आज पेश-ए-खिदमत है एक रचना वो भी एक ऐसे शायर की जो आज से ४८ साल पहले अपनी सरज़मीन को छोड़ लन्दन आ गए थे लेकिन आज भी दिल से पूरी तरह हिन्दुस्तानी ही हैं. ये हस्ती हैं डॉ. विद्या सागर आनंद जी, जिन्होंने इतिहास, कानून, राजनीति, साहित्य और ना जाने कितने क्षेत्रों में हिन्दुस्तान का झंडा बुलंद किया और आज भी हर भारतीय की सफलता को अपनी सफलता की तरह महसूसते हैं. लन्दन के वेस्टमिन्स्टर इलाके से सत्तारूढ़ लेबर पार्टी से सांसदी का चुनाव भी लड़ चुके हैं और यूरोपियन यूनियन का भी. हाल के प्रधानमन्त्री श्री गोर्डन ब्राउन के अच्छे परिचितों में हैं... अर्थात हर क्षेत्र में दखलंदाजी रखते हैं. अभी तक उनकी विभिन्न विषयों पर करीब १८ किताबें अंग्रेजी और ८ हिंदी/उर्दू में भी भारत, पाकिस्तान, यू.के., यू.एस. से प्रकाशित हो चुकी हैं और वीर सावरकर पर लिखी अपनी पुस्तक के लिए जाने जाते हैं. यहाँ उनके पहले ग़ज़ल संग्रह 'लहर लहर आनंद' से एक रचना आप सबको पढ़ा रहा हूँ-
शीर्षक है 'शहीद'
आग लगी है वृक्ष को जलने लग गए पात
पंक्षी फिर भी ना उड़े पंख भी थे जो साथ
वृक्ष को जलता देख कर पंक्षी क्यों ना उड़े
वृक्ष ने तो जलना ही था वो क्यों साथ जले
वृक्ष था पंक्षी के लिए मातृ भूमि समान
विपत्ति में नहीं छोड़ते माँ की सुधड़ सुजान
हीरे जैसी जान का मिला ना कोड़ी दाम
उनके इस बलिदान का निकला क्या परिणाम
मिल कर कूदे आग पर आग बुझी तत्काल
वृक्ष सलामत रह गया पर जल गए माँ के लाल
उनके इस बलिदान की प्रसिद्धि हुई महान
पुष्प चढ़ा कर आज भी पूजा करे जहान
डॉ. विद्या सागर आनंद
दोस्तों अगर मेरी खुद की रचनाएं आप पढ़ने लायक समझते हैं तो निम्न लिंक पर क्लिक करें-
नई कलम- उभरते हस्ताक्षर
पहला अहसास
भारत ब्रिगेड
शब्दकार
प्रस्तोता- दीपक 'मशाल'
चित्र- दीपक 'मशाल' का छायांकन
सोमवार, 12 अप्रैल 2010
शनिवार, 10 अप्रैल 2010
आँखों को बेनूर कर रहा पानी
लेखक: मीनाक्षी अरोड़ा
जन्मजात अंधापनबिहार के भोजपुर जिले के बीहिया से अजय कुमार, शाहपुर के परशुराम, बरहरा के शत्रुघ्न और पीरो के अरुण कुमार ये लोग भले ही अलग-अलग इलाकों के हैं, पर इनमें एक बात कॉमन है, वो है इनके बच्चों की आंखों की रोशनी। इनके साथ ही सोलह और अन्य परिवारों में जन्में नवजात शिशुओं की आँखों में रोशनी नहीं है। इनकी आँखों में रोशनी जन्म से ही नहीं है। बिहार के सबसे ज्यादा आर्सेनिक प्रभावित भोजपुर जिले में पिछले कुछ दिनों के अंदर 50 ऐसे बच्चों के मामले मीडिया में छाये हुए हैं जिनकी आँखों का नूर कोख में ही चला गया है।
मामला प्रकाश में लाने वाले आरा के एक विख्यात नेत्र विशेषज्ञ हैं- डॉ. एसके केडिया, जो कहते हैं कि "जन्मजात अंधापन के दो मामले लगभग छह महीने पहले मेरे अस्पताल में आये थे। उस समय मुझे कुछ गलत नहीं लगा था। लेकिन जब इस तरह के मामले पिछले तीन महीने में नियमित अंतराल पर मेरे पास आने शुरू हुए तो मुझे धीरे-धीरे यह एहसास हुआ कि यह एक नई चीज है, मेरे 20 साल के कैरियर में जन्मजात अंधापन के मामले इतनी बड़ी संख्या में कभी नहीं आये थे।“
भोजपुर के लोग अपने नवजात शिशुओं को लेकर डरे सहमे से अस्पताल पहुँच रहे हैं। वे नहीं जानते कि उनका नन्हा सा बच्चा देख सकता है कि नहीं। क्योंकि शुरुआत में बच्चे में इस तरह के कोई लक्षण दिखाई नहीं देते कि वे देख पा रहे हैं या नहीं। लोग अपना जिला छोड़कर राजधानी पटना के अस्पतालों में भी बच्चों की जांच करा रहे हैं। वे अपने बच्चों के बारे में किसी समस्या को सार्वजनिक भी नहीं करना चाहते क्योंकि इससे उनके सामाजिक ताने-बाने पर भी असर पड़ेगा।
सरकार और उससे जुड़ी हुई विभिन्न स्वास्थ्य एजेन्सियां इस तरह के मामलों के पीछे का सही कारण पता करने में पूरी तरह असफल सिद्ध हुई हैं। लोगों को आशंका है कि इसके लिये पानी में मिला आर्सेनिक जिम्मेदार है। हालांकि भोजपुर के जिला सिविल सर्जन डॉ. केके लाभ कहते हैं कि मोबाइल फोन के टावरों से निकला इल्क्ट्रोमैग्नेटिक रेडियेशन भी बच्चों के अंधेपन का कारण हो सकता है। हम लोग सही कारण जानने की कोशिश कर रहे हैं। इस पूरे मामले में प्रमाणित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता है पर एक चीज तो साफ है कि पर्यावरणीय प्रदूषण ही मुख्य कारण नजर आ रहा है।
अभी तक देखा गया है कि आर्सेनिक युक्त जल के निरंतर सेवन से लोग शारीरिक कमजोरी, थकान, तपेदिक, (टीबी.), श्वाँस संबंधी रोग, पेट दर्द, जिगर एवं प्लीहा में वृद्धि, खून की कमी, बदहजमी, वजन में गिरावट, आंखों में जलन, त्वचा संबंधी रोग तथा कैंसर जैसी बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। पर गर्भ में ही बच्चों के अंधा होने की घटनाओं का होना एकदम नया मोड़ है।
भोजपुर जिले का मुख्यालय आरा में आरोग्य संस्था के डॉ मृत्युंजय कुमार कई आशंकाएं व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि पहला कारण तो वंशानुगत हो सकता है। दूसरा कारण हो सकता है कि गर्भावस्था के दौरान दी जा रही किसी गलत दवा का असर हो। तीसरा यह भी हो सकता है कि आर्सेनिक से प्रभाव का यह कोई नया रूप हो, क्योंकि आर्सेनिक मानव के तंत्रिका तंत्र और स्नायु तंत्र पर असर तो करता ही है।
भोजपुर, बिहार में सबसे अधिक आर्सेनिक प्रभावित जिलों में से एक है। पिछले साल बिहार में कराये गए एक सर्वे में 15 जिलों के भूजल में आर्सेनिक के स्तर में खतरनाक वृद्धि दर्ज की गई थी। आर्सेनिक प्रभावित 15 जिलों के 57 विकास खंडों के भूजल में आर्सेनिक की भारी मात्रा पायी गई थी। सबसे खराब स्थिति भोजपुर, बक्सर, वैशाली, भागलपुर, समस्तीपुर, खगड़िया, कटिहार, छपरा, मुंगेर और दरभंगा जिलों में है। समस्तीपुर के एक गाँव हराईछापर में भूजल के नमूने में आर्सेनिक की मात्रा 2100 पीपीबी पायी गई जो कि सर्वाधिक है। जबकि भारत सरकार के स्वास्थ्य मानकों के अनुसार पेयजल में आर्सेनिक की मात्रा 50 पीपीबी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए और विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 10 पीपीबी से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
पानी में मिला आर्सेनिक बिहार ही नहीं पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तरप्रदेश, पंजाब सहित भारत के विभिन्न हिस्सों में लोगों की जिंदगी बर्बाद कर रहा है। आज पानी कहीं कैंसर तो कहीं बच्चों में सेरेब्रल पाल्सी, शारीरिक-मानसिक विकलांगता बाँट रहा है। माँ के गर्भ में ही बच्चों से आँखे छीन लेने वाले पानी की एक नई सच्चाई हमारे सामने आने वाली है। हालांकि यह सच अभी आना बाकी है कि असली कारण क्या हैं पर जो भी हैं वे पानी- पर्यावरण प्रदूषण के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ेंगे। लेकिन इसके साथ यह भी एक कड़वा सच है कि इन सब के पीछे इन्सान ही जिम्मेदार है।
धरती में जब पानी बहुत नीचे चला जाता है तब पानी कम, खतरनाक केमिकल ज्यादा मिलने लगते हैं। तभी पानी में फ्लोराइड, नाइट्रेट, आर्सेनिक और अब तो यूरेनियम भी मिलने लगा है। जब पानी आसमान से बरसता है तब उसमें कोई जहर नहीं होता। जब बारिश का पानी झीलों, तालाबों, नदियों में इकट्ठा होता है तब हमारे पैदा किए गए कचरे से प्रदूषित हो जाता है। पहले पानी झीलों, तालाबों, नदियों से धरती में समा जाता था लेकिन अब पानी के लिये सारे रास्ते हम धीरे-धीरे बंद करते जा रहे हैं। धरती में पानी कम जा रहा है जितना हम डालते हैं उसका कई गुना निकाल रहे हैं। ऐसे में धरती की खाली होती कोख जहर उगल रही है और माओं की कोख जन्मना अंधी संतानें। हालात धीरे-धीरे ऐसे होते जा रहे हैं कि धरती की कोख सूनी होती जा रही है। जमीन के नीचे पानी काफी कम हो गया है और जितना पानी बचा है उसकी एक-एक बूँद लोग निचोड़ लेना चाहते हैं। धरती की कोख को चीर कर उसके हर कतरे को लोग पी जाना चाहते हैं। सरकारें और उनकी नीतियां नलकूप, बोरवेल, डीपबोरवेल लगा-लगाकर धरती की कोख से सबकुछ निकाल लेना चाहती हैं।
सूनी धरती, सूखी धरती से जब पानी बहुत नीचे चला जाता है तब पानी कम, खतरनाक केमिकल ज्यादा मिलने लगते हैं। तभी पानी में फ्लोराइड, नाइट्रेट, आर्सेनिक और अब तो यूरेनियम भी मिलने लगा है। जब पानी आसमान से बरसता है तब उसमें कोई जहर नहीं होता। जब बारिश का पानी झीलों, तालाबों, नदियों में इकट्ठा होता है तब हमारे पैदा किए गए कचरे से प्रदूषित हो जाता है। पहले पानी झीलों, तालाबों, नदियों से धरती में समा जाता था लेकिन अब पानी के लिये सारे रास्ते हम धीरे-धीरे बंद करते जा रहे हैं। धरती में पानी कम जा रहा है जितना हम डालते हैं उसका कई गुना निकाल रहे हैं। ऐसे में सूखी होती धरती की कोख अब अमृत रूप पानी नहीं जहर उगल रही है। धरती की खाली होती कोख जहर उगल रही है और माओं की कोख जन्मना अंधी संतानें। यह नहीं होना चाहिए, फिर क्या होना चाहिए?
जन्मजात अंधापनबिहार के भोजपुर जिले के बीहिया से अजय कुमार, शाहपुर के परशुराम, बरहरा के शत्रुघ्न और पीरो के अरुण कुमार ये लोग भले ही अलग-अलग इलाकों के हैं, पर इनमें एक बात कॉमन है, वो है इनके बच्चों की आंखों की रोशनी। इनके साथ ही सोलह और अन्य परिवारों में जन्में नवजात शिशुओं की आँखों में रोशनी नहीं है। इनकी आँखों में रोशनी जन्म से ही नहीं है। बिहार के सबसे ज्यादा आर्सेनिक प्रभावित भोजपुर जिले में पिछले कुछ दिनों के अंदर 50 ऐसे बच्चों के मामले मीडिया में छाये हुए हैं जिनकी आँखों का नूर कोख में ही चला गया है।
मामला प्रकाश में लाने वाले आरा के एक विख्यात नेत्र विशेषज्ञ हैं- डॉ. एसके केडिया, जो कहते हैं कि "जन्मजात अंधापन के दो मामले लगभग छह महीने पहले मेरे अस्पताल में आये थे। उस समय मुझे कुछ गलत नहीं लगा था। लेकिन जब इस तरह के मामले पिछले तीन महीने में नियमित अंतराल पर मेरे पास आने शुरू हुए तो मुझे धीरे-धीरे यह एहसास हुआ कि यह एक नई चीज है, मेरे 20 साल के कैरियर में जन्मजात अंधापन के मामले इतनी बड़ी संख्या में कभी नहीं आये थे।“
भोजपुर के लोग अपने नवजात शिशुओं को लेकर डरे सहमे से अस्पताल पहुँच रहे हैं। वे नहीं जानते कि उनका नन्हा सा बच्चा देख सकता है कि नहीं। क्योंकि शुरुआत में बच्चे में इस तरह के कोई लक्षण दिखाई नहीं देते कि वे देख पा रहे हैं या नहीं। लोग अपना जिला छोड़कर राजधानी पटना के अस्पतालों में भी बच्चों की जांच करा रहे हैं। वे अपने बच्चों के बारे में किसी समस्या को सार्वजनिक भी नहीं करना चाहते क्योंकि इससे उनके सामाजिक ताने-बाने पर भी असर पड़ेगा।
सरकार और उससे जुड़ी हुई विभिन्न स्वास्थ्य एजेन्सियां इस तरह के मामलों के पीछे का सही कारण पता करने में पूरी तरह असफल सिद्ध हुई हैं। लोगों को आशंका है कि इसके लिये पानी में मिला आर्सेनिक जिम्मेदार है। हालांकि भोजपुर के जिला सिविल सर्जन डॉ. केके लाभ कहते हैं कि मोबाइल फोन के टावरों से निकला इल्क्ट्रोमैग्नेटिक रेडियेशन भी बच्चों के अंधेपन का कारण हो सकता है। हम लोग सही कारण जानने की कोशिश कर रहे हैं। इस पूरे मामले में प्रमाणित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता है पर एक चीज तो साफ है कि पर्यावरणीय प्रदूषण ही मुख्य कारण नजर आ रहा है।
अभी तक देखा गया है कि आर्सेनिक युक्त जल के निरंतर सेवन से लोग शारीरिक कमजोरी, थकान, तपेदिक, (टीबी.), श्वाँस संबंधी रोग, पेट दर्द, जिगर एवं प्लीहा में वृद्धि, खून की कमी, बदहजमी, वजन में गिरावट, आंखों में जलन, त्वचा संबंधी रोग तथा कैंसर जैसी बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। पर गर्भ में ही बच्चों के अंधा होने की घटनाओं का होना एकदम नया मोड़ है।
भोजपुर जिले का मुख्यालय आरा में आरोग्य संस्था के डॉ मृत्युंजय कुमार कई आशंकाएं व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि पहला कारण तो वंशानुगत हो सकता है। दूसरा कारण हो सकता है कि गर्भावस्था के दौरान दी जा रही किसी गलत दवा का असर हो। तीसरा यह भी हो सकता है कि आर्सेनिक से प्रभाव का यह कोई नया रूप हो, क्योंकि आर्सेनिक मानव के तंत्रिका तंत्र और स्नायु तंत्र पर असर तो करता ही है।
भोजपुर, बिहार में सबसे अधिक आर्सेनिक प्रभावित जिलों में से एक है। पिछले साल बिहार में कराये गए एक सर्वे में 15 जिलों के भूजल में आर्सेनिक के स्तर में खतरनाक वृद्धि दर्ज की गई थी। आर्सेनिक प्रभावित 15 जिलों के 57 विकास खंडों के भूजल में आर्सेनिक की भारी मात्रा पायी गई थी। सबसे खराब स्थिति भोजपुर, बक्सर, वैशाली, भागलपुर, समस्तीपुर, खगड़िया, कटिहार, छपरा, मुंगेर और दरभंगा जिलों में है। समस्तीपुर के एक गाँव हराईछापर में भूजल के नमूने में आर्सेनिक की मात्रा 2100 पीपीबी पायी गई जो कि सर्वाधिक है। जबकि भारत सरकार के स्वास्थ्य मानकों के अनुसार पेयजल में आर्सेनिक की मात्रा 50 पीपीबी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए और विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 10 पीपीबी से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
पानी में मिला आर्सेनिक बिहार ही नहीं पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तरप्रदेश, पंजाब सहित भारत के विभिन्न हिस्सों में लोगों की जिंदगी बर्बाद कर रहा है। आज पानी कहीं कैंसर तो कहीं बच्चों में सेरेब्रल पाल्सी, शारीरिक-मानसिक विकलांगता बाँट रहा है। माँ के गर्भ में ही बच्चों से आँखे छीन लेने वाले पानी की एक नई सच्चाई हमारे सामने आने वाली है। हालांकि यह सच अभी आना बाकी है कि असली कारण क्या हैं पर जो भी हैं वे पानी- पर्यावरण प्रदूषण के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ेंगे। लेकिन इसके साथ यह भी एक कड़वा सच है कि इन सब के पीछे इन्सान ही जिम्मेदार है।
धरती में जब पानी बहुत नीचे चला जाता है तब पानी कम, खतरनाक केमिकल ज्यादा मिलने लगते हैं। तभी पानी में फ्लोराइड, नाइट्रेट, आर्सेनिक और अब तो यूरेनियम भी मिलने लगा है। जब पानी आसमान से बरसता है तब उसमें कोई जहर नहीं होता। जब बारिश का पानी झीलों, तालाबों, नदियों में इकट्ठा होता है तब हमारे पैदा किए गए कचरे से प्रदूषित हो जाता है। पहले पानी झीलों, तालाबों, नदियों से धरती में समा जाता था लेकिन अब पानी के लिये सारे रास्ते हम धीरे-धीरे बंद करते जा रहे हैं। धरती में पानी कम जा रहा है जितना हम डालते हैं उसका कई गुना निकाल रहे हैं। ऐसे में धरती की खाली होती कोख जहर उगल रही है और माओं की कोख जन्मना अंधी संतानें। हालात धीरे-धीरे ऐसे होते जा रहे हैं कि धरती की कोख सूनी होती जा रही है। जमीन के नीचे पानी काफी कम हो गया है और जितना पानी बचा है उसकी एक-एक बूँद लोग निचोड़ लेना चाहते हैं। धरती की कोख को चीर कर उसके हर कतरे को लोग पी जाना चाहते हैं। सरकारें और उनकी नीतियां नलकूप, बोरवेल, डीपबोरवेल लगा-लगाकर धरती की कोख से सबकुछ निकाल लेना चाहती हैं।
सूनी धरती, सूखी धरती से जब पानी बहुत नीचे चला जाता है तब पानी कम, खतरनाक केमिकल ज्यादा मिलने लगते हैं। तभी पानी में फ्लोराइड, नाइट्रेट, आर्सेनिक और अब तो यूरेनियम भी मिलने लगा है। जब पानी आसमान से बरसता है तब उसमें कोई जहर नहीं होता। जब बारिश का पानी झीलों, तालाबों, नदियों में इकट्ठा होता है तब हमारे पैदा किए गए कचरे से प्रदूषित हो जाता है। पहले पानी झीलों, तालाबों, नदियों से धरती में समा जाता था लेकिन अब पानी के लिये सारे रास्ते हम धीरे-धीरे बंद करते जा रहे हैं। धरती में पानी कम जा रहा है जितना हम डालते हैं उसका कई गुना निकाल रहे हैं। ऐसे में सूखी होती धरती की कोख अब अमृत रूप पानी नहीं जहर उगल रही है। धरती की खाली होती कोख जहर उगल रही है और माओं की कोख जन्मना अंधी संतानें। यह नहीं होना चाहिए, फिर क्या होना चाहिए?
गुरुवार, 8 अप्रैल 2010
एक निहायत जरूरी पोस्ट, ये कोई मजाक नहीं------>>>दीपक 'मशाल'
नक्सली समस्या पर जो विचार मैं लिखना चाहता था और जो सवाल उठाना चाहता था वो कुछ तो गुस्से की वजह से सोच नहीं पाया और कुछ समयाभाव में... लेकिन आज एक ऐसी पोस्ट पढ़ी जो इस विषय पर एक सम्प्पूर्ण पोस्ट लगी लेकिन बहुत दुखद है कि इससे पहले से भी कई बेहतरीन पोस्ट लिखती आ रहीं लाइफ ब्लॉग की लेखिका श्रीमती रौशनी साहू जी को बहुत कम लोगों ने पढ़ा जबकि उनकी नक्सल समस्या पर लिखी गई कल की पोस्ट नक्सल आखिर चाहते क्या हैं? वास्तव में एक बहुत गंभीर और विचारणीय पोस्ट है इसलिए उनकी अनुमति से यहाँ पुनः आप लोगों के सामने रख रहा हूँ. साथ ही आपसे गुज़ारिश करूंगा कि यारों-दोस्तों की पोस्टों के चक्रव्यूह से निकाल ऐसी पोस्टों पर नज़र डालें.. मुझे पूरे अपने से मिलते विचार लगे तो मैं इस पोस्ट को यहाँ ले आया. आपको लगेंगे या नहीं.. ये भी नहीं जानता.
केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम के दूसरे शांतिवार्ता प्रस्ताव का जवाब नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ में ७६ जवानों का खून बहा कर दिया।
यह घटना दंतेवाड़ा (छ. ग. ) के चिंतलनार थाने की है जहाँ नक्सलियों ने सोची समझी साजिश के तहत पूरे जवानों को घेर कर इस कारनामे को अंजाम दिया।
देश की जनता इनका कारण जानना चाहती है।
सबसे पहले हमारे देश के पूज्यनीय नेताओं से प्रश्न :-
इस समस्या का शांतिपूर्ण समाधान ढूँढने में आपको काफी मेहनत करनी पड़ेगी। आप यदि जीतना चाहते हैं तो जीत सही मायने में वही होगी की आप नक्सलियों का ह्रदय भी जीते। यह कार्य सच्ची लगन से होना चाहिए।
नक्सलियों के लिए दिलों में नफ़रत नहीं बल्कि उनको समझने का प्रयास करना होगा नहीं तो हम ऐसे ही जवानों का खून बहता देखेंगे। माताओं की गोद , बहनों की कलाईयाँ और सुहागिनों की मांग सुनी हो जाएँगी। कुछ पलों की हमदर्दी जताकर आप उन्हें भूल जायेंगे और छोड़ जायेंगे उन्हें हमेशा के लिए तन्हा। फिर एक नई तैयार औरों के जीवन को सुना करने की।
नक्सलियों से प्रश्न :-
जवानों और अफसरों से प्रश्न:-
दीपक 'मशाल'
केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम के दूसरे शांतिवार्ता प्रस्ताव का जवाब नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ में ७६ जवानों का खून बहा कर दिया।
यह घटना दंतेवाड़ा (छ. ग. ) के चिंतलनार थाने की है जहाँ नक्सलियों ने सोची समझी साजिश के तहत पूरे जवानों को घेर कर इस कारनामे को अंजाम दिया।
देश की जनता इनका कारण जानना चाहती है।
सबसे पहले हमारे देश के पूज्यनीय नेताओं से प्रश्न :-
- ये नक्सली कौन हैं और इनका मकसद क्या है क्या आपने ईमानदारी से इसका जवाब ढूँढने की कोशिश की है?
- ग्रीन हंट ऑपरेशन क्या है?
- आप नक्सलियों को मारना क्यों चाहते हो? उन्होंने कभी आम जनता की जान नहीं ली यह जरूर है कि जनता कि संपत्ति को नुकसान पहुंचाकर वे जनता को परेशां करते हैं पर यह आपके द्वारा बढ़ाई गई महंगाई से बेहद कम नुकसान है।
- नक्सलियों के सफाए की बात सोचते वक्त आपका दृष्टिकोण क्या होता है?क्या कभी इस नज़र से देखने की कोशिश की है कि यह भी हमारे भाई ही हैं।
- इस शतरंज के खेल में आपको ही हर बार क्यों मात खानी पड़ रही है?
- बेहतर रणनीति किसकी है? आपकी या फिर नक्सलियों की?
- जहाँ तक हमें यह जानकारी प्राप्त हुई है की भोले भाले आदिवासियों के विश्वास को आप लोगों ने शिक्षा और दवाईयों से जीता और उनकी सारी जमीन हथिया ली और शोषण किया। परिणाम आज सामने है। यह कहाँ तक सच है यदि है तो इसका समाधान क्या है? या फिर और कुछ बात है?
इस समस्या का शांतिपूर्ण समाधान ढूँढने में आपको काफी मेहनत करनी पड़ेगी। आप यदि जीतना चाहते हैं तो जीत सही मायने में वही होगी की आप नक्सलियों का ह्रदय भी जीते। यह कार्य सच्ची लगन से होना चाहिए।
नक्सलियों के लिए दिलों में नफ़रत नहीं बल्कि उनको समझने का प्रयास करना होगा नहीं तो हम ऐसे ही जवानों का खून बहता देखेंगे। माताओं की गोद , बहनों की कलाईयाँ और सुहागिनों की मांग सुनी हो जाएँगी। कुछ पलों की हमदर्दी जताकर आप उन्हें भूल जायेंगे और छोड़ जायेंगे उन्हें हमेशा के लिए तन्हा। फिर एक नई तैयार औरों के जीवन को सुना करने की।
नक्सलियों से प्रश्न :-
- क्या चाहते हैं आप?
- अपने अधिकारों के लिए जिस रास्ते को आपने चुना क्या वह सही है?
- किसके खिलाफ लड़ाई है आपकी ? अपने स्वयं के देशवासियों से /अपने देश से?
- शांति का रास्ता छोड़ हथियारों का साथ पकड़ने से आप कहाँ तक सफल हो पाएंगे?
- क्या आपको अपने वाकई में अपने देश और लोगों से स्नेह है?
- आपकी हरकतों से आपके बच्चे क्या सिखेंगे? हथियार पकड़ना, बारूदी सुरंग बिछाना या और कुछ?
- पाकिस्तान और बाकि कुछ राष्ट्रों का हाल तो आपने देखा ही है कि क्या हो रहा है दूसरों का बुरा सोचने से स्वयं भी उसके प्रभाव से बच नहीं सकते। वैसे औरों का भला करने से स्वयं का भी भला होता है।
- संकीर्ण मानसिकता को त्यागकर दूरदृष्टि अपनाएँ जिसमें जन का भला हो।
- आप अपनी ही सरकार से इतने क्रोधित क्यों हैं? हर क्षेत्र में आप लोगों के लिए बहुत कुछ किया जा रहा है जबकि पीड़ित तो सामान्य वर्ग के लोग हैं जो पढ़ लिख कर बेरोजगार बैठे हैं।
- नक्सली नेताओं से मेरा यह सीधा प्रश्न है कि आप और देश के नेताओं में फर्क क्या है? यद्दपि उन्होंने आदिवासियों कि जमीने , शिक्षा और दवाईयों के नाम से हड़प ली हैं तो आप क्या कर रहे हैं उन भोले भाले आदिवासियों को मोहरा बनाकर अपने स्वार्थसिद्ध करने में लगे हैं।
- एक तरफ हमारे जवान प्यादे हैं तो दूसरी तरफ आपने भोले भाले आदिवासियों को प्यादा बनाकर रखा है। यह दोनों ही सूरत हमारे अपनों के लिए घातक है।
- क्या आप वाकई में आदिवासियों की भलाई चाहते हैं या फिर हमारे परम दुश्मनों की सहायता कर देश में अस्थिरता फैलाना चाहते हैं?
जवानों और अफसरों से प्रश्न:-
- माना अनुशासन से भरी हुई जिन्दगी आपकी होती है इसका मतलब यह नहीं की आप मशीन हो गए! जिसने चाहा जब चाहा वहां बगैर किसी ठोस उपाय के आपको लगा दिया।
- जब आप दुश्मनों के सामने होते हैं तो आपकी पहली शर्त होती है उनका सफाया हथियारों से। क्या आपकी नज़रों में यह सही है?
- क्या आप देश के नेताओं के मात्र कठपुतलियाँ रह गए हैं?
- नक्सल क्षेत्रों में जब आप जाते हैं तो आप नेताओं से ज्यादा उनके करीब होते हैं क्या आपने कभी उनके दिलों तक जाकर उन्हें समझने की कोशिश की है?
- क्या किसी भी समस्या का समाधान हथियार ही है?
- आपके लिए कौन महत्वपूर्ण है ? हमारा देश, देशवासी या हमारे नेताओं के आदेश?
दीपक 'मशाल'
ऐसे गृहमंत्री और अन्य मंत्रियों को फांसी पर लटका दो----->>>दीपक 'मशाल'
क्या लगता है आपको? कौन है असली दोषी इस नरसंहार के पीछे? क्या नक्सल या आदिवासी, टाटा-बिडला-अम्बानी जैसे उद्योगपति या मीडिया, पुलिस या सरकार, या कोई और?
ये घटना मेरा भी उतना ही लहू जलाती है जितना कि किसी अन्य भारतीय का.. निश्चय ही बहुत ही निंदनीय कृत्य है ये. लेकिन क्या न्याय विभाग असली दोषियों को पकड़ पायेगा? क्या उन्हें सजा सुना पायेगा? क्या पकड़ पायेंगे वो सत्तारुड़ी पार्टी के दिग्गजों को, क्या दे पायेंगे चिदंबरम को फांसी?
एक जायज़ सवाल उठ सकता है कि फांसी चिदंबरम को क्यों? क्योंकि नैतिक रूप से ये आदमी ही जिम्मेवार है अफसरशाही और उद्योगपतियों के बढ़ते प्रभुत्व के लिए. मैं मानता हूँ कि नक्सल्स का ये बिलकुल गलत तरीका है अपनी मांगों को मनवाने का. ये नरसंहार कहीं से भी जायज़ नहीं लेकिन क्या गृहमंत्री जवाब देंगे कि उन जवानों को किस मंशा से वहाँ जंगल में मरने के लिए छोड़ा गया था? क्या हुआ? कहाँ चूक हुई? चूक क्यों कहा गया, क्या ये षड़यंत्र था कि किसी को कानोकान खबर ना हो और इस विद्रोह को रातोंरात कुचल दिया जाए यदि सच में ऐसा है तो क्या ये एक तरह से आत्मरक्षा में उठाया गया कदम नहीं है? क्या ये टुकड़ी नक्सलों को मारने के लिए नहीं भेजी गई थी?
मरे कोई भी नुक्सान हमारे देश का ही हो रहा है.. जब तक ये रक्तपिपासु राजनीतिज्ञ अपने फायदे को ध्यान में रखते रहेंगे तब तक किसी ना किसी माँ को तो विलाप करते ही रहना है, किसी ना किसी बहिन को राखी पर आँसू बहाना ही है, किसी को तो विधवा होना ही है और किसी ना किसी बच्चे को अनाथ होना ही है.
इसी सरकार के आदेश से इन आदिवासियों में से बिना असली नक्सल की पहिचान किये उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किये जाते हैं, उनके स्तन काट दिए जाते हैं और उनके बच्चों की अंगुलियाँ काट दी, छील दी जाती हैं.. और ये सब होता है इस मानसिक रूप से दिवालिया सरकार के आदेशों से, कुछ दुर्दांत अफसरों के कहने पर. परिणामस्वरूप बलि चढ़ती है मासूमों की, चाहे वो सीआरपीऍफ़ का जवान हो या कोई आदिवासी जिसे नक्सल का नाम दे दिया गया हो. असली अपराधी पकड़ में ही कहाँ आते हैं?
लेकिन ना ये सरकार सुधरनेवाली है और ना हम लोग...
अभी और भी नरसंहार की घटनाएं होती रहेंगीं और रोकने का एक ही तरीका है कि सेना भेजकर शांति की कोशिश करने वाले ऐसे गृहमंत्री और अन्य मंत्रियों को फांसी पर लटका दो.
दीपक 'मशाल'
ये घटना मेरा भी उतना ही लहू जलाती है जितना कि किसी अन्य भारतीय का.. निश्चय ही बहुत ही निंदनीय कृत्य है ये. लेकिन क्या न्याय विभाग असली दोषियों को पकड़ पायेगा? क्या उन्हें सजा सुना पायेगा? क्या पकड़ पायेंगे वो सत्तारुड़ी पार्टी के दिग्गजों को, क्या दे पायेंगे चिदंबरम को फांसी?
एक जायज़ सवाल उठ सकता है कि फांसी चिदंबरम को क्यों? क्योंकि नैतिक रूप से ये आदमी ही जिम्मेवार है अफसरशाही और उद्योगपतियों के बढ़ते प्रभुत्व के लिए. मैं मानता हूँ कि नक्सल्स का ये बिलकुल गलत तरीका है अपनी मांगों को मनवाने का. ये नरसंहार कहीं से भी जायज़ नहीं लेकिन क्या गृहमंत्री जवाब देंगे कि उन जवानों को किस मंशा से वहाँ जंगल में मरने के लिए छोड़ा गया था? क्या हुआ? कहाँ चूक हुई? चूक क्यों कहा गया, क्या ये षड़यंत्र था कि किसी को कानोकान खबर ना हो और इस विद्रोह को रातोंरात कुचल दिया जाए यदि सच में ऐसा है तो क्या ये एक तरह से आत्मरक्षा में उठाया गया कदम नहीं है? क्या ये टुकड़ी नक्सलों को मारने के लिए नहीं भेजी गई थी?
मरे कोई भी नुक्सान हमारे देश का ही हो रहा है.. जब तक ये रक्तपिपासु राजनीतिज्ञ अपने फायदे को ध्यान में रखते रहेंगे तब तक किसी ना किसी माँ को तो विलाप करते ही रहना है, किसी ना किसी बहिन को राखी पर आँसू बहाना ही है, किसी को तो विधवा होना ही है और किसी ना किसी बच्चे को अनाथ होना ही है.
इसी सरकार के आदेश से इन आदिवासियों में से बिना असली नक्सल की पहिचान किये उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किये जाते हैं, उनके स्तन काट दिए जाते हैं और उनके बच्चों की अंगुलियाँ काट दी, छील दी जाती हैं.. और ये सब होता है इस मानसिक रूप से दिवालिया सरकार के आदेशों से, कुछ दुर्दांत अफसरों के कहने पर. परिणामस्वरूप बलि चढ़ती है मासूमों की, चाहे वो सीआरपीऍफ़ का जवान हो या कोई आदिवासी जिसे नक्सल का नाम दे दिया गया हो. असली अपराधी पकड़ में ही कहाँ आते हैं?
लेकिन ना ये सरकार सुधरनेवाली है और ना हम लोग...
अभी और भी नरसंहार की घटनाएं होती रहेंगीं और रोकने का एक ही तरीका है कि सेना भेजकर शांति की कोशिश करने वाले ऐसे गृहमंत्री और अन्य मंत्रियों को फांसी पर लटका दो.
दीपक 'मशाल'
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