सोमवार, 12 जुलाई 2010

बीहड़ की शादी(अंतिम भाग)------->>>दीपक'मशाल'

धर्मशाला में कुछ देर आराम फरमाने के बाद जब नाश्ते-खाने के वक़्त वीडिओ कैमरे की हैलोजन लाईट के लिए जनवासे के जनरेटर मालिक से कनेक्शन देने के लिए कहा तो वो ऐसे नखरे दिखाने लगा के जैसे मन्नू बाबा(मनमोहन सिंह) से कीमतें कम करने के लिए कह दिया हो.. किसी तरह दुल्हन के भाई को समझाया कि बिना लाईट के शादी की रेकोर्डिंग नहीं हो पायेगी, तब जाके कहीं थोड़ी सी उधार की बिजली नसीब हुई.. उसके बाद हमारा तहलका डोट कॉम चालू हुआ कि किसने कितनी कचौड़ी और कितने रसगुल्ले उड़ाए.. एक सच्चाई से वाकिफ हुआ कि चाहे गाँव हो, क़स्बा हो या शहर हो चाट के चटोरे हर जगह पाए जाते हैं.. सो यहाँ भी कोई अपवाद ना मिला और चाट के लगाये गए छोटे से ठेले पर सब एक दूसरे को ऐसे ठेले जा रहे थे जैसे कि किसी ने कह दिया हो 'कल क़यामत का दिन है जितनी चाट खानी हो आज ही खा लो' 
अब बरात को लगाने का वक़्त आया तो पता चला कि गाँव में घोडा-घोडी तो थे नहीं अलबत्ता ट्रेक्टर को ही हंस का रूप दे दिया गया और बड़ी शान के साथ दुल्हेराजा 'ये देश है वीर जवानों का.. ' के उत्साहवर्धक संगीत के साथ(बैंडबाजे वाले मिल गए थे ये गनीमत रही) वधूपक्ष के घर की तरफ चले.. हमें शूटिंग करने में बहुत मुश्किलें हुईं.. एक तो मुझे रात में जागने की आदत नहीं थी तो आँखों में नींद भरी थी.. ऊपर से हर मवाली अपनी बत्तीसी कैमरे को डैन्टोव्हाईट के एड की तरह पेश कर रहा था.. लगता था कि अभी उसी में घुस जाएगा.. ऊपर से बार-बार कैमरे और हैलोजन की वायर पर चढ़ जाते और पूरी दम से लगते उसे कुचलने.. कभी मन करता कि जोर से खींच दूँ तोअभी एकाध गिरेगा लेकिन अगर डोरी टूट जाती तो कोई झटका खाता इसलिए मन मसोस कर रह गया.. 
थोड़े से धूम-धड़ाके और सुर-असुरों(शराबी-गैरशराबी) को ढोती हुई वो बरात लड़की वालों के दरवाजे पर पहुँची जहाँ लाईट की सिर्फ एक-दो झालर लटकी थीं, दो-चार बल्ब, ४ ट्यूब लाईट और  चिलकनी वाली झालरें लेकिन ऐसा कुछ नहीं की वधूपक्ष वाले ऊर्जा का अपव्यय न करने के पक्ष में थे.. असल में ये मजबूरी थी क्योंकि बस एक ही जनरेटर जो था.. तिरपाल खिंची हुई थी और ४ तख्तों को मिला कर बनाये गए मंच पर दो लाल रंग की महाराजा कुर्सियां सजाई गयीं थीं, जिसके सामने एक चाय-टेबल पर गुलदान भी रख दिया गया था.... उस समय लोहे की कुर्सियां बहुत चलती थीं जिन पर टेंटहॉउस का नाम बुना रहता था, सो वही सभी बारातियों के लिए लगाईं गयी थीं.. गले में गेंदे की माला डाल और चन्दन का तिलक लगा हर बाराती का स्वागत हुआ तो आप ही बताइए हर कोई अपने को नवाब क्यों न समझता भला.. एक बार फिर शरबत आया केवड़े का.. 
उधर चमकीली पगड़ी पहने, मुँह में पान दबाये और सफ़ेद सफारी सूट में सजे बन्ने को हंस से लड़की के मामा ने उतारा और कईयाँ में ले के द्वारचार के लिए ले गए.. वहीं पर अपने सिरों पर ३-४ कलशे सजाए खड़ीं और ब्याह गीत गा रही महिलायें थीं.. २-३ मुच्छड़ दुनालीधारी लोगों ने जब फायरिंग की तो मुझे लगा की अब कोई दस्यु-सम्राट आ गया.. लेकिन पता चला की दुल्हे के दोस्त महाशय थे.. और ये बंदूकबाजी बड़ी शान समझी जाती है ब्याह-बारातों में.. टीका-जयमाल के लिए लड़की भी आ गयी अपने हाथों में गेंदे और गुलाब की माला लिए, जिसे देवी-देवताओं के जयकारों के बीच वर-वधु ने एक दुसरे को पहिनाया.. अभिनन्दन पत्र पढ़ा गया जिसमे सभी रिश्तेदारों के नाम सहेजे गए थे..
