शनिवार, 24 अक्तूबर 2009

मैं इक बेरोजगार हूँ..#############

हमारे देश कि बढती हुई जनसँख्या आज से ही नहीं बल्कि बीते कई सालों से देश कि सबसे बड़ी समस्या या ये कहें कि समस्याओं की जड़ है. बाकी जितनी भी बड़ी समस्याएँ है सब इस बढती जनसँख्या का ही परिणाम हैं, यहाँ मैं बेरोज़गारी कि समस्या को, एक बेरोजगार नवयुवक के दर्द के माध्यम से उकेरने का प्रयत्न कर रहा हूँ.


मैं इक बेरोजगार हूँ,
मैं इक बेरोजगार हूँ.
नज़र में दुनिया के बेकार हूँ,
पर बेकारी के आलम से जन्मे
दर्द का तजुर्बेकार हूँ.
मैं इक बेरोजगार हूँ.
सब मांगते हैं अनुभव,
पर
अनुभव के लिए
कोई नौकरी नहीं देता.
इसीलिए मैं बेगार हूँ,
मैं इक बेरोजगार हूँ.
खोखले वादों के
ख़खोल से उपजी
देश की
शिक्षा-प्रणाली की
एक हार हूँ.
मैं इक बेरोजगार हूँ.
झूठा मक्कार हूँ,
बरसात में
टूटी हुई छत को तकते,
किसी
बाप का इन्तेज़ार हूँ.
मैं इक बेरोजगार हूँ.
खामोश है जो,
कुछ कह नहीं सकती
जिगर के टुकड़े से,
दर्द में तड़पती उस
बीमार माँ का गुनहगार हूँ.
मैं इक बेरोजगार हूँ.
जो
मुझमें तलाश बैठी है
सपने कई अपने,
ढलती उम्र ढोती हुई
उस नादान का मैं प्यार हूँ.
मैं इक बेरोजगार हूँ.
दूर के
और करीब के,
सम्बन्धियों की
नज़रों में,
मैं पढालिखा गंवार हूँ.
मैं इक बेरोजगार हूँ.
जो चहकते थे
संग खुशियों में,
अब
उन यारों की
उपेक्षा का शिकार हूँ.
मैं इक बेरोजगार हूँ.
देखता नहीं मैं
आइना,
कैसे सामना
करुँ खुद का?
मैं खुद का कसूरवार हूँ.
मैं इक बेरोजगार हूँ......

दीपक 'मशाल'
चित्रांकन- दीपक 'मशाल'

23 टिप्‍पणियां:

  1. मैं पढ़ा लिखा गंवार हूँ....
    मैं बेरोजगार हूँ....
    न जाने कितने लोगों के मन की व्यथा तुम उंडेल गए हो इस कविता में दीपक.....
    बहुत ही मर्मस्पर्शी.....
    इसकी एक एक पंक्ति लाखों लोग जीते हैं ....शायद हर पल....
    दुःख और विषाद को कलम वद्ध करने में कामयाब हुए हो तुम इस कविता मैं...
    खुश रहो...
    दी ....

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  2. हमने जय हिंद !!....बोलने का प्रण किया था लेकिन हमेशा हम भूल ही जाते हैं ....अब से हमेशा याद रहेंगे...

    जय हिंद !!!

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  3. देखता नही मै आईना
    कैसे सामना करूँ खुद का
    बहुत गहराई तक यह दर्द उतरती है.

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  4. बेरोजगार की व्यथा की मार्मिक प्रस्तुति ..!!

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  5. youth ki sabse badi problem ko shabdo mein behtrin terike se likha hai....

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  6. सरकार की फिक्र अंबानी भाइयों के झगड़े सुलझाने और सेंसेक्स की चमक पर ही खत्म हो जाती है...बेरोज़गारी तो आर्थिक सुधारों का देश को सबसे बड़ा तोहफ़ा है...ऐसे में खाली बैठे नौनिहाल मां के गुनहगार हो सकते हैं लेकिन सरकार भारत माता की नहीं...


