शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

क्षणिकाएं


आता यकीं नहीं उसको, मुलजिम की बेगुनाही का
दीवारों से पूछता है फिरता, किस्सा गवाही का 
नज़र मिला ना पाया हाकिम फैसले के बाद 
रंग उड़ा-उड़ा सा था लगा, उसकी सियाही का


बादलों के ये किनारे ज़र्द जैसे पड़ रहे हैं
ये पल वक़्त की चट्टान पे मूरत कोई गढ़ रहे हैं 
तुम्हें अब भी यकीं नहीं कि साए हमारे बोलते हैं
देखो सूरज डूबते ही ये अँधेरे से लड़ रहे हैं.
दीपक मशाल 



गुरुवार, 3 नवंबर 2011

दुनिया गोल है-------->>>दीपक मशाल

मेरी अपनी जिन्दगी में जब पहली बार किसी ने कहा था कि 'भाई, दुनिया गोल है' तो इस बात के पीछे छिपा गूढ़ रहस्य उस समय उजागर नहीं हुआ था. बस मन में कुछ-कुछ ऐसा ही ख्याल आया था कि इसमे कौन सी नई बात कह दी या 'ये भी कोई मुहावरा हुआ?' अब दुनिया गोल है तो है इस बात को सिद्ध हुए कई दशक गुजर गए..ये तो कई साल बाद पता चला कि इस उक्ति के जितने चाहे मतलब निकाल लो.. आपकी सोच को नींद आ जायेगी लेकिन 'दुनिया गोल है' के मायने निकलते चले जायेंगे..
हाँ जी भाईसा'ब एकदम सही कह रिया हूँ.. तभी ना हम सब गोला बना रहे हैं.. अजी सीधा सा मतलब है.. गोला बनाने का कोई गोल मतलब नहीं और मतलब यह है कि इस दुनिया में हम सभी एक दूसरे के पीछे भाग रहे हैं. अब आप लोग कहीं यह ना समझाने लगना कि 'अबे बेवकूफ, दुनिया गोल है तब कहते हैं जब कोई बार-बार टकराता है या फिर किसी अन्जान व्यक्ति से मिलने पर पता चलता है कि यह हमारे किसी करीबी के माध्यम से पहले ही हमसे जुड़ा हुआ है और हमको भनक तलक नहीं जी.... इसीलिए मैंने पहले ही यह यूनिवर्सल ट्रुथ आपके सामने लिख दिया कि 'दुनिया गोल है' के अर्थ भी गोले के छोर के जितने निकलते हैं(आदर्श परिस्थितियों में यहाँ तुलना लोहे के गोले से है ना कि ऊन के).. अब इस गोल दुनिया में मुझे सभी एक दूसरे के पीछे भागते हुए नज़र आ रहे हैं.. लोग हमारे पीछे और हम लोगों के पीछे.. एक समाज दूसरे के पीछे और दूसरा पहले के.. एक देश दूसरे के और दूसरा पहले के.. यह पिछलग्गूपन का खेल अनंतकाल से चला आ रहा है, अभी भी जारी है और आगे भी रहेगा इस बात की प्रबल संभावना है.. कृपया अचंभित ना होवें अगर आगे की सदी में पता चले कि यह खेल सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय नहीं बल्कि अंतर्ब्रह्मांडीय है.. धरती वाले किसी और ग्रह की नक़ल में लगे थे जो दूर से दूरबीन लेकर हमारी नक़ल में लगे थे.. 
जग-जाहिर है कि पश्चिमी देश भारत के और भारत पश्चिमी देशों के पीछे भाग रहा है.. अभी तक सिर्फ सभ्यता, आयुर्वेद, योग आदि तक सीमित था लेकिन अब तो नौकरी तक पर बात आ गई.. इन तथाकथित विकसित देशों के बड़े-बड़े अधिकारी बंगलौर और हैदराबाद जैसे शहरों की ख़ाक छानने को तैयार बैठे हैं.. इंटरव्यू देने के लिए कतार में खड़े हैं भाई लोग.. हम कितना ही उन्हें बहलाते हैं कि ''कृपया प्रतीक्षा करें, आप कतार में हैं'' लेकिन भाई लोग हैं कि कलेऊ बाँध कर टिके हुए हैं.
कतार से याद आया कि विदेशी हमारा मजाक बनाते हैं कि हिन्दुस्तान में संडास के बाहर सुबह-२ लम्बी लाइन लगती देखी जाती हैं.. लेकिन ये साहब तब भूल जाते हैं जब शाम को ये खुद कतार में लगे होते हैं दौड़ने वाली मशीनों पर चढ़ने के लिए.. अब कतार तो कतार हुई ना और देखने वाली बात यह है कि दोनों ही दशाओं में चेहरे पर आते-जाते भाव आपस में बड़ी भयंकर समानता रखते हैं..
वैसे अमीर देश के गरीब नागरिकों का बेचारों का एक ही सपना होता है कि अपने देश के उद्योगपतियों को विश्व के सबसे धनी व्यक्ति बनता देखें.. वो बनकर भी खुश नहीं होते और ये नागरिक बेचारे उन्हें बनते देखकर ही खुश हो लेते हैं.. बदले में अपनी दाल-रोटी की खातिर कैलोरी जलाते हैं जबकि विकसित देशों में इसके उलट है.. पहले वो जमके घी-दूध खाते हैं उसके बाद कैलोरी जलाने के लिए पैसे खर्च करते हैं..
हम जिस साइकिल को देखकर यह कहते हुए नाक-भौं सिकोड़ लेते हैं कि यह तो गरीबों की सवारी है या फिर मुलायम की.. उसी साइकिल से ये विकसित देश वाले इतना प्यार करते हैं कि बस पूछो मत.. ये साइकिल चलाते हैं शौक़ से.. अपने स्वास्थ्य के लिए.. कई-कई दफा तो इनकी साइकिल हमारी मोटरसाइकल से महँगी होती है और मोटरसाइकल हमारी कार से महँगी.. और कुछ साल पुरानी कार देखो तो एक पुराने स्कूटर के बराबर दामों में मिल जाते है.. अज़ब ही किस्सा है जहाँपनाह क्या किया जाए.. 
कल ही यहाँ स्पार(किराने की बड़ी दुकानों में से एक) में पता चला कि ब्रेड का एक पैकेट १.७२ पाउंड का और अगर दो लेते हैं तो १.६० पाउंड के.. सुनकर सर चकराया और मन ने यही दोहराया कि ''दुनिया गोल तो है ही यह भी सही है कि ये दुनिया खूब है..''
हमने सदियों तक जी भरकर ता-ता-थैया किया अब उन्हें भरतनाट्यम चाहिए और हमें सालसा, बैले नृत्य में रमने को मांगता.. देख लीजिये सबकुछ गोल-गोल घूम रहा है कि नहीं.. इतने से जी ना भरे तो अपने आसपास की किसी भी चीज.. जिसकी की तुलना आप कर सकें या कि हो सके, आप करके देखिये खुद ही सब गोल-गोल घूमता नज़र आएगा..
दीपक मशाल
(व्यंग्य नवम्बर २०११ के गर्भनाल अंक ६० में प्रकाशित)

