गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

कुछ अधूरा सा...

तुम्हारी
किताब के पन्नों ने
अक्सर
मेरा जिक्र किया होगा...
तुम्हारी
कविता के शब्दों ने
अक्सर
मेरा जिक्र किया होगा...
कभी आगे
तो कभी पीछे,
कभी शीर्षक
तो कभी सन्दर्भ में..
कभी मध्य में विलुप्त सा..
या तो कभी
उपसर्ग या प्रत्यय में..
कुछ अंश ही सही.......
या.. नहीं भी किया होगा
तो भी
कोई बात नहीं,
क्योंकि
इसके पीछे भी
कोई महत्वपूर्ण कारण रहा होगा..
जिसके पीछे भी
मैं ही
कहीं ना कहीं होऊंगा,
अगर नहीं तब भी
मैं खुश हूँ,
मगर काश.....
तुमने..
मेरे जीवन की पुस्तक ही
कभी खोली होती..
जिसमें कि हर....

दीपक मशाल

कीमत

रमा के मामा रमेश के घर में कदम रखते ही रमा के पिताजी को लगा कि जैसे उनकी सारी समस्याओं का निराकरण हो गया.
रमेश फ्रेश होने के पश्चात, चाय की चुस्कियां लेने अपने जीजाजी के साथ कमरे के बाहर बरामदे में आ गया. ठंडी हवा चल रही थी.. जिससे शाम का मज़ा दोगुना हो गया. पश्चिम में सूर्य उनींदा सा बिस्तर में घुसने कि तैयारी में लगा था.. कि चुस्कियों के बीच में ही जीजाजी ने अपने आपातकालीन संकट का कालीन खोल दिया-

''यार रमेश, अब तो तुम ही एकमात्र सहारा हो, मैं तो हर तरफ से हताश हो चुका हूँ.''

मगर जीजाजी की बात ने जैसे रमेश की चाय में करेले का रस घोल दिया, उसे महसूस हुआ की उस पर अभी बिन मौसम बरसात होने वाली है.. लेकिन बखूबी अपने मनोभावों को छुपाते हुए उसने कहा-

''मगर जीजाजी, हुआ क्या है?''

''अरे होना क्या है, वही पुराना रगडा... तीन साल हो गए रमा के लिए घर तलाशते हुए. अभी वो ग्वालियर वाले शर्मा जी के यहाँ तो हमने रिश्ता पक्का ही समझा था मगर..... उन्होंने ये कह के टाल दिया की लड़की कम से कम पोस्ट ग्रेज़ुएत तो चाहिए ही चाहिए. उससे पहिले जो कानपूर वाले मिश्रा जी के यहाँ आस लगाई तो उन्होंने सांवले रंग की दुहाई देके बात आई गई कर दी.''

''वैसे ये लड़के करते क्या थे जीजा जी?''

''अरे वो शर्मा जी का लड़का तो इंजीनिअर था किसी प्राइवेट कंपनी में और उनका मिश्रा जी का बैंक में क्लर्क..'' लम्बी सांस लेते हुए रमा के पिताजी बोले.

''आप कितने घर देख चुके हैं अभी तक बिटिया के लिए?'' रमेश ने पड़ताल करते हुए पूछा.

''वही कोई १०-१२ घर तो देख ही चुके हैं बीते ३ सालों में'' जवाब मिला.

'' वैसे जीजा जी आप बुरा ना मानें तो एक बात पूछूं?'' रमेश ने एक कुशल विश्लेषक की तरह तह तक जाने की कोशिश प्रारंभ कर दी.

''हाँ-हाँ जरूर''

''आप लेन-देन का क्या हिसाब रखना चाहते हैं? कहीं हलके फुल्के में तो नहीं निपटाना चाहते?'' सकुचाते हुए रमेश बोला.

''नहीं यार १६-१७ लाख तक दे देंगे पर कोई मिले तो..'' जवाब में थोड़ा गर्व मिश्रित था.

रमेश अचानक चहका-
''अरे इतने में तो कोई भी भले घर का बेहतरीन लड़का फंस जायेगा, जबलपुर में वही मेरे पड़ोस वाले दुबे जी हैं ना, उनका लड़का भी तो पिछले महीने ऍम.डी. कर के लौटा है रूस से... उन्हें भी ऐसे घर की तलाश है जो उनके लड़के की अच्छी कीमत दे सके.''

रमा के पिताजी को लगा जैसे ज़माने भर का बोझ उनके कन्धों से उतर गया..
मगर परदे के पीछे खड़ी रमा को इस बात ने सोचने पे मजबूर कर दिया कि यह उसकी खुशियों की कीमत है या उसके होने वाले पति की????

दीपक मशाल

बुधवार, 23 दिसंबर 2009

संभावनाओं का संसार...**********दीपक मशाल

हर पल

इक सम्भावना है,

बीता नहीं..

आने वाला

कल

आने वाला पल..

हाँ वही पल

जिसका की

कभी अस्तित्व नहीं पता चला

किसी को भी..

कभी भी..

जबतक आता है वो

तो वर्तमान बन चुका होता है..

और फिर से

एक नया

आने वाला

कल बन जाता है..

वो

तो है महज़ एक

सम्भावना..

जिसे

किसी ने समझा नहीं

और न ही देखा है

उसका अस्तित्व...

क्योंकि

मृग मरीचिका है वह..

नहीं पता कि

क्या है वह पल..

जीवन है या

मृत्यु??

गम है या

खुशी??

फतह है या

शिकस्त??

या

वह जिसका कि

शायद...

वजूद भी नहीं..

न ही रहा उससे पहले अब तक..

बस यही सब बनाता है उसे..

एक संभावना

और इसीलिए है जाना जाता ये जग

संभावनाओं का संसार...

दीपक मशाल
chitra google se

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

महान बलिदान...........दीपक मशाल



इन ज़ख्मों को
हरा रखना मेरे दोस्त,
पीते जाना
इनका दर्द..
मेरी खातिर,
तब तक
जब तक कि मैं..
उन गोली,
बन्दूक,
खंजर और
तलवारों कि धारों को
मोथरा न कर दूं..
जिसने इनमे
भर दिया है गर्म लाल रंग..
और
तकलीफ का सागर...
मगर,
माफ़ करना मेरे दोस्त..
ये धार मैं
तुम्हारी खातिर नहीं
बल्कि उन मासूमों की खातिर
मोथरा करूंगा..
जिनको ये
आगे घाव दे सकते हैं,
तुम्हारा
इन घावों को
हरा रखना तो होगा
सिर्फ एक
महान बलिदान....

दीपक मशाल
चित्र साभार गूगल से

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

'बुद्धा स्माइल'@@@@@दीपक मशाल

'बुद्धा स्माइल'
यही रखा था नाम
परमाणु परीक्षण का...
महान हिन्दोस्तान ने,
मगर
क्यों मुस्कुराये बुद्ध?
ये रहस्य बन गया सदा के लिए...
क्या हमारी नादानी पर?
या मोक्ष के इस नए मार्ग पर
जो सीखा था हमने..
कीमती समय
और बहुत कुछ गँवा कर..
कितने बड़े -बड़े दिमाग
उलझाकर..
इस काम में खपा कर..
वैसे.....
बुद्ध मुस्कुराये थे तब भी
जब
सामने खड़ा था उनके
मदमस्त पागल हाथी..
जब खड़ा था अंगुलिमाल..
जब खड़ा था बाघ
और जब
सामने खड़ी थीं यशोधरा
राहुल को दान करने के वास्ते..
वो मुस्कुराये थे तब भी
जब हुआ था आत्मबोध,
बुद्ध मुस्कुराते थे
पीड़ा में भी
बुद्ध मुस्कुराते थे हर्ष में भी...
क्योंकि
दोनों थे सम उनको...
बस इसीलिए
ये बन गया
अज़ब रहस्य सदा के लिए
कि
व्हाई 'बुद्धा स्माइल'?

दीपक मशाल

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

आस्तीन के सांप...

आधुनिकता के
इस दौर में
पाश्चात्य सभ्यता के
अनुगमन कि होड़ में..
हम दौड़ रहे हैं...
अंधी दौड़ में...
बहुत आगे,
मगर पदचिन्हों पर किसी के..
हर बदलते पल के साथ,
कभी पतलून
बदल जाती है
बैलबोटोम में..
कभी पजामे में,
कभी जींस
तो कभी बरमुडे में...
सिर्फ जींस नहीं रोक सकती,
केवल धोती नहीं
बाँध सकती
इन भागते
फैशनपरस्तों के क़दमों को..
कुछ लोग जो
कईयों के
आदर्श है..
प्रेरित करते हैं
पूर्वजों सरीखे प्राकृतिक होने को भी..
मगर तुम
अपने कमीज़ की..
अपने कुरते की
या जो भी कहें इसे
अगली घड़ी में...
इसकी बाहें
इतनी न फैला लेना..
इतनी न बढ़ा लेना..
और ना ही इतनी चौड़ी करलेना
कि पल सकें उनमे
आसानी से
बिना परेशानी के..
आस्तीन के सांप...
दीपक मशाल

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

सबलों का शस्त्र ))))))))))))) दीपक मशाल

जो मज़हब का
मतलब,
जो धर्म का
मर्म...
सिर्फ
और सिर्फ,
त्रिशूल और
तलवार,
घात और प्रहार
समझते हैं...
वो कमज़ोर हैं
हर तरह से
और निहत्थे हैं आत्मास्त्र से..
वो
जला सकते हैं
देह को,
पर आत्मा को
छू भी नहीं पाते
और प्रेम जिला सकता है
आत्मा,
कहा है वासुदेव ने भी...
''नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि.. नैनं दहति पावकः...''
देह का है अंत
और
देहनाशक का भी..
है आत्मा अनंत
और
प्रेम भी..
बस यही कारण है
कि
बम
बुजदिलों का
और प्रेम
सबलों का शस्त्र है...

