मंगलवार, 22 अगस्त 2017

मोल-भाव/ दीपक मशाल

लघुकथा

उन्होंने कहा-
'न न... निश्चिन्त रहिए हमें कुछ नहीं चाहिए। बस लड़की सुन्दर हो, जरा तीखे नैन-नक्श और रंग गोरा हो। हाँ, खाना अच्छा पकाती हो। बाकी कढ़ाई-बुनाई का तो अब ज़माना रहा नहीं सो ना भी आता हो तो चलेगा। ज्यादा पढ़ी-लिखी भी न हो तो भी ठीक, बस घर चला सकने लायक हिसाब आता हो। '
'तब तो हमारी छोटी बेटी आपको ज़रूर पसंद आएगी... तर ऊपर की हैं, साल भरे का ही फ़र्क़ है दोनों में।' कहते हुए बाप की आँखों में चमक थी।
जिस दिन छोटी की सगाई थी बड़ी उस दिन प्रयोगशाला की बजाय बाज़ार में मिली। उजली रंगत का दावा करती क्रीम और सबसे काला काजल पैक कराते हुए। इस दुआ के साथ कि कुछ और भी 'भले लोग' हों दुनिया में।


शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

कहाँ पहुँचा हूँ कहीं तो नहीं
जहाँ से चला पर वहीं तो नहीं
मंजिलें हैं ख़ामोश बैठी हुईं पर
कहीं ये रास्तों का नहीं तो नहीं।
मशाल 

सोमवार, 26 सितंबर 2016

दो कविताऐं- दीपक मशाल

फोटो: दीपक मशाल 

१- हम आश्वस्त है


 घास के तिनकों से टिके हुए दुःख
 कुतुबमीनारी सुखों को बौना बना रहे
 तुलना के तराज़ू पर रखकर

सपने फ़रार होकर आभासी संसार से
कम्प्यूटर स्क्रीन में जा समाए
और खाई गईं 'क़समें'
संतुष्ट हो रहीं कागज़ी क्रांतिकारिता से

जब भी याद आ जाती हैं वो
भूले-भटके

दुनिया बढ़-बदल रही है
हम आश्वस्त हैं

मौके-बेमौके
लोकतंत्र की इकाई की बोली लग रही है
हम खुश है कि कीमतों में उछाल आया है
चलो फिर चुनावी साल आया है।


फोटो: दीपक मशाल 

२- मानेगा नहीं आदमी


विदर्भ से बुन्देलखण्ड तक
पानी ख़त्म नहीं हुआ
सूखा नहीं
उड़ा नहीं
ग़ायब नहीं हुआ

मर गया है पानी
शज़र का
ज़मीं का
नज़र का
मारा आदमी ने.....

पर
आदमी मानेगा नहीं
आदमी का हत्यारा हो जाना...

जो सदियों पहले आरम्भ हो गया था
आदमी मानेगा नहीं
खुद के हाथों

अंतिम आदमी की हत्या होने तक।

सोमवार, 23 मई 2016

रविवार, 8 मई 2016

धरती कभी बनी ही नहीं थी हमारे लिए/ मशाल

आग खतरनाक होती है 
जब पेट की नहीं होती 
जब नहीं होती सीने में 
या जब इनके लिए नहीं जलाई जाती 

सभ्यता का दूसरा पहलू 
विकास का वीभत्स चेहरा उघाड़ देती है आग 

जलकर- झुलसकर मरती जीव-जातियों की दर्दनाक चीखें 
और उससे भी भयानक खामोशियों के बीच 
बहरे बने हुए लोगों की शक्लें 
सबसे कुरुप नज़र आती हैं 

जब जलाई नहीं जाती 
आग लगती नहीं जब.... 
जब लगाई जाती है 
यह इंसानियत पर से भरोसे को सबसे पहले भस्म करती है 
यह आदमी को नंगा कर देती है 

यह आग फिर प्रमाण देती है कि 
हम आए थे यहाँ पेड़-पौधों की जूठन गैस पीने 
धरती कभी बनी ही नहीं थी हमारे लिए.... 