शनिवार, 16 जुलाई 2011

इस बार का भारत प्रवास--------------->>> दीपक मशाल

इस बार जब भारत आया तो यू.के. से वहाँ पहुँचने के दो दिन के अन्दर बचपन में भूगोल की कक्षा में पढाये गए सारे यातायात के महत्वपूर्ण साधन प्रयोग कर डाले.. जल मार्ग, वायु मार्ग से लेकर थल मार्ग तक और थल मार्ग में भी रेल मार्ग एवं सड़क मार्ग.. इनके भी विस्तार में जाएँ तो ट्रेन, मेट्रो, बस, कार, जीप, ऑटो-रिक्शा, रिक्शा, मोटरबाइक, साइकल सभी. 
इधर बहुत सारे नए तजुर्बों से मुलाक़ात हुई जो अब बेताब हो रहे हैं किस्से-कहानियों, संस्मरण तो कुछ कविता के रूप में कागज़ पर उतरने को. कई हिन्दी-साहित्य, ब्लॉग के महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों से मुलाक़ात तो हुई ही साथ ही मुलाक़ात हुई अपने जीवनसाथी से और चट मंगनी पट ब्याह भी हो गया. हालांकि इस दौरान कुछ दुखद घटनाओं ने रास्ता रोकने की कोशिश भी की और यही वजह रही कि अधिकाँश दोस्तों से ना दुःख बांटा और ना ही खुशी. प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से आप सभी की दुआएं मिलती रहीं.. कह सकते हैं कि इस सब के बावजूद ब्लॉग की दुनिया से अलग नहीं रहा क्योंकि घर में ही एक ब्लॉगर मौजूद हैं... जी हाँ ब्लॉगर श्री संजय कुमार चौरसिया जी जो कि रिश्ते में मेरे बहनोई भी हैं, हर सुख-दुःख में मेरे कन्धे से कन्धा मिलाते हुए मेरे साथ ही रहे.
इसके अलावा विश्व भर की नामी-गिरामी हिन्दी-साहित्यिक, गैरसाहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से अपनी रचनाओं को प्रसारित करने के द्वार खुले साथ ही यह सबक भी मिला कि ''जो छप गया वह जरूरी नहीं कि अच्छा ही हो और जो नहीं छपा वह भी जरूरी नहीं कि बुरा हो..'' 
कहने को आया तो था सिर्फ १५ दिन के लिए लेकिन अचानक जो कुछ हुआ उसकी वजह से ४० दिन रुकना हो गया और गर्मी से बरसात तक का लम्बा प्रवास हो गया.
प्रवास के दौरान करीब ८-९ दिन घर पर यानी कोंच-उरई में, २ दिन आगरा में, २५ दिन लखनऊ और ३ दिन दिल्ली में रहना हुआ. भारत में जहाँ एक ओर लखनऊ के बेहतरीन ब्लोगर्स और लेखक-पत्रकारों से मिलना हुआ वहीं 'खाकी में इंसान' के लेखक श्री अशोक कुमार जी का लखनऊ आकर मिलना सुखद रहा. उरई में डॉ.कुमारेन्द्र चाचा जी और डॉ.आदित्य जी से पुनर्मिलन हुआ.. फिर सिद्धार्थ नगर जाकर श्री पंकज सुबीर जी, राहत इन्दौरी साहब, गौतम राजरिशी भाई, प्रकाश 'अर्श', रविकांत, वीनस केसरी, कंचन सिंह चौहान, अंकित 'सफ़र', विजित से मुलाक़ात की शाम हो चाहे गिरिजेश राव जी से मिलना रहा हो या फिर दिल्ली में दर्पण साह 'दर्शन' और शीबा असलम फ़हमी से संक्षिप्त मुलाक़ात सभी एक अविस्मरनीय घटना के रूप में दिलोदिमाग में सुरक्षित हो गए. 
वापस आते हुए १ दिन-रात लन्दन में रुका जहाँ एक लम्बा समय श्री समीर लाल जी के साथ गुजारने का मौक़ा मिला, ब्लॉग और हिन्दी-साहित्य दोनों में समान दखल रखने वाले समीर जी को और भी करीब से जानने का मौक़ा मिला. हिन्दी-साहित्य की दैदीप्यमान नक्षत्र आदरणीया कविता वाचक्नवी जी का प्रेमपूर्ण सानिध्य रहा और एक बार फिर शिखा दी के आतिथ्य सुख को भोगने का मौक़ा भी मिला. 
दीपक मशाल

