मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

दो लघुकथाएं



1- चोर-सिपाही-वजीर-बादशाह 

चार पर्चियां बनाई गईं.. उन पर नाम लिखे गए
चोर, सिपाही, वजीर और बादशाह
उन्हें उछाला गया, चार हाथों ने एक-एक पर्ची उठाई. फिर उनमे से एक सीना चौड़ा करके गरजा
-बोल-बोल, मेरा वजीर कौन?
-मैं जहाँपनाह
-ह्म्म्म.. इन दोनों में से चोर सिपाही का पता लगाओ
वजीर दो मिनट सोचता रहा फिर बोला-
-जाने भी दीजिये हुज़ूर, दोनों अपने ही आदमी हैं... वैसे भी इनके हाथ तो सिर्फ कौडियाँ लगी होंगी, अशर्फियाँ तो महफूज़ ठिकानों में पहुँच ही चुकी हैं 

जिसका माल चोरी हुआ था वह खेल में शामिल हुए बिना ही चारों में से चोर ढूँढने की कोशिश में लगा था 
दीपक मशाल 

2- कौवा और गिलहरी 

कौवे और गिलहरी में फिर से करार हुआ. कौवे ने बीती बातें भूल जाने का निवेदन किया और गिलहरी ने तुरंत मान लिया, उसके मन में तो वैसे भी कोई मलाल था ही नहीं. पिछली बारी कौवे ने ना खेत जोते थे, ना बीज बोये, ना सिंचाई की और ना ही फसल काटी थी.. नतीजतन गिलहरी के सब कर देने के बाद भी कौवे की पकी-पकाई फसल तेज़ आंधी-पानी में बह गई थी. इस बार तय हुआ कि कौवा निठल्ला बन हरी डाल पर ना बैठा रहेगा... तय हुआ कि दोनों बराबर से मेहनत करेंगे.
समय आया तो गिलहरी ट्रेक्टर लेकर कौवे के पेड़ के नीचे पहुँची, अब हल से खेत जोतने वाले दिन तो रहे नहीं थे. गिलहरी को उम्मीद थी कि कौवा अब वही पुराना गीत ना अलापेगा कि 
-तू चल मैं आता हूँ, 
चुपड़ी रोटी खाता हूँ
ठंडा पानी पीता हूँ
हरी डाल पर बैठा हूँ..

लेकिन कौवे ने बिना हिले ही अन्दर से आवाज़ दी. भाई कुछ ना खाऊंगा-पीऊंगा लेकिन सच यही है कि आज सर में बहुत दर्द है, तुम आगे-आगे चलो मैं जरा दवा लेकर आता हूँ. गिलहरी को क्या फर्क पड़ना था, वो तो थी ही मेहनती.. थोड़े ही समय में अपना खेत जोत लिया... जब कौवा काफी देर तक ना पहुंचा तो दयावश उसका खेत भी जोत दिया.. थोड़ी देर और ट्रेक्टर चला लिया जब पिछली बार पसीना बहाकर जोत लिया था तो इसबार तो ट्रेक्टर था ही. 
वापस लौटते हुए देखा कि कौवा आँखें मींचे और मुँह खोले खर्राटे भर रहा था. गिलहरी ने तबियत का पूछा और अपने घर की राह देखी.
जब बुआई का वक़्त आया तो कौवे की टांग में दर्द पैदा हो गया, गिलहरी ने बिना तीन-पांच करे वह भी अपनी मर्जी से कर दिया. फिर यही कहानी कटाई के वक़्त भी दोहराई गई, कौवे को ना सुधरना था सो नहीं सुधरा.
इतिहास ने खुद को दोहराया और इस बार भी बारिश में कौवे की फसल बह गई और गिलहरी के गोदाम भरे रहे. 
एक दिन सुबह-सुबह गिलहरी के दरवाजे पर दस्तक हुई.. उसने पूछा 
-कौन है भाई?
जवाब आया 
-मैं हूँ कौवा 
-पुलिस
-वकील
-जज
एक-एक कर चार आवाजें गिलहरी के कानों में पड़ीं. बाहर से ही फरमान सुनाया गया कि जल्द से जल्द बाहर उनकी अदालत में हाज़िर हो क्योंकि उस पर कौवे की फसल हड़पने का आरोप था और मुकदमा चलाया जाना था.
गिलहरी आँख मलते हुए बाहर पहुँची तो पेड़ के नीचे अदालत लग चुकी थी. थोड़ी ही देर में गिलहरी काली चोंच, काले पंख और कर्कश स्वर वाले जीवों के बीच अकेली खड़ी थी. 
दीपक मशाल

मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

मेरे प्रश्न



मेरे प्रश्न
तुम्हारे विरोध में नहीं
मगर अफ़सोस कि
नहीं कर पाते हैं ये समर्थन भी

ये प्रश्न हैं
सिर्फ और सिर्फ खालिस प्रश्न
जो खड़े हुए हैं
जानने को सत्य
ये खड़े हुए हैं धताने को उस हवा को
जो अफवाह के नाम से ढंके है जंगल

ये सर्दी, गर्मी, बारिश
और तेज़ हवा में डंटे रहेंगे
तब तक
जब तक इनके लिए
मुझ तक भेजे गए तुम्हारे उत्तर के लिए
नहीं हो जाते मजबूर
ये मेरे हाथ, मन और मष्तिस्क
देने को पूर्णांक

सनद रहे
कि ये प्रश्न इन्कार करते हैं
फंसने से
किसी छद्म तानों से बुने झूठ के जाल में
ये इन्कार करते हैं
भड़कने से
बरगलाए जाने से
बहलाए जाने से
फुसलाये जाने से

ये हुए हैं पैदा
सोच के गर्भ से

यूं ही नहीं...
इन्हें उत्पन्न होने को किया गया था निमंत्रित
जानने के हक के अधिकार के द्वारा

और ये अधिकार हुआ था पैदा
स्वयं इस सृष्टि के जन्म के साथ
भले ही तुम्हारे संविधान ने
तमाम लड़ाइयों के बाद ही
इसे दी हो मंजूरी

देखो नीचे खोलकर अपनी अटारी की खिड़की
प्रश्न खड़े हैं
करो पूर्ण उत्तर देकर युग्म
और समयावधि तुम्हें है उतनी ही
जिसमे कि ना जन्मने पायें प्रतिप्रश्न
न मेरे मन में
और न ही प्रत्यक्षदर्शियों के..
उतनी ही
जितने में कि
ना मिल पायें कुछ और स्वर
मेरे स्वर में..
दीपक मशाल


हिन्दी साहित्यिक मासिक पत्रिका सद्भावना दर्पण के सितम्बर अंक को पढ़ने के लिए इस लिंक का अनुसरण करें-
http://issuu.com/dipakmashal/docs/sadbhavnadarpanseptember-12_final


शनिवार, 1 सितंबर 2012

लघुकथाएं



१- अपराध का ग्राफ
''मारो स्सारे खों.. हाँथ-गोड़े तोड़ देओ.. अगाऊं सें ऐसी हिम्मत ना परे जाकी. एकई दिना में भूखो मरो जा रओ थो कमीन.. हमायेई खलिहान सें दाल चुरान चलो... जौन थार में खात हेगो उअई में छेद कर रओ.. जासें कई हती के दो रोज बाद मजूरी दे देहें लेकिन रत्तीभर सबर नईयां...'' कहते हुए मुखिया ने दो किलो दाल चुराते पकड़े गए अपने खेतिहर मजदूर पर लात-घूंसे चलाने शुरू कर दिए.
''हाय मर जेँ मालिक, खाली पेट हें, पेट में लातें ना मारो.. हाय दद्दा मर जेहें'' वो गरीब रोये जा रहा था.
''औकात तो देखो जाकी अब्नों खें जुबान लड़ा रओ... मट्टी को तेल डारो ससुरे पे फूंक तो देओ जाए'' नशे में धुत मुखिया का बेटा गुर्राया..

रात बीती तो मुखिया और उसके बेटे का नशा उतर चुका था, दरवाज़े पर पुलिस थी. मजदूर ७० प्रतिशत जली हुई हालत में सरकारी हस्पताल में जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहा था.
पुलिस ने दोनों पक्षों को समझाया. मजदूर के सारे इलाज़ कराने की जिम्मेवारी लेने की बात पर दोनों पक्षों में तपशिया करा दिया गया.
बेचारी पुलिस भी क्या करती, राज्य सरकार का दबाव था कि राज्य में अपराध का ग्राफ नीचे जाना चाहिए.


2- इंतज़ार 
घंटाघर की घड़ी ने रात के दस घंटे टन्कारना शुरू किया.. टन-टन-टन की आवाज़ से 'उसने' अपने क़दमों की रफ़्तार तेज़ करने की कोशिश की.. भागा भी लेकिन सामने के स्टॉप से उसके मोहल्ले  की ओर जाने वाली आखिरी बस की रफ़्तार ज्यादा निकली. बस उसकी नज़रों के सामने देखते-२ ओझल हो गई. दिन भर की थकान हावी हो रही थी उसपर और घर अभी भी दो किलोमीटर बाकी था जो अब उसे मजबूरन पैदल ही तय करना था. सड़क के बीच में पड़े ईंटे के टुकड़े को जोर से ठोकर लगाकर सन्नाटे को सुनाते हुआ चीखा वो, ''साला कमीना, एक मिनट को नहीं रोक सकता था..''
अगले दिन वो समय से पहले बस में था.. अज़ब सी बेचैनी से घिरा हुआ. बार-२ घड़ी देखता, दस बजे का इंतज़ार था.. अभी तक घंटाघर की घड़ी चीखी नहीं थी. वह गुस्से में भुनभुना रहा था,''साला बेवकूफ.. अब कौन सवारी आयेगी इतनी रात को. पता नहीं कब चलेगा.''
दीपक मशाल

रविवार, 3 जून 2012

लेखनी के जून २०१२ अंक में प्रकाशित दो लघुकथाएं..

सहजीविता 

सफ़ेद कबूतर और कबूतरी के उस जोड़े ने दुनिया देख रखी थी और वो बहेलिया था कि उन्ही के घोंसले वाले पेड़ के नीचे अपने दाने,जाल  और आस बिछाए था। कबूतर और कबूतरी ने एक दूसरे की तरफ देखा, मुस्कुराए और फिर भोजन की तलाश में पास के कस्बे की तरफ उड़ गए।

मगर शाम होते-होते जब कबूतर को कहीं से भी दाने हासिल न हुए तो खाली ही अपने घोंसले में लौट आया।  वापस आकर पता चला कि कबूतरी के साथ भी वही हुआ। मारे भूख के दोनों का बुरा हाल था, नीचे देखा तो जाल और दाने अभी भी बिछे हुए थे। कबूतर ने कबूतरी से पूछा, ''क्या कहती हो? खाया जाए?''

''पगला गए हो क्या? एक रात भूखे नहीं सो सकते, चार दानों के लिए जान जोखिम में डालने पर तुले हो..'' कबूतरी ने गुस्सा दिखाते हुए कहा।

''घबराओ मत प्रिये, मैं पता करके आया हूँ। कस्बे में मंत्री जी कल एक खेल प्रतियोगिता के उदघाटन समारोह में हमें अपने हाथों से शांति के प्रतीक के रूप में उड़ाने वाले हैं, जिसके लिए ही ये बहेलिया हमें पकड़ना चाहता है। सिर्फ एक रात की बात है, अभी खाना भी मिलेगा और कल आज़ादी भी।''

वो युगल मुस्कुराते हुए दानों पर जा बैठा, झाडी में छिपे बहेलिये ने जाल खींच लिया।

       ताकत
वो नौसिखिया कार चालक सांझ होते ही कार लेकर सड़क पर आ उतरा. कार चलाना तो सीख गया मगर अभ्यास की कमी थी, जिसको कि पूरा करने वास्ते वह कम भीड़-भाड़ वाले इलाके की तरफ मुड़ गया। अचानक पानी से भरे गड्ढे के ऊपर से कार निकली तो गड्ढे का गन्दा पानी राह चलते एक साइकिल सवार की कमीज को गन्दा कर गया। साइकिल वाले के चिल्लाने पर आस-पास के लोग जमा हो गए और कार को आगे बढ़ने से रोक दिया गया। अपनी आँखों को बड़ा-बड़ा करते हुए उस साइकिल वाले ने नौसिखिये पर चीखना शुरू कर दिया, ''स्साले, अन्धा होकर चलाता है? इतना बड़ा खड्डा नहीं दिखा तुझे? मेरी नई कमीज़ ख़राब कर दी। तुझे क्या लगता है ऐसे ही निकल जाएगा यहाँ से.. जानता नहीं है तू मैं कौन हूँ। इस इलाके के दादा का ख़ास आदमी हूँ मैं। अब चुपचाप नई कमीज़ के पैसे निकाल वर्ना स्टेयरिंग पकड़ने के लिए हाथ सलामत नहीं रहेंगे..''

धमकी का असर हुआ। नौसिखिये ने बिना कुछ कहे सुने चंद नीले-पीले नोट निकाल कर 'बेचारे' साइकिलवाले के हवाले कर दिए।

अगले मोड़ पर मुड़ते समय पता नहीं कहाँ से एक मोटर साइकिल सवार जल्दबाजी में कार से हल्का सा टकरा गया। हालांकि टक्कर बड़ी मामूली थी और मोटर साइकिल वाले को चोट भी नहीं लगी, लेकिन कार रोक कर उसने भी नौसिखिये को बाहर निकाला और उसने भी धमकाते हुए कहा कि, ''हाथ में मेहंदी लगा कर कार चला रहा था? चार पहिये पर सवार है तो किसी की जान लेगा? मैं यहाँ के कमिश्नर को अच्छी तरह से जानता हूँ. अगर अभी दो हज़ार नहीं निकाल के दिए तो थाने में टाँगे तुडवा दूंगा तेरी.. लाइसेंस जाएगा सो अलग.''

डरते हुए एकबार फिर उसने दो हज़ार रुपये मोटरसाइकिल वाले को थमा दिए और वहाँ से अपनी जान लेकर दूसरे इलाके की तरफ भागा।

लेकिन उसकी बदकिस्मती कहें या खराब ड्राइविंग कि इस बार सच में उसने एक सफ़ेद एम्बेसडर को पीछे से ठोक दिया। तुरत प्रक्रिया हुई, तीन गुण्डे टाईप के लोग मुँह में पान दबाये उसकी तरफ बढ़े और कॉलर पकड़कर उसे कार से बाहर निकालने के साथ-साथ तीन-चार थप्पड़ रसीद कर दिए। जैसे कि उसे उम्मीद थी उनमे से एक अश्लीलतम गालियाँ देते हुए बोल पड़ा, ''जानता है किसकी गाड़ी ठोकी है तूने? मंत्री जी के भतीजे की। पूरी डिग्गी चपटी कर डाली। अब इसका पैसा तेरा बाप भरेगा? चल निकाल बीस हज़ार वर्ना पता भी नहीं चलेगा कि कहाँ से आया था और कहाँ गया।''

पैसे तो अब जेब में थे नहीं, सो उसने अपने गले में पड़ी सोने की मोटी चेन उन गुन्डेनुमा लोगों को सौंप उनके पास गिरवी रखी अपनी जान छुड़ाई और अब अत्यधिक सावधानी के साथ कार चलाने लगा।

पर हाय रे बदकिस्मती कि घर से थोड़ी ही दूरी बाकी रहते, अँधेरे में कार एक बार फिर किसी भारी-भरकम वस्तु से टकरा गई।

डर के मारे थर-थर कांपते हुए उसने कार रोक कर देखने की कोशिश की कि इसबार कौन है कि तभी एक शांत और मधुर आवाज़ कानों में पड़ी, ''माफ़ करना, मैं तुम्हारे रास्ते में आ गया।''

देखा तो कार एक चबूतरे से टकरा गई थी. चबूतरा किसी धार्मिक इमारत का था।

नौसिखिये ने हिम्मत करके पूछा, '' आप कौन हैं?''

''भाई, मैं ईश्वर हूँ और मैं किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता..''.

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