सोमवार, 2 मई 2016

तीन लघुकथाऐं

१- वह जो जरूरी है (लघुकथा) 


गुप्ता जी ने बाहर जाने के लिए दरवाज़ा खोला ही था कि सामने पड़ोसी वर्मा जी खड़े मिले। 

- अरे भाई सा'ब आप! आइए.. अंदर आइए बाहर क्यों खड़े हैं। 

- कैसे हो भाई गुप्ता? घंटी बजाने ही वाला था कि तुमने खुद ही दरवाज़ा खोल दिया   

भीतर आते हुए वर्मा जी बोले। 

दोनों के सोफे पर बैठते ही गुप्ता जी ने भीतर आवाज़ दी 

- पिंकी!!! बाहर आओ ज़रा 

पिंकी ने बाहर आते हुए अभिवादन किया  

- जी नमस्ते अंकल

- अरे!! खाली नमस्ते? चाय-पानी पिलाओ भई.. 

गुप्ता जी ने मजाकिया लहजे में कहा। 

इधर-उधर की बातों के दौरान घर के ऊपर वाले कमरे से दो बार पानी के लिए पुकार लगी तो अंदर से मिसेज गुप्ता ने 

रसोई में चाय बनाती पिंकी को आदेश दिया 

- पिंकी!! भईआ को पानी दे आ ज़रा, कब से माँग रहा है 

- क्या हुआ बेटे की तबियत ठीक नहीं क्या?

वर्मा जी ने शंका जाहिर की तो गुप्ता जी ने झेंपते हुए कहा  

- नहीं, पढ़ रहा होगा अपने कमरे में  

थोड़ी देर बाद पिंकी ने सबको चाय के कप पकड़ाए ही थे कि पीछे से आ रहीं मिसेज गुप्ता ने कहा  

- भैया की चाय ऊपर ही दे आ उसके कमरे मे 

इससे पहले कि पिंकी आगे बढ़ती गुप्ता जी ने आवाज़ को ऊपर वाले कमरे तक पहुँचाते हुए कहा 

- बबलू! नीचे आओ और अपनी चाय खुद लेकर जाओ। 

२- शहर में/ दीपक मशाल (लघुकथा)

वह बहुत देर तक गौर से देखता रहा कि सड़क के दूसरे किनारे खड़ा सब्जीफर्रोश किस तरह अपने हाथ ठेले के एक किनारे बैठी अपनी पाँच-छह साल की बच्ची को फुर्सत मिलते ही पढ़ाने लगता। अक्सर ऐसे दृश्यों पर नज़र रहती उसकी, जानकारी जुटाकर सचित्र अपने ब्लॉग, सोशल अकाउंट पर डाल देता। कई बार अखबारों में भी उसकी ये पोस्ट आ जातीं। 
वह धीरे-धीरे ठेले के नज़दीक आ गया और सब्जीवाले से बात करने लगा 
- तुम्हारी बेटी है?
- जी सर  
उसने जवाब दिया 

- क्या पढ़ा रहे हो?
- जित्ता खुदे आता है उत्ता बता दे रए हैं सर, स्कूल भेजे की तो औक़ात नहीं अबी 
- अरे अच्छा है, करते रहो।  कल को स्कूल भी जाएगी ही। कहाँ से हो? 
- रहे वारे तो यूं पी के हैं, लेकिन अब यहीं गुज़ारा है 
- हम्म..... तुम्हारी फोटो निकालकर डालूँगा इंटरनेट पर, मशहूर हो जाओगे। 

कहकर उसने बिना जवाब की प्रतीक्षा किए जेब से स्मार्ट फोन निकाला और बेटी समेत उस आदमी की फोटो लेने लगा। 

