शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2009

क्या ब्लॉगजगत का भी यही हाल है????????????

क्या ब्लॉगजगत का भी यही हाल है??? शायद हाँ, शायद ना.... यानि कि अभी तक पूरी तरह से किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा हूँ लेकिन फिर भी इतना तो तय है कि एक वर्ग विशेष के ब्लॉग कि तरफ हमारा कुछ ज्यादा झुकाव रहता है. अरे आप अभी नाराज़ होके डाँटीए तो मत...... मैं देख रहा हूँ ना अभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा,, इस बात पर भी शोध चल रहा है.... तब तक देखिये कि साहित्य जगत में क्या चल रहा है.


<एक लघु कथा का अंत>




" डा. विद्या क्या बेमिसाल रचना लिखी है आपने! सच पूछिए तो मैंने आजतक ऐसी संवेदनायुक्त कविता नहीं सुनी", "अरे शुक्ला जी आप सुनेंगे कैसे? ऐसी रचनाएँ तो सालों में, हजारों रचनाओं में से एक निकल के आती है. मेरी तो आँख भर आई" "ये ऐसी वैसी नहीं बल्कि आपको सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवी वर्मा जी की श्रेणी में पहुँचाने वाली कृति है विद्या जी. है की नहीं भटनागर साब?"
एक के बाद एक लेखन जगत के मूर्धन्य विद्वानों के मुखारबिंद से निकले ये शब्द जैसे-जैसे डा.विद्या वार्ष्णेय के कानों में पड़ रहे थे वैसे वैसे उनके ह्रदय की वेदना बढ़ती जा रही थी. लगता था मानो कोई पिघला हुआ शीशा कानों में डाल रहा हो. अपनी तारीफों के बंधते पुलों को पीछे छोड़ उस कवि-गोष्ठी की अध्यक्षा विद्या अतीत के गलियारों में वापस लौटती दो वर्ष पूर्व उसी स्थान पर आयोजित एक अन्य कवि-गोष्ठी में पहुँच जाती है, जब वह सिर्फ विद्या थी बेसिक शिक्षा अधिकारी डा.विद्या नहीं. हाँ अलबत्ता एक रसायन विज्ञान की शोधार्थी जरूर थी.
 शायद इतने ही लोग जमा थे उस गोष्ठी में भी, सब वही चेहरे, वही मौसम, वही माहौल. सभी तथाकथित कवि एक के बाद एक करके अपनी-अपनी नवीनतम स्वरचित कविता, ग़ज़ल, गीत आदि सुना रहे थे. अधिकांश लेखनियाँ शहर के मशहूर डॉक्टर, प्रोफेसर, वकील, इंजीनियर और प्रिंसिपल आदि की थीं. देखने लायक या ये कहें की हँसने लायक बात ये थी की हर कलम की कृति को कविता के अनुरूप न मिलकर रचनाकार के ओहदे के अनुरूप दाद या सराहना मिल रही थी. इक्का दुक्का ऐसे भी थे जो औरों से बेहतर लिखते तो थे लेकिन पदविहीन या सम्मानजनक पेशे से न जुड़े होने की वजह से आयाराम-गयाराम की तरह अनदेखे ही रहते. गोष्ठी प्रगति पे थी, समीक्षाओं के बीच-बीच में ठहाके सुनाई पड़ते तो कभी बिस्कुट की कुरकुराहट या चाय की चुस्कियों की आवाजें. शायद उम्र में सबसे छोटी होने के कारण विद्या को अपनी बारी आने तक लम्बा इन्तेज़ार करना पड़ा. सबसे आखिर में लेकिन अध्यक्ष महोदय, जो कि एक प्रशासनिक अधिकारी थे, से पहले विद्या को काव्यपाठ का अवसर अहसान कि तरह दिया गया. 'पुरुषप्रधान समाज में एक नारी का काव्यपाठ वो भी एक २२-२३ साल की अबोध लड़की का, इसका हमसे क्या मुकाबला?' कई बुद्धिजीवियों की त्योरियां खामोशी से ये सवाल कर रहीं थीं.
वैसे तो विद्या बचपन से ही कविता, कहानियां, व्यंग्य आदि लिखती आ रही थी लेकिन उसे यही एक दुःख था की कई बार गोष्ठियों में काव्यपाठ करके भी वह उन लोगों के बीच कोई विशेष स्थान नहीं अर्जित कर पाई थी. फिर भी 'बीती को बिसारिये' सोच विद्या ने एक ऐसी कविता पढ़नी प्रारंभ की जिसको सुनकर उसके दोस्तों और सहपाठियों ने उसे पलकों पे बिठा लिया था और उस कविता ने सभी के दिलों और होंठों पे कब्ज़ा कर लिया था. फिर भी देखना बाकी था की उस कृति को विद्वान साहित्यकारों और आलोचकों की प्रशंसा का ठप्पा मिलता है या नहीं.
तेजी से धड़कते दिल को काबू में करते हुए, अपने सुमधुर कन्ठ से आधी कविता सुना चुकने के बाद विद्या ने अचानक महसूस किया की 'ये क्या कविता की जान समझी जाने वाली अतिसंवेदनशील पंक्तियों पे भी ना आह, ना वाह और ना ही कोई प्रतिक्रिया!' फिर भी हौसला बुलंद रखते हुए उसने बिना सुर-लय-ताल बिगड़े कविता को समाप्ति तक पहुँचाया. परन्तु तब भी ना ताली, ना तारीफ़, ना सराहना और ना ही सलाह, क्या ऐसी संवेदनाशील रचना भी किसी का ध्यान ना आकृष्ट कर सकी? तभी अध्यक्ष जी ने बोला "अभी सुधार की बहुत आवश्यकता है, प्रयास करती रहो." मायूस विद्या को लगा की इसबार भी उससे चूक हुई है. अपने विचलित मन को सम्हालते हुए वो अध्यक्ष महोदय की कविता सुनने लगी. एक ऐसी कविता जिसके ना सर का पता ना पैर का, ना भावः का और ना ही अर्थ का, या यूँ कहें की इससे बेहतर तो दर्जा पांच का छात्र लिख ले. लेकिन अचम्भा ये की ऐसी कोई पंक्ति नहीं जिसपे तारीफ ना हुई हो, ऐसा कोई मुख नहीं जिसने तारीफ ना की हो और तो और समाप्त होने पे तालियों की गड़गडाहट थामे ना थमती.
साहित्यजगत की उस सच्ची आराधक का आहत मन पूछ बैठा ''क्या यहाँ भी राजनीति? क्या यहाँ भी सरस्वती की हार? ऐसे ही तथाकथित साहित्यिक मठाधीशों के कारण हर रोज ना जाने कितने योग्य उदीयमान रचनाकारों को साहित्यिक आत्महत्या करनी पड़ती होगी और वहीँ विभिन्न पदों को सुशोभित करने वालों की नज़रंदाज़ करने योग्य रचनाएँ भी पुरस्कृत होती हैं.'' उस दिन विद्या ने ठान लिया की अब वह भी सम्मानजनक पद हासिल करने के बाद ही उस गोष्ठी में वापस आयेगी.
वापस वर्तमान में लौट चुकी डा. विद्या के चेहरे पर ख़ुशी नहीं दुःख था की जिस कविता को दो वर्ष पूर्व ध्यान देने योग्य भी नहीं समझा गया आज वही कविता उसके पद के साथ अतिविशिष्ट हो चुकी है. अंत में सारे घटनाक्रम को सबको स्मरण कराने के बाद ऐसे छद्म साहित्यजगत को दूर से ही प्रणाम कर विद्या ने उसमें पुनः प्रवेश ना करने की घोषणा कर दी. अब उसे रोकता भी कौन, सभी कवि व आलोचकगण तो सच्चाई के आईने में खुद को नंगा पाकर जमीन फटने का इन्तेज़ार कर रहे थे.