अब एक बार फिर सब खाने पर मक्खियों कि तरह भागे लेकिन गाँव में वुफे जैसा कुछ नहीं था इसलिए सबको शराफत से जमीन पर ही आसन लगाना पड़ा.. पिछली से पिछली पोस्ट में जो बताया था उसी तरह का खाना परोसा गया.. महकती पत्तलों पर.. सब ठीक था लेकिन मोटी-मोटी पूड़ियों ने जरा सा मज़ा खराब कर दिया था.. हाँ मगर बैगन-टमाटर की सब्जी लाजवाब थी.. पर मुझे क्या पता था कि ये बैगन-टमाटर कि सब्जी ही अभी मेरे लिए  दुश्मन बन जायेगी(अरे बात को सुबह तक मत ले जाइए.. डर्टी माइंड.. अभी थोड़ी देर बाद ही कुछ होने वाला है)
खाने-पीने के बाद मंडप-तेल चढ़ाने, पाँव-पखारने की रस्म चालू हुई.. पीछे से गारियों के स्वर सुनाई दे रहे थे.. लड़के के मामा-पापा-चाचा पर जम के अश्लील शब्दों का प्रहार हो रहा था.. उस समय मुझे ऐसी चीजों से बड़ी नफरत थी. लगता था ये भी कोई बात होती है भला कि शादी जैसे मौके पर इतनी गंदी बातें बोली जा रही हैं.. 
अचानक वहाँ की कुछ मसखरी लड़कियों और औरतों को क्या सूझा कि उन्होंने मुझे निशाना बनाया और एक बाल्टी में बैगन-टमाटर और आलू की सब्जी को तनु(डायल्यूट/पतला) कर, पानी में घोल बनाया और जोर की छपाक की आवाज़ के साथ मेरे ऊपर फेंक दिया.... २ मिनट को मेरी समझ में ही नहीं आया कि ये हुआ क्या.. आँखों में बैगन(भाटे) के बीज और नमक से तिलमिलाहट हो रही थी.. पर मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ थी कि मेरे कपड़ों का सत्यानाश हो गया था. जाने वो सब मेरे कपड़ों पर रीझी थीं या मेरे चौखटे पर या सिर्फ कोई खुन्नस निकाल रही थीं.. सभी मेरी दशा पर हंस रहे थे और वो औरतें और लड़कियां हर दूसरे सेकेण्ड दाँत निपोरे जा रही थीं.. 
बस पापा ने आव देखा ना ताव और बोले अब कोई रेकोर्डिंग नहीं होगी.. 
सब परेशान हो गए कि ठाकुर साब को क्या हो गया(असल में ऊंची-पूरी कद-काठी के कारण कई लोग पापा को ठाकुर ही समझते/कहते थे).. पर उन्होंने साफ़ कह दिया कि, ''ये औरतें हैं आपके यहाँ की? इन्हें जरा भी तमीज नहीं.. अगर कोई शोर्ट-सर्किट हो जाता.. हैलोजन पकड़े जो मेरा बेटा खड़ा है उसको करेंट लग जाता तो उसका कौन जिम्मेवार होता? एक तो काम वाले लड़के ना होने पर भी मैं खुद शूटिंग करने आया कि बरात ना ख़राब हो और उसका ये नतीजा मिला?''
अब यहाँ पासा उल्टा पड़ते देख वो औरतें भी माफ़ी मांगते सामने आयीं और लम्बे से घूंघट के पीछे से ही क्षमा याचना करने लगीं.. मुझे लगा कि बेचारे दुल्हे को भी फील हो रहा होगा कि मेरी शादी में किसी और के मनौये लिए जा रहे हैं.. आखिरकार पिताश्री मान गए पर इस शर्त पर कि अब लाईट पकड़ने के लिए लड़की पक्ष का ही कोई व्यक्ति मदद करेगा क्योंकि मैं बुरी तरह भीग चुका था और शायद बारिश की वजह से काँप भी रहा था.. 
मैं वापस धर्मशाला आकर कपड़े बदलकर सो गया और बाकी की शादी ना देख पाया.. पर उस समय मुझे उसका कोई मलाल भी ना हुआ था क्योंकि आँखों में नींद जो भरी थी और खुद ही निद्रादेवी की गोद की तरफ भागना चाह रहा था वो तो भला हो उन महिलाओं का जिन्होंने मुझे बहाना दे दिया... 
दूसरे दिन सुबह जब आँख खुली तो पिताश्री की आँखें नींद कि वजह से लाल थीं और विदा होने वाली थी.. मैंने चाय के साथ वो ग्रामीद क्षेत्रों का टिपिकल जलेबी-पकोड़ियों का नाश्ता किया और महिलाओं के रूदन के बीच में से निकलता हुआ ट्रेक्टर में जा बैठा.. क्योंकि बस वाले भाईसाब ने इसबार अन्दर आने से साफ़ इंकार कर दिया था और मुख्य सड़क तक ट्रेक्टर से ही जाना था, और फिर हिचकोले खाता बस की तरफ चल दिया.. वैसे आपलोग अगर कभी ट्रेक्टर की सवारी करेंगे तो मेरी तरह मानने लगेंगे कि शकीरा के डांस को ट्रेक्टर सवारी डांस भी कह सकते हैं..

