सोमवार, 13 सितंबर 2010

कविता------------------------->>>दीपक मशाल

होती है वारदात
मारा जाता है गरीब इक सोने के चाकू से
मौका-ए-वारदात पर आती है पुलिस 
मिलते हैं सबूत कुछ
कुछ मिटाए जाते हैं
नहीं मिलते कुछ
कुछ बनाये जाते हैं

लगती है अदालत 
जिरह चलती है 
सृजित होते हैं अड़ंगे
बढ़ती हैं तारीखें
दिन बिताये जाते हैं 
खाली आंतें ला खड़ा करती हैं 
फर्जी गवाहों को कठघरे में
सच्चाई की नीलामी करने को
खरीदारों की भीड़ है
ईमान बिक जाता है ऊंचे दामों में 

मुद्दई की सूनी आँखों में भर जाते हैं नुकीले पत्थर
जो हर गुज़रते दिन के साथ बड़े होते जाते हैं
फिर उस दिन उन पत्थरों से रिसने लगता है खारा पानी
जब जीतता है वकील
जब हारता है इंसान
जब जीतता है क़ानून
जब इन्साफ हार जाता है..
दीपक मशाल 

रविवार, 12 सितंबर 2010

आदमी की तरह चलता कुत्ता और तुम्हें मेरी याद भी नहीं आती.. हुँह..----------------->>>दीपक मशाल

सुबह से कुछ लिखने का जी किया आज... बस टाइप करता चला गया.. बाद में देखा तो ये बना... अब जो बना सो बना.. पर सोचता हूँ आपको दिखा ही दूँ..


काश तुम्हारी याद होती कोई बिल्ली 
जब भी वक़्त बे-वक़्त 
दिल-ओ-दिमाग के कमरे में विचरने की कोशिश करती
दबे पाँव चुपके से अन्दर आने का  
घुसने का जतन करती
उसकी उम्मीदों पर पानी फेरते हुए
बंद कर लेता दरवाजे खिड़कियाँ सब
उस चौंड़े मुँह वाले पनाले में ठूंस देता
तुम्हारे बुरे बर्ताव वाली पुरानी कमीज़ को गोल करके 

वो बाहरी दीवार पे लगाती रहती 
अपने धारदार नाखूनों की मदद से सेंध
और मैं बेफ़िकर हो खोया रहता अपने आप में

वो खरोंचे मारती रहती
पंजों से दरवाजों को लहुलुहान करती रहती
लेकिन मैं कर जाता अनसुना
तब जब मैं खाली नहीं होता 
और नहीं जाना चाहता उसके पास 
उन यादों को ना भरना चाहता अपने आगोश में

उस याद की बिल्लौरी आँखें
हो जातीं उदास
और मुझे आता कुछ तरस सा
उसके हाल पर, बेचारगी पर
तब ताज़ी हवा के नाम पर खोल देता मैं खिड़कियाँ
खोल देता दरवाज़े सारे

और वो बेजुबान फुदक के आ बैठती मेरी गोद में
मेरी जानिब देखती वो
प्यार और कुछ शिकायत भरी नज़रों से
जैसे कह रही हो
'तुम्हें मेरी याद भी नहीं आती.. हुँह...'
दीपक मशाल 
जाने से पहिले ये वीडिओ तो देखिये..  वो शेर याद दिला देगा कि 
''कौन कहता है कि आसमाँ में छेद हो नहीं सकता..''



चित्र साभार गूगल से

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

ग़ज़ल पढ़िए और देखिये कि कैसे एक कुकुर को आती है गिनती और जोड़, घटाना------->>>दीपक मशाल

आदरणीय अग्रज श्री राजेन्द्र स्वर्णकार जी द्वारा मेरी इस रचना को ग़ज़ल का स्वरुप दिया गया है.. उनका बहुत आभारी हूँ..
 
बड़ी मुश्किल से हाथ आए , तुम्हें हम जाने कैसे दें
अभी पैदा हुई ख़्वाहिश , अभी मर जाने कैसे दें
अभी तो रूठ कर आया है इक बादल समंदर से
ज़मीं प्यासी है , इसको लौट कर अब जाने कैसे दें 
तुम्हीं ने आज़माया है , मेरी सच्चाई को यारों
तुम्हारे झूठ पर पर्दा कोई पड़ जाने कैसे दें
' भुला देना न मुझको ' - यूं कहा करते थे तुम अक्सर
न भूलेंगे तुम्हें हम … टूट ये  दिल  जाने  कैसे दें.
इन्हीं ज़ख़्मों की ख़ातिर पूछने आते वो घर मेरे
कोई ज़ख़्मों से कहदे , हम उन्हें भर जाने कैसे दें 
बरी हो'के तू निकला है, अदालत से अभी , लेकिन
मुकद्दमे और भी हैं जो  कहे  - ' हम जाने कैसे दें '
जहां को तू बदल डाले , नहीं इतना भी तू क़ाबिल
'मशाल' अब जां पॅ तुझको खेलते ही जाने कैसे दें 
दीपक मशाल
अब यहाँ देखिये क्या कमाल की ट्रेनिंग दी गई है इन साहब को कि गणित भी आता है..अब कोई बच्चा जो काहे कि मैथ्स मुश्किल है तो कौन मानेगा.. मास्टर तो यही कहेंगे कि ''कुत्तों को भी गणित आता है''




मंगलवार, 7 सितंबर 2010

दुल्हन के जेवर आज भी गिनते हैं हर जगह------------->>>दीपक मशाल

तुम्हारे दिल की अब धड़कन, हमारे साथ क्यों ना है
कभी होती थी जो लब पे, वो अब बात क्यों ना है

नहीं लगता साथ होकर भी, अब तुम साथ हो मेरे
मिरे हाथों में होता था जो, वो अब हाथ क्यों ना है

नहीं चंदा कहीं दिखता, सितारे भी नदारद हैं
कभी जन्नत सी होती थी, वो अब रात क्यों ना है

कि क्यों फैला है सन्नाटा, बिरादर तेरी बस्ती में
संगीत है ना गीत है, अरे वो साज़ क्यों ना है

नहीं बरसा है सावन फिर, हैं पत्ते सूखते सारे
गया भादों भी आधा पर, यहाँ बरसात क्यों ना है

अंधेरों की कई फूँकें, ये दीपक लील बैठी हैं
क्यों हाथों में है फिर शम्मा, मशाल हाथ क्यों ना है.
दीपक मशाल

दुल्हन के जेवर आज भी गिनते हैं हर जगह
दुल्हे के तेवर आज भी मिलते हैं हर जगह
कमते हैं जेवरात तो बढ़ते हैं तेवरात
बाबुल के सर आज भी झुकते हैं हर जगह


दीपक मशाल

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