मंगलवार, 18 मई 2010

बोनट(लघुकथा)----------------------------->>> दीपक 'मशाल'


रोज की तरह कॉलेज जाने के लिए जब उसने अपनी सहेलियों के साथ पास के शहर जाने वाली पहली बस पकड़ी तो बस में क़दम रखने पर कुछ भी नया नहीं मिला.. सामने वाली सीट पर वही बैंक बाबू अपनी अटैची लिए बैठे थे, उनके साथ रस्ते के गाँव में उतरने वाले वो प्राइमरी स्कूल टीचर, बाएं तरफ की सीट पर जिला न्यायालय जाने वाले वो तीन वकील साहब और बोनट व ड्राइवर के आसपास वही ३ छिछोरे लड़कों का गैंग..
''आय हाय आज तो सरसों फूल रही है.. चलें क्या खेत में?'' बोनट की तरफ से पहला घटिया कमेन्ट आया.
उसे क्या सबको समझ आ रहा था कि ये तंज़ उसी के पीले सूट को देख कसा जा रहा है..
दूसरा गुंडा टाइप लड़का कहाँ पीछे रहने वाला था- ''प्यार से ना मिले तो छीनना पड़ता है आजकल की दुनिया में...''
और ना जाने क्या-क्या अनाप-शनाप बोले जा रहीं थीं वो रईस बापों की बिगड़ी हुई औलादें..
कमाल की बात तो ये कि बस में सब सुन कर भी अनसुना कर रहे थे. वो भी चुप रही और उसकी सहेलियां भी.. पर जब बस कंडक्टर किराया लेने आया तो उससे रहा नहीं गया और उससे बोल ही उठी- ''भैया आप रोज के रोज ऐसे लोगों को चढ़ने ही क्यों देते हैं बस में  या फिर चुप क्यों नहीं कराते?''
कंडक्टर रुखाई से बोला- ''देखिये मैडम ये आप लोगों का आपस का मामला है आप ही जानें.. और वैसे भी ना मैं आपका भैया हूँ और ना वो लोग ऐसा कुछ कर रहे हैं कि मैं अपने पेट पर लात मार लूं. आप ही की तरह वो भी मेरी सवारी हैं. अगर कुछ कह दिया तो आप ध्यान ही मत दो, कह ही तो रहे हैं.. कुछ कर थोड़े रहे हैं..'' 
''मतलब??'' वो हैरान रह गई उसका जवाब सुन.
शाम को कंडक्टर जब अपने घर पहुंचा तो पता चला घर में अज़ब कोहराम मचा था.. मोहल्ले के किसी लड़के ने राह चलते उसकी बहिन का दुपट्टा जो छीन लिया था. 
अगले दिन पहली बस में वो लड़कियां थीं, बैंक बाबू , मास्टर साब थे, वकील साब थे और बाकी सब थे.. बस बोनट के आस-पास कोई नहीं था.
दीपक 'मशाल' 
चित्र साभार गूगल सर्च इंजिन से 

रविवार, 16 मई 2010

तलब (लघुकथा)------------------------------->>> दीपक 'मशाल'


आँख खुलते ही सुबह-सुबह मुकेश को अपने घर के सामने से थोड़ा बाजू में लोगों का मजमा जुड़ा दिखा. भीड़ में अपनी जानपहिचान के किसी आदमी को  देख उसने अपने कमरे की खिड़की से ही आवाज़ देते हुए पूछा-
''क्या हुआ अरविन्द भाई? सुबह से इतनी भीड़ क्यों लगी है?''
''यहाँ कोई भिखारिन मरी पड़ी है मुकेश जी, शायद सर्दी और भूख से मर गई.''
जवाब सुन कर उसे बीती रात का घटनाक्रम याद आ गया..
१० बजे के आसपास सिगरेट की तलब उठते ही वो नाईट ड्रेस में ही १४-१५ रुपये डाल पान की दुकान, जो कि गली के मुहाने पर थी, की तरफ  बढ़ गया. रास्ते में एक मरगिल्ली सी भिखारिन २-३ रुपये के लिए गिगियाने लगी-
''ऐ बाबू जी, दू ठो रुपईया दे देओ.. हम बहुत भूखाइल बानी अउर पेट दुखाता.. तनी दू ठो रोटी खा लेब''
एक पल को मुकेश ठिठका तो पर उसे ख्याल आया कि 'इसे २ रुपये दे दिए तो सिगरेट के पैकेट को कम पड़ जायेंगे और उसे वापस घर भागना पड़ेगा पैसे लेने के लिए. फिर ये तो मंगनी है कोई ना कोई दे ही देगा इसे.'
''अरे दे देओ बाबू जी.. ना तो भूखे हम मर जाइब, भगवान् भला करी'' भिखारिन अभी भी गिड़गिड़ा रही थी और वो ''खुल्ला नहीं है माई'' कह कर वहाँ से बच कर निकल लिया था .