ऐसे ही एक बार एक और गाँव गया था जहाँ धर्मशाला के नाम पर एक खलिहान था और वो गाँव बिच्छुओं के लिए कुख्यात था.. जब रात में खलिहान में, खुले में खटिया पर सोने को कहा गया तो सारे बाराती भाग कर बस में चढ़ के सो गए.. अच्छा था कि उस गाँव में बस जा सकती थी.. और तो और सुबह नहाने के लिए सबको एक पक्के तालाब का रास्ता दिखा गया था..वो तो अच्छा था कि उसमे मैं भी ठेठ बाराती बन के गया था तो जल्दी ही बिना पूरी शादी किये विपक्षी सांसदों की तरह उस शादी-संसद से वापस खिसक लिया था.. पर घबराइए नहीं अब और शादी के किस्से सुनाकर आपको पकाऊंगा नहीं.. :)
इतना लम्बा किस्सा झेलने के लिए शुक्रिया कहूं तो चलेगा क्या???
एक झलक ये भी देखिये..  
आपका-
दीपक 'मशाल'
चित्र गूगल और विडियो यूट्यूब से..

रविवार, 11 जुलाई 2010

बीहड़ की शादी-------->>> दीपक 'मशाल'

 हफ्ते भर पहले आपसे बोल कर गया था कि आपको बीहड़ की शादी के बारे में बताऊंगा कुछ.. लेकिन अंतर्जाल की अनुपलब्धता और काम के जाल में ऐसा फंसा कि लिखने-पढ़ने का समय ही नहीं मिल पाया.. आज किसी तरह लिख रहा हूँ तो सुनियेगा..
 ऐसे ऐसे हुआ क्या कि एक दिन मैं शाम के वक़्त खेल के जैसे ही घर लौटा कि कानों में एक फरमान सुनाई दिया,''आज की शादी में वीडिओग्राफी के लिए जाने वाले दोनों लड़के कहीं अपने रिश्तेदार के यहाँ शादी में गए हैं इसलिए आज की साई पर मुझे खुद जाना पड़ेगा और मदद के लिए तुम भी चलो साथ में..''
सुनकर मेरी जैसे जान निकल गई.. अगले दिन जरूरी क्लास, कपडे न धुले होने, जूते न पोलिश होने जैसे कितने बहाने गिनाये लेकिन.... आखिरकार मन मार कर बस में बैठना ही पड़ा उस बरात में जाने के लिए.. अब बस में बैठने पर पता चला कि हमारे यहाँ से करीब १०० किलोमीटर दूर बारात जानी थी एक ऐसे गाँव में जहाँ सुनते हैं कि डाकुओं का आना-जाना लगा रहता है और वो गाँव मुख्या सड़क से १०-१२ किलोमीटर अन्दर जा कर था. सुनकर और भी दिमाग भन्ना गया कि पिताश्री ने कहाँ फंसा दिया..
'बोल कालका माई की जय... शेरावाली मैया की जय.. वृन्दावनबिहारी लाल की.. जय..... के नारों के साथ बस स्टार्ट होके चली और रस्ते में १-२ जगह रूककर.. नमकीन और बूंदी के नाश्ते के साथ गाते-ऊंघते :) बस आखिरकार उस जगह पहुँची जहाँ से मुख्य सड़क ख़त्म और कच्चा रास्ता शुरू होता था..  
तो अब भईया शुरू हुआ असली खेल तमाशा.. पता नहीं दूल्हे-दुल्हिन ने कड़ाही हाथ में लेकर चाटी थी या कड़ाही में बैठ कर ही चाट मारा था कि अचानक ही बारिश शुरू हो गयी. अब जिस रस्ते से जाना था वो इस तरह था कि दायीं
 तरफ काफी बड़ी नहर थी और बाईं तरफ खेत.. लेकिन खेत करीब एक-डेढ़ मीटर नीचे था और कच्चा रास्ता जो सिर्फ एक ट्रेक्टर निकलने भर की इज़ाज़त देता था और बारिश से वो भी रपटीला हो गया था.. ड्राइवर साहब ने समझाने की कोशिश की कि ''देखिये भाई लोग कोई ट्रेक्टर मंगवा लीजिये क्योंकि ऐसे रास्ते पे बस नहीं जा पाएगी.. पलटने का खतरा है.'' लेकिन बाराती तो एक दिन के नवाब होते हैं सरकार.. वो कहाँ मानने वाले थे ट्रेक्टर जैसे घटिया खेतिहर वाहन में बैठने को.. झक मार के बस ड्राइवर ने बस को इस तरह उस रास्ते पर उतारा कि बस के पीछे वाले बाएं तरफ के दो पहियों में से एक हवा में था और बाकि सब उस रपटीली-चिकनी कच्ची सड़क पर.. ३-४ किलोमीटर तो वो बस-चालक बेचारा चालाकी से अपने स्किल्स का कामयाबी से यूज करते हुए बस को आगे ढरका ले गया लेकिन एक जगह वो रपटीली सड़क बेवफाई कर गई और बस खेत की तरफ को करीब ३०-३५ डिग्री के कोण पर झुक गयी..  लेकिन पीछे से ''भवानी मैया की जय'' के नारों के बीच बस 'वीर तुम बढे चलो-धीर तुम बढे चलो' करती हुई आगे बढ़ती गई.. पता नहीं कि औरों के क्या हाल थे लेकिन मेरे जरूर अंडे सटक रहे थे क्योंकि मैं खेत वाली साइड में खिड़की पर जो फंसा बैठा था.. फंसा इसलिए माई-बाप कि मैं आपको ये बताना भूल गया कि हमारे यहाँ की ए.सी.(खिड़की में शीशे नाम के तत्व नहीं पाए जाते और बस के चलने पर बस के अंग-अंग में लगे सारे पेंचों के हिलने से निरंतर एक सुरम्य संगीतमय आर्केस्ट्रा चलती रहती है..) बसें जो कि दिल्ली में १०-१२ साल चल चुकने के बाद हमारी सड़कों पर अपना बचा हुआ दम-ख़म आजमाती हैं और उनमे ५५-६० सीटों पर ९० के आस पास सवारियां बड़े आसानी से फंसाई जाती हैं.. चाहे वो बारात का सफ़र हो या पिकनिक का या किसी अन्य शहर जाने का..
और एक जगह वही हुआ जिसके न होने के लिए मैं बराबर हनुमान चालीसा गाये जा रहा था.. यानी बस एक पवित्र स्थान पर ऐसी लटकी कि ज़रा से झटके में फ़िल्मी स्टाइल में स्पिनाती हुई खेत में जा गिरती.. लेकिन वो तो चालक  जी ने चालाकी से सबको फटाफट नीचे उतरने को बोला एक-एक करके पहले खेत वाली तरफ की सीटें खाली हुईं फिर नहर की तरफ वालीं.. मैं भी अपने कैमरे का झोला समेटे राम-राम करता नीचे उतर गया.. जान बची तो लाखों पाए..
उसके बाद ड्राइवर महोदय ने बड़ी कुशलता मगर कुछ मुश्किल से बस को सम्हाला और रास्ते पर लाया.. लेकिन फिर आगे जाने की बात आने पर हाथ खड़े कर दिए.. तभी हल्की बारिश भी चालू हो गयी.. किसी तरह भींजते-भांजते हम लोग करीब ६-७ किलोमीटर पैदल चलते उस गाँव पहुंचे..
पहुँचने पर हाज़िर हुआ ''रूह-अफज़ा..'' और जिसे पीने के बाद हम फिर से अनारकली की तरह नृत्य करने को उठ बैठे.. गाँव में बिजली सिर्फ तभी नज़र आती जब बारिश होती और बादल गरजते या फिर जब कोई शादी होती. . यहाँ भी सिर्फ कुछ बल्ब और ट्यूबलाईट जगमगाने के लिए जेनरेटर को मंगाया गया था...
(पोस्ट बड़ी होने जा रही लगती है.. है कि नहीं भाई साब/ बहिन जी.. चलिए बाकी १-२ दिन में सुना देंगे.. तब तक एक बिहारी विवाह का गीत झेलिये.. :) )