-  न ना सर ई सब नहीं। 
उसने कैमरे के आगे हाथ लगाते हुए उसे रोका। दो पल को कैमरे वाला स्तब्ध रह गया और फिर खीझकर दूसरी ओर जाने लगा। पीछे से सब्जी वाले ने आवाज़ दी  

- और कौनो दिक्कत नाहीं सर, बस फोटू कम्पूटर में जावेगी तो गाँव में उहाँ सब जान जावेंगे कि हम इहाँ शहर में सब्ज़ी...... । 


३- ख़बर के रास्ते में

'नया दौर' से काफी आगे का नया दौर आ चुका था। इतना कि लोगों में एक वर्गीकरण दृष्टव्य उम्र के अंतर का भी आ गया था। कुछ लोग चालीस की उम्र में भी पैंतीस नज़र आते थे तो कई अभी भी ऐसे थे जो चालीस में पैंतालीस या अधिक दिखते थे। 
चुपके से सही मगर कम दिखने की होड़ इंसान को उसकी लक़ीर से खिसका दे रही थी। 
समाचार में दिखाया जा रहा था कि इसी तरह की कुछ नई-पुरानी होड़ों में शामिल होने के उपक्रम में एक 'हवलदार जो हद से आगे चला गया था, पकड़ा गया'। कई घर, ज़मीन-जायदाद, रुपिया-पैसा जोड़ लिए थे उसने, तनख्वाह से बहुत अधिक। अनुभवों से जानता था कि सामने आई है तो यह बात कम से कम दो-चार दिन का मसाला हो जानी है।
पंसारी से कुछ सामान खरीदने निकला तो चौराहे पर भीड़ देखी, पता चला कि क़रीब की गली में रहने वाला कोई अफसर भी ऐसी ही दौड़ में शामिल मिला। जाँच दल काफी देर से घर में घुसा हुआ था। लोग, जो रामभरोसे जी रहे थे, दबी ज़ुबान से मन की बात कहते सुने
- 'खबर' न बने इसकी कोशिशें चल रही हैं।
तनिक दूरी पर खड़े दो संविधानभरोसे सिपाही भी आपस में बात कर रहे थे, एक ने कहा
- मोटी खाल है, जल्दी सब नहीं उगलेगा।
इस बात के मायने खोजता घर पहुँचा, देखा कि बाहर जाते हुए टी.वी. बंद करना भूल गया था। नए दौर में कहीं से पुराना विज्ञापन चल निकला
- जी आपकी त्वचा से तो आपकी उम्र का पता ही नहीं चलता।

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

बेचैनी / दीपक मशाल (लघुकथा)

दोनों परिवारों में दोस्ती बहुत पुरानी या गहरी तो नहीं थी लेकिन वक़्त बीतने के साथ-साथ बढ़ती जा रही थी। महीने में कम से कम एक बार दोनों एक दूसरे को खाने के बहाने, मिलने के लिए अपने घर आमंत्रित कर ही लेते थे, इस बार दूसरे वाले ने किया था। 
सुरक्षा के उद्देश्य से दोनों की ही बिल्डिंग में इस तरह का सिस्टम था कि जब तक मेजबान खुद बाहर निकल कर नीचे मुख्य द्वार तक लेने ना आये तब तक कोई मेहमान भीतर नहीं आ सकता था। पहले दोस्त ने परिवार सहित बिल्डिंग के नीचे पहुँच कर फोन किया 
- हैलो! हाँ जी, पहुँच गए हैं गेट पर 
- जी अभी दो मिनट में नीचे आता हूँ 
- जी ठीक है
मेजबान मित्र निकलने को चप्पल पहन ही रहा था कि पत्नी ने टोका 
- आपको क्या जल्दी पड़ी रहती है भागकर तुरंत जाने की, याद नहीं जब भी उनके घर आते हैं दो मिनट का कह कर दस मिनट में दरवाजे पर आते हैं। आज थोड़ी देर उन्हें भी इंतज़ार करने दीजिये, आराम से जाइये
चप्पलें उतार वो सोफे में धँस गया, लेकिन फिर एक मिनट भी न गुजरा होगा कि उठकर चहलकदमी करने लगा। बेचैनी बढ़ती जा रही थी, किसी तरह पत्नी से बोला 
- मैं सोच रहा था कि वो जान-बूझकर थोड़े करते होंगे, और फिर करते भी हों तो हम उनके जैसे क्यों..... 
बात ख़त्म भी ना हुई थी कि पत्नी बोल पड़ी 
- जी, वही मुझे लगा कि फिर उनका छोटा बच्चा भी तो बाहर सर्दी में खड़ा होगा, आप जल्दी जाइये 