    जय हिंद...

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  7. अरे भैया, होली दीवाली मनाना मोहाल हो जाता है इस बेरोजगरी के चक्कर में,,,अच्छी और शायद जरूरी कविता....

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  8. अच्छी कविता।

    बेरोजगारी से दुखी न हों स्वरोजगार का प्रयत्न करें।

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  9. एक बेरोजगार का सार्थक दर्द ! कठिन परिस्थितियों में पढाई पूरी कर सरकारी नौकरी के लिए किसी हरामखोर नेता की शिफारिश और घूस के लिए मोटी रकम चाहिए और प्राइवेट में नौकरी के लिए बिना नौकरी किये तजुर्बा चाहिए ! विकट परिस्थिति है !
    बहुत पहले की एक कविता " अम्मा का ख़त" याद आ रही है दो लेने इस तरह से थी ;

    तेरा छोटा भाई बी-ए कर चुका,
    खलियान में खड़े-खड़े घंटों गुमसुम
    लिखता रहता है, जाने क्या-क्या पाँव से
    बड़े दिनों में आया है अम्मा का ख़त गाँव से.............!

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  10. sundar rachna.. dil ko chu jaane wali... samasya par chot ki acchi aadat paal rakhi hai aapne.. shukriya..

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  11. uff! berozagaari ki peeda ko kitne sahi chitran ke saath se bayaan kiya hai..........

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  12. बढिया वर्णन किया है , एक बेरोजगार के एहसासों का । लेकिन यह भी एक अमूल्य अनुभव है जीवन का । तब हम उस समय भी बेरोजगार की पीडा समझ सकते हैं जब बेरोजगरी खत्म हो जाती है ।

    बेरोजगारी हमें इस दुनिया की हकीकत से रुबरु कराती है ।

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  13. बढती जनसँख्या और बेरोज़गारी. इन दोनों का सम्बन्ध ठीक वैसा है जैसा मुर्गी औए अंडे का.
    यानि जनसँख्या बढ़ रही है, इसलिए बेरोज़गारी है. या बेरोज़गारी है , इसलिए जनसँख्या बढ़ रही है.
    कहना मुश्किल है. अच्छी रचना के लिए बधाई.

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  14. ऊपर वाले विवेक जी दूसरे हैं जिन्होंने आपको बेरोजगार समझा ।

    मैं तो अब आया हूँ यह वाला विवेक सिंह :)

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  15. Hamara desh pariwaar niyojan kee baat jaise bhool hee gaya...! Khaas kar Sanjay Gandhi ke mrutyu ke baad...Sajay ne atirek kar diya, to baad aayee saaree sarkaron ne doosraa chhor pakad liya....pooree tarah durlaksh kar diya...
    Ekdam sahee kaha...is deshkee har samasya ka mool karan yahee hai..

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  16. उस एहसास और अनुभव को बखूबी लिखा है आपने

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  17. अमित मिश्रा24 अक्तूबर 2009 को 7:35 pm

    बखूबी एक परेशां बेरोजगार की तकलीफ को उकेरा है दीपक.

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  18. आप सबको देश की सबसे बड़ी समस्या(जनसँख्या) और उससे उपजी दूसरी विकट दिक्कतों की तरफ ध्यान देने के लिए शुक्रिया...
    क्यों न इस दिशा में कोई हल निकलने का प्रयास करें?

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  19. विश्चित ही इसी दिशा में हल निकालने का प्रयास होना चाहिये...स्वरोजगार का दीप जलना चाहिये.

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  20. देर बाद देखी बस इतना ही कहूँगी कि बडिया सही अभिव्यक्ति है आशीर्वाद्

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  21. बेरोजगारों का दर्द बयां करती कविता ....

    सार्थक लेखन ...

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