संयम की मूरत में उग्रता की निशानी ढूंढती है,
आस की देवी बूढ़ी रगों में जवानी ढूंढती है!
हय ढूंढती है भावनाएं कब्र के कंकाल में वो,
झील के पानी में भी वो इक रवानी ढूंढती है!!
कैसे तू भूली ऐ देवी काल ना सतजुग रहा अब,
जलजलों में जी रहा इंसां जो सचमुच रहा अब,
सत्य की जय कह रहे हैं पर झूठ से भी मेल है,
कहता कुछ है आदमी और कर कुछ रहा अब,
पूष में तो ढूंढती है तमतमाते सूर्य को और,
जेठ के महीने में वो पुरबाई सुहानी ढूंढती है!
उसने समझा सच दिख रहा सुबह के अखबार में,
देश प्रगति कर रहा संसार में संचार में व्यापार में,
पर नई जमात आई है जिसने कलम बेच खाई है,
जो करती चुपके से दलाली जनतंत्र के दरबार में,
इसको क्या मालूम अस्ल ख़बरों की खबर क्या,
हकीकत के दर्द में जो सनसनी कहानी ढूंढती है!
डूबती है नब्ज़, साँस आख़िरी बस चल रही है,
रोज़ संसद में चिता गणतंत्र की जल रही है,
दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रहीं हैं कोठियां,
नींव भरने वाले की झोपड़ी पर खल रही है,
नई दुनिया में अलग है महक आज रिश्तों की,
तू किसलिए इनमे वही खुशबू पुरानी ढूंढती है!!
दीपक मशाल
तस्वीर- अमृता शेरगिल का एक सेल्फ पोर्ट्रेट