और दोनों मुस्कुरा दिए.

रविवार, 28 दिसंबर 2014

फिर जूलिया/ दीपक मशाल


कई दिनों बाद गुनगुनी धूप निकली थी। मैं आराम कुर्सी पर आँगन में बैठ अन्याय के विरोध में लिखी गई चेखव की एक प्रसिद्द कहानी का हिन्दी अनुवाद पढ़ रहा था कि तभी डाकिए ने दरवाज़े पर आवाज़ देते हुए पिछले महीने का मोबाइल का बिल मेरी तरफ़ उछाल दिया। हवा में ही बिल को लपक कर मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। 
अब एक हाथ में कहानी थी और दूसरे में बिल   
  
चेखव ने लिखा 
'एक दिन मालिक ने अपने बच्चों की गवर्नेस जूलिया को अपने पढ़ने के कमरे में बुलाकर उसका हिसाब करना चाहा। उसने जूलिया से पूछा 
- हाँ, तो तुम्हारी तनख्वाह तीस रुबल महीना तय हुई थी ना?
जी नहीं, चालीस रुबल महीना। 
जूलिया ने दबे स्वर में कहा।
- नहीं भाई तीस। मैं बच्चों की गवर्नेस को हमेशा तीस रुबल महीना ही देता आया हूँ।'

अब मैंने एक निगाह दूसरे हाथ में पकड़े बिल पर डाली। बिल ने कहा 
- आपके पोस्टपेड कनेक्शन का प्लान है ग्यारह सौ निन्यानवे रुपए प्रति माह।  
हालांकि मैंने कनेक्शन महीने की चौथी तारीख से लिया था पर मैं चुप रहा। बिल ने आगे कहा 
प्लान के अनुसार आपके पास बारह सौ फ्री मिनट थे, जिनको आपने चौबीस तारीख़ तक इस्तेमाल कर लिया था। 
- पर फ्री मिनट्स ख़त्म होने पर मुझे कोई सूचना नहीं दी गई
मैंने प्रतिरोध किया 
- इसके बाद आपके द्वारा की गई अड़तीस कॉल्स में कुल दो सौ छप्पन मिनट बात हुई और इसका बिल सवा रुपए प्रति मिनट के हिसाब से बना तीन सौ बीस रुपए। इस तरह हुए पंद्रह सौ उन्नीस रुपए 
- लेकिन….... 
- आपने सारे नियम शर्तें पढ़ रखे हैं, यह आपके हस्ताक्षर कहते हैं  

चेखव की कहानी में  
'- अच्छा, तो तुम्हें यहाँ काम करते हुए कितने दिन हुए, दो महीने ही ना?
- जी नहीं, दो महीने पाँच दिन।
- अरे नहीं, ठीक दो महीने हुए हैं। मैंने डायरी में सब नोट कर रखा है। तो दो महीने के बनते हैं साठ रुबल। लेकिन तुमने हर इतवार को छुट्टी मनाई है। इतवार-इतवार तुमने काम नहीं किया, कोल्या को सिर्फ घुमाने ले गई हो।' 