दीपक 'मशाल'
चित्रांकन- दीपक 'मशाल'

27 टिप्‍पणियां:

  1. दीपक जी बेहतरीन लिखा है आपने | यही तो विडम्बना है ... ऐसा साहित्य मैं भी होता है तो तकलीफ होती है ...

    मुझे लगता है मैं आपका इशारा समझ रहा हूँ .... खैर वो फिर कभी ...

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  2. प्रिय दीपक,
    दिनों-दिन तुम्हारी सच बोलने की आदत और बे-बाकपन पसंद आ रहा है....ये साहित्यिक मठाधीश हर जगह मिलेंगे जोअपना वर्चस्व न जाने कितने उदीयमानों की बलि चढाकर ही बनाये रखते हैं....ऐसे मठाधीशों से दो-चार तो हम होते ही रहते हैं पर अफ़सोस.....इनकी तूती के आगे सच की वाणी मौन होकर मूक हो जाती है...
    बहुत की ओजपूर्ण आलेख....शायद यह कुछ आँखें खोल कर उन्हें खुला रख पाए...
    आर्शीवाद...
    दीदी

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  3. कितना ज्यादा सच कहोगे भाई..किसी को चुभ सकता है.यह तो तुम्हारी मंशा नहीं...है न!

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  4. समीर अंकल, मैं उनसब से माफ़ी मांगता हूँ जिनके दिलों को ये बात चुभी हो, मेरा मकसद सिर्फ स्वस्थ ब्लोगींग और साहित्य को सामने लाना है, किसी का दिल दुख के नहीं.

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  5. दीपक भाई,
    ब्लॉग जगत में ये एक बड़ा सकारात्मक बदलाव है कि खुल कर सच कहा जाने लगा है और पसंद भी किया जाने लगा है...टिप्पणियों में भी... मैं तूझे पंत कहूं, तू मुझे निराला...वाली सोच से लोग आगे बढ़ने लगे है...वैसे इसे तो आपकी पोस्ट वाली बेसिक शिक्षा अधिकारी विद्या जैसों के लिेए ही छो़ड़ देना चाहिए...

    जय हिंद...

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  6. दीपक यार,
    एक बात और, अपने समीर जी एवरग्रीन गबरू हैं, उनके साथ अंकल लगाना जमता नहीं है...क्यों गुरुदेव (समीरजी) सही कह रहा हूं न...


    जय हिंद...

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  7. आप तो लिखते रहिये बस...बाकी यूँ ही चलता रहेगा...

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  8. समीर अंकल नहीं हैं वे तो बस "समीर लाल उड़नतश्तरी वाले" कृपया अंकल न कहें ऐसा लगता है फ़िर कि यह कहानी में आ गये हैं कि ओहदो के साथ तवज्जो दी जाती है। :)

    कटु सत्य और अनुभवी भी हूँ, नाट्य जगत में भी ऐसा ही होता है।

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  9. सत्य को इसी साहित्यिक तरीके से लाया जाना चाहिए। सुंदर,शिव लेखन के लिए बधाई!

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  10. hmm.... aapka sandesh saaf hai aur kaphi had tak sacchai hai is baat mein... satya likhne ke liye aapki lekhnee ko salaam...

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  11. दीपक जी आपकी रचना को ध्यान से पढ़ा मैंने ....एक बात कहूँ कुछ वर्ष पहले मेरी भी सोच कुछ ऐसी ही थी .....पर जिसे हम बेसिर पैर की कविता समझते हैं वह वास्तव में बहुत गहरे अर्थ लिए होती हैं पर हम उस कवि की सोच तक नहीं पहुँच पाते ....मुक्ति बोध जी की कवितायेँ जब मैंने पढ़ी तो मुझे भी ऐसा ही लगा था ....पर आज पढ़ती हूँ तो बहुत गहरे अर्थ दे जातीं हैं ....हाँ ब्लॉग जगत कुछ लोग यूँ ही तारीफ कर देते हैं पर इससे भी रचनाकार को लिखने का प्रोत्साहन मिलता है तो हर्ज क्या है .....!!

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  12. प्रिय दीपक तुम्हारा गध्य पहली बार पढा ।अच्छा लगा । यह लघुकथा भी है और इसमे ललित निबन्ध और व्यंग्य दोनो का समावेश है । इसे संस्मरण की विधा के अंतर्गत भी रखा जा सकता है और डायरी की भी । यही तुम्हारी विशेषता है । इस कथा के इतने आयाम हो सकते हैं थोडे थोडे से परिवर्तन से । मुश्किल यही है कि हमारे बहुत सारे वरिष्ठ ( हाँ मेरे भी वरिष्ठ हैं ) "अभी सुधार की आवश्यकता है " कह्ते हैं लेकिन क्या सुधार करना है यह नहीं बताते । एक समय था कि इस तरह की गोष्ठियाँ हुआ करती थीं जहाँ एक नवोदित रचनाकार की रचनाओं को लेकर समीक्षा हुआ करती थी । अब सब अपनी सुनाने मे लगे रहते है दूसरे की कोई सुनना नही चाहता । यह हमारा सौभाग्य है कि ब्लॉग जगत मे अब यह परम्परा शुरू हो गई है क्योंकि यहाँ अभिव्यक्ति के अलावा समीक्षा की स्वतंत्रता है और एक स्थान पर एकत्रित होकर कहने या समय की बाध्यता भी नही है । मैने इसी उद्देश्य को लेकर ब्लॉग "आलोचक" की शुरुआत की है और कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों से भी निवेदन किया है कि वे नये ( और पुराने भी) रचनाकारों की रचनाओं पर समीक्षात्मक बात करें । उम्मीद है हम सब मिलकर हिन्दी ब्लॉगिंग में साहित्य और साहित्येतर विषयों को भी ऊंचाइयो तक ले जा सकेंगे ।-शरद कोकास

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  13. आपने महसूस किया! तभी लिखा होगा। पर...
    अपना लेखन ज़ारी रखिएगा। लेखन दिशा होती है।

    शरद कोकास जी की बात गौर करने वाली है।

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  14. अंकल.....सुनकर भी खुश हो लेता हूँ कि चलो, दादा जी तो नहीं कहा,,..हा हा!! :)