सोमवार, 16 मई 2011

कवि शरद कोकास को सृजन सम्मान २०११

वैसे खबर थोड़ी पुरानी है लेकिन इतनी भी नहीं की उसे सुनकर खुशियाँ न मनाई जा सकें और सम्बंधित हस्ती को बधाई न दी जा सके...
कुछ दिन पहले ही पता चला कि पहले कवि और अब ब्लोगर यानी कि ब्लॉग पर उपस्थित हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ कवियों में से एक श्री शरद कोकास जी को कविता के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान के लिए वर्ष २०११ का 'सृजन सम्मान' प्रदान किया गया है. यह हम सभी हिन्दी ब्लोगर साथियों के लिए गर्व का विषय है.

श्री शरद कोकास जी जिनको मैं कविता के क्षेत्र में अपना गुरु भी मानता हूँ और भी कई ब्लोगर साथियों का, जो कि कविता सीखने की ललक रखते हैं, समय-२ पर मार्गदर्शन करते रहते हैं. ज्ञातव्य है की शरद जी की पहल पत्रिका द्वारा प्रकाशित लम्बी कविता 'पुरातत्ववेत्ता' पर भी हाल ही में समीक्षा की एक पुस्तक विमोचित हुई थी. पुरातत्ववेत्ता वास्तव में ऐसी कविता है जो कविता के प्रशिक्षार्थियों के लिए सम्पूर्ण ट्यूटोरियल साबित होती है.

आप यहाँ उनके नाम पर चटका लगाकर उनके ब्लॉग शरद कोकास  पर पहुँच कर बधाई दे सकते हैं..

दीपक मशाल 

शनिवार, 7 मई 2011

कहीं हो न जाए दिग्विजय सिंह की जूतों से मरम्मत..

बहुत कम ऐसे नेता होंगे जिनके कुकृत्यों की वजह से उनकी सूरत(कूरत कह सकें तो बेहतर) मात्र से ही हमें नफरत हो जाए.. दिग्विजय सिंह कांग्रेस के ऐसे ही नेताओं में से है. सच है यह दिग्विजय सिंह आज तक किये गए अपने कामों से सिर्फ नफरत के लायक ही लगता है. जाने क्यों लगता है की बहुत जल्द ही कहीं इसे सड़क पर रोक इसकी जूतों से मरम्मत न कर दी जाए.
इस घटिया नेता की हर बयानबाजी सिर्फ सुर्खियाँ बटोरने के लिए होती है यह अब हर वो व्यक्ति जान गया है जो कांग्रेस का अंधभक्त नहीं है. कभी-२ तो लगता है कि यह व्यक्ति उन लोगों में है जो अपने भले के लिए, वोटबैंक के लिए अपनी माँ को भी सरेआम गालियाँ दे दे. एक वर्ग विशेष के कुछ विचित्र मानसिकता वाले लोगों को खुश करने के लिए जो एक दुर्दांत आतंकवादी को जी कह कर संबोधित कर सकता है वह कुछ भी कर सकता है.