उधर बिल बोले जा रहा था 
- आप महीने में छह बार दूसरे ज़ोन में गए, जिसका रोमिंग इनकमिंग-आउटगोइंग कॉल्स का बना एक सौ छ्यानवे रूपए  
- ऐसा कब तक चलेगा! अपने ही देश-प्रदेश के दूसरे हिस्सों में रोमिंग?
मैं हैरान था मगर बिल मेरी तरफ देखे बिना बताए जा रहा था 
- अब हुए सत्रह सौ पन्द्रह रुपए 

इधर कहानी में 
'- इसके अलावा तुमने तीन छुट्टियाँ और ली हैं। 
जूलिया का चेहरा पीला पड़ गया। वह बार-बार अपने ड्रेस की सिकुड़नें दूर करने लगी। बोली एक शब्द भी नहीं। 
- हाँ तो नौ इतवार और तीन छुट्टियाँ यानी बारह दिन काम नहीं हुआ। मतलब यह कि तुम्हारे बारह रुबल कट गए। उधर कोल्या चार दिन बीमार रहा और तुमने सिर्फ तान्या को ही पढ़ाया। पिछले सप्ताह शायद तीन दिन हमारे दाँतों में दर्द रहा था और मेरी बीबी ने तुम्हें दोपहर बाद छुट्टी दे दी थी। तो इस तरह तुम्हारे कितने नागे हो गए? बारह और सात उन्नीस। तुम्हारा हिसाब कितना बन रहा है? इकतालीस। इकतालीस रुबल। ठीक है न ?'

बिल में 
- आपको दिए गए पाँच सौ फ्री मैसेजेस में से आपने सिर्फ बत्तीस प्रयोग किए 
- हम्म 
मैंने राहत की साँस ली 
- मगर पचास रुपए कॉलर्स टोन के हुए और अब हुए सत्रह सौ पैंसठ रुपए 
- अरे! मैंने तो कोई कॉलर्स टोन शुरू कराई ही नहीं, ये अपने आप कैसे? 
मेरे लिए मामला बर्दाश्त के बाहर होता जा रहा था 

'दूसरी तरफ जूलिया की आँखों में आँसू छलछला आए। वह धीरे से खाँसी। उसके बाद अपनी नाक पोंछी, लेकिन उसके मुँह से एक भी शब्द नहीं निकला। मालिक कहता रहा 
- हाँ एक बात तो मैं भूल गया था 
उसने डायरी पर नजर डालते हुए कहा 
- पहली जनवरी को तुमने चाय की प्लेट और प्याली तोड़ डाली थी। चलो, मैं उसके दो रुबल ही काटूँगा। इसके अतिरिक्त एक दिन तुम्हारे ध्यान न देने से कोल्या पेड़ पर चढ़ गया और वहाँ उलझकर उसकी जैकेट फट गई। तो दस रुबल उसके कट गए। फिर तुम्हारी इसी लापरवाही के कारण हमारी नौकरानी ने तान्या के नए जूते चुरा लिए। तुम अपने काम में ढील दोगी तो पैसे तो काटने ही पड़ेंगे।'

उधर बिल ने आगे बताया 
- महीने की तेरह, सोलह और अट्ठारह तारीख को आपने वॉइप कॉल्स के लिए इंटरनेट का प्रयोग किया लेकिन उसके लिए आपने हमारा विशेष इंटरनेट पैक नहीं लिया हुआ था, इंटरनेट का हुआ दो सौ तैंतालीस रुपए पैंतीस पैसे और कुल हुए अठारह सौ आठ रुपए पैंतीस पैसे 
अब तक मैं भी जूलिया में ढलने लगा था। 

