठने मनाने का खेल नहीं है
बार-बार छोड़ने अपनाने का खेल नहीं है
ये तो महसूस करने की चीज़ नहीं है
और समझने का खेल तो ऊपर वाले माले में होता है
और ये काम तो बीच वाले माले के हवाले है..
क्योंकि ये मोहब्बत है.
लेकिन तुम्हारे सारे काम तो
ऊपर और नीचे वाले माले में ही होते हैं....
इसलिए ऐ लव गुरु.... ऐ डॉ. लव....
जाने भी दो यार
तुम ना सिखलाओ लोगों को... तुम ना समझाओ प्यार को
रहने भी दो तुम ना उलझाओ प्यार को..
लैला-मजनूँ बनाने से नहीं बनते..
हीर-राँझा सिखाने से नहीं बनते
क्योंकि सीखने के लिए चाहिए दिमाग और सिखाने के लिए चाहिए दिमाग
और मोहब्बत दिल से होती है... हाँ मोहब्बत दिल से होती है..
अगर तुम समझा सकते हो
अगर तुम सिखा सकते हो
तड़पना दर्द में... और ठिठुरना सर्द में
तभी हाँ सिर्फ तभी मोहब्बत सिखाना तुम..
वर्ना खुदा पाक की मासूम खूबी पे
दाग ना लगाना तुम..
वैसे मैं जानता हूँ .. कि तुम बाज़ार में हो कुछ बेचोगे जरूर
प्यार नहीं छल ही सही..
इसलिए .. हाँ इसीलिए मैं कहता हूँ हाथ जोड़ के तुमसे
कि ऐ डॉ. लव, ऐ लव गुरु...
तुम क्या समझोगे.. क्या समझाओगे प्यार को..
खुद भी उलझोगे और उलझाओगे प्यार को....
दीपक 'मशाल'
चित्र साभार गूगल से...