कांग्रेस भी इसका इस्तेमाल सिर्फ निजी हित के लिए करती हुई लगती है. ठीक एक क्रिकेट मैच के आखिरी पंक्ति के बल्लेबाज की तरह जिसको कि ९वें विकेट गिरने के बजाय दूसरे विकेट गिरने पर ही मैदान में उतार दिया कि चल जाए तो कम नहीं, खो जाए तो ग़म नहीं.. वैसे दिग्विजय सिंह की औकात कांग्रेस में एक दोयम दर्जे के नेता से ज्यादा नहीं, जिसको कि खुली छूट है कि कभी भी कुछ भी भौंको.. खुल्लमखुल्ला कुछ भी बोलने की इज़ाज़त है, वो सब जिससे कि कांग्रेस का वोटबैंक मजबूत हो. लोग भड़क जाएँ और हमारे साथ आ जाएँ तो अच्छा वर्ना अगर उल्टा परिणाम दिखे तो दिखावे के लिए दिग्विजय को महासचिव पद से हटा दो. लेकिन असलियत में उसपर कांग्रेसी दिग्गजों का वरदहस्त रहेगा. कांग्रेस आलाकमान द्वारा हमेशा उसका वैसे ही ख्याल रखा जाएगा जैसे शिवराज पाटिल को राज्यपाल बना और विलासराव देशमुख को केंद्र सरकार में मंत्री बना रखा जा रहा है. भले ही लोगों की नज़र में तुरत-फुरत कुछ भी कर दिया जाए, शायद यही वह आश्वासन है जो दिग्विजय सिंह को गन्दगी उगलने में सहायक है.

दूसरी तरफ बुंदेलखंड को लेकर खेली जा रही कांग्रेस की राजनीति साफ़ ज़ाहिर है, जहाँ दिग्विजय ने मनमोहन-राहुल की चुनावी तैयारी वाली सभा की पूर्वसंध्या पर कांग्रेस को बुंदेलखंड का समर्थक बताया और अगले दिन बड़े कांग्रेसियों ने उसका मुँह बंद करा कर स्टेज पर चुप्पे बैठे रहने दिया, जैसे कह दिया हो कि, ''ज्यादा ची-चपाड़ की तो उतार देंगे अभी मंच से नीचे.. उतना ही बोला करो जितना कि हम लोग कहें, ज्यादा अपने घुटने मत लगाया करो..''. और इसी तरह आज़ादी के बाद से ही पृथक बुंदेलखंड के नाम पर इस अतिपिछड़े खण्ड के निवासियों को कांग्रेस द्वारा निरंतर छला जा रहा है. इस बार भी महासेवक मनमोहन सिंह ने बुंदेलखंड की मदद करके अहसान सा किया और उसका श्रेय भी सार्वजनिक मंच पर चढ़ कर अपने छोटे मालिक और बड़ी मालकिन को दे दिया. यह बात हमें जल्द ही समझ लेना चाहिए की उत्तरप्रदेश जैसे प्रदेशों के पिछड़े होने का एक कारण बड़ा प्रदेश होना भी है, जिसको एक साथ बेहतर प्रशासन देने के लिए छोटा राज्य बनाया ही जाना चाहिए.
सोनिया गांधी एक तरफ तो भली, ईमानदार, लौह नेता बनने की नौटंकी फैला रही हैं दूसरी तरफ चुपचाप पीछे से भ्रष्टाचार, शोषण और अनर्गल मगर वोटखेंचू बयानबाजी को सह दे रही हैं. सच है कूटनीति बड़े अच्छे से सीख गई हैं कांग्रेस अध्यक्ष.
दीपक मशाल 

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

कुछ और लघुकथाएं------>>> दीपक मशाल

आपने पिछली पोस्ट की तीन लघुकथाएं पढ़ीं और सराहा उसके लिए आपका शुक्रगुज़ार हूँ.. एक गुजारिश है की जहाँ भी कमियाँ लगें निःसंकोच टोक दें, मैं कोशिश करूंगा की लेखन को आपके सुझावों, मार्गदर्शन के अनुसार बेहतर करून. 
आज तीन लघुकथाएं और पेश कर रहा हूँ, जिनको कि अपने हिन्दी ब्लोगर साथियों को समर्पित करता हूँ(आपमें से कुछ जो इन्हें साहित्यिक पत्रिका पाखी में पहले ही पढ़ चुके हैं उन्हें पुनः पढ़वाने के लिए क्षमा मांगता हूँ..)..

गाहक
जाड़े से कांपते लल्लू ने स्टोव पर दूध चढ़ा दिया और पिछली रात के गाहकों के गिलास-प्लेट मांजने में लग गया. गिलास पोंछ कर ठेले पर सजा ही रहा था कि सामने से आवाज़ आई 'लल्लू, एक चाय तो पिला कड़क सी.'
लल्लू ने भारी भरकम काले जूते और खाकी पेंट पहने उस गाहक को टके सा जवाब दे दिया, 'ज़रा ठहरो सा'ब सबेरे से बोहनी ना ख़राब करो'