चेखव की कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई थी
'जूलिया के मालिक ने कहा 
तो जूतों के पाँच रुबल और कट गए और हाँ, दस जनवरी को मैंने तुम्हें दस रुबल दिए थे।
जी, मुझे अभी तक एक ही बार कुछ पैसे मिले थे और वे भी आपकी पत्नी ने दिए थे। सिर्फ तीन रुबल। ज्यादा नहीं।
अच्छा! हाँ तो चौदह में से तीन और घटा दो। इस तरह तुम्हारे बचते हैं ग्यारह रुबल। ये रही तुम्हारी तनख्‍वाह, पूरे ग्यारह रुबल। देख लो, ठीक हैं न?
जूलिया ने काँपते हाथों से ग्यारह रुबल ले लिए और धीरे से विनीत स्वर में बोली 
- जी धन्यवाद।
धन्यवाद किस बात का?
आपने मुझे पैसे दिए, इसके लिए धन्यवाद।
 मालिक ने ऊँचे स्वर में लगभग चिल्लाते हुए कहा
- तुम मुझे धन्यवाद दे रही हो, जबकि तुम अच्छी तरह जानती हो कि मैंने तुम्हें ठग लिया है। तुम्हें धोखा दिया है। 
फिर संयत होते हुए कहा 
- मैंने तुम्हारे साथ एक छोटा-सा क्रूर मजाक किया। पर मैं तुम्हें सबक सिखाना चाहता था। देखो जूलिया, मैं तुम्हारा एक पैसा भी नहीं काटूँगा, यह लो तुम्हारे अस्सी रुबल। मैं देखना चाहता था कि इस दुनिया में कमजोर लोगों को डरा लेना कितना आसान है!

बिल का भी आख़िरी हिस्सा बाकी था 
- इन दो हज़ार आठ रुपए पैंतीस पैसों पर साढ़े बारह प्रतिशत वैट का दो सौ इक्यावन रुपए और पाँच पैसे लगाने पर होते हैं कुल दो हज़ार दो सौ उनसठ रुपए और चालीस पैसे, जिन्हें आपको इस महीने की पंद्रह तारीख तक जमा कर देना है। 
मैं बिल को फटी-फटी आँखों से देखे जा रहा था लेकिन मन में एक विश्वास था कि मेरे चुप रहने पर भी कहानी के अंत की तरह नेटवर्क कम्पनी का मालिक आकर कहेगा 
- मैं भी सिर्फ कुछ देखना, कुछ सिखाना चाहता था, मैं तुमसे सिर्फ ग्यारह सौ निन्यानवे रुपए लूँगा। 

और इसी विश्वास पर मैं ताउम्र जूलिया बना रहा।  

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

खबर (लघुकथा)/ दीपक मशाल

 
साँझ ढलने के साथ-साथ उसकी चिड़चिड़ाहट बढ़ती जा रही थी, मनसुख को लगा कि 
- दिन भर की भूखी-प्यासी है और ऊपर से थकी-माँदी… इसीलिए गुस्सा आ रहा होगा, ये करवाचौथ का व्रत होता भी तो बहुत कठिन है। 
राजपूताना रेजीमेंट में ड्राइवर की नौकरी पर तैनात मनसुख आज ड्यूटी ख़त्म होते ही सीधा घर को भागा आया, लेकिन आज प्रतिमा का व्यवहार उसे और दिनों से अलग सा लगा। वह खुद से मशविरा करने लगा 
- पिछले साल भी तो व्रत रखा था, तब तो ऐसा मूड उखड़ा न था जबकि तब तो यह पहली बार था। फिर इस बार क्या ऐसी बात हो गई जो रह-रहकर चौके के बर्तन भड़भड़ाए जा रहे हैं।
पानी पीने के बहाने वह चौके में गया तो देखा कि वह सिसक भी रही थी। एकबारगी सोचा कि पूछ लिया जाए कि वज़ह क्या है लेकिन उसकी हिम्मत न हुई, उसे याद आया कि
- सुबह ड्यूटी जाने के वक़्त देर हो रही थी सो वह चिल्ला पड़ा था कहीं वही वजह तो नहीं?
चाँद निकलने का वक़्त हुआ तो प्रतिमा चलनी, करवा, सींकें और बाकी पूजा सामग्री लेकर छत पर जा पहुँची, मनसुख भी साथ में आ खड़ा हुआ। पूजा पूरी होने के बाद जब वह व्रत तुड़वाने के लिए पानी का गिलास अपनी ब्याहता के होंठों तक ले जाने को हुआ तो प्रतिमा ने पानी पिए बिना ही गिलास परे हटाते हुए कँपकँपाती आवाज़ में पूछा
- अखबार में ऐसी खबर है, क्या सच में जंग छिड़ सकती है?

मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

मुआवज़ा/ (laghukatha) Dipak Mashal

मुआवज़ा सत्तर से ऊपर बुजुर्गों से पता चला कि इससे पहले क़स्बे में ऐसी बाढ़ उन्होंने सिर्फ तब देखी थी जब वो खुद बच्चे या फिर किशोर थे। हफ्ते भर की मूसलाधार बारिश और नजदीकी बाँध को कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा काट दिए जाने ने समूचे जिले को प्रलय का नमूना दिखा दिया था। पानी उतरा तो सरकार ने प्रतिनिधियों और अधिकारियों को नुकसान का अनुमान लगाने के काम में लगा दिया। पीड़ितों के पुनर्वास में मदद के लिए घोषणाएँ होने लगीं। राज्य सरकार ने बाढ़ पीड़ितों की सूची माँगी। 
रातोंरात सूची भी तैयार हो गई, अंतिम रूप देने के लिए लेखपालों को कुछ असली पीड़ितों के नाम दर्ज करने के लिए लगाया गया। 'अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बोल' के हिसाब से नाम दर्ज करके जब लेखपाल राहत शिविर से जाने लगा तो पीछे से नेकसिंह बंजारे ने गुहार लगाई

- सा'ब, हमऊँ को नाँओ लिख लेओ 
- का नाम है 
लेखपाल ने बेरुखी से पूछा  

-  नेकसिंह 
- नुक्सान?
- सबई चलो गओ सा'ब, दो बकरियाँ चली गईं, एक कुत्ता मर गओ.…. पहनवे-ओढ़वे के सब उन्ना-लत्ता बह गए.… खटिया, चूल्हो-चौका बासन…… गुज़ारे खों कछू नईं बचो 
दुःखी स्वर में नेक सिंह ने बताया  
- भक ससुर, कुत्तन को मुआओजा मिळत कऊँ? घर कच्चो हतो के पक्को?
पड़ताल करते लेखपाल ने झिड़ककर सवाल किया 

- घर न हतो मालिक, ऐसेई गाड़ी पे बरसाती तान कें काम चलात ते। तीन साल सें जई गाँव में बसे 
बंजारे ने ब्यौरा दिया 
- फिर तुम्हें न मिल पाहे, जो मदद स्थाई निवासियन के लाने है  
पैंट झाड़ते हुए लेखपाल ने असमर्थता जाहिर की 

नेक सिंह रिरियाने लगा 
- दया करो सा'ब बिलकुलई बर्बाद हो गए, खाबे तक के लाले पड़े…. अब तो कामऊ नईंयाँ करबे खों 

- अरे कर लीजिये लेखपाल सा'ब, ग़रीब आदमी है.…
साथ में चल रहे सिपाही ने सिफारिश लगाई  

- आप कहते हैं तो कर लेता हूँ दीवान जी, वर्ना …… ठीक है जाओ, कर लओ नाओं दर्ज 
एक-एक कर सिपाही और नेक सिंह से मुखातिब होते हुए लेखपाल बोला 

नेक सिंह ने सिपाही और लेखपाल को कृतज्ञतापूर्वक दोनों हाथ जोड़े और आश्वस्त होकर चला गया  
- जब चोरी-चकारी या राहजनी जैसे मामले नहीं सुलझ पाते तो प्रेशर कम करने के लिए गिरफ्तारी दिखाने में बड़े काम आते हैं ये बंजारे
सिपाही ने हँसते हुए सिफारिश का राज बताया और दोनों चाय की गुमटी की तरफ बढ़ गए। 

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