मारा जाता है गरीब इक सोने के चाकू से
मौका-ए-वारदात पर आती है पुलिस
मिलते हैं सबूत कुछ
कुछ मिटाए जाते हैं
नहीं मिलते कुछ
कुछ बनाये जाते हैं
लगती है अदालत
जिरह चलती है
सृजित होते हैं अड़ंगे
बढ़ती हैं तारीखें
दिन बिताये जाते हैं
खाली आंतें ला खड़ा करती हैं
फर्जी गवाहों को कठघरे में
सच्चाई की नीलामी करने को
खरीदारों की भीड़ है
ईमान बिक जाता है ऊंचे दामों में
मुद्दई की सूनी आँखों में भर जाते हैं नुकीले पत्थर
जो हर गुज़रते दिन के साथ बड़े होते जाते हैं
फिर उस दिन उन पत्थरों से रिसने लगता है खारा पानी
जब जीतता है वकील
जब हारता है इंसान
जब जीतता है क़ानून
जब इन्साफ हार जाता है..
दीपक मशाल