दुखी मन से दातुन करते हुए अब उसे पछतावा हो रहा था कि उसकी सिगरेट की तलब किसी की भूख पर भारी पड़ गई.. एक ज़िंदगी पर भारी पड़ गई.. वो उठा और सबसे पहिले सिगरेट के आधे बचे पैकेट को कमोड में बहा दिया, शायद कुछ दृढ निश्चय सा किया था उसने.
दीपक 'मशाल'
चित्र साभार गूगल से

शुक्रवार, 14 मई 2010

रौंग नंबर(कविता)----------------------------------->>>दीपक 'मशाल'

तुम्हारे भेजे आखिरी ख़त
अब तक मुझे ये समझाने में नाकाम रहे थे
कि मैं क्यों नाकाबिल था तुम्हारे लिए..

क्या तुमने अपनी अनुभवी आँखों के दूरबीन में
अपनी तीक्ष्ण बुद्धि के लेंस लगाकर
दूर खड़े भविष्य के आस-पास
मेरे साथ बाँहों मे बाहें डाल चलती
जो आकृति देखी थी
जो सुनहरे सपने देखे थे.. वो भ्रम थे
या था मेरा फैलाया तथाकथित मायाजाल

पता नहीं समझ नहीं पा रहा था मैं
या समझा नहीं पा रहा था खुद को
कि जो भी था वो बस हवा में तैरते
साबुन के सतरंगी बुलबुले सा था..

तुम्हारे घर बसने के बाद भी
मैं पागल यही उम्मीद पाले रहा
कि चलो उम्र भर का साथ ना हो पाया तो क्या
प्यार तो जिंदा रहेगा ताजिंदगी
मेरे दिलो-दिमाग में और तुम्हारे भी
तुम्हारे दिमाग में नहीं तो कम से कम  दिल में तो रहेगा ही

देखो ना आज महीनों बाद लगा
कि तुम वहीं हो शायद
तुम्हारे पुराने घर में....
जहाँ हमने साथ-साथ सपने देखे थे.. बिना सोये हुए
और मेरे दिल ने झूठ नहीं बोला..
तुमने ही फ़ोन उठाया था ना...

और मेरी आवाज़ सुनते ही कह दिया 'रौंग नंबर'

जो काम तुम्हारे लम्बे-लम्बे ख़त ना कर सके
वो एक लफ्ज़ ने कर दिया..
पर अभी भी उलझा हूँ इसी सोच में
कि मैं रौंग नंबर पहले था
या कि अब हूँ......

दीपक 'मशाल'
चित्र साभार गूगल से

गुरुवार, 13 मई 2010

वतन के रखवाले (लघुकथा)------------------------------->>>दीपक 'मशाल'


''आप कैसे ये जनरल बोगी खाली करा सकते हैं जबकि इसके बाहर 'सैनिकों के लिए आरक्षित' या इसके जैसा कुछ भी नहीं लिखा?'' उन १०-१२ सैनिकों के कहने पर चुपचाप उस सामान्य बोगी से उतरते लोगों में से उस पढ़े-लिखे से युवक ने एक मिलिट्री वाले से सवाल कर दिया.
''तुझे हम सबकी वर्दी नहीं दिख रही क्या?'' सैनिकों में से एक ने जवाब में सवाल की गोली चला दी.
शायद युवक भी जल्दी हार मानने वाला नहीं था ''पर रेलवे ने पहले से तो ऐसा कुछ बताया...''
''हाँ-हाँ ठीक है भूल होगी रेलवे की.. अब अपना सामान सिमेटो और जल्दी निकलो यहाँ से.'' युवक की बात काटते हुए दूसरा सैनिक बोल पड़ा.
बिना अपना सामान उठाये वो फिर बोला- ''पर अगर ये आर्मी के लिए है तो मेरे चाचा जी भी लेफ्टिनेंट कर्नल हैं.. कैंसर सर्जन हैं वो आर्मी होस्पीटल में. देखिये सर मुझे सुबह ड्यूटी ज्वाइन करनी है और ये रात भर का सफ़र है, मुझे यहीं रहने दीजिए प्लीज़.. आप चाहें तो मैं अंकल से बात करा देता हूँ... अगर विश्वास ना हो तो.''
कहते-लहते वह जेब से मोबाइल निकाल अपने अंकल का नम्बर डायल करने लगा.
उसके मोबाईल वाले हाथ को सख्ती से पकड़ एक सैनिक कुछ ज्यादा ही तैश में आते हुए बोला ''ओये ज्यादा नौटंकी नहीं.. चुपचाप उतर जा या धक्के मार के उतारें.. बाकी के सब चू** थे क्या जो आराम से उतर गए.. बड़ा आया अंकल वाला''
मायूस होकर उसे वतन के उन रखवालों की मंशा पूरी करनी ही पड़ी. उसके डब्बे से नीचे उतरने के साथ-साथ दो लड़कियां उसी बोगी में चढ़ने की कोशिश करने लगीं. जिन्हें उसने समझाने की सोची कि इनलोगों से बात करना फ़िज़ूल है. पर उससे पहले ही- ''ये कम्पार्टमेंट पूरा खाली है, क्या हम इसमें बैठ सकती हैं?''
अन्दर से ३-४ समवेत स्वर उभरे- ''हाँ-हाँ क्यों नहीं? आ जाइये.''
दीपक 'मशाल'
चित्र साभार गूगल से 

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