शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

अन्ना लड़ाई लम्बी है और हम तुम्हारे साथ रहने लायक नहीं.-------->>>दीपक मशाल

आज देश भर में अन्ना की, दूसरी आज़ादी पाने की लहर चल रही है. हम सब जोश में हैं और होना भी चाहिए, मगर फिर भी कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें दिमाग में आने से खुद को नहीं रोक पा रहा. इस लड़ाई के साथ-साथ हमें खुद से भी कुछ सवाल पूछने की आवश्यकता जान पड़ती है, कुछ विचारणीय बिंदु हैं जैसे कि-
हम में से कितने हैं जिन्होंने कभी अपनी सुविधाओं के लिए इस शासन को भ्रष्ट बनाने में सहयोग नहीं दिया? क्या हमने कभी बेटिकट यात्रा नहीं की या टी.सी. को कुछ पैसे थमाकर अपने लिए सीट की व्यवस्था नहीं की? क्या समय बचाने हेतु किसी प्रसिद्द मंदिर में लगी लम्बी लाइन को धता बताने के लिए सिक्कों की खनक का उपयोग नहीं किया? या फिर कभी कोई कर बचाने की कोशिश नहीं की?
मैंने खुद अँगुलियों पर गिनी जा सकने वाली अपनी रेलयात्राओं में से कुछेक बार नींद पूरी करने के लिए सहर्ष सुविधा शुल्क दिया है.
जब तक हम अपने पिछले किये गए इन कार्यों को स्वीकार कर उनके लिए प्रायश्चित करके आगे कभी इस तरह के आचरण को दोहराने की शपथ नहीं लेते, तब तक न तो हम भ्रष्टाचारहीन समाज, देश मांगने के हक़दार हैं और न ऐसे देश में जीने के.
देखने वाली बात ये है की इस आन्दोलन में सबसे ज्यादा शोर करने वालों में वो भी शामिल हैं जो कई सालों से लोगों का शोषण करते आ रहे हैं और भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा हैं. कुछ लोगों ने कहा की 'संभवतः उन्हें अब अपनी करनी पर अफ़सोस हो', मगर यह अफ़सोस कम और अपने आपको आने वाले नए तंत्र में सुरक्षित करने का उपाय कहीं अधिक दीखता है. ऐसे लोगों में चपरासी, बिचौलियों और क्लर्कों से लेकर छोटे-बड़े ठेकेदार, वकील, जज एवं पत्रकार तक शामिल हैं. 
देखकर बड़ा अचम्भा सा होता है की चंद दिनों में ही देश के जमाखोर, मिलावटखोर, मुनाफाखोर और कालाबाजारी के महारथी भी भ्रष्टाचारविहीन समाज की वकालत कैसे करने लगे. जिसके हाथ में एक छोटा सा भी अधिकार है वह भ्रष्ट हो चुका है, राशन, वजीफा बांटने वाले से लेकर विकास बांटने वाले तक.
क्या इस लेख के लेखक या पाठक ही दूध के धुले हुए हैं? 
मेरा मानना है इन हालात के लिए हम स्वयं भी दोषी हैं इसलिए संघर्ष सिर्फ नेताओं और अफसरों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए बल्कि हर महकमे के छोटे से बड़े अफसर तक यह नियम लागू हों. आज चाहे शिक्षा विभाग हो, पुलिस, रेलवे, बैंक या कोई और हर जगह आराम तलबी के चलते लगभग ना के बराबर कर्मचारी या अधिकारी अपनी जिम्मेवारियों को बखूबी निभाते हैं. अधिकाँश लोग संविधान, नियम-क़ानून की धज्जियां उड़ाते मिलते हैं और यह सब भ्रष्ट आचरण के अंतर्गत ही आता है. सिर्फ अधिकारी कर्मचारी ही क्यों दुकानदार, किसान, डॉक्टर, इंजीनियर हो या निठल्ले लोग सभी तो अपनी मनमानी में लगे हुए हैं. जब तक हम सभी स्वयं को इस देश के भ्रष्टाचारविहीन होने की दिशा में इकाई की तरह नहीं मानते और नियम-क़ानून का अनुपालन नहीं करते तब तक जो सपना हम देख रहे हैं वह अधूरा ही है.
एक डर ये भी है की पूर्व में अपहृत हो चुके आन्दोलनों की तरह इस आन्दोलन को भी कोई हाइजैक न कर ले, कहीं इस आन्दोलन से जुड़े बड़े नेताओं की मेहनत को नज़रंदाज़ कर कोई बड़ा नाम सिर्फ मलाई खाने के लिए आन्दोलन को बड़ा रूप देने का बहाना कर, जिम्मेदारी उठाने का दिखावा कर हमें वापस उसी जगह लाकर न खड़ा कर दे जहाँ से हम चलना शुरू कर रहे हैं. क्योंकि कई दूरदर्शी जो इस आन्दोलन में नए भारत का निर्माण देखने के साथ-२ अच्छा मौका तलाश रहे होंगे नया हिटलर बनने का...
यह आन्दोलन जो शुरू हुआ है तो अब पूर्ण सफाई के बाद ही समाप्त हो. लेकिन साथ ही अगर हम खुद अपने आप को इन बुराइयों से बाहर निकाल सकें तब ही अन्ना के साथ रहने का हक रखते हैं.

हाल कहीं वैसा ही ना हो जैसा कि श्री गणेश रायबोले जी की एक कविता कहती है.

सत्ता राक्षस
हिटलर को मारता हिटलर
लोग खुश हो जाते हैं
चलो मरा हिटलर
हिटलर हँसता है
अभी का नहीं
हजारों बरस का यह सिलसिला है.

एक और बात.. कहीं न कहीं लगता है की अभी भी ये एक बिखरा हुआ आन्दोलन ही है. हालांकि सब साथ दे रहे हैं मगर फिर भी अभी भी एक समुचित रणनीति की आवश्यकता है. बड़ी आज़ादी पाने के लिए बड़े संगठन की आवश्यकता है. हमें आगे बढ़ने के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम करना होगा. आप क्या कहते हैं? मैं तो बस इतना कहता हूँ कि-


चल पड़ी है बात
तो बस शाम तक ही ना चले
अब हमारी जंग 
अधूरे काम तक ही ना चले
विकास की पुरवाई गर 

इस बार जो आये यहाँ 
ध्यान रखना वो महज़ 
कुछ ग्राम तक ही ना चले

हर एक मस्जिद में चले 
चल पड़े इक-इक गुरुद्वारे में
ये बात 
सिर्फ चारों धाम तक ही ना चले

मैं इतनी दूर बैठा हूँ
हूँ मगर फिर भी वहीं 
पीने वालों बात सच्ची
बस जाम तक ही ना चले

हर आम का है हक अगर
हर आम को मिल जाए वो
रेवड़ी बनकर ये केवल
कुछ आम तक ही ना चले 

हर उम्र लांघे अगर
दहलीज देश के लिए
तो नया क़ानून
कुछ के काम तक ही ना चले

निशान भी छोड़े जो ये 
तब तो कोई बात हो
जो चल रहा है वो अकेले 

नाम तक ही ना चले.
दीपक मशाल 

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

अन्ना का समर्थन... गणेश रायबोले की कवितायें---->>>दीपक मशाल

श्री अन्ना हजारे 


मेरे पसंदीदा कवियों में से एक श्री गणेश रायबोले की कुछ कवितायें जो आजकल के हालात पर एकदम फिट हैं,  आदरणीय श्री अन्ना हजारे जी के समर्थन में, जन लोकपाल बिल के समर्थन में इन कविताओं के साथ एक हाथ मेरा भी.... 
आइये सन १९४७ में गोरे अंग्रेजों द्वारा काले अंग्रेजों को हुए सत्ता हस्तांतरण के बाद पुनः पुनः इन काले हिटलरों को होते आ रहे हस्तांतरण को विराम देने के लिए उठ खड़े हों. आइये भारत आज़ाद कराएं...

सत्ता राक्षस
हिटलर को मारता हिटलर
लोग खुश हो जाते हैं
चलो मरा हिटलर
हिटलर हँसता है
अभी का नहीं
हजारों बरस का यह सिलसिला है.
श्री गणेश रायबोले 


देश का मतलब

जब वह वोट मांगता है
तो उसके लिए
देश का मतलब 'हम लोग' हैं
हम लोग जो फैले हुए हैं
कश्मीर से कन्याकुमारी तक
गुजरात से अरुणांचल तक,
जबकि जीत जाता है
तो उसके लिए देश का अर्थ सिकुड़ जाता है
अम्बानी हो जाता है.

बदनाम जंगलराज
साजिशन बदनाम किया जाता है 
जंगलराज
जंगल में कोई अपनी जीविका के लिए 
आवश्यक धरती, आवश्यक आसमान से 
ज्यादा नहीं लेता
जंगल जानता है
जीविका के लिए
जितना जरूरी है
उससे ज्यादा लेना
जघन्य अपराध है,
जंगलराज में नहीं होते
कभी न भरने वाले सर्वभक्षी
सत्ताईस सत्ताईस मंजिला पेट
जंगलराज होता है
न्याय का राज
संतुलन का राज.

गणेश रायबोले 
(पत्रिका तीसरी दुनिया से ली गई कवितायें)

साथ में एक मेरी लघुकविता-
एक राजनैतिक सीमा पार करने की सज़ा 
सत्ताईस साल जेल..
एक देश लूटने की सज़ा?? 
एक देश पर हमले की सज़ा?
बेगुनाहों को गोलियों से भूनने की सज़ा?
अभी कुछ सोचा नहीं
तय भी नहीं 
मिलेगी या नहीं..
क्या पता दे ही दें 
सत्ताईस साल बाद..
दीपक मशाल 

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

एक तस्वीर बड़बड़ा रही थी ख्वाब में

मेरे अल्बम से  कुछ पुरानी तस्वीरें
झाँक रहीं थीं सूरज की ओर
उनके धुंधले पड़ते अक्स से
मानो सूरज के थे पुराने रिश्ते

तस्वीरें ढूंढ रहीं थीं 
आशा की किरण मेरे लिए

आग के महाकूप से निकलती लपटें झुलसा देतीं 
खामोश तस्वीरों की उमीदों को
मगर पगली तस्वीरें फिर नयी आस उगा लेतीं
उनके चारों कोने सोख लेते कुछ ऑक्सीजन
वो फिर लग जाती नई कोशिश में

तस्वीरें सपने नहीं देखतीं 
इसलिये कि तस्वीरें कभी नहीं सोतीं

पर आज जाने कैसे आँख लग गई उनकी
रात के तीसरे पहर
एक तस्वीर बड़बड़ा रही थी ख्वाब में
'अब तुम आ गए हो तो...
आशा की किरण का क्या करना'
पता नहीं जाने किसे देखकर
दीपक मशाल
(कविता गर्भनाल में पूर्व प्रकाशित)

सोमवार, 28 मार्च 2011

हम कब तक ऐसा करते रहेंगे??--------->>>दीपक मशाल


हाल ही में होली के पूर्व भारत के कई हिस्सों में खाद्य निरीक्षकों द्वारा डाले गए छापों के दौरान जिस तरह से काफी बड़ी तादाद में नकली या मिलावटी खोवे, घी, क्रीम, दूध, मिठाई और किराना सामग्री इत्यादि के बरामद होने के मामले प्रकाश में आये, उससे मन में यह विश्वास बैठ गया है कि भ्रष्टाचार, मिलावट, मुनाफाखोरी अब सतही बुराइयां नहीं रहीं. बल्कि यह जन-जन में संस्कार के रूप में अपनी पैठ जमा चुकी हैं. अब शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति भारत में शेष हो जो इन क्रियाकलापों से अछूता रहा हो, चाहे वह इस अपराध के अपराधी के रूप में रहा हो या फिर भुक्तभोगी के रूप में. यूँ तो यह सब सिर्फ आज की बात नहीं है ये लालच की 'संतान' बुराइयां सालों पहले हमारे यहाँ पैदा हो चुकी थीं और कितने ही बार ऐसी ख़बरें हमारी आँखों के सामने से गुजरीं. लेकिन जिस तरह से इस होली और बीती दीवाली पर मिलावट की घटनाएं देखने को मिलीं उससे लगता है कि देश को तबाह करने के लिए एक अप्राकृतिक और अदृश्य सुनामी भारत और विशेष रूप से उत्तर और मध्य  भारत में भी आया हुआ है. 

समझ नहीं आता कि कैसे चंद पैसे कमाने के लालच में हमारे बीच ही उठने-बैठने वाले लोग हमारी ही जान खतरे में डालने को तैयार हो जाते हैं. कैसे ये लोग भूल जाते हैं कि अगर वो बबूल बो रहे हैं तो उन्हें भी आम नहीं हाथ आने वाले. कल को हर व्यक्ति मिलावट से ही मुनाफे के चक्कर में उलझकर एक दूसरे के स्वास्थ्य को नुक्सान पहुँचाता मिलेगा. एक व्यक्ति जो जल्दी अमीर बनने के लिए खोवा नकली बनाकर बेचेगा वो फिर उन्ही पैसों से खुद के लिए भी नकली दालें, सब्जियां, मसाले, तेल इत्यादि खरीदेगा. हम सभी तो एक दूसरे को कहने में लगे हैं की 'तू डाल-डाल, मैं पात-पात'. 
जिसके जो हाथ में आ रहा है वो उसी को मिलावटी बना देता है. पेट्रोल पम्प हाथ आ गया तो पेट्रोल, डीजल में किरासिन मिला दिया, किराने की दुकान है तो दाल-चावल, मसाले, घी में अशुद्धिकरण, दूधवाले हैं तो यूरिया मिलाकर दूध ही नकली बना दिया वरना कुछ नहीं अगर थोड़े ईमानदार हैं तो पानी मिला कर ही काम चला लिया. बाजारों में उपलब्ध सब्जियों, फलों को कृत्रिम तरीके से आकर्षक एवं बड़े आकार का बनाया जा रहा है. फलों को कैल्शियम कार्बाइड का छिड़काव कर पकाने की बातें तो हम सालों से सुनते आ रहे हैं, ये कार्बाइड मष्तिष्क से सम्बंधित कई छोटी-बड़ी बीमारियों का स्रोत है. सब्जियों को बड़ा आकार देने के लिए उनके पौधों की जड़ों में ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन लगाये जा रहे हैं, ये वही ऑक्सीटोसिन है जो कि प्राकृतिक रूप से मादा के शरीर में बनता है और प्रसव के दौरान शिशु को बाहर लाने में एवं उसके बाद दुग्ध उत्पन्न करने में सहायक होता है. गाय-भैंसों को यही इंजेक्शन देकर ज्यादा दूध निकाला जा रहा है, जबकि इस हारमोन के इस तरह मानव शरीर में पहुँचने से होने वाले गंभीर दुष्प्रभावों पर रिसर्च चल रही है. मटर को हरा रंग देने के लिए कॉपर सल्फेट का प्रयोग होता है जो हमारे शरीर के लिए काफी नुकसानदेह है. एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में बाज़ार में उपलब्ध खाद्य पदार्थों में ९०% खाद्य पदार्थ मिलावटी होते हैं. यानी हम हर रोज़ कितना धीमा ज़हर ले रहे हैं हमें पता भी नहीं है. अब हम इन्हें खाते हैं तो अपनी मौत को दावत देते हैं और नहीं खाते तो जिंदा कैसे रहें?

वैसे ये सब खेल सिर्फ भारत में ही नहीं अन्य कई विकसित देशों में भी चल रहा है, लेकिन वहां के शुद्धता मानक अलग हैं और वहाँ की सक्रिय मीडिया समय-समय पर सरकार और लोगों को इस सब के खिलाफ चेताती रहती है इसलिए स्थिति काफी हद तक नियंत्रण में रहती है.
ये मिलावटी पदार्थ भले ही तुरंत दुष्प्रभाव ना दिखाएँ लेकिन इनके दूरगामी परिणाम तब समझ आते हैं जब किसी व्यक्ति को या उसके परिवारीजन को किसी न किसी जानलेवा बीमारी के रूप में इसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं. उस समय हम सिर्फ यही कहते रह जाते हैं कि ''हे ईश्वर! हमने किसी का क्या बिगाड़ा था जो यह दिन देखने को मिला..'' 
उस समय वह यह भूल जाता है कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कहीं ना कहीं उसने स्वयं यह ज़हर अपने आस-पास फैलाया है. मोटे तौर पर कहें तो वो दस रुपये कमाने के लिए अपने ही लोगों का हज़ार रुपये का नुक्सान कर रहा है.

पिछले साल ऐसे अप्राकृतिक तरीके से आकर्षक और बड़े आकार की बनाई गई सब्जियां-फल बाज़ार में लाने वालों के खिलाफ कानपुर में एक समूह ने आवाज़ उठाई जरूर थी, लेकिन उसके बाद क्या हुआ पता नहीं चला. सरकारी अमला ऊपर से आदेश आने से पहले इस तरफ ध्यान देता नहीं और ऊपर से आदेश आने से रहा. क्योंकि देश को चलाने वाले ही इन माफियाओं के साथ लंच-डिनर करते देखे जाते हैं.
आखिर कब तक सिर्फ उस खनक के लिए हम अपने ही लोगों के प्राणों से खिलवाड़ करते रहेंगे जो कि तब भी यहीं थी जब हम धरती पर ना आये थे और तब भी रहेगी जब हम ना होंगे. हम सभी विश्व को खूबसूरत बनाने और जीवनशैली  को बेहतर बनाने की दिशा में एक इकाई कार्यकर्ता की तरह कार्य करें तो समाज, देश, दुनिया बदलने में ज्यादा देर नहीं लगेगी. इस सोच को दिल से निकालना होगा कि 'एक अकेले हम नहीं करेंगे तो क्या फर्क पड़ जाएगा?'.. हम सभी इसी सोच के तहत दूध की बजाय सुरम्य तालाब को पानी से भर रहे हैं, सभी यही सोच रहे हैं कि सारा गाँव तो दूध डाल रहा है एक मैं पानी डाल दूंगा तो किसे पता चलेगा. इस तरह सभी एक दूसरे को धोखा देते रहे तो हम और न जाने कितने सालों तक सिर्फ विकासशील ही बने रहेंगे.

दूसरी तरफ खाद्य और आपूर्ति विभाग को भी कड़े क़ानून बनाने, उनको पालन कराने और लोगों में जागरूकता फैलाने की सख्त आवश्यकता है. वर्ना पहले से ही हमारे यहाँ प्रति दस हज़ार व्यक्ति पर एक डॉक्टर है....
दीपक मशाल 

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