न्याय
सब खुश थे, सबको न्याय मिलने लगा था. कुछ न्यायाधीश बिके हुए निकले तो क्या लोगों को अब भी भरोसा था कि जैसे इतनों को न्याय मिला वैसे जल्द ही उन्हें भी मिलेगा. कलावती को भी लगने लगा था कि दबंगों ने उसकी जो ज़मीन हथियाई थी वो वापस मिलेगी, उसकी आस और पक्की हो गई थी कि उसके मरद के हत्यारों को फांसी चढ़ाया जाएगा. 
वकील साब ने इस बार की पैरवी की फीस लेते हुए बताया था कि किसी जेसिका और नीतिश कटारा के हत्यारों को सज़ा मिल चुकी है जल्द ही उसे भी इन्साफ मिलेगा.
सुनकर कलावती को मजदूर पति की आखिरी निशानी बेंच देने का गम कुछ कम हुआ. फिर से हौसला हुआ.
उसे क्या पता था कि जिसे इन्साफ मिला उनमें एक हाई-प्रोफाइल मॉडल थी और दूसरा आई.ए.एस. का बेटा.

मूली और मामूली 
गली में छुट्टा घूमने वाला वो नगर पालिका का सांड कुछ दिनों से अचानक ही अजीब स्वभाव का हो चला था. बेवजह किसी के भी पीछे नथुने फुलाकर दौड़ पड़ता. अभी पिछले हफ्ते तो उसने मोहल्लेवालों का बड़ा मनोरंजन किया जब एक मामूली हाथ ठेलावाले के ठेले पर लदी हरी सब्जी के दो-तीन गट्ठे खा गया और रोकने पर अपने खतरनाक सींगों के दम पर उस गरीब को दूर तक खदेड़ दिया.
मगर आज नगरपालिका वाले उसे पकड़ कर ले ही गए. हद ही हो गई उसने सब्जी खरीद कर लौट रहे सभासद के चाचा की डोलची से मूली जो खा ली थी.
दीपक मशाल 
(सभी चित्र साभार गूगल इमेज से लिए गए)

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

तीन लघुकथाएं---------->>>दीपक मशाल

आप सबके सुझावों से सीख लेते हुए कुछ और लघुकथाएं लिखने की कोशिश की है. लेकिन उन्हें यहाँ नहीं बल्कि सृजनगाथा पर पढ़ा जा सकता है. विश्वास है कि वहां ये तीन लघुकथाएं पढ़कर पुनः अपने स्नेह से सिंचित करेंगे.

'सृजनगाथा' या 'तीन लघुकथाएं' शब्दों पर क्लिक करके वहां पहुंचा जा सकता है अन्यथा नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें---


शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

अन्ना लड़ाई लम्बी है और हम तुम्हारे साथ रहने लायक नहीं.-------->>>दीपक मशाल

आज देश भर में अन्ना की, दूसरी आज़ादी पाने की लहर चल रही है. हम सब जोश में हैं और होना भी चाहिए, मगर फिर भी कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें दिमाग में आने से खुद को नहीं रोक पा रहा. इस लड़ाई के साथ-साथ हमें खुद से भी कुछ सवाल पूछने की आवश्यकता जान पड़ती है, कुछ विचारणीय बिंदु हैं जैसे कि-
हम में से कितने हैं जिन्होंने कभी अपनी सुविधाओं के लिए इस शासन को भ्रष्ट बनाने में सहयोग नहीं दिया? क्या हमने कभी बेटिकट यात्रा नहीं की या टी.सी. को कुछ पैसे थमाकर अपने लिए सीट की व्यवस्था नहीं की? क्या समय बचाने हेतु किसी प्रसिद्द मंदिर में लगी लम्बी लाइन को धता बताने के लिए सिक्कों की खनक का उपयोग नहीं किया? या फिर कभी कोई कर बचाने की कोशिश नहीं की?
मैंने खुद अँगुलियों पर गिनी जा सकने वाली अपनी रेलयात्राओं में से कुछेक बार नींद पूरी करने के लिए सहर्ष सुविधा शुल्क दिया है.
जब तक हम अपने पिछले किये गए इन कार्यों को स्वीकार कर उनके लिए प्रायश्चित करके आगे कभी इस तरह के आचरण को दोहराने की शपथ नहीं लेते, तब तक न तो हम भ्रष्टाचारहीन समाज, देश मांगने के हक़दार हैं और न ऐसे देश में जीने के.
देखने वाली बात ये है की इस आन्दोलन में सबसे ज्यादा शोर करने वालों में वो भी शामिल हैं जो कई सालों से लोगों का शोषण करते आ रहे हैं और भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा हैं. कुछ लोगों ने कहा की 'संभवतः उन्हें अब अपनी करनी पर अफ़सोस हो', मगर यह अफ़सोस कम और अपने आपको आने वाले नए तंत्र में सुरक्षित करने का उपाय कहीं अधिक दीखता है. ऐसे लोगों में चपरासी, बिचौलियों और क्लर्कों से लेकर छोटे-बड़े ठेकेदार, वकील, जज एवं पत्रकार तक शामिल हैं. 
देखकर बड़ा अचम्भा सा होता है की चंद दिनों में ही देश के जमाखोर, मिलावटखोर, मुनाफाखोर और कालाबाजारी के महारथी भी भ्रष्टाचारविहीन समाज की वकालत कैसे करने लगे. जिसके हाथ में एक छोटा सा भी अधिकार है वह भ्रष्ट हो चुका है, राशन, वजीफा बांटने वाले से लेकर विकास बांटने वाले तक.
क्या इस लेख के लेखक या पाठक ही दूध के धुले हुए हैं? 
मेरा मानना है इन हालात के लिए हम स्वयं भी दोषी हैं इसलिए संघर्ष सिर्फ नेताओं और अफसरों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए बल्कि हर महकमे के छोटे से बड़े अफसर तक यह नियम लागू हों. आज चाहे शिक्षा विभाग हो, पुलिस, रेलवे, बैंक या कोई और हर जगह आराम तलबी के चलते लगभग ना के बराबर कर्मचारी या अधिकारी अपनी जिम्मेवारियों को बखूबी निभाते हैं. अधिकाँश लोग संविधान, नियम-क़ानून की धज्जियां उड़ाते मिलते हैं और यह सब भ्रष्ट आचरण के अंतर्गत ही आता है. सिर्फ अधिकारी कर्मचारी ही क्यों दुकानदार, किसान, डॉक्टर, इंजीनियर हो या निठल्ले लोग सभी तो अपनी मनमानी में लगे हुए हैं. जब तक हम सभी स्वयं को इस देश के भ्रष्टाचारविहीन होने की दिशा में इकाई की तरह नहीं मानते और नियम-क़ानून का अनुपालन नहीं करते तब तक जो सपना हम देख रहे हैं वह अधूरा ही है.
एक डर ये भी है की पूर्व में अपहृत हो चुके आन्दोलनों की तरह इस आन्दोलन को भी कोई हाइजैक न कर ले, कहीं इस आन्दोलन से जुड़े बड़े नेताओं की मेहनत को नज़रंदाज़ कर कोई बड़ा नाम सिर्फ मलाई खाने के लिए आन्दोलन को बड़ा रूप देने का बहाना कर, जिम्मेदारी उठाने का दिखावा कर हमें वापस उसी जगह लाकर न खड़ा कर दे जहाँ से हम चलना शुरू कर रहे हैं. क्योंकि कई दूरदर्शी जो इस आन्दोलन में नए भारत का निर्माण देखने के साथ-२ अच्छा मौका तलाश रहे होंगे नया हिटलर बनने का...
यह आन्दोलन जो शुरू हुआ है तो अब पूर्ण सफाई के बाद ही समाप्त हो. लेकिन साथ ही अगर हम खुद अपने आप को इन बुराइयों से बाहर निकाल सकें तब ही अन्ना के साथ रहने का हक रखते हैं.

हाल कहीं वैसा ही ना हो जैसा कि श्री गणेश रायबोले जी की एक कविता कहती है.

सत्ता राक्षस
हिटलर को मारता हिटलर
लोग खुश हो जाते हैं
चलो मरा हिटलर
हिटलर हँसता है
अभी का नहीं
हजारों बरस का यह सिलसिला है.

एक और बात.. कहीं न कहीं लगता है की अभी भी ये एक बिखरा हुआ आन्दोलन ही है. हालांकि सब साथ दे रहे हैं मगर फिर भी अभी भी एक समुचित रणनीति की आवश्यकता है. बड़ी आज़ादी पाने के लिए बड़े संगठन की आवश्यकता है. हमें आगे बढ़ने के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम करना होगा. आप क्या कहते हैं? मैं तो बस इतना कहता हूँ कि-


चल पड़ी है बात
तो बस शाम तक ही ना चले
अब हमारी जंग 
अधूरे काम तक ही ना चले
विकास की पुरवाई गर 

इस बार जो आये यहाँ 
ध्यान रखना वो महज़ 
कुछ ग्राम तक ही ना चले

हर एक मस्जिद में चले 
चल पड़े इक-इक गुरुद्वारे में
ये बात 
सिर्फ चारों धाम तक ही ना चले

मैं इतनी दूर बैठा हूँ
हूँ मगर फिर भी वहीं 
पीने वालों बात सच्ची
बस जाम तक ही ना चले

हर आम का है हक अगर
हर आम को मिल जाए वो
रेवड़ी बनकर ये केवल
कुछ आम तक ही ना चले 

हर उम्र लांघे अगर
दहलीज देश के लिए
तो नया क़ानून
कुछ के काम तक ही ना चले

निशान भी छोड़े जो ये 
तब तो कोई बात हो
जो चल रहा है वो अकेले 

नाम तक ही ना चले.
दीपक मशाल 

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

अन्ना का समर्थन... गणेश रायबोले की कवितायें---->>>दीपक मशाल

श्री अन्ना हजारे 


मेरे पसंदीदा कवियों में से एक श्री गणेश रायबोले की कुछ कवितायें जो आजकल के हालात पर एकदम फिट हैं,  आदरणीय श्री अन्ना हजारे जी के समर्थन में, जन लोकपाल बिल के समर्थन में इन कविताओं के साथ एक हाथ मेरा भी.... 
आइये सन १९४७ में गोरे अंग्रेजों द्वारा काले अंग्रेजों को हुए सत्ता हस्तांतरण के बाद पुनः पुनः इन काले हिटलरों को होते आ रहे हस्तांतरण को विराम देने के लिए उठ खड़े हों. आइये भारत आज़ाद कराएं...

