सोमवार, 19 अक्तूबर 2009

कोई कमी तो रहती होगी.......................................................................

इस कविता के माध्यम से मैंने एक ऐसी लड़की के मन के भावों को उभारने की कोशिश की है जो सामाजिक रीतियों में बंधी होने के साथ स्वयं को पति द्वारा परित्यक्त होने के दंश को झेल रही है और पुरुषवादी समाज द्वारा अपने पर किये गए अत्याचार को भी अपनी ही कोई भूल मान के दुखी है.

छोड़ के तन्हा चले गए तुम
कोई कमी तो रहती होगी
मजबूरी या अविश्वास की
कोई नदी तो बहती होगी.
सात जनम के रिश्ते टूटे
इक बिना किसी सी बात पे
मेरी बातों के जादू में
कोई कमी तो रहती होगी.
मैं अनपढ़ थी पढ़ ना पाई
तुमरे ह्रदय की पाती को
और जो मैंने लिखा था उसमे
कोई कमी तो रहती होगी
वो रात है अब भी ताज़ा मन में
जब फेरे लिए थे हमने सात
पर मेरे मन के फेरों में ही
कोई कमी तो रहती होगी.
हंस के ही बातों बातों में
मुझको तुम बतलाते तो
जो कोई और कमी थी मुझमे
तुम मुझे सिर्फ जतलाते तो
शायद जतलाया भी हो तुमने
पर मैं ही कुछ ना समझ सकी
समझी ना मैं कोई इशारा
कोई कमी तो रहती होगी.
दीपक 'मशाल'

11 टिप्‍पणियां:

  1. स्त्री का यह समर्पण भाव ही है जिसका पुरुष फायदा उठा उसे शोषित करते आये हैं.

    -बहुत सार्थक रचना.

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  2. बखूबी आपने अंतर्मन के परतो को उकेरा है.
    बहुत अच्छे भाव

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  3. इस कविता में स्त्री मन के मूक भावों को पुरुष कवि की कलम से उतरते देखा.
    शायद यही है गहन संवेदनशीलता.

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  4. समझी न मैं कोई इशारा कोई कमी तो रहती होगी
    सच मे औरत का पूरा जीवन पति के इशारे समझने मे ही बीत जाता है फिर भी कई बार न समझ पाने मे दंड भी उसे ही भुगतना पडाता है पति चाहे एक भी इशारा न समझे तो भी वो दोशी नहीं कहलाता कैसी विडंवना है समाज की कविता लाजवाब है शुभकामनायें और आशीर्वाद तुम्हरी कलम दिल को छू लेती है

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  5. koi kami to rahti hogi,
    majboori ya avishwas ki,
    koi nadi to bahti hogi...
    bahut sundar...

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  6. kisi ke mann ki gahraiyon ko yun khojna aur use likhna ......aasan nahi,bahut hi utkrisht bhaw

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