रविवार, 6 मई 2012
शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012
सामाजिक सरोकारों की पत्रिका 'जनपक्ष' में प्रकाशित एक कविता-
सबने किया बलात्कार
जज साहब
सबने किया बलात्कार जज साहब
ये सबने किया
मेरे साथ सामूहिक बलात्कार हुआ है
उनके नाम नहीं पता मुझे
और चेहरे मैं नहीं रखना चाहती याद
अब तो नहीं याद पड़ते दिन
महीना तारीख भी
वो दिन जब मेरा बलात्कार बनी थी
खबर
हाँ अखबार में जरूर होगा
ढूँढने पर मिल जाए शायद
पर अखबार में भी तो छुपा ही
देते हैं असली नाम
छद्म नाम के सहारे कहाँ ढूंढूं मैं किस पेज पर
हर जगह तो यही खबर है
ना जाने कौन सी मेरी हो
अब जो तारीख याद रहती है
वो है अगली सुनवाई की तारीख
और हर बार, बार-बार
याद करनी पड़ती है एक नई तारीख
जिनके बीच कहीं उस हादसे के दिन
की तारीख
होकर रह गई है गुम
कभी इस सोच की नदी में भी मन
लगाता है डुबकी
कि क्या पता मेरा बलात्कार और भी पहले से
हो रहा हो
मुझे बताये बिना ही हो रहा
हो
पड़ोसियों के सपनों में..
सपनों में मेरे पुरुष साथियों
के
उन राहगीरों की फंताशी दुनिया में
जो रास्ते भर बिना
झिझके घूरते हैं मेरे कटाव, मेरे उभार
या क्या पता मेरे ही
रिश्तेदारों के सपनों में भी
वैसे ये सब पहली
बार जिस भी तारीख को हुआ
उसको होने की खबर ना थी मुझे
पर अब जो हर रोज होता है
वो होता है सरेआम बाकायदा तारीख बताकर
अदालत में सुनवाई की तारीख
भरी अदालत में मेरे
पुनार्बलात्कार की तारीख ही है जज साहब
और इधर हर रोज हर मज़हब हर सम्प्रदाय
हर उम्र के शख्स अपनी आँखों से
भींचते-भंभोडते हैं हर पल मुझे
हर वक़्त रौंदे जाते हैं मेरे वक्ष
नोचा जाता है चेहरा और कमर
हर क्षण उगते हैं खरोंच के नए
निशान इन नितम्बों पर
अपनी जाँघों पर फिर-फिर रिसता
महसूस करती हूँ लहू....
मेरे हर अंग में नाखूनों के
धंसते हैं ब्लेड
अब तो इनके सबूत के तौर पर खून
के धब्बे भी नहीं बनते
अब जो होता है वो होता है
और भी बेदर्दी से
मेरी जान की हत्या कर मेरी
अस्मिता की हत्या कर
अगर यह सब उस दिन के बाद से
मेरे बदन के साथ रोज भी होता
तो शायद इतना तकलीफदेह ना होता
क्योंकि जिस्म की तकलीफ को कर
सकती हूँ सहन मैं एक बारगी
पर उसका क्या जो बलात्कार रोज
होता है
मेरी आत्मा के साथ
मेरे अरमानों की तो बलात्कार और
हत्या दोनों होते हैं जज साहब
शरीर पर दिखने वाली खरोंचें
नहीं दिखतीं अब
पर मन पर जो खरोंचें थीं
वो वक़्त के साथ भरती ही नहीं
उन खरोंचों के घाव से नासूर बनने तक की प्रक्रिया में
कितने मन पीव निकली उसका अंदाज़ा
नहीं खुद मुझको भी
रेगिस्तान में पेड़ जितने लोगों
की सहानुभूति भी
मुझे कराती है एहसास
कि कोई सड़ांध है जो उपज रही है
मेरे भीतर ही भीतर
बलात्कारियों के लिबास चाहे
काले रहे हों या खाकी
वो सफ़ेद कार से निकले हों या नीली
पर चेहरे सबके एक से थे
सबने बार-बार किया कभी भरी अदालत में तो कभी
थाने में
रिपोर्ट लिखने के नाम पर जो
किया वह बलात्कार ही था माइलोर्ड
मुझे इन्साफ दिलाने के लिए
रिश्वत के नाम पर
जो माँगा गया वो भी यही था मेरी
मर्जी से मेरे साथ बलात्कार
यहाँ तक कि यहाँ दलील सुनने को
हाज़िर हुए लोगों ने
और इस खबर को सुनने वालों ने
तकिये अपनी छाती से लगा मुझे
महसूस किया होगा
वो भी उतने ही बलात्कारी हुए जज
साहब
छोड़ कर एक जमात को बाकी सबने
किया बलात्कार जज साहब
ये दर दोगुनी होती अगर ये जमात
ना बख्शती मुझे
ये बलात्कार होते दोगुने अगर
दुनिया के आधे इंसान ना होते
औरतें
पर फिर भी उनमे से अधिकाँश रखती
हैं हक
मुझ पर थूकने का..
साँचे से मेरे ही जैसी दिखने
वाली
कुछ लाचार औरतों
ने सुना दी है
दरिंदों के हाथों मेरे ही नारीगत सम्मान को कुचले जाने की सज़ा
मुझे ही
बदचलन करार देकर
तुम्हारी इस
अदालत में
मेरे गुनाहगारों
को गुनहगार साबित होने से पहले
ईद, दिवाली, लोहड़ी
सब मैं अब सुनती हूँ सिर्फ आते जाते
इन्हें थम कर
नहीं देखने दिया जाता मुझे
इन मंगलों में
मैं हो गई हूँ अमंगल... अपशकुन
दीवार पे टंगे
कलेंडर के तस्वीरों की ऑंखें भी मुझे
मेरी देह को उसी
निगाह से घूरती दिखती हैं
उनकी आँखों में
भी उभर आते हैं लाल डोरे
कई बार खाली
दीवार पर ही सैकड़ों आखें उगने लगती हैं
उगती रहती हैं..
और चली जाती
हैं उगतीं
जब तक कि मैं ना
हो जाऊं चीख मार कर बेहोश
और करने दूँ
उन्हें उनकी मनमानी
कई बार तो अँधेरे में आईने
में
मेरा ही अक्स करता लगता है मेरे साथ वही
दरिन्दगी
इसलिए मैं और
नहीं कुचली जाना चाहती
गुनाह किसी का भी
हो जज सा'ब
फांसी मुझे दो
मुझे दिला दो
छुटकारा इस हर पल के दमन से
कदम-कदम पर होते
मेरे मान-मर्दन से..
दीपक मशालशुक्रवार, 4 नवंबर 2011
क्षणिकाएं
आता यकीं नहीं उसको, मुलजिम की बेगुनाही का
दीवारों से पूछता है फिरता, किस्सा गवाही का
नज़र मिला ना पाया हाकिम फैसले के बाद
रंग उड़ा-उड़ा सा था लगा, उसकी सियाही का
बादलों के ये किनारे ज़र्द जैसे पड़ रहे हैं
ये पल वक़्त की चट्टान पे मूरत कोई गढ़ रहे हैं
तुम्हें अब भी यकीं नहीं कि साए हमारे बोलते हैं
देखो सूरज डूबते ही ये अँधेरे से लड़ रहे हैं.
दीपक मशाल
गुरुवार, 3 नवंबर 2011
दुनिया गोल है-------->>>दीपक मशाल
मेरी अपनी जिन्दगी में जब पहली बार किसी ने कहा था कि 'भाई, दुनिया गोल है' तो इस बात के पीछे छिपा गूढ़ रहस्य उस समय उजागर नहीं हुआ था. बस मन में कुछ-कुछ ऐसा ही ख्याल आया था कि इसमे कौन सी नई बात कह दी या 'ये भी कोई मुहावरा हुआ?' अब दुनिया गोल है तो है इस बात को सिद्ध हुए कई दशक गुजर गए..ये तो कई साल बाद पता चला कि इस उक्ति के जितने चाहे मतलब निकाल लो.. आपकी सोच को नींद आ जायेगी लेकिन 'दुनिया गोल है' के मायने निकलते चले जायेंगे..
हाँ जी भाईसा'ब एकदम सही कह रिया हूँ.. तभी ना हम सब गोला बना रहे हैं.. अजी सीधा सा मतलब है.. गोला बनाने का कोई गोल मतलब नहीं और मतलब यह है कि इस दुनिया में हम सभी एक दूसरे के पीछे भाग रहे हैं. अब आप लोग कहीं यह ना समझाने लगना कि 'अबे बेवकूफ, दुनिया गोल है तब कहते हैं जब कोई बार-बार टकराता है या फिर किसी अन्जान व्यक्ति से मिलने पर पता चलता है कि यह हमारे किसी करीबी के माध्यम से पहले ही हमसे जुड़ा हुआ है और हमको भनक तलक नहीं जी.... इसीलिए मैंने पहले ही यह यूनिवर्सल ट्रुथ आपके सामने लिख दिया कि 'दुनिया गोल है' के अर्थ भी गोले के छोर के जितने निकलते हैं(आदर्श परिस्थितियों में यहाँ तुलना लोहे के गोले से है ना कि ऊन के).. अब इस गोल दुनिया में मुझे सभी एक दूसरे के पीछे भागते हुए नज़र आ रहे हैं.. लोग हमारे पीछे और हम लोगों के पीछे.. एक समाज दूसरे के पीछे और दूसरा पहले के.. एक देश दूसरे के और दूसरा पहले के.. यह पिछलग्गूपन का खेल अनंतकाल से चला आ रहा है, अभी भी जारी है और आगे भी रहेगा इस बात की प्रबल संभावना है.. कृपया अचंभित ना होवें अगर आगे की सदी में पता चले कि यह खेल सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय नहीं बल्कि अंतर्ब्रह्मांडीय है.. धरती वाले किसी और ग्रह की नक़ल में लगे थे जो दूर से दूरबीन लेकर हमारी नक़ल में लगे थे..
जग-जाहिर है कि पश्चिमी देश भारत के और भारत पश्चिमी देशों के पीछे भाग रहा है.. अभी तक सिर्फ सभ्यता, आयुर्वेद, योग आदि तक सीमित था लेकिन अब तो नौकरी तक पर बात आ गई.. इन तथाकथित विकसित देशों के बड़े-बड़े अधिकारी बंगलौर और हैदराबाद जैसे शहरों की ख़ाक छानने को तैयार बैठे हैं.. इंटरव्यू देने के लिए कतार में खड़े हैं भाई लोग.. हम कितना ही उन्हें बहलाते हैं कि ''कृपया प्रतीक्षा करें, आप कतार में हैं'' लेकिन भाई लोग हैं कि कलेऊ बाँध कर टिके हुए हैं.
कतार से याद आया कि विदेशी हमारा मजाक बनाते हैं कि हिन्दुस्तान में संडास के बाहर सुबह-२ लम्बी लाइन लगती देखी जाती हैं.. लेकिन ये साहब तब भूल जाते हैं जब शाम को ये खुद कतार में लगे होते हैं दौड़ने वाली मशीनों पर चढ़ने के लिए.. अब कतार तो कतार हुई ना और देखने वाली बात यह है कि दोनों ही दशाओं में चेहरे पर आते-जाते भाव आपस में बड़ी भयंकर समानता रखते हैं..
वैसे अमीर देश के गरीब नागरिकों का बेचारों का एक ही सपना होता है कि अपने देश के उद्योगपतियों को विश्व के सबसे धनी व्यक्ति बनता देखें.. वो बनकर भी खुश नहीं होते और ये नागरिक बेचारे उन्हें बनते देखकर ही खुश हो लेते हैं.. बदले में अपनी दाल-रोटी की खातिर कैलोरी जलाते हैं जबकि विकसित देशों में इसके उलट है.. पहले वो जमके घी-दूध खाते हैं उसके बाद कैलोरी जलाने के लिए पैसे खर्च करते हैं..
हम जिस साइकिल को देखकर यह कहते हुए नाक-भौं सिकोड़ लेते हैं कि यह तो गरीबों की सवारी है या फिर मुलायम की.. उसी साइकिल से ये विकसित देश वाले इतना प्यार करते हैं कि बस पूछो मत.. ये साइकिल चलाते हैं शौक़ से.. अपने स्वास्थ्य के लिए.. कई-कई दफा तो इनकी साइकिल हमारी मोटरसाइकल से महँगी होती है और मोटरसाइकल हमारी कार से महँगी.. और कुछ साल पुरानी कार देखो तो एक पुराने स्कूटर के बराबर दामों में मिल जाते है.. अज़ब ही किस्सा है जहाँपनाह क्या किया जाए..
कल ही यहाँ स्पार(किराने की बड़ी दुकानों में से एक) में पता चला कि ब्रेड का एक पैकेट १.७२ पाउंड का और अगर दो लेते हैं तो १.६० पाउंड के.. सुनकर सर चकराया और मन ने यही दोहराया कि ''दुनिया गोल तो है ही यह भी सही है कि ये दुनिया खूब है..''
हमने सदियों तक जी भरकर ता-ता-थैया किया अब उन्हें भरतनाट्यम चाहिए और हमें सालसा, बैले नृत्य में रमने को मांगता.. देख लीजिये सबकुछ गोल-गोल घूम रहा है कि नहीं.. इतने से जी ना भरे तो अपने आसपास की किसी भी चीज.. जिसकी की तुलना आप कर सकें या कि हो सके, आप करके देखिये खुद ही सब गोल-गोल घूमता नज़र आएगा..
दीपक मशाल
(व्यंग्य नवम्बर २०११ के गर्भनाल अंक ६० में प्रकाशित)
दीपक मशाल
(व्यंग्य नवम्बर २०११ के गर्भनाल अंक ६० में प्रकाशित)
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