सत्ता राक्षस
हिटलर को मारता हिटलर
लोग खुश हो जाते हैं
चलो मरा हिटलर
हिटलर हँसता है
अभी का नहीं
हजारों बरस का यह सिलसिला है.
श्री गणेश रायबोले 


देश का मतलब

जब वह वोट मांगता है
तो उसके लिए
देश का मतलब 'हम लोग' हैं
हम लोग जो फैले हुए हैं
कश्मीर से कन्याकुमारी तक
गुजरात से अरुणांचल तक,
जबकि जीत जाता है
तो उसके लिए देश का अर्थ सिकुड़ जाता है
अम्बानी हो जाता है.

बदनाम जंगलराज
साजिशन बदनाम किया जाता है 
जंगलराज
जंगल में कोई अपनी जीविका के लिए 
आवश्यक धरती, आवश्यक आसमान से 
ज्यादा नहीं लेता
जंगल जानता है
जीविका के लिए
जितना जरूरी है
उससे ज्यादा लेना
जघन्य अपराध है,
जंगलराज में नहीं होते
कभी न भरने वाले सर्वभक्षी
सत्ताईस सत्ताईस मंजिला पेट
जंगलराज होता है
न्याय का राज
संतुलन का राज.

गणेश रायबोले 
(पत्रिका तीसरी दुनिया से ली गई कवितायें)

साथ में एक मेरी लघुकविता-
एक राजनैतिक सीमा पार करने की सज़ा 
सत्ताईस साल जेल..
एक देश लूटने की सज़ा?? 
एक देश पर हमले की सज़ा?
बेगुनाहों को गोलियों से भूनने की सज़ा?
अभी कुछ सोचा नहीं
तय भी नहीं 
मिलेगी या नहीं..
क्या पता दे ही दें 
सत्ताईस साल बाद..
दीपक मशाल 

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

एक तस्वीर बड़बड़ा रही थी ख्वाब में

मेरे अल्बम से  कुछ पुरानी तस्वीरें
झाँक रहीं थीं सूरज की ओर
उनके धुंधले पड़ते अक्स से
मानो सूरज के थे पुराने रिश्ते

तस्वीरें ढूंढ रहीं थीं 
आशा की किरण मेरे लिए

आग के महाकूप से निकलती लपटें झुलसा देतीं 
खामोश तस्वीरों की उमीदों को
मगर पगली तस्वीरें फिर नयी आस उगा लेतीं
उनके चारों कोने सोख लेते कुछ ऑक्सीजन
वो फिर लग जाती नई कोशिश में

तस्वीरें सपने नहीं देखतीं 
इसलिये कि तस्वीरें कभी नहीं सोतीं

पर आज जाने कैसे आँख लग गई उनकी
रात के तीसरे पहर
एक तस्वीर बड़बड़ा रही थी ख्वाब में
'अब तुम आ गए हो तो...
आशा की किरण का क्या करना'
पता नहीं जाने किसे देखकर
दीपक मशाल
(कविता गर्भनाल में पूर्व प्रकाशित)

सोमवार, 28 मार्च 2011

हम कब तक ऐसा करते रहेंगे??--------->>>दीपक मशाल


हाल ही में होली के पूर्व भारत के कई हिस्सों में खाद्य निरीक्षकों द्वारा डाले गए छापों के दौरान जिस तरह से काफी बड़ी तादाद में नकली या मिलावटी खोवे, घी, क्रीम, दूध, मिठाई और किराना सामग्री इत्यादि के बरामद होने के मामले प्रकाश में आये, उससे मन में यह विश्वास बैठ गया है कि भ्रष्टाचार, मिलावट, मुनाफाखोरी अब सतही बुराइयां नहीं रहीं. बल्कि यह जन-जन में संस्कार के रूप में अपनी पैठ जमा चुकी हैं. अब शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति भारत में शेष हो जो इन क्रियाकलापों से अछूता रहा हो, चाहे वह इस अपराध के अपराधी के रूप में रहा हो या फिर भुक्तभोगी के रूप में. यूँ तो यह सब सिर्फ आज की बात नहीं है ये लालच की 'संतान' बुराइयां सालों पहले हमारे यहाँ पैदा हो चुकी थीं और कितने ही बार ऐसी ख़बरें हमारी आँखों के सामने से गुजरीं. लेकिन जिस तरह से इस होली और बीती दीवाली पर मिलावट की घटनाएं देखने को मिलीं उससे लगता है कि देश को तबाह करने के लिए एक अप्राकृतिक और अदृश्य सुनामी भारत और विशेष रूप से उत्तर और मध्य  भारत में भी आया हुआ है. 