दीपक मशाल

रविवार, 13 दिसंबर 2009

खंडहर की ईंट

खंडहर की ईंट
कुछ कहती हुई सी लगती है,
उसी पुराने खंडहर की
जिसे ऐतिहासिक स्थल कहते हैं...
और देखते हैं रोज़
हज़ारों देशी और विदेशी पर्यटक...
हर किसी से
सूनी आँखों से
कुछ कहती हुई सी लगती है...
वो चाहती है बताना
क्या है असली इतिहास
जिसमे जोड़ी गयी है
कुछ झूठी कहानी भी...
उस कहानी को छोड़कर,
क्या है हकीकत
और क्या है फ़साना...
है हर पल की
सच्ची गवाह
वह ईंट
जो झूठी नहीं है..
अलग-अलग इतिहासों की तरह....
दीपक 'मशाल'

रविवार, 22 नवंबर 2009

तुम न थे.....^^^^^^^^^^^^^^^^^^दीपक 'मशाल'

आज से ७ वर्ष पूर्व.... कुछ सोच रहा था और देश में चल रहे कई अभियानों की विफलताओं और उनके मकसदों को लेके दिमाग में एक ऊहापोह थी... जिसका फ़ायदा उठाते हुए दिल ने एक छोटी सी कविता के रूप में उन आंदोलनों के सफल न हो पाने का सांकेतिक कारण तलाशा.. देखिये कहाँ तक सही है ये सोच????


अब भी
हो रहे थे जनांदोलन,
चल रहा था
स्वदेशी अभियान,
बम चलते थे..
छुरे और बंदूकें भी,
तत्पर थे अब भी लोग
उखाड़ फेंकने को
सत्ताधारी सरकार को....
अभी भी
हुंकार भरती थीं कई जानें
एक इशारे पर...
देखते थे कोटि दृग,
एक दृग देखे जिधर....
अभी भी
बढ़ रहे थे कोटि पग,
एक पग बढ़ता जिधर....
लोग
सर्वस्व न्योछावर
करने को थे तत्पर,
अपने नेताओं के इशारे पर....
सब तो था,
रैलियाँ, हड़तालें,
विद्रोह, अफवाहें और
जनसभाएं....
अभी भी
सब था पूर्ववत मगर...
कुछ फर्क था शायद....
हाँ!!!!
इस भीड़ में कहीं....
भगत तुम न थे..
आज़ाद तुम न थे..
सुभाष तुम न थे.....

दीपक 'मशाल'
चित्र- साभार गूगल से...

शनिवार, 21 नवंबर 2009

नया नहीं बन पाया तो सम्बन्ध पुराना बना रहे..........................'बीती ख़ुशी' ......क्या हुआ जो आरज़ू लब तलक आयी नहीं........दीपक 'मशाल'

दोस्तों आज मैं आपकी खिदमत में २ रचनाएं पेश कर रहा हूँ, जिनमे से एक तो मेरी है और दूसरी मेरे किसी ऐसे अज़ीज़ की जिनके बिना मेरा जीवन अधूरा है... उनके नाम की बजाए उन्हें 'बीती ख़ुशी' कहना ज्यादा मुनासिब होगा.. लीजिये तो पहले उन्हीं का लिखा देखिये-

नया नहीं बन पाया तो सम्बन्ध पुराना बना रहे,
आखिर जीने की खातिर कोई बहाना बना रहे.
सच कहती हूँ कभी नहीं मैं तुमसे कुछ भी मागूंगी,
बस बेगानी बस्ती में इक ठौर ठिकाना बना रहे.
सहन कभी क्या कर पाएगी मेरे दिल की आहट ये,
तुम बेगाने हो जाओ गुलशन गुलज़ार ये बना रहे.
सुबह देर से आँखें खोलीं मैंने केवल इसीलिए,
बहुत देर तक इन आँखों में ख्वाब सुहाना बना रहे...
'बीती ख़ुशी'

अब इसके बाद मेरा घटिया टूटा फूटा भी पढ़ लीजिये-

क्या हुआ जो आरज़ू लब तलक आयी नहीं,
क्या हुआ गर इश्क ने मंजिल पायी नहीं.
सीने में है महफूज़ मेरे शम्मा-ए-चाहत अभी,
क्या हुआ अरमान पे जो चाँदनी छायी नहीं.
उम्र भर से दिल पे मेरे नाम है उसका सजा,
क्या हुआ जो उसने मेरी नज़्म कोई गायी नहीं.
हाथ मेरे जब उठे मांगी दुआ उसके लिए,
क्या हुआ जो मुश्किलों में संग वो आयी नहीं.
बहार हर क़दम मिले जाए 'मशाल' वो जिस गली,
क्या हुआ जो मेरी गली खुशियाँ वो लायी नहीं..
दीपक 'मशाल'
चित्र- दीपक 'मशाल' के कैमरे से..

गुरुवार, 19 नवंबर 2009

तुम तो आओगी ना????????????दीपक 'मशाल'

 अभी कल ही की बात है कि मैं अपनी एक ब्लॉगर मित्र शोभना जी से जी मेल पर लिख लिख के बतिया रहा था.. कि अचानक उन्हें कुछ याद आया तो वो बोलीं कि उनकी एक विशेष साईट पर उन्होंने एक नयी तस्वीर डाली है और जब मुझे वक्त हो तो वो देख लूं... लेकिन लैब में होने की वजह से मैं फ़ौरन नहीं देख सकता था... सो मैंने तुरत-फुरत एक कविता रुपी जवाब तैयार किया.. हालाँकि सिर्फ पहली दो पंक्तियों को छोड़ दें तो बाकी सब सिर्फ कविता लिखने के उद्देश्य से लिखा गया है... इसलिए इसे अन्यथा ना लें...

देखूँगा!!!
देखूँगा तस्वीर तुम्हारी... 
तसल्ली से,
सिर्फ देखने को नहीं...
दिल में उकेरने के लिए भी.
जल्दबाजी में चेहरा
बिगड़ भी सकता है,
एक पल देखने भर से
ना जाने..
दिमाग में क्या छप जाये..
देखूं तुम्हें...
और दिल में कोई और बस जाए...
सिर्फ  देखना ही नहीं है ना.....
उसे
अपने खूँ में कुछ हरा रंग मिला के
फिर उस रंग से बने एक नए रंग से
कागज़ पे उतारना भी तो है....
अरे हाँ...
हरा इसलिए मिलाना कि........
इसके मिलाने से बने नए रंग को
देख कर,
पहिचान ना कर सको तुम
की इसमें लहू भी मिला है मेरा...
क्योंकि मुझे पता है
के तुम्हे पता चल गया तो
बहुत रोओगी तुम,
मेरे जिस्म में दौड़ते 
लाल रंग से बनी,
अपनी तस्वीर  देख के......
और 
इतना तो पता है मुझे भी
कि लाल में हरा मिलाने से
काला होता है.
ऐसा..... ऐसा काला..
कि पहिचान नहीं हो पाती
कि 'किस-किस रंग से
कैसे बना है कोई रंग'......
बस कहीं से थोड़े
हरे रंग भर कि जुगाड़ हो जाये,
अरे हाँ....
मैं भी ना....
वो तो मेरी 
पुरानी टेबल की दराज़  के
अन्दर वाले खाने में फंसा पड़ा है..
जाने कब से.....
सोचा था के
किसी खुशी में भरने के काम आएगा कभी...
चलो आज किसी काम आ ही गया...
लेकिन गज़ब बात है...
गज़ब बात है कि 
तुम्हारी तस्वीर में
लाल और हरे रंगों को
मिला के भरने से,
रंगीन रंगों के इस्तेमाल के बाद भी...
बनेगी...
बनेगी सिर्फ एक रंगहीन...
श्वेत-श्याम तस्वीर.............
देखो है ना कितना अजीब,
कि मेरे रंगीन रंग भी
तुम्हारी तस्वीर को
मेरी ज़िन्दगी की तरह
सादा बना देंगे....
पर......
तुम तो आओगी ना?????
रंग भरने..
अरे.... तस्वीर में नहीं...
मेरी ज़िन्दगी में.....
मेरी ज़िन्दगी में.....
दीपक 'मशाल'
चित्रांकन-दीपक 'मशाल'

बुधवार, 18 नवंबर 2009

छला गया, मैं छला गया 0000000000000 दीपक 'मशाल'

दिल की टीसों को, दिल में दबाये रखना,
लोग आएंगे जब, जख्मों को छिपाए रखना.
इक तबस्सुम तो रखना होंठों पे ज़माने के लिए,
वक़्त जरूरत के लिए, आंसू भी कुछ बचाए रखना.

छला गया, मैं छला गया
अपनों के हाथों छला गया,
जो फूलों का न मिला मुझे,
पथ मंजिल तक चलने को,
अंगारों की इक राह चुनी,
जिस पर मैं चलता चला गया.


यूँ तो इक प्यासा पनघट का
और तनहा कोई जमघट का,
मिलना तो मुश्किल होता है,
पर किस्मत ऐसी मिली मुझे,
कि शीतल जल भी जला गया.
छला गया मैं छला गया.


रात पूस और चंदर पूनम,
फिर भी मेरा भाग अहो,
उसका बर्फीला ताप मेरे,
कोमल अरमानों का इक इक
जमा हुआ हिम गला गया.
छला गया मैं छला गया.


हाल-ए-दिल जिस दिलवर से,
हम सुनते और सुनाते थे,
संग राग वफ़ा के गाते थे,
हय दिल में रहकर वो दिल को,
कुछ ज़ख्म दिला के चला गया.
छला गया मैं छला गया.
दीपक 'मशाल'

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

अपने नींड में लौटने को व्याकुल एक परिंदा========दीपक 'मशाल'

जाने क्यों जैसे-जैसे अपनी सरजमीं पर, छुट्टियों के लिए ही सही, वापस आने के दिन नज़दीक आ रहे हैं.... अपनी मिट्टी की याद उतनी ही दिल में गहरे तक उतरती जा रही है...
यकीं मानिये पिछले सवा साल से लगभग हर रोज़ अपने आप को सपने में हिन्दुस्तान में पाता हूँ... कभी कभी तो लगता है की सिर्फ मेरी देह यहाँ आ गई है, सिर्फ भौतिक शरीर यहाँ है.. बाकी आत्मा, मन, दिल सब भारत माँ के आँचल में रख के आया हूँ...
अपने आप ही 'काबुलीवाला' फिल्म के नायक की याद आ जाती है... और  याद आ जाती है अपने मादरे वतन लौटने के लिए बेचैन उस काबुली वाले की तड़प, वो..... वो दृश्य अनायास ही आँखों के सामने उभर आता है जब बलराज साहनी(काबुलीवाला) साहब किरदार में जाँ डालते हुए, पंडित को बोलते हैं की ''ऐ बिरादर, तुम सबका हाथ देखता... ज़रा मेरा हाथ देख के बी बताओ की अम अपने वतन को कब वापिस जायेगा......'' और जब पंडित निकट भविष्य में उसके वापिस जाने के योग नहीं बताता तो... काबुली वाले का गुस्सा देखते ही बनता है... कुछ ऐसी ही तड़प आज मेरे दिल में है अपनी मिट्टी को पूरे १५ महीने बाद चूमने की..
इसी बात पे एक ज़ोरदार गाना सुनिए भाईसाब... अरे चलिए अब सुनना है तो जल्दी से इस लिंक दो बार चटका लगाइए सुनने के वास्ते बिरादर...
http://www.youtube.com/watch?v=FHO2hsXCfQo
और ये दूसरा लिंक जब आप सुनेंगे तो आपके दिल में एक टीस जरूर उठेगी, नहीं मानते तो सुन के देख लीजिये.. दिल आह ना कहे और आँख में पानी ना आये तो कहिये...
http://www.youtube.com/watch?v=1cDSOh_0YNA
शायद आपमें से कई लोगों को ये सब एक पागलपल लग रहा होगा... लेकिन क्या करुँ कैसे अपने दिल की ख़ुशी को समझाऊं आपको.. जैसे एक पिंजड़े में बंद पंछी ही आज़ादी का असली मतलब समझ सकता है.. वैसे ही मेरी हालात सिर्फ अपने वतन से बिछुड़े बन्दे समझ सकते हैं...
सोने के पिंजड़े की तरह मेरे आस पास भी बहुत खूबसूरती बिखरी है यहाँ बेलफास्ट(उत्तरी आयरलैंड, संयुक्त गणराज्य) में... कहने को तो बीते एक साल में कई उपलब्धियां बटोरीं..  जैसे हमारे चहेते माननीय पूर्व राष्ट्रपति डॉ. कलाम से भेंट और सवालों का वो सिलसिला.... पंडित हरिप्रसाद चौरसिया जी का संगीत कार्यक्रम आयोजित कराना, उनसे मिलना और उनको करीब से जानना अपने आप में एक सुखद उपलब्धि है.... और भी कई नामचीन हस्तियों से मिलकर उनके व्यक्तित्व से प्रेरित होना..  लेकिन इस थोड़े से सुख को पाने के लिए लगता है बहुत कुछ खोया है....
अब आप चाहें तो इस सोने के पिंजड़े को खुद भी देख लीजिये... लेकिन ये कितना भी मनभावन लगे.. जो बात हमारी मिट्टी में है वो और कहाँ????
१- तो लीजिये सबसे पहले हमारे क्वीन'स विश्वविद्यालय की मुख्य इमारत(लेन्योंन बिल्डिंग) से शुरुआत कीजिए---



2- अब लीजिये शहर की केंद्रीय इमारत(सिटी काउन्सिल) की चंद तस्वीरें.............................................................








३- ये है मुख्य बाज़ार.......................................................................................***************************
.   


 ४- ये हैं एक मेले में----------------------------------------------------------------------------------------------------------->
५- और ये है वनस्पति उद्यान :) खूबसूरत है ना.... बिलकुल जैसे जेल में बगीचा........................................................













६- और ये तब की है जब एक दिन अंग्रेजों को अपने घर बुला के चटोरा बनाया था.... हा.. हा.. हा............................
 

७- ये पंडित जी के साथ यादगार मुलाकात........................................................................................................

८- आखिर में ये है यहाँ की दिसंबर की सर्दी में बर्फ़बारी के बाद का नज़ारा..........................................................


अब कहने को तो कई लोग ये ही कहेंगे की इतनी सुन्दर जगह में रहने में क्या तकलीफ?? तो इसका जवाब तो वो सोने के पिंजड़े वाला पंछी ही देगा.. हम तो २३ नवम्बर को अपने देश के लिए उड़ने की तैयारी में हैं भइया...
जय हिंद......

सभी चित्र दीपक 'मशाल' के कैमरे से....

शनिवार, 14 नवंबर 2009

खूंखार हुए कौरव के शर

खूंखार हुए कौरव के शर
खूंखार हुए कौरव के शर,
गाण्डीव तेरा क्यों हल्का है?
अर्जुन रण रस्ता देख रहा,
विश्राम नहीं इक पल का है.

तमतमा उठो सूरज से तुम,
खलबली खलों में कर दो तुम,
विध्वंस रचा जिसने जग का,
उसको आतंक से भर दो तुम.
ये दुनिया जिससे कांप रही,
उसको आज कंपा दो तुम.
कि हदें हदों की ख़त्म हुईं,
तुम देखो धैर्य भी छलका है. खूंखार हुए कौरव के शर, गाण्डीव तेरा क्यों.....

क्षण भर भी जो तुम ठहर गए,
ये धरा मृत्यु न पा जाये,
बारूद यहाँ शैतानों का,
मानव जीवन न खा जाये.
अमृत देवों के हिस्से का,
दैत्यराज न पा जाये,
पीड़ा ह्रदय की असाध्य हुई,
आँसू हर नेत्र से ढुलका है. खूंखार हुए कौरव के शर, गाण्डीव तेरा क्यों.....

क्यों खड़े अभी तक ठगे हुए,
अब कान्हा कोई न आयेगा,
थामो अश्वों की बागडोर,
ना ध्वजरक्षक ही आयेगा.
तुम स्वयं पूर्ण हो गए पार्थ,
अब गीता न कोई सुनाएगा,
जो ज्वालामुख ये दहक उठे तुम,
स्वर्णिम भारत फिर कल का है. खूंखार हुए कौरव के शर, गाण्डीव तेरा क्यों.....
दीपक 'मशाल'

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

जाने क्या समझा.TTTTTTTTTTTTदीपक 'मशाल'

तूने कहा था जाने को मगर, मैं इशारा जाने क्या समझा,
था तो इंकार तेरी जानिब से, ये ज़माना जाने क्या समझा.


पानी न था मेरी आँख में जब, वो पत्थर बुलाता रहा मुझे,
तेरी चुनरी ने अश्क सोखे तो, वो फ़साना जाने क्या समझा.


मेरी खता क्या है ये बता मुझे, साज़ मेरा नहीं गलत यारा,
मैंने छेड़ी थी तान उल्फत की, तू तराना जाने क्या समझा.


तुम तो भंवर में तैरने के आदी हो, ये सुना करते हैं हम,
जो हमने अपनी नाव डाली, तो किनारा जाने क्या समझा.


किसको वफ़ा है मिली भला, ढाके यहाँ सितम-ए-जफ़ा,
उनकी मसखरी की आदत को, दिल हमारा जाने क्या समझा.


यूंही शब् भर था सिसकता रहा, मेरी कहानी सुन के 'मशाल',
मुझे था शौक गम सुनाने का, वो दीवाना जाने क्या समझा.


दीपक 'मशाल'
चित्र- दीपक 'मशाल' के कैमरे से...

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

कुछ छुटपुंजी कवितायेँ............दीपक 'मशाल'

    आजकल देश में इतनी सुन्दर सुन्दर घटनाएं हो रही हैं की सुन के और उन्हें सीधे प्रसारित होते देख के मन जिस तरह से खिन्न होता है वो सिर्फ मन ही जानता है...... जिस हिन्दी को हम मातृभाषा, राष्ट्रभाषा कहते हैं उसका ऐसा निरादर हो रहा है की कुछ कहते नहीं बनता, हिन्दी में शपथ लेना अपने ही देश में अपराध हो गया  ..और उससे भी दो कदम बढ़के ये कि सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता ये सब होने से........ ना केंद्र ना राज्य सरकार को....... इधर राजधानी में शीला दीक्षित की सह पे कानून की कमियों का फ़ायदा उठा के कांग्रेसी नेता की हत्यारी औलाद उस मनु शर्मा को खुलेआम घूमने की आज़ादी मिल रही है...... कुछ मन ही नहीं करता लिखने, कहने का..... मन कहता है की जब तक कुछ कर नहीं सकते तो लिखने का फ़ायदा क्या????
इसलिए नया तो कुछ नहीं है... कुछ पहले की टूटी फूटी रचनाएँ हैं जो डायरी के आगे, पीछे और किसी कोने में पड़ी मिल गयीं..... एक नज़र मार लीजिये और छत्रपति शिवाजी का नाम डुबोने वाले कपूतों से सम्बंधित समाचार सुनियेगा फिर से जाके...

१- इस दुनिया में
    जीने का
    अब मन ही नहीं करता,
    मैं मर जाता
    मगर,
    ना जाने कितने ख्वाबों से
    बेवफाई हो जाती...

२- मैं
    परिंदों के शहर से आया हूँ,
    देखना
    सय्याद कोई 
    देख ना ले,
    हर घड़ी 
    जागता रहता हूँ मैं,
    कोई हौसले के परों को
    नोंच ना ले.....
    मशर्रत की छाँव में 
    पलता रहा हूँ मैं,
    आफताब-ए-नफरत
    ये कहीं भांप ना ले.... 

३- मैं
    अपनी जेब में
    एक आइना रखता हूँ हरदम,
    जब भी कोई
    अच्छा कहता है मुझे,
    इक बार
    चेहरा देख जरूर लेता हूँ......

४- छोटा सा तो
    मिला है जीवन
    और
    करने को कितने काम,
    कहते ना रह जाएँ कहीं हम
    तेरे अल्लाह, मेरे राम....
    कब के हैं
    हम निकले घर से,
    कुछ तो हासिल करके जाएँ,
    खाने-रहने के फेरों में,
    ढल ना जाए
    यूं ही शाम.......

दीपक 'मशाल'

रविवार, 8 नवंबर 2009

आज की क्षणिकाएं----~~~~~~~~~~~~दीपक 'मशाल'

आज की क्षणिकाएं---- आज ५ अलग अलग रंग लेके आया हूँ मुलाइजा फरमाइयेगा..............
पहले तो मेरे हाथ कंपे... फिर मेरे पैर  क्या है ये जानने के लिए पढें---http://pahlaehsas.blogspot.com/

१- कहने को तो लोकतंत्र
   पर राजनीति अब भी भारी,
   क्यों लोकनीति ना कहलातीं
   नीति यहाँ की अब सारी..
   जनता की सरकार नहीं
   ना कोई है अब जनसेवक,
   प्रताड़ित नर नर होता है
   अपमानित है हर नारी....

२- वो कैसा हमसफ़र था 'मशाल'
    हाथ भी छोड़ा
    और रिश्ता भी,
    जिंदगी की
    अधखुली सी चिट्ठी में
    थोड़ी हकीकत है
    थोड़ा किस्सा भी....

३- वो जानता है सब
    मगर
    अन्जान बना रहता है...
    जो जताता नहीं
    उसका,
    ताउम्र अहसान बना रहता है....

४- मेरे घर की
    भीत लगी है,
    मस्जिद की दीवार से इक....
    अल्लाह ने तो
    कहा नहीं कुछ,
    तुम क्यों झगड़े करते हो....

५- इक हाथ
    कलम दी देव मुझे, 

    दूजे में 
    कूंची पकड़ा दी,
    संवाद
    मंच पर बोल सकूं
    ऐसी है तुमने जिह्वा दी.......
    पर इतने सारे मैं हुनर लिए
    कहीं विफल सिद्ध ना हो जाऊं,
    तूने तो
    गुण भर दिए बहुत,
    खुद दोषयुक्त ना हो जाऊं.
    भूखे बच्चों के पेटों को
    कर सकूं अगर,
    तो तृप्त करुँ...
    जो बस माथ तुम्हारे चढ़ता हो
    वो धवल दुग्ध ना हो जाऊं......
    इतनी सी रखना कृपा प्रभो
    मैं आत्ममुग्ध ना हो पाऊं......
    मैं आत्म मुग्ध ना हो पाऊं....
आज बस इतना ही :) ...... कुछ मेरे पहले अहसास के बारे में जानना हो तो यहाँ जरूर क्लिक करें.. http://pahlaehsas.blogspot.com/


आपका -
दीपक 'मशाल'
चित्र- दीपक 'मशाल' के कैमरे से

शनिवार, 7 नवंबर 2009

-ग़ज़ल-----------------------------------दीपक 'मशाल'


-ग़ज़ल-
ये परिंदा इन दरख्तों से, पूछता रहता है क्या,
ये आसमां की सरहदों में, ढूंढता रहता है क्या.

जो कभी खोया नहीं, उसको तलाश क्या करना,
इन दरों को पत्थरों को, चूमता रहता है क्या.

खोलकर तू देख आँखें, ले रंग ख़ुशी के तू खिला,
गम को मुक़द्दर जान के, यूँ ऊंघता रहता है क्या.

कोई मंतर नहीं ऐसा, जो आदमियत जिला सके,
कान में इस मुर्दे के, तू फूंकता रहता है क्या.

आएँगी कहाँ वो खुशबुएँ, अब इनमें 'मशाल',
दरारों में दरके रिश्तों की, सूंघता रहता है क्या.
दीपक 'मशाल'

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

पसंद आये तो १ चटका लगायें ना पसंद आये तो २ :) :) :) :) :) :) :) :) :) दीपक 'मशाल'

पसंद नापसंद सब आपकी मर्ज़ी से होता है साहब... और आपकी मर्ज़ी और लोग जानते हैं, आपके द्वारा लगाये गए चटके और दी गयी टिप्पणियों से इसलिए सहयोग करिए लोगों की नज़र में लाने का उस चिट्ठे को जिसे आपने पसंद किया है.. आखिर लोग भी तो देखें की आपकी पसंद में क्या खास है(लगता है मैं उसी तरह चिल्ला रहा हूँ जैसे बस स्टैंड के आस पास बने ढाबे छाप रेस्टोरेंट, वैसे लोग उन्हें होटल ही कहते हैं, के बाहर खड़े लड़के या होटल मालिक ग्राहक तलाशता हैं और उन्हें अपने 'होटल' में आने को उकसाते हैं).... लेकिन बड़े भाई, देवियों और सज्जनों ये सब मैं सिर्फ इसलिए नहीं कह रहा की मेरी पोस्ट पर चटके और टिप्पणी दो... बल्कि ये सब तामझाम है ब्लॉगजगत में सच्ची, कलात्मक, श्रेष्ठ साहित्यिक और ईमानदार पोस्टों को लोगों की नज़र में लाने का..... वरना एक ख़राब नेता को चुनने की तरह आपके द्वारा भाई-भतीजावाद के तहत चुनी गई घटिया पोस्टें तो लोग पढ़ लेंगे मगर योग्य पोस्ट नीचे कहीं दब जायेगी और फिर हो गया हिंदी का उत्थान.... कल्याण मस्तु...
माफ़ करना जी.... ये बात पढ़वाने के लिए मुझे भी औरों की तरह नयन और कर्ण प्रिय नाम देने पड़े पोस्ट को.... आशा है माफ़ करेंगे...
चलिए अब अपने घर बुला लिया है तो थोडा बोर भी कर ही देते हैं ( मैं सच में बोर करने की बात कर रहा हूँ, क्योंकि वास्तव में ये एक स्तरहीन रचना ही है)-----

 गुण चार मिले अपने गिन के....

थोड़े लोगों से ज्यादा हूँ,
ज्यादा लोगों से
कम थोडा,
मैं हूँ बस इक मध्यस्थ कड़ी
जिसने
ऊपर-नीचे को जोड़ा.
वो आसमान सी बातों को
बातों-बातों में
कहते हैं,
धरती पर जिनको
जगह नहीं,
धरती के नीचे रहते हैं.
कैसे कह दूं
ये देश मेरा,
जिसमे अब राम न रहते हों,
नक्सल, माओ का
रूप धरे,
घर-घर में रावन रहते हों.
बहते रहते अब
यहाँ-वहां,
मंद पवन के झोंकों से,
गुमाँ में
अपनी ताकत के,
जो उठते थे तूफाँ बन के.
मैं
दोष सभी के गिनता हूँ,
इसलिए नहीं
कि उत्तम हूँ,
खुद में भी
झाँका था इकदिन,
गुण चार मिले अपने गिन के,
गुण चार मिले अपने गिन के....
दीपक 'मशाल'
चित्र- 'रोटी के टुकड़े' एकांकी निर्वहन करते समय लिया गया.

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

क्या त्रियोदशी भोज निहायत ही आवश्यक प्रथा है???????????????????दीपक 'मशाल'

क्या त्रियोदशी भोज निहायत ही आवश्यक प्रथा  है??????????????????????????????? .............................. समयाभाव से इस पर विस्तृत चर्चा नहीं कर पा रहा हूँ मगर १-२ दिन बाद करेंगे अवश्य. हाल फिलहाल इस सामाजिक बुराई पे लिखी १ कविता आपके सामने है---

परम्परा की चाल ने.....
एक, दो, तीन, चार,
पांच, छः.....
पूरे तेरह विप्र
थे विराजमान उस पंक्ति में...
रसस्वादन के लिए,
दिवंगत आत्मा की शांति के
नाम पर आयोजित
उस त्रियोदशी भोज में.
तभी बोले इक विप्र देव
हो जाता भोजन ये स्वादिष्ट,
जो कम होता नमक कुछ रायते में.....
अरे कैसे ये पाषाण से 
सख्त हैं लड्डू बने ये?
फूटे थे उदगार ये
एक और ब्राह्मण देव के....
थी सुन रही आशिर्वचन ये
बैठी हुई दहलीज पे, 
इक मूर्ति सी श्वेताम्बरा,
खोया था जिसने सर से साया
अपने ह्रदय के नाथ का
वो थी बनी विधवा नयी
और अब नाम पे इस भोज के
थी खो चुकी वो घोंसला,
जिसमे था जीवन पला...
चिपेटती जाती ह्रदय से
अपने ह्रदय के अंश को....
दुःख था उसे कैसे बढ़े,
लेकर वो अपने वंश को...
कौन था दोषी मगर
उसके इस विध्वंश का,
पति तो गया था छोड़ के
छीना था उसको काल ने,
सर से छत छीनी मगर
परम्परा की चाल ने,
सर से छत छीनी मगर
परम्परा की चाल ने.....
दीपक 'मशाल'

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

हवालात में एक मौत..+++++++++++++++दीपक 'मशाल'

पुलिसिया अत्याचार की खबरें हम आये दिन सुनते रहते हैं...... कभी किसी की सच्ची ऍफ़.आई.आर.  दर्ज नहीं की जाती, तो कभी किसी को किसी झूठे मामले में ही फंसा दिया जाता है.... ऐसे ही एक हवालात में मौत को ध्यान में रखते हुए इस कविता को लिखा गया था, जिसे आपके सामने रख रहा हूँ....

हवालात में एक मौत.....

मारा गया
फिर इक कोई हवालात में,
चीख थी उसकी सुनी
हमने भी रात में,
कहती पुलिस है
'वो बड़ा बदमाश था
पर
कुबूल करता नहीं अपराध था'.
पर वो तो बस
भूख का मारा था इक,
उसका था न घर कोई
ना माँ कोई
ना बाप था.
बाल था,
सो मजदूर भी
ना कोई रखता उसे,
पर ताप को पेट के
इस बात से क्या वास्ता,
था ढूँढने वो लग गया
कोई नया इक रास्ता.
हीरे सी चमकी थी आँखें
देख के वो तश्तरी,
छोड़ी जो थी किसी ने
थी रोटी इक उसमे पड़ी.
अंधा वो मारा भूख का
ना सूझ पाया,
न जाने कैसे हाथ को
रोटी पे पाया,
तभी
यमदूत सा था आ खड़ा,
मालिक होटल का वो साया.
बस वो घड़ी
उसके लिए मनहूस बन गई,
रोटी वो
उसके लिए थी मौत बन गई.
थी ढूंढती फिरती पुलिस
इक सरगना को,
जिसने हिला रखा था
समूचे परगना को,
करने साबित जुट गए
गिरोह का हिस्सा उसे,
अखबार में भी दे दिया
बना के एक किस्सा उसे.
इक खबर छोटी सी
प्रकाशित तो थी हुई,
आया ना उसको देखने
पर कोई इंसान था,
रौशनी थी अब मगर,
करना गुनहगार साबित उसे
खाकी वर्दी के लिए आसान था.
ऐ प्रभाकर!!
रश्मियाँ भी तेरी क्या करतीं?
जब दिलों में ही घिरा
तिमिर घनघोर था,
शोर ये उपजा कि वो इक चोर था....
शोर ये उपजा कि वो इक चोर था....
दीपक 'मशाल'
चित्र साभार गूगल से

सोमवार, 2 नवंबर 2009

कल क्यों नहीं पढ़ा इसे''@@@@@@@@दीपक 'मशाल'

कल क्यों नहीं पढ़ा इसे अब दोबारा पढना पड़ेगा  :)
क्योंकि स्व. श्री दुष्यंत कुमार जी कि एक प्रसिद्द रचना है कि,
'' सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश  है कि ये सूरत बदलनी चाहिए,
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग लेकिन आग होनी चाहिए''
बस कुछ ऐसा ही सोच के कि ये कविता रुपी सन्देश ज्यादा से ज्यादा लोगों तक और उनके दिलोदिमाग तक पहुंचे मजबूर होके आज दोबारा लगा रहा हूँ.
इसमें मैंने कोशिश की है छोटे कस्बों और महानगरों में एक लड़की के डरों को दिखाने की... और बताने की कि वो किस तरह से किन हालातों में डरते हुए जीती है और कैसे आतंकवाद समझती है...... हमें सच में जरूरत है उन्हें इस आतंक से मुक्त कराने कि...

वो आतंकवाद समझती है...

वो जब घर से निकलती है,
खुद ही
खुद के लिए दुआ करती है,
चाय की दुकान से उठे कटाक्षों के शोलों में,
पान के ढाबे से निकली सीटियों की लपटों में,
रोज़ ही झुलसती है.
चौराहों की घूरती नज़रों की गोलियाँ,
उसे हर घड़ी छलनी करती हैं.
आतंकवाद!!!!
अरे इससे तो तुम
आज खौफ खाने लगे हो,
वो कब से
इसी खुराक पे जीती-मरती है.
तुम तो आतंक को
आज समझने लगे हो
आज डरने लगे हो,
वो तो सदियों से डरती है,
ज़मीं पे आने की जद्दोज़हद में,
किस-किस से निपटती है.
तुम जान देने से डरते हो
पर वो
आबरू छुपाये फिरती है,
क्योंकि वो जान से कम और
इससे ज्यादा प्यार करती है.
तुम तो ढंके चेहरों और
असलहे वाले हाथों से सहमते हो,
वो तुम्हारे खुले चेहरे,
खाली हाथों से सिहरती है.
तुम मौत से बचने को बिलखते हो,
वो जिंदगी पे सिसकती है.
तुम्हे लगता है...
औरत अख़बार नहीं पढ़ती तो..
कुछ नहीं समझती,
अरे चाहे पिछडी रहे
शिक्षा में मगर,
सभ्यता में
आदमी से कई कदम आगे रहती है.
इसलिए
हाँ इसलिए,
हमसे कई गुना ज्यादा,
वो आतंकवाद समझती है
वो आतंकवाद समझती है....
दीपक 'मशाल'

रविवार, 1 नवंबर 2009

वो आतंकवाद समझती है...******************दीपक 'मशाल'

कल आपसे वादा किया था अपनी एक पुरस्कृत कविता पढ़वाने  का वो पूरा कर रहा हूँ.... ये कविता हिन्दयुग्म की सितम्बर   माह की यूनिकवि प्रतियोगिता के लिए निर्णायकों द्वारा पसंदीदा कविता चुनी गयी थी. कोशिश की है छोटे कस्बों और महानगरों में एक लड़की के डरों को दिखाने की... और बताने की कि वो किस तरह से किन हालातों में डरते हुए जीती है और कैसे आतंकवाद समझती है..
वो आतंकवाद समझती है...

वो जब घर से निकलती है,
खुद ही
खुद के लिए दुआ करती है,
चाय की दुकान से उठे कटाक्षों के शोलों में,
पान के ढाबे से निकली सीटियों की लपटों में,
रोज़ ही झुलसती है.
चौराहों की घूरती नज़रों की गोलियाँ,
उसे हर घड़ी छलनी करती हैं.
आतंकवाद!!!!
अरे इससे तो तुम
आज खौफ खाने लगे हो,
वो कब से
इसी खुराक पे जीती-मरती है.
तुम तो आतंक को
आज समझने लगे हो
आज डरने लगे हो,
वो तो सदियों से डरती है,
ज़मीं पे आने की जद्दोज़हद में,
किस-किस से निपटती है.
तुम जान देने से डरते हो
पर वो
आबरू छुपाये फिरती है,
क्योंकि वो जान से कम और
इससे ज्यादा प्यार करती है.
तुम तो ढंके चेहरों और
असलहे वाले हाथों से सहमते हो,
वो तुम्हारे खुले चेहरे,
खाली हाथों से सिहरती है.
तुम मौत से बचने को बिलखते हो,
वो जिंदगी पे सिसकती है.
तुम्हे लगता है...
औरत अख़बार नहीं पढ़ती तो..
कुछ नहीं समझती,
अरे चाहे पिछडी रहे
शिक्षा में मगर,
सभ्यता में
आदमी से कई कदम आगे रहती है.
इसलिए
हाँ इसलिए,
हमसे कई गुना ज्यादा,
वो आतंकवाद समझती है
वो आतंकवाद समझती है....

दीपक 'मशाल'
चिता साभार गूगल से..

शनिवार, 31 अक्तूबर 2009

श्री समीर लाल जी का हुक्म कौन टाल सकता है भला?!!!!!!!!!!!!!!!!!!दीपक 'मशाल'

ब्लॉगजगत में किसकी इतनी हिम्मत है जो श्री समीर लाल जी के आदेश का उल्लंघन करे भला, फिर मेरी बिसात ही क्या है? बित्ते भर का छोकरा हूँ... ऐसा कोई क्षेत्र भी तो नहीं जिसमें समीर जी का किसी अन्य से भी मुकाबला हो, चाहे वह ब्लॉग लेखन की कला हो, साहित्यिक ज्ञान हो, धनधान्य हो, प्रशंसक हों, पद हो, विनम्रता हो, सम्मान हो या कुछ और भी....
मैं नतमस्तक हूँ उनके आगे और उनके आदेश कि ''कुछ और अपनी पुरानी रचनाओं की छंटनी करके ब्लॉग पे लगाओ'' का पालन कर रहा हूँ और यहाँ पर एक ४-५ महीने पुरानी रचना है जो लगा रहा हूँ, क्योंकि उनका हुक्म कौन टाल सकता है भला?
इस रचना में एक ऐसी सोच का निरूपण है जो यदि हर व्यक्ति सोचे तो संसार को सुधारने के लिए किसी कानून की आवश्यकता ही ना रहे....
कल हिंद युग्म में सितम्बर २००९ की यूनीकविता के रूप में पुरस्कृत अपनी एक अन्य रचना आपके सामने रखूंगा.... समीक्षा और उत्साहवर्धन करें..  

मुझसे पूँछेगा खुदा











मुझसे पूछेगा खुदा,
क्या किया तुमने
जमीं पे जाके,
आदमी का तन पाके।
मैं तुझमे ढूंढता रहा
जगह अपनी,
और तू खुश था,
मुझे पत्थरों में ठहरा के।
अपनी सिसकियों के शोरों में,
आह औरों की
ना सुन पाए,
सपने बुने तो सतरंगी मगर,
अपने लिए ही बुन पाए।
जो लिया सबसे
तुम्हे याद नहीं
और देके थोड़े का हिसाब,
भूल नहीं पाए।
क्या करुँ मैं
बना के वो इन्सां,
काम इन्सां के जो,
कर नहीं पाए।
मैंने चाहा था,
तुम लिखो नसीब दुनिया का,
तुम रहे बैठे,
दोष अपने नसीब को लगा के।
याद मुझको तो किया,
किया मगर घबरा के।
बाँट के मुझको कई नामों में,
लौट आये हो ज़हर फैला के।
दीपक 'मशाल'
 चित्र साभार गूगल से प्राप्त.

गुरुवार, 29 अक्तूबर 2009

मोक्ष::::::::::::::::::::::::::::::::::दीपक 'मशाल'

मोक्ष क्या है? लिखना तो बहुत कुछ चाह रहा था लेकिन पता नहीं क्यों आज मन बहुत व्यथित है और इसीलिए बिना किसी लाग लपेट के एक पुरानी कविता आपके सामने रख रहा हूँ.....  इनमें  सिर्फ वही भाव हैं, सिर्फ वही अंतर्द्वंद है जो कभी-कभी हर मन में चलता है की मोक्ष क्या है?

मोक्ष
परिक्रमा
करते थे प्रश्न,
अँधेरे मन के
कोटर के,
उत्तर कोई निकले सार्थक,
जिसको
हथिया के प्राप्त करुँ,
विचलित ह्रदय
संतृप्त करुँ।
किस राह को
मैं पा जाऊँ?
किसपे
कर विश्वास चला जाऊँ?
किसको भरूँ,
अंक में मैं,
जीवन-दर्शन या जग-पीड़ा?
करुँ नर-सेवा या
नारायण?
बनूँ किसका कर्त्तव्य-परायण?
चलूँ पथ
मोक्ष प्राप्ति का मैं,
या पीड़ा दीनों की हरूँ हरी?
गुँथा हुआ मैं
ग्रंथि में,
था अंतर्मन टटोल रहा बैठा।
सहसा घिर आये मेघा
आबनूस रंग चढ़े हुए,
गरजे,
बरसे,
कौंधी बिजली,
मुझे वज्र इन्द्र का याद हुआ,
त्याग दधीचि का सार हुआ।
तब ज्ञान हुआ जो
करनी का,
जीते जी मोक्ष प्राप्त हुआ।
दीपक 'मशाल'
चित्र- साभार गूगल से लिया गया.

बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

अरे भाई मैं मरने नहीं जा रहा हूँ###############........दीपक 'मशाल'

आप मानें या ना मानें हर व्यक्ति अपने जीवन में हमेशा सकारात्मक सोच नहीं रख सकता, कभी ना कभी हताश या निराश होके वो नकारात्मक सोच का लबादा ओढ़ ही लेता है. कई बार जानबूझ कर तो कई बार अनजाने में....
ऐसे ही एक बार मेरे मन में भी एक ऐसे व्यक्ति के बारे में लिखने का विचार आया... जो जीवन से थक सा गया है और मौत, जो की एक अटल सच्चाई है, को एक प्रेमिका की तरह आलिंगन के लिए तत्पर है...... लेकिन पिछली कविताओं के निकाले गये अर्थ(अनर्थ) की तरह इसका ये अर्थ मत निकाल लीजियेगा की मैं नकारात्मक सोच अपना चुका हूँ....
अरे भाई मैं मरने नहीं जा रहा हूँ.................. जब कभी ऐसा सोचूंगा तो आत्म हत्या के लिए आतंकवादियों की टोली के बीच जाऊंगा जिससे की मरने से पहले १०-१२ को मारकर कुछ दहशतगरदों  से तो अपनी ज़मीं को आज़ाद करा सकूं.....
देखिये इस बार क्या बकवास लिख डाली....


ऐ मौत!!!!!!!!!!!!!!!! 
ऐ मौत!
मैं दरवाज़े पे खडा हूँ,
तुम आओ तो सही,
मैं भागूंगा नहीं........
कसम है मुझे उसकी,
जिसे
मैं सबसे ज्यादा प्यार करता हूँ,
और उसकी भी
जो मुझे सबसे ज्यादा प्यार करता है.
या शायद दोनों.........
एक ही हों.
एक ऐसा शख्स
या ऐसे दो शख्स
जो आपस में गड्डमगड्ड हैं..
मगर जो भी हो
है तो प्यार से जुड़ा हुआ ही न....
वैसे भी...
गणित के हिसाब से
अ बराबर ब
और ब बराबर स
तो अ बराबर स ही हुआ न....
जो भी हो यार
मगर सच में
उन दोनों की कसम...
उन दोनों की कसम, मैं भागूँगा नहीं.
कुछ लोग कहते हैं कि-
'जिंदगी से बड़ी सजा ही नहीं'
अरे
तो तुम तो इनाम हुई न
और भला इनाम से
क्यों कर मैं भागूंगा?
और फिर वो इनाम जो.....
आखिरी हो
सबसे बड़ा हो,
जिसके बाद किसी इनाम की जरूरत ही न रहे..
उससे भला मैं क्यों कर भागूंगा?
इसलिए
ऐ मौत....
तुम्हे
वास्ता है खुद का,
खुदा का
आओ तो सही
मैं भागूंगा नहीं.........
दीपक 'मशाल'

जय हिंद

मंगलवार, 27 अक्तूबर 2009

क्या आप पहिचानते हैं इन्हें????~~~~~~~~~~~~ दीपक 'मशाल'

 क्या आप पहिचानते हैं इन्हें???? बस एक बार आप इनके गाये हुए गीत इन लिंकों पर सुन लेंगे तो मुझे भरोसा है कि मेरी तरह आप भी ना सिर्फ इनकी आवाज़ बल्कि इन गीतों और इनके पीछे छिपी देश और समाजहित कि भावनाओं के दीवाने हो जायेंगे...... अगर आपकी संवेदनाएं मर चुकी होगीं तो फिर से जीवित हो जाएँगीं और अगर सो रही होंगी तो जाग जाएँगीं.
इनके चेहरे से ही शायद आपको भी इस चेहरे के स्वामी में कूट कूट के भरी सच्चाई और ईमानदारी के दर्शन होंगे. लेकिन दुर्भाग्य कि इनका प्रशंसक होने के बावजूद मुझे इनके नाम(विनय जी) के अलावा इनके बारे में कुछ नहीं पता....  आपसे विनम्र निवेदन है कि यदि आप इनके बारे में जानते हों तो कृपया मुझे जरूर बताएं.... मैं आपका आभारी रहूँगा..
http://www.youtube.com/watch?v=WQCckYsS7bw

http://www.youtube.com/watch?v=Oi5XnHnEv9k

 आज मैं ईश्वर को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने आदरणीय गुरुदेव श्री पंकज सुबीर जी को, जो दीवाली के दिन से ही विषाणु ज्वर(वाइरल बुखार) से पीड़ित थे, उन्हें राहत प्रदान की इसके अलावा हमारे शेरदिल, जांबाज़, देश के सच्चे लाल भाई गौतम राजरिशी जी को पूर्णरूपेण स्वस्थ कर दिया......लेकिन दुःख है की दूसरी तरफ युवा दिलों की धड़कन महफूज़ भाई को वाइरल बुखार के प्रकोप से ग्रसित कर दिया... मुझे डर है कि जाने मेरी पिछली पोस्ट से इसका कोई ताल्लुक तो नहीं.....  आप सबसे गुजारिश है की बड़े भाई के शीघ्र  स्वस्थ्य लाभ के लिए दुआ करें, मेरी तो अब ऊपर वाला सुनता ही नहीं.....

      अंत में चलते चलते वो कविता जिसमे अपनी कलम से पुरुषों के लिए नारियों द्वारा दिया गया सन्देश लिखने की कोशिश की है......... जिसमे की नारियां सदियों से अपने ऊपर होती आ रही ज्यादती को आज भी एक चुनौती मान कर स्वीकार करने के लिए तैयार हैं.....

बाद विरह के कई बरस के,
किया गया था उसे खड़ा इक सवाल की तरह,
और जवाब के लिए
था कूदना पड़ा अग्नि में
अपने को
कंचन साबित करने के लिए.


कभी थी लगी दांव पे
इक वस्तु की तरह महज़,
और हारी भी गयी,
लाज उसकी उतारी भी गयी,
घसीटा गया उसे,
दासी साबित करने के लिए.


सदैव उसने ही किया तप,
अपने आराध्य पति को पाने को,
कभी भस्म हुई थी
अग्निकुण्ड में
क्यों???..सिर्फ...
समर्पण साबित करने के लिए.


थी मृत्युदेव से भिड़ी कभी,
वो राह में थी अडी तभी,
लाने को वापस प्राण...
निज प्राणप्रिय के
स्वयं को...
सती साबित करने के लिए.


हे पुरुषवादी मानसिकता के झंडावरदारों!!!!!!!!
इक बुरी खबर है आपके लिए,
कि नारी अबतक हारी नहीं,
हाँ और अब भी खड़ी है,
तुम जो चाहो....
वो साबित करने के लिए.


तुम समंदर हो गए,
वो कतरा ही रह गयी..
फिर भी डरते हो क्यों?????
कि वो कहीं उठ न जाये
तुम्हे कतरे का....
कर्जदार साबित करने के लिए.
दीपक 'मशाल'
चित्रांकन- दीपक 'मशाल'

जय हिंद......

सोमवार, 26 अक्तूबर 2009

महफूज़ भाई के प्यार कि दास्ताँ... इंटरवल के बाद का शेष भाग.... दीपक 'मशाल'


जो कहानी महफूज भाई ने सुनाई वो तो आधी-अधूरी है जनाब, वो तो सिर्फ तब की चर्चा है जब प्यार नया नया था.. इंटरवल तक उनसे सुन लिया अब आगे की फीचर फिल्म मेरे पास है.
हुआ यूं की सब कुछ ठीक ठाक चल रिया था लेकिन एक दिन भाभी जी की नज़र महफूज़ भाई के ऑरकुट प्रोफाइल/ अकाउंट पे चली गई. जहाँ देखा की इत्त्त्त्त्ती सारी महिला मित्रां और एक वो है जिसका कोई ना मित्रा(कोइना मितरा) इतने सारियों ने टेस्तिमोनिअल लिख डाले!!!!!!!!!!!!!
''तो फिर क्या हुआ??? ''
''धत् तेरे की.....''
 ''हुआ क्या विश्वास डगमगा गया?''
 ''अरे डगमगा नहीं गया भाई, भूकंप आगया भरोसा नाम के शहर में.... वो भी रिअक्टर स्केल पे पूरी ८.२ तीव्रता का.  फिर क्या था, बोरिया बिस्तर बांधा और वापस नैहर की तरफ. ''
अब महफूज़ भाई लगे उस घड़ी को कोसने जिसमे प्यार जताते हुए पासवर्ड बता बैठे, वो तो भला हो सिर्फ ऑरकुट का बताया, फेस बुक का नहीं...
मुझे फोन लगा दिया कि- ''छोटे भाई मियां मशाल तुम यार दिलजले टाईप के देवदास आदमी हो, ऐसा-ऐसा हो गया मेरे साथ.... और अब रोने धोने और मनाने वाली कविता, गीत तो हमें लिखने आते ही नहीं... तुम ही अपनी सुनसान, वीरान सूरत के ऊपर वाले माले में रखे दर्दीले, चोटीले  दिमाग से कुछ ऐसा तडकता भड़कता लिख दो कि तुम्हारी भाभी को मेरे प्यार पे यकीन हो जाये, मैं तो साहिर लुधियानवी के पुराने गाने एस ऍम एस कर कर के थक गया, लेकिन कोई रेस्पोंस ही नहीं आता.....


अपनी खोपडिया खुजला के  हमने लिख के दे दिया के-

कैसे?
हाँ कैसे यकीं दिलाऊँ तुम्हे
तुम ही प्यार हो मेरा,
हर साल, हर महीने
हर दिन, हर पहर
हर पल.......
तुम ही इन्तेज़ार हो मेरा.
तुम्ही तो हो जिसके लिए,
मैं साँसों को सम्हाले हुए हूँ,
अधखुली आँखों में कुछ,
रंगीन सपने पाले हुए हूँ.....
तुम्ही तो हो,
जो ज़मीं से बाँधे है मुझे,
और उस जमीं के सर का,
तुम्ही विस्तार हो मेरा........
कैसे?
हाँ कैसे यकीं.........................हो मेरा.
तुम्हारे ही सपनों के तिनकों से,
मैंने नींव रखी है
अपने घोंसले की,
और तुम्हारी आँखों की चमक से
मिलती है
खुराक हौसले की.
वर्ना ठूँठ पे,
हाँ पुराने ठूँठ पे
नए घोंसले नहीं बनते.........
बनकर के होंठ मेरे
तुम्ही तो इज़हार हो मेरा......
कैसे?
हाँ कैसे यकीं दिलाऊँ कि तुम ही प्यार हो मेरा
हाँ कैसे यकीं दिलाऊँ कि तुम ही प्यार हो मेरा..........
दीपक 'मशाल'

भेज दिया महफूज़ भाई ने इसे भाभी जी को, और फिर होना क्या था लौटती गाड़ी से वो घर वापस...
अजी भरोसा ना हो तो फ़ोन कर लो महफूज़ भाई को.... कहो तो मोब. नं. दे दें ...कसम से... 

फिल्म का शुरूआती शेष भाग यहाँ देखें- http://lekhnee.blogspot.com/2009/10/blog-post_25.html

रविवार, 25 अक्तूबर 2009

इस हफ्ते की खुरचन"""""""""""""""""""""""""""""""""

 इधर उधर की बातों को लेकर कुछ छोटा-बड़ा, कुछ  हल्का-फुल्का लिखा आपके सामने है, चाहें तो इसे इस हफ्ते की खुरचन कह सकते हैं...

१- लाख हों गम मगर हंसने का मौका ढूंढ लेता है,
    वो एक पंछी है अक्सर झरोंखा ढूंढ लेता है.

२- वो जानता है सब मगर, अन्जान बना रहता है,
    जो ना जताए करम उसका, एहसान बना रहता है..

३- सादे लिबास में जिन्हें नाकामियां मिलती रहीं,
    उनको खुदा के काम में भी खामियां मिलती रहीं.

४- शर्म-
एक ऐसी चादर
जिसकी तहें,
उम्र बढ़ने के साथ-साथ
लड़की पर
बढ़ती जाती हैं
और
लड़के पर से
उतरती जाती हैं....

५- बर्फ सा जीवन-
पता नहीं
ये
वक़्त की साजिश है
या
लम्हों का
दिवालियापन,
तुम
सामने होके भी
नहीं दिखते,
बर्फ सा
जम गया जीवन.

६- वहां से सड़ रहा हूँ मैं....
मैं अबोला
एक भूला सा वेदमंत्र हूँ,
खामियों से लथपथ
मैं लोकतंत्र हूँ.
तंत्र हूँ, स्वतंत्र हूँ द्रष्टि में मगर
ओझल मैं
आत्मा से परतंत्र हूँ.
कहने को बढ़ रहा हूँ मैं.
पर जड़ों में न झांकिये
वहां से सड़ रहा हूँ मैं.
लोक को धकेलता
परलोक की मैं राह में,
कुछ मुसीबतों की आँख में
गड़ रहा हूँ मैं.
हूँ तो मैं कुँवर कोई
सलोना एक चाँद सा,
पर ग्रहणों की छाया से
पिछड़ रहा हूँ मैं.
मैं अश्व हूँ महाबली,
पर सामने नदी चढ़ी
भ्रष्टों की खेप की,
झूठ की फरेब की,
जो घुड़सवार मेरा है
उसको फिक्र रहती है
सिर्फ अपनी जेब की,
बस इसलिए बिन बढ़े,
तट पे अड़ रहा हूँ मैं.
जड़ों में न झांकना
वहां से सड़ रहा हूँ मैं...
वहां से सड़ रहा हूँ मैं....
दीपक 'मशाल'

शनिवार, 24 अक्तूबर 2009

मैं इक बेरोजगार हूँ..#############

हमारे देश कि बढती हुई जनसँख्या आज से ही नहीं बल्कि बीते कई सालों से देश कि सबसे बड़ी समस्या या ये कहें कि समस्याओं की जड़ है. बाकी जितनी भी बड़ी समस्याएँ है सब इस बढती जनसँख्या का ही परिणाम हैं, यहाँ मैं बेरोज़गारी कि समस्या को, एक बेरोजगार नवयुवक के दर्द के माध्यम से उकेरने का प्रयत्न कर रहा हूँ.


मैं इक बेरोजगार हूँ,
मैं इक बेरोजगार हूँ.
नज़र में दुनिया के बेकार हूँ,
पर बेकारी के आलम से जन्मे
दर्द का तजुर्बेकार हूँ.
मैं इक बेरोजगार हूँ.
सब मांगते हैं अनुभव,
पर
अनुभव के लिए
कोई नौकरी नहीं देता.
इसीलिए मैं बेगार हूँ,
मैं इक बेरोजगार हूँ.
खोखले वादों के
ख़खोल से उपजी
देश की
शिक्षा-प्रणाली की
एक हार हूँ.
मैं इक बेरोजगार हूँ.
झूठा मक्कार हूँ,
बरसात में
टूटी हुई छत को तकते,
किसी
बाप का इन्तेज़ार हूँ.
मैं इक बेरोजगार हूँ.
खामोश है जो,
कुछ कह नहीं सकती
जिगर के टुकड़े से,
दर्द में तड़पती उस
बीमार माँ का गुनहगार हूँ.
मैं इक बेरोजगार हूँ.
जो
मुझमें तलाश बैठी है
सपने कई अपने,
ढलती उम्र ढोती हुई
उस नादान का मैं प्यार हूँ.
मैं इक बेरोजगार हूँ.
दूर के
और करीब के,
सम्बन्धियों की
नज़रों में,
मैं पढालिखा गंवार हूँ.
मैं इक बेरोजगार हूँ.
जो चहकते थे
संग खुशियों में,
अब
उन यारों की
उपेक्षा का शिकार हूँ.
मैं इक बेरोजगार हूँ.
देखता नहीं मैं
आइना,
कैसे सामना
करुँ खुद का?
मैं खुद का कसूरवार हूँ.
मैं इक बेरोजगार हूँ......

दीपक 'मशाल'
चित्रांकन- दीपक 'मशाल'

शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2009

क्या ब्लॉगजगत का भी यही हाल है????????????

क्या ब्लॉगजगत का भी यही हाल है??? शायद हाँ, शायद ना.... यानि कि अभी तक पूरी तरह से किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा हूँ लेकिन फिर भी इतना तो तय है कि एक वर्ग विशेष के ब्लॉग कि तरफ हमारा कुछ ज्यादा झुकाव रहता है. अरे आप अभी नाराज़ होके डाँटीए तो मत...... मैं देख रहा हूँ ना अभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा,, इस बात पर भी शोध चल रहा है.... तब तक देखिये कि साहित्य जगत में क्या चल रहा है.


<एक लघु कथा का अंत>




" डा. विद्या क्या बेमिसाल रचना लिखी है आपने! सच पूछिए तो मैंने आजतक ऐसी संवेदनायुक्त कविता नहीं सुनी", "अरे शुक्ला जी आप सुनेंगे कैसे? ऐसी रचनाएँ तो सालों में, हजारों रचनाओं में से एक निकल के आती है. मेरी तो आँख भर आई" "ये ऐसी वैसी नहीं बल्कि आपको सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवी वर्मा जी की श्रेणी में पहुँचाने वाली कृति है विद्या जी. है की नहीं भटनागर साब?"
एक के बाद एक लेखन जगत के मूर्धन्य विद्वानों के मुखारबिंद से निकले ये शब्द जैसे-जैसे डा.विद्या वार्ष्णेय के कानों में पड़ रहे थे वैसे वैसे उनके ह्रदय की वेदना बढ़ती जा रही थी. लगता था मानो कोई पिघला हुआ शीशा कानों में डाल रहा हो. अपनी तारीफों के बंधते पुलों को पीछे छोड़ उस कवि-गोष्ठी की अध्यक्षा विद्या अतीत के गलियारों में वापस लौटती दो वर्ष पूर्व उसी स्थान पर आयोजित एक अन्य कवि-गोष्ठी में पहुँच जाती है, जब वह सिर्फ विद्या थी बेसिक शिक्षा अधिकारी डा.विद्या नहीं. हाँ अलबत्ता एक रसायन विज्ञान की शोधार्थी जरूर थी.
 शायद इतने ही लोग जमा थे उस गोष्ठी में भी, सब वही चेहरे, वही मौसम, वही माहौल. सभी तथाकथित कवि एक के बाद एक करके अपनी-अपनी नवीनतम स्वरचित कविता, ग़ज़ल, गीत आदि सुना रहे थे. अधिकांश लेखनियाँ शहर के मशहूर डॉक्टर, प्रोफेसर, वकील, इंजीनियर और प्रिंसिपल आदि की थीं. देखने लायक या ये कहें की हँसने लायक बात ये थी की हर कलम की कृति को कविता के अनुरूप न मिलकर रचनाकार के ओहदे के अनुरूप दाद या सराहना मिल रही थी. इक्का दुक्का ऐसे भी थे जो औरों से बेहतर लिखते तो थे लेकिन पदविहीन या सम्मानजनक पेशे से न जुड़े होने की वजह से आयाराम-गयाराम की तरह अनदेखे ही रहते. गोष्ठी प्रगति पे थी, समीक्षाओं के बीच-बीच में ठहाके सुनाई पड़ते तो कभी बिस्कुट की कुरकुराहट या चाय की चुस्कियों की आवाजें. शायद उम्र में सबसे छोटी होने के कारण विद्या को अपनी बारी आने तक लम्बा इन्तेज़ार करना पड़ा. सबसे आखिर में लेकिन अध्यक्ष महोदय, जो कि एक प्रशासनिक अधिकारी थे, से पहले विद्या को काव्यपाठ का अवसर अहसान कि तरह दिया गया. 'पुरुषप्रधान समाज में एक नारी का काव्यपाठ वो भी एक २२-२३ साल की अबोध लड़की का, इसका हमसे क्या मुकाबला?' कई बुद्धिजीवियों की त्योरियां खामोशी से ये सवाल कर रहीं थीं.
वैसे तो विद्या बचपन से ही कविता, कहानियां, व्यंग्य आदि लिखती आ रही थी लेकिन उसे यही एक दुःख था की कई बार गोष्ठियों में काव्यपाठ करके भी वह उन लोगों के बीच कोई विशेष स्थान नहीं अर्जित कर पाई थी. फिर भी 'बीती को बिसारिये' सोच विद्या ने एक ऐसी कविता पढ़नी प्रारंभ की जिसको सुनकर उसके दोस्तों और सहपाठियों ने उसे पलकों पे बिठा लिया था और उस कविता ने सभी के दिलों और होंठों पे कब्ज़ा कर लिया था. फिर भी देखना बाकी था की उस कृति को विद्वान साहित्यकारों और आलोचकों की प्रशंसा का ठप्पा मिलता है या नहीं.
तेजी से धड़कते दिल को काबू में करते हुए, अपने सुमधुर कन्ठ से आधी कविता सुना चुकने के बाद विद्या ने अचानक महसूस किया की 'ये क्या कविता की जान समझी जाने वाली अतिसंवेदनशील पंक्तियों पे भी ना आह, ना वाह और ना ही कोई प्रतिक्रिया!' फिर भी हौसला बुलंद रखते हुए उसने बिना सुर-लय-ताल बिगड़े कविता को समाप्ति तक पहुँचाया. परन्तु तब भी ना ताली, ना तारीफ़, ना सराहना और ना ही सलाह, क्या ऐसी संवेदनाशील रचना भी किसी का ध्यान ना आकृष्ट कर सकी? तभी अध्यक्ष जी ने बोला "अभी सुधार की बहुत आवश्यकता है, प्रयास करती रहो." मायूस विद्या को लगा की इसबार भी उससे चूक हुई है. अपने विचलित मन को सम्हालते हुए वो अध्यक्ष महोदय की कविता सुनने लगी. एक ऐसी कविता जिसके ना सर का पता ना पैर का, ना भावः का और ना ही अर्थ का, या यूँ कहें की इससे बेहतर तो दर्जा पांच का छात्र लिख ले. लेकिन अचम्भा ये की ऐसी कोई पंक्ति नहीं जिसपे तारीफ ना हुई हो, ऐसा कोई मुख नहीं जिसने तारीफ ना की हो और तो और समाप्त होने पे तालियों की गड़गडाहट थामे ना थमती.
साहित्यजगत की उस सच्ची आराधक का आहत मन पूछ बैठा ''क्या यहाँ भी राजनीति? क्या यहाँ भी सरस्वती की हार? ऐसे ही तथाकथित साहित्यिक मठाधीशों के कारण हर रोज ना जाने कितने योग्य उदीयमान रचनाकारों को साहित्यिक आत्महत्या करनी पड़ती होगी और वहीँ विभिन्न पदों को सुशोभित करने वालों की नज़रंदाज़ करने योग्य रचनाएँ भी पुरस्कृत होती हैं.'' उस दिन विद्या ने ठान लिया की अब वह भी सम्मानजनक पद हासिल करने के बाद ही उस गोष्ठी में वापस आयेगी.
वापस वर्तमान में लौट चुकी डा. विद्या के चेहरे पर ख़ुशी नहीं दुःख था की जिस कविता को दो वर्ष पूर्व ध्यान देने योग्य भी नहीं समझा गया आज वही कविता उसके पद के साथ अतिविशिष्ट हो चुकी है. अंत में सारे घटनाक्रम को सबको स्मरण कराने के बाद ऐसे छद्म साहित्यजगत को दूर से ही प्रणाम कर विद्या ने उसमें पुनः प्रवेश ना करने की घोषणा कर दी. अब उसे रोकता भी कौन, सभी कवि व आलोचकगण तो सच्चाई के आईने में खुद को नंगा पाकर जमीन फटने का इन्तेज़ार कर रहे थे.

दीपक 'मशाल'
चित्रांकन- दीपक 'मशाल'

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