सोमवार, 12 अक्तूबर 2009

बस मांस का पुतला हूँ इक तुम खरीद लो साहिब...


समझ में नहीं आता कि कैसे अचानक मन में ये ख्याल आया कि देह बाज़ार से निकली कोई लड़की अपनी मजबूरी लेके सामने आके खड़ी है, और कुछ इस तरह अपनी मजबूरी बयां कर रही है-

इत्मीनान से देखो मुझे फिर खरीद लो साहिब,
बस मांस का पुतला हूँ इक तुम खरीद लो साहिब.
नख से लेके केश तक कर लो मुआइना मेरा,
पर दिल में मेरे न झांकिए बस खरीद लो साहिब.
ना बेटी, बहिन ना आपकी ना मैं बहू कोई,
जल जायेगा चूल्हा मेरा जो तुम खरीद लो साहिब
मंजूर है जो कुछ समय ज्यादा हो तुमको चाहिए,
जो दे सको देदो मुझे पर खरीद लो साहिब,
भूखी बहिन है घर में औ माँ मेरी बूढी सी है,
मिल जाएँगी दुआएं कई गर तुम खरीद लो साहिब..
दीपक 'मशाल'

12 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन कविता...क्या बात है भाई दिल छू गयी आपकी यह कविता..इसे सामाजिक कविता कहे या क्या पता नही पर भाव कमाल का है....बहुत बहुत धन्यवाद

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  2. बहुत मार्मिक विषय उठाया आपने और उससे भी ज्यादा हृदयवेधी बना दिया अपने कलम से..बेहतरीन

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  3. गरीबी जो कराए...कम है

    मार्मिक रचना

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  4. कविता न कहकर मैं इसे एक विचार कहूंगा ! ऐसा विचार जिसमे एक मजबूर औरत तो अपना शरीर बेच अपनी मजबूरियों को धोना चाहती है मगर गौर करने वाली बात यह है की उसके अनुरोध से पसीजकर कोई मर्द अगर सचमुच उसे खरीदता है तो भले ही वह अपने को उस महिला पर बहुत उपकार करने वाली बात समझ रहा हो मगर उससे नीच इंसान कोई नहीं ! अगर वह वाकई उसपर उपकार कर रहा है तो बिना उसकी देह खरीदे भी उसकी मदद कर सकता है ! खैर, दुनिया का दस्तूर इससे भिन्न ही है, क्या करे !

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  5. सही कहा आपने, जो सच्चा और भला आदमी होगा वो बजाये उसे खरीदने के उसे उसको उसकी सामर्थ्यानुसार कोई रोज़गार देगा, जिससे उसका और उसके परिवार का भरण पोषण हो सके.

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  6. bahut hi maarmik abhivyakti dipak............

    bas khareed lo........... kitna dard hai ismein...........


    saamaajikta ka bhaav liye hai yeh........


    gr8.......


    My article OK is released........ see ma blog

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  7. मोदगिल जी ने सही कहा है लेकिन फिर भी ऐसी बात को उठाने की हिम्मत हर नौजवान नहीं करता हम लोग केवल उन औरतों को कोस सकते हैं ।बहुत अच्छा लगा कि सामाजिक विडंवनायों पर भी आप गहरी नज़र रखते हैं शुभकामनायें

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