बुधवार, 15 सितंबर 2010

लन्दन वाले कपड़े अब खादी हो गए हैं---------------->>>दीपक मशाल





४ साल पहले इस मंचीय व्यंग्य कविता के पाठ पर हिन्दी दिवस पर दिल्ली के एक सरकारी संस्थान में पुरस्कार मिला था.. कोई ख़ास तो नहीं मगर फिर भी पढ़ियेगा.. 


अब तो इस सब के हम आदी हो गए हैं-३ 

लन्दन वाले कपड़े अब खादी हो गए हैं-२ 

कैसे हंस सकेंगे हम हंसने वाली बातों पे-३ 

खुशियाँ सारे बेच दीं अवसादी हो गए हैं-२ 

अब तो इस सब के हम आदी हो गए हैं--२

लन्दन वाले कपड़े अब खादी हो गए हैं-२



आज हम सच्च में इक सच्ची बात सुनाते हैं-३

देश में जो चल रहा है उसको बताते हैं-२

ईमानदारी के भाषण पे ताली जो बजाते हैं-३ 

वे भी मेजों के नीचे हाथ खिसकाते हैं-२

मिठाई के डिब्बे कभी घर मंगवाते हैं-३

खाते-खाते मोटे सेठ वादी हो गए हैं-२

अब तो इस सब के हम आदी हो गए हैं-२

लन्दन वाले--------------------------- -२



अंगुली उठाने पे वो ऐसे चिल्लाते हैं-३

जैसे हड्डी छीनने पे कुत्ते गुर्राते हैं-२ 

फिर विस्तार से हमें ये समझाते हैं-३

इतना तो दुनिया में सभी लोग खाते हैं-२

पता है ईमान वाले कैसे घर चलाते हैं-३

सच्चे लोग झूठों के अपराधी हो गए हैं-२

अब तो इस सब के हम आदी हो गए हैं-२

लन्दन वाले--------------------------- -२



नेताओं के बेटे कभी पेट्रोल पी जाते हैं-३

और बेटे किसी के कोकीन चबाते हैं-२

पहली बीवी छोड़ के स्वयंवर रचाते हैं-३

और गरीबों के बेटे जब मेट्रो पुल बनाते हैं-२

लालची लोगों की खातिर बलि चढ़ जाते हैं-३(इन तीन पंक्तियों में पहले से कुछ तब्दीलियाँ की हैं इसे समसामयिक बनाने के लिए)

गरीबों के हक अब लादी हो गए हैं-२

अब तो इस सब के हम आदी हो गए हैं-२

लन्दन वाले--------------------------- -२



हर नया नेता यहाँ प्रेस को बुलाता है-३

बीती सरकारों पे वो गुस्सा दिखाता है-२

फिर नए टेक्सों से महंगाई बढ़ाता है-३

ऐसे जन सेवकों ने देश को सम्हाला है-२ 

मुरली बजाने वाला तू ही रखवाला है-३ 

हाथ में बन्दूक वाले गांधी हो गए हैं-२ 

अब तो इस सब के हम आदी हो गए हैं-२

लन्दन वाले--------------------------- -२

दीपक मशाल 

45 टिप्‍पणियां:

  1. अब तो हम सच में आदी हो गये हैं। वाह।

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  2. बहुत तीखा गीत है भाई,
    इतना तेज तमाचा जनता के मुह पर भी और जननायक के मुह पर भी

    वाह वाह

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  3. व्यवस्था की बुराईयों पर गहरी चोट......

    जवाब देंहटाएं
  4. नेताओं के बेटे कभी पेट्रोल पी जाते हैं-३

    और बेटे किसी के कोकीन चबाते हैं-२
    बहुत आग है सब के दिलो मै, लेकिन यह नेता अपनी ही बनाई लंका मै खुद जलेगे क्योकि इतने सारे लोगो की बद दुआये ले कर केसे यह सुखी रह पायेगे, आप ने बहुत सुंदर कविता लिखी, धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  5. kavita ke jariye sab kah dena aapki khas adaa hai.nice poem

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  6. ek ek pankti karari chot karti hai .lajabab vyang hai manch par sunna to aur bhi achha laga hoga .
    badhai.

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  7. सचमुच अब हम इस व्यवस्था /अव्यवस्था के आदि हो गए हैं ...
    सच्ची कविता ..!

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  8. अंगुली उठाने पे वो ऐसे चिल्लाते हैं-३

    जैसे हड्डी छीनने पे कुत्ते गुर्राते हैं-२

    फिर विस्तार से हमें ये समझाते हैं-३

    इतना तो दुनिया में सभी लोग खाते हैं-२

    सही कहा भिड़ु, एकदम बराबर। एक पूर्व प्रधानमंत्री का बयान भी आया था, "corruption is an international phenomenon".

    एकदम सटीक लिखा है।
    शुभकामनायें।

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  9. प्रिय दीपक ,
    आजकल के हालात में , कई बार सोचता हूं कि मंचीय होना क्या होता है ? अक्सर लालू जी पर मंच...थरथराते देखे / सुनें हैं ! एक आम कविता और मंचीय कविता में शैलीगत फ़र्क तो साहित्यिक लोग ही समझाएंगे पर मुझे लगता है कि इनमें 'क्लास' और 'नारेबाजी' जैसा अंतर जरुर होगा ! अब शायद क्लास को नारेबाजी नें मंच से धकिया दिया है ?

    आपकी कविता में पोलिटिकल सिस्टम के प्रति आक्रोश है तो शायद आप इसे मंचीय कह रहे हैं ! इसके लिए आपको पुरस्कार मिला सो उसकी बधाई पर आपमें जो 'क्लास' छुपी है उसे ध्यान में रखकर कह रहे हैं कि खुद को आजकल की तर्ज पर मंचीय होने से बचाइए !

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  10. बहुत अच्छी प्रस्तुति दीपक जी -
    खादी खादी ना रही अब !!

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  11. पता है ईमान वाले कैसे घर चलाते हैं-
    सच्चे लोग झूठों के अपराधी हो गए हैं-
    अब तो इस सब के हम आदी हो गए हैं-

    ab hum bhi aapke aadi ho gaye hain

    bahut badiya dpakji,

    जवाब देंहटाएं
  12. अंगुली उठाने पे वो ऐसे चिल्लाते हैं-३


    जैसे हड्डी छीनने पे कुत्ते गुर्राते हैं-२


    फिर विस्तार से हमें ये समझाते हैं-३


    इतना तो दुनिया में सभी लोग खाते हैं-२


    पता है ईमान वाले कैसे घर चलाते हैं-३


    सच्चे लोग झूठों के अपराधी हो गए हैं-२


    अब तो इस सब के हम आदी हो गए हैं-२


    वाकई पुरूस्कार पाने लायक रचना थी दीपक साहब !

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  13. बहुत सुंदर प्रस्तुति |बधाई
    आशा

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  14. गीत रुपी यह व्यंग्यात्मक कविता बहुत अच्छी लगी.... अब तो हमें आदत हो गई है ऐसे सिस्टम की...

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  15. बहुत अच्छी लगी रचना। मगर ये पीछे 2 और तीन का अर्थ मुझे समझ नही आया। आशीर्वाद।

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  16. एक तीखी मगर सच से ओत-प्रोत रचना।

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  17. नेताओं से अब कोई आशा नहीं रही

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  18. वाह दीपक जी!...इतना करारा व्यंग्य!....मजेदार है!

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  19. सही कहा आपने "अब तो इस सब के हम आदी हो गए हैं..."
    हम प्रदूषण, भ्रष्टाचार, महंगाई और अव्यवस्था के आदी हो गए हैं...

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  20. बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

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  21. बहुत सटीक रचना .... यही हो रहा है...

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  22. बहुत तेज़ है धार .... पर ये सही है हम सब इस व्यवस्था के आदि हो गये हैं ...

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  23. बहुत ही सशक्त और मारक रचना.

    रामराम.

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  24. अंगुली उठाने पे वो ऐसे चिल्लाते हैं-३
    जैसे हड्डी छीनने पे कुत्ते गुर्राते हैं-२
    फिर विस्तार से हमें ये समझाते हैं-३
    इतना तो दुनिया में सभी लोग खाते हैं-२


    -बहुत सटीक...इसे तो ऑडियो/विडियो में चढ़ाओ

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  25. @अली सर,
    आगे से ख्याल रखूंगा.. ऐसे ही दिशा-निर्देशन करते रहें..

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  26. सही कहा हम सब अब इसके आदि हो चुके है |

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  27. अब तो इस सब के हम आदी हो गए हैं

    लन्दन वाले कपड़े अब खादी हो गए हैं
    ye panktiyan bahut jyada achhi hain deepak bhai ...baki rachna bhi thik hai ..par in panktiyon ko utna badhiya saath nahi mila jiski ye haqdaar hain ..aisa laga padh kar mujhe..han kavita system ki kamiyon ko ujaagar karti hai ..isliye is kavita kad khud hi uncha hai

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  28. सच्चाइयां तल्ख ही होती हैं। यह क्रूरतम ही जब शबदों में आता है तो इसे व्यंग्य भी कहा जाता है।
    बेहतर प्रस्तुति।

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  29. अब तो हम सच में आदी हो गये हैं। वाह।

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  30. बहुत ही करारा व्यंग्य....व्यवस्था पर चोट करती यह कविता निश्चय ही पुरस्कार योग्य है.

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  31. सामाजिक विडम्बनापूर्ण व्यवस्था का सच्चा चिठा..
    सारगर्भित रचना के लिए धन्यवाद

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  32. प्रियवर दीपक भाई
    अच्छी रचना है , मंच के अनुरूप धूम मचाने की पूरी संभावना रखने वाली !
    अंगुली उठाने पे वो ऐसे चिल्लाते हैं
    जैसे हड्डी छीनने पे कुत्ते गुर्राते हैं


    गेयता , लयात्मकता , जन रंजकता सभी मौजूद हैं …
    किसी मंच पर आपके साथ बैठ कर सुनेंगे आपसे ।

    शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  33. समसामयिक सटीक और सार्थक व्यंग्य चित्र खींचा है आपने शब्दों के माध्यम से...

    बहुत ही सुन्दर रचना...वाह !!!!

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  34. एकदम सटीक लिखा है।
    शुभकामनायें।

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  35. दीपक भाई मजा आ गया..इतना अच्छा और जबरदस्त व्यंग...वाह :)

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  36. पहली बीवी छोड़ के स्वयंवर रचाते हैं
    और गरीबों के बेटे जब मेट्रो पुल बनाते हैं
    लालची लोगों की खातिर बलि चढ़ जाते हैं

    अच्छी पंक्तिया ........

    इसे भी पढ़कर कुछ कहे :-
    आपने भी कभी तो जीवन में बनाये होंगे नियम ??

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  37. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

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