समझ नहीं आता कि कैसे चंद पैसे कमाने के लालच में हमारे बीच ही उठने-बैठने वाले लोग हमारी ही जान खतरे में डालने को तैयार हो जाते हैं. कैसे ये लोग भूल जाते हैं कि अगर वो बबूल बो रहे हैं तो उन्हें भी आम नहीं हाथ आने वाले. कल को हर व्यक्ति मिलावट से ही मुनाफे के चक्कर में उलझकर एक दूसरे के स्वास्थ्य को नुक्सान पहुँचाता मिलेगा. एक व्यक्ति जो जल्दी अमीर बनने के लिए खोवा नकली बनाकर बेचेगा वो फिर उन्ही पैसों से खुद के लिए भी नकली दालें, सब्जियां, मसाले, तेल इत्यादि खरीदेगा. हम सभी तो एक दूसरे को कहने में लगे हैं की 'तू डाल-डाल, मैं पात-पात'. 
जिसके जो हाथ में आ रहा है वो उसी को मिलावटी बना देता है. पेट्रोल पम्प हाथ आ गया तो पेट्रोल, डीजल में किरासिन मिला दिया, किराने की दुकान है तो दाल-चावल, मसाले, घी में अशुद्धिकरण, दूधवाले हैं तो यूरिया मिलाकर दूध ही नकली बना दिया वरना कुछ नहीं अगर थोड़े ईमानदार हैं तो पानी मिला कर ही काम चला लिया. बाजारों में उपलब्ध सब्जियों, फलों को कृत्रिम तरीके से आकर्षक एवं बड़े आकार का बनाया जा रहा है. फलों को कैल्शियम कार्बाइड का छिड़काव कर पकाने की बातें तो हम सालों से सुनते आ रहे हैं, ये कार्बाइड मष्तिष्क से सम्बंधित कई छोटी-बड़ी बीमारियों का स्रोत है. सब्जियों को बड़ा आकार देने के लिए उनके पौधों की जड़ों में ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन लगाये जा रहे हैं, ये वही ऑक्सीटोसिन है जो कि प्राकृतिक रूप से मादा के शरीर में बनता है और प्रसव के दौरान शिशु को बाहर लाने में एवं उसके बाद दुग्ध उत्पन्न करने में सहायक होता है. गाय-भैंसों को यही इंजेक्शन देकर ज्यादा दूध निकाला जा रहा है, जबकि इस हारमोन के इस तरह मानव शरीर में पहुँचने से होने वाले गंभीर दुष्प्रभावों पर रिसर्च चल रही है. मटर को हरा रंग देने के लिए कॉपर सल्फेट का प्रयोग होता है जो हमारे शरीर के लिए काफी नुकसानदेह है. एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में बाज़ार में उपलब्ध खाद्य पदार्थों में ९०% खाद्य पदार्थ मिलावटी होते हैं. यानी हम हर रोज़ कितना धीमा ज़हर ले रहे हैं हमें पता भी नहीं है. अब हम इन्हें खाते हैं तो अपनी मौत को दावत देते हैं और नहीं खाते तो जिंदा कैसे रहें?

वैसे ये सब खेल सिर्फ भारत में ही नहीं अन्य कई विकसित देशों में भी चल रहा है, लेकिन वहां के शुद्धता मानक अलग हैं और वहाँ की सक्रिय मीडिया समय-समय पर सरकार और लोगों को इस सब के खिलाफ चेताती रहती है इसलिए स्थिति काफी हद तक नियंत्रण में रहती है.
ये मिलावटी पदार्थ भले ही तुरंत दुष्प्रभाव ना दिखाएँ लेकिन इनके दूरगामी परिणाम तब समझ आते हैं जब किसी व्यक्ति को या उसके परिवारीजन को किसी न किसी जानलेवा बीमारी के रूप में इसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं. उस समय हम सिर्फ यही कहते रह जाते हैं कि ''हे ईश्वर! हमने किसी का क्या बिगाड़ा था जो यह दिन देखने को मिला..'' 
उस समय वह यह भूल जाता है कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कहीं ना कहीं उसने स्वयं यह ज़हर अपने आस-पास फैलाया है. मोटे तौर पर कहें तो वो दस रुपये कमाने के लिए अपने ही लोगों का हज़ार रुपये का नुक्सान कर रहा है.

पिछले साल ऐसे अप्राकृतिक तरीके से आकर्षक और बड़े आकार की बनाई गई सब्जियां-फल बाज़ार में लाने वालों के खिलाफ कानपुर में एक समूह ने आवाज़ उठाई जरूर थी, लेकिन उसके बाद क्या हुआ पता नहीं चला. सरकारी अमला ऊपर से आदेश आने से पहले इस तरफ ध्यान देता नहीं और ऊपर से आदेश आने से रहा. क्योंकि देश को चलाने वