सोमवार, 21 दिसंबर 2009

'बुद्धा स्माइल'@@@@@दीपक मशाल

'बुद्धा स्माइल'
यही रखा था नाम
परमाणु परीक्षण का...
महान हिन्दोस्तान ने,
मगर
क्यों मुस्कुराये बुद्ध?
ये रहस्य बन गया सदा के लिए...
क्या हमारी नादानी पर?
या मोक्ष के इस नए मार्ग पर
जो सीखा था हमने..
कीमती समय
और बहुत कुछ गँवा कर..
कितने बड़े -बड़े दिमाग
उलझाकर..
इस काम में खपा कर..
वैसे.....
बुद्ध मुस्कुराये थे तब भी
जब
सामने खड़ा था उनके
मदमस्त पागल हाथी..
जब खड़ा था अंगुलिमाल..
जब खड़ा था बाघ
और जब
सामने खड़ी थीं यशोधरा
राहुल को दान करने के वास्ते..
वो मुस्कुराये थे तब भी
जब हुआ था आत्मबोध,
बुद्ध मुस्कुराते थे
पीड़ा में भी
बुद्ध मुस्कुराते थे हर्ष में भी...
क्योंकि
दोनों थे सम उनको...
बस इसीलिए
ये बन गया
अज़ब रहस्य सदा के लिए
कि
व्हाई 'बुद्धा स्माइल'?

दीपक मशाल

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

आस्तीन के सांप...

आधुनिकता के
इस दौर में
पाश्चात्य सभ्यता के
अनुगमन कि होड़ में..
हम दौड़ रहे हैं...
अंधी दौड़ में...
बहुत आगे,
मगर पदचिन्हों पर किसी के..
हर बदलते पल के साथ,
कभी पतलून
बदल जाती है
बैलबोटोम में..
कभी पजामे में,
कभी जींस
तो कभी बरमुडे में...
सिर्फ जींस नहीं रोक सकती,
केवल धोती नहीं
बाँध सकती
इन भागते
फैशनपरस्तों के क़दमों को..
कुछ लोग जो
कईयों के
आदर्श है..
प्रेरित करते हैं
पूर्वजों सरीखे प्राकृतिक होने को भी..
मगर तुम
अपने कमीज़ की..
अपने कुरते की
या जो भी कहें इसे
अगली घड़ी में...
इसकी बाहें
इतनी न फैला लेना..
इतनी न बढ़ा लेना..
और ना ही इतनी चौड़ी करलेना
कि पल सकें उनमे
आसानी से
बिना परेशानी के..
आस्तीन के सांप...
दीपक मशाल

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

सबलों का शस्त्र ))))))))))))) दीपक मशाल

जो मज़हब का
मतलब,
जो धर्म का
मर्म...
सिर्फ
और सिर्फ,
त्रिशूल और
तलवार,
घात और प्रहार
समझते हैं...
वो कमज़ोर हैं
हर तरह से
और निहत्थे हैं आत्मास्त्र से..
वो
जला सकते हैं
देह को,
पर आत्मा को
छू भी नहीं पाते
और प्रेम जिला सकता है
आत्मा,
कहा है वासुदेव ने भी...
''नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि.. नैनं दहति पावकः...''
देह का है अंत
और
देहनाशक का भी..
है आत्मा अनंत
और
प्रेम भी..
बस यही कारण है
कि
बम
बुजदिलों का
और प्रेम
सबलों का शस्त्र है...

दीपक मशाल

रविवार, 13 दिसंबर 2009

खंडहर की ईंट

खंडहर की ईंट
कुछ कहती हुई सी लगती है,
उसी पुराने खंडहर की
जिसे ऐतिहासिक स्थल कहते हैं...
और देखते हैं रोज़
हज़ारों देशी और विदेशी पर्यटक...
हर किसी से
सूनी आँखों से
कुछ कहती हुई सी लगती है...
वो चाहती है बताना
क्या है असली इतिहास
जिसमे जोड़ी गयी है
कुछ झूठी कहानी भी...
उस कहानी को छोड़कर,
क्या है हकीकत
और क्या है फ़साना...
है हर पल की
सच्ची गवाह
वह ईंट
जो झूठी नहीं है..
अलग-अलग इतिहासों की तरह....
दीपक 'मशाल'

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