दीपक 'मशाल'

सोमवार, 5 जुलाई 2010

गाँव की शादी के बारे में एक पोस्ट(एक कविता मुफ्त में)----------->>>दीपक 'मशाल'



अभी दो दिन पहले रश्मि रविजा जी के ब्लॉग पर भारत के गाँव की शादी के बारे में एक पोस्ट पढ़ी तो सोचा कि इस विषय में मैं भी कुछ अपना भी ज्ञान बघार ही दूँ... वो क्या है कि एक तो मैं छोटे से कस्बे से हूँ.. और उसपे सोने पे सुहागा ये कि मेरे यहाँ पिछले ५५-६० सालों से फोटोग्राफी का व्यवसाय हो रहा है.. इसलिए कई बार मुझे भी इसी कारण ठेठ गाँव की शादियों में शामिल होना पड़ा.. अब एक बात जिसे मैं अकाट्य समझता हूँ वो ये है कि एक कस्बाई व्यक्ति ना सिर्फ शहर और गाँव के बीच की कड़ी होता है बल्कि दोनों संस्कृतियों को अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से समझ सकता है.. खासकर जब उसके कुछ रिश्तेदार गाँव में हों और कुछ शहर में.. वो एक ऐसे विशाल वृक्ष की तरह होता है जिसका तना तो कस्बे में होता है जड़ें गाँव में और पत्ते शहर में.. 
तो है क्या कि मेरा ननिहाल गाँव में ही पड़ता है.. इसलिए बचपन से ही गाँव की शादियाँ देखने का सौभाग्य मिलता रहा.. अभी तक अपने सर पर गत्ते की चमकीली टोपी पहने.. सीने से क्रोस आकार में सफा बांधे और गले में १-२  या ५ के नोटों की माला डाले.. माथे पर भोहों के किनारे से लाल सफ़ेद टिपकियां रचवाये, अपने एक हाथ में सींकों में पूड़ी फंसाए और दूसरे में दोने में कुछ बतासे वगैरह लिए दूल्हों की तस्वीर नहीं भूल पाया हूँ.. 
और अच्छे से याद है कि पहले जब कार्ड नहीं चलते थे तो जिसके घर से एक लोग को बुलाना हो उसके घर के बाहर एक ईंट और जिसके घर से सपरिवार(चूल) बुलाना हो उसके घर के बाहर २ ईंटे रख देते थे.. और शादी वाले घर के सगे लोगों को बुलाने के लिए नाइ चूल का न्योता देने जाता था..
खाने की पत्तल में वो देखने में लाल रंग की और खुश्बू से ही भूखदेव को निद्रा से जगाने वालीं आलू-टमाटर या कभी मटर की तरी वाली सब्जी, आलू-गोभी बैंगन(भटे-टमाटर) की या कद्दू की वो स्वादिष्ट सब्जियां.. बूंदी का रायता.. दही-बड़ा, नमकीन(दालमोंठ), पिसी हुई चीनी, रसगुल्ले, बालूशाही, बर्फी के दोने, कुल्हड़ में परोसा गया बर्फ की सिल्ली से ठंडा किया गया वो पानी और सबसे ख़ास वो गरमागरम पूड़ियाँ.. मुँह में पानी आ गया लिखते हुए ही..
बन्ने या बन्नी(शादी के प्रचलित लोकगीत) जब ढोलक की थाप पर गाये जाते थे तो क्या आनंद आता था ''आहहा आ.. क्या कहने''
''महंगाई का ज़माना.. मेहमान ना भुलाना.. बन्ना(दूल्हेराजा) याद रखोगे या भूल जाओगे...''
पंडित जी और नाइयों के झगड़े, नखरे.. दूल्हे के बाप-चाचा के मनौये.. जूता चुराई.. कुँवर-कलेऊ(हमारे क्षेत्र में गाँव में दोपहर के भोजन को कलेऊ और रात के को ब्यारू कहते हैं..), बाती-मिलाई में लड़के के अंदाज़.. सब एक से बढ़कर एक..
मेरा एक बड़ा रोचक किस्सा भी जुड़ा है एक बीहड़ के गाँव में शादी से.. पर अगली पोस्ट में ही लगाऊंगा.. अब इतना इन्तेज़ार तो कर ही लेंगे आप.. :) तब तक ये पुरस्कृत कविता भी झेल ही लीजिये..



अधूरी जीत



तुम्हारे सच के लेबल लगी फाइलों में रखी
झूठी अर्जियों में से एक को
एक कस्बाई नेता की दलाली के जरिये
मेरे कुछ अपने लोग
हकीकत के थोड़ा करीब ले आये

आज बोलने पड़े कई झूठ मुझे
एक सच को सच साबित करने के वास्ते
वो झूठ जो तुम्हारे ही एक
कानून के घर में सेंध लगाने वाले विशेषज्ञ ने 
लिख कर दिए थे मुझे

कतई नामुमकिन नहीं
कि कुछ भी अजीब सा ना लगे इसमें तुम्हें
क्योंकि तुम्हारे लिए हो चुका है ये
दाँत मांजने जैसा
पर मेरे लिए अभी भी अजीब
या शायद बहुत अजीब ही है ये
कि मेरे सच की कमाई
एक झूठ को झूठ साबित करने में लग गई

किसी ने कहा भी तो था पीछे से
कि 'कुछ खर्च हुआ तो हुआ
पर सच जीत ही गया आखिरकार'
और आज मैं एक बिन किये अपराध का
छोटा सा अपराधी बन
मुचलके पर रिहा हो रहा हूँ
अब बस इंतज़ार है
कल के अदालती चक्करों का..

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

'कभी मगरिब से मशरिक मिला है जो मिलेगा...(पश्चिम और पूरब के युवाओं में अंतर)-------------->>>दीपक 'मशाल'

'कभी मगरिब से मशरिक मिला है जो मिलेगा... जहाँ का फ़ूल है जो.. वहीं पे वो खिलेगा...' फिल्म जब-जब फूल खिले के गीत यहाँ मैं अजनबी हूँ का ये मुखड़ा बहुत कुछ कह जाता है.. पर यहाँ मैं थोडा हट कर आज भारत की नहीं बल्कि पश्चिम की मुखालफत करने जा रहा हूँ.. ऐसा नहीं की मैं अपने देश से प्यार नहीं करता या पश्चिम को बहुत चाहता हूँ.. लेकिन फिर भी यहाँ कई सारी बातें ऐसी देखने को मिलीं जिनके बारे में जब सोचता हूँ तो अपने आप ही मन में भारत के युवाओं और यहाँ के युवाओं के बीच तुलना होने लगती है.. कई सारी बातें हैं जो भारत दुनिया को सिखा सकता है और उसी तरह कई बातें ऐसी भी हैं जो हम दुनिया से सीख सकते हैं..
जैसे कि आप भी सोचिये कि हमारे यहाँ यूनिवर्सिटी या किसी कॉलेज में जो छात्र संगठन होते हैं उनका कॉलेज की व्यवस्था या अनुशासन बनाये रखने में कितना योगदान होता है???.. अगर मैं गलत नहीं  तो आजकल विभिन्न राजनैतिक पार्टियां इन युवाओं का उपयोग अपना वोटबैंक बनाने-बढ़ने में लगी रहती हैं और जो छात्र या संगठन अध्यक्ष/ महासचिव के लिए चुन लिया जाता है वो अपना फैदा पहले देखता है.. यहीं से नींव पड़ती है मलिन व भ्रष्ट राजनीति की.. और फिर वो छात्र नेता जल्द से जल्द किसी राजनैतिक पार्टी के झंडे तले एक बड़ा चुनाव लड़ने की सोचने लगता है.. 
जबकि यहाँ ऐसा नहीं है... बेशक महत्वाकांक्षा यहाँ के छात्र नेताओं की भी होती हैं.. लेकिन ये अपने मकसद को पूरा करने के लिए बेकार की हड़ताल और कॉलेजबंदी नहीं कराते.. सिर्फ उन्ही मुद्दों को उठाते हैं जिनमे उन्हें लगता है कि यहाँ किसी छात्र के साथ अन्याय हो रहा है जो नियमविरुद्ध है.. सिर्फ अपनी राजनीति चमकाने के लिए नारे लगाऊ नेतागीरी नहीं करते.. न ही चुनाव जीतने के लिए कट्टे-बंदूकबाजी होती है यहाँ..

यहाँ के लड़के-लड़कियों को मैंने कभी सिफारिश लगवाते नहीं देखा.. कभी प्रश्नपत्र आउट करते या नंबर बढ़वाते नहीं सुना.. अगर किसी छात्र का पिता प्रोफ़ेसर है तो भी उसमे और अन्य छात्र में कोई भेदभाव होते आमतौर पर नहीं देखा जाता.. और न ही अभिभावक खुद अपने बच्चों की नौकरी वगैरह के लिए अपने रसूख का इस्तेमाल करते पाए जाते हैं.. तो बताइए क्या इसे स्वाभिमान नहीं कहते??

ये लोग बदनाम हैं कि बहुत शराब पीते हैं.. पर यहाँ जितनी सड़क दुर्घटनाएं होती हैं वो हमारे देश से सैकड़ों गुना कम हैं... वैसे ये भी कह सकते हैं कि इस मामले में यहाँ की पुलिस सख्त है.. पर जैसे भी है है तो सही.. दुर्घटनाएं तो नहीं ही होती हैं न..

हमारे यहाँ बच्चों के बड़े होते ही उनके शादी-ब्याह की चिंता सताने लगती है.. अगर बेटी है तो समझिये लोग पैदा होते ही पैसा जोड़ने में लग जाते हैं.. पर यहाँ दहेज़ के लेन-देन जैसी बुराई भी नहीं है.. बच्चे बड़े होकर जब अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं तो योग्य जीवनसाथी चुन कर खुद ही माँ-बाप को बता देते हैं और अपने ही पैसों से अपनी शादी करते हैं.. खर्च होता है सिर्फ दूल्हा-दुल्हन का.. क्योंकि उनको अपने माता-पिता को उपहार जो देने होते हैं.. ज्यादा हुआ तो अभिभावक उनके सम्मान में भोज रख लेते हैं वरना कई बार भोज भी नवदंपत्ति अपने ही धन से आयोजित करता है..
अपनी राय दीजिए क्या इनकी ये अच्छाइयां अपनाने योग्य नहीं क्या इनको अपनाना सच में बहुत मुश्किल है???
अंत में मेरी पसंद का ये बेहतरीन गाना सुनियेगा..

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