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  15. हरकीरत जी मैं आपकी बात से काफी हद तक सहमत हूँ, क्योंकि साहित्य जगत की सभी विधाओं की समझ एक नौसिखिये को नहीं हो सकती, लेकिन फिर भी कुछ लोग ऐसे लिखने वाले होते हैं जैसे की मॉडर्न आर्ट के नाम पे जलेबी बना के उलझन शीर्षक देने वाले... लेकिन मैं उन लोगों के लिए ही कह रहा हूँ जो सिर्फ शब्दों को उल्टा सीधा लिख देना ही कविता समझते हैं. हमारे समाज में ऐसे भी कुछ लोग मिल ही जाते हैं. आप से आशा करता हूँ की इसी तरह आके मुझे भटकने से बचाती रहेंगी.
    गुरुदेव शरद जी का वरद हस्त ऐसे ही हमेशा अपने सर पर चाहता हूँ जिससे की मेरी सोच और लेखन दोनों का विकास हो सके.
    समीर जी आप को अब अंकल नहीं कहूँगा, आपने वही बात की जो भंते आनंद ने बुद्ध से कही थी की यदि कोई मुझे गाली दे तो समझूंगा की ये बहुत भला आदमी है जिसने मुझे पीटा तो नहीं, पीट दे तो सोचूंगा की चलो हाथ पैर तो नहीं तोडे, यदि तोड़ दिए तब सोचूंगा की जान से तो नहीं मारा इसलिए ये एक सज्जन है, और यदि जान से मार दिया तो उसको इसलिए धन्यवाद् दूंगा की उसने मुझे धर्म का कार्य करते समय इस नश्वर देह से मुक्ति दी है और मोक्ष का द्वार दिखाया है, वो मेरे लिए एक आदर्श गुरु है.

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  16. अंकल, गबरू, गुरु दादा..........क्या क्या न सितम सहे तेरे लिए:)
    रही बात गुटबाज़ी की, तो बात यह है कि सभी लोग सभी ब्लाग नहीं न पढ सकते, तो अपने प्रिय ब्लाग चुन लेते है, फ़ालो करते हैं...इसमें गुटबाज़ी देखना शायद अनुचित हो!!!

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  17. भैया दीपक, कविता के मामले में तो यही कहा जा सकता है की कविता पाठ में न सिर्फ सामग्री बल्कि प्रस्तुतीकरण और आत्मविश्वास भी देखा जाता है. हो सकता है की विद्या के साथ भी यही रहा हो.
    मेरा तो मानना है की आदमी हमेशा सीखता ही रहता है अंत तक. कभी पूर्ण ज्ञानी होने का दावा नहीं कर सकता.
    वैसे आपकी बात में कुछ तो सच्चाई भी है.

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  18. अमित मिश्रा23 अक्तूबर 2009 को 8:20 pm

    मशाल जी काफी हद तक सच लगती है आपकी बात लेकिन कुछ और भी कारन हो सकते हैं... वैसे लघुकथा अच्छी बनी है.

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  19. श्री समीर लाल दादा जी से सहमत ।

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  20. यकीन मानिये, ये लघुकथा सिर्फ एक सोच है किसी घटना से प्रभावित नहीं, न ही कभी मेरे साथ ऐसा हुआ और न किसी ने इस तरह की आप बीती सुनाई.

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  21. ek hakikat likhi hai...vaise ye to shuru se chalta aaya hai..jiske pas takat hai uski hi chalti hai....Dipak is system ko todne ke liye ek will power ki zarurat hai....hum sirf likhte hai...padhte hai...affsos jata dete hai...koi aage nahi aata..sab sochte hai change aaye par BALIDAN khud nahi koi dusra de....sab safe side search karte hai...isliye KALAM ki takat ko PRACTICAL life mai bhi shamil karo....mai itna hi bolungi....ki koshish karo khud apne VICHARO par kayam raho...khud ko change mat karo..system khud sahi ho jayega....

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  22. कितने सुन्दर तरीके से आपने सत्य को उजागर कर दिया....वैसे अधिकांश लोग इस चलन से भली भान्ती परिचित हैं...किन्तु शायद कुछ स्वार्थ आडे आ जाते हैं कि लोग न तो सत्य ही कह पाते हैं ओर न ही इस परम्परा के विरूद्ध चलने का साहस ही दिखा पाते हैं...

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  23. दिल का हाल कहे दिलवाला,
    सीधी सी बात न मिर्च-मसाला।

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  24. कथा के माध्यम से साहित्यजगत मे फैली गुटबाजी और अहंकार को बहुत सशक्त ढंग से लिखा है । वाकई आज साहित्यकारों मे अहं की भावना इतनी बढ गयी है कि जायज़ नाजायज़ तरीके से वो अपने से अच्छे और कर्मनिष्ठ शब्द शिलपियों को आगे नहीं निकलने देते। बस चुपचाप अपना काम करते रहो। कभी जरूर आपके शब्द गूँज गूँज कर अपनी कहानी खुद सुनायेंगे। बहुत अच्छे जा रहे हो ।अशीर्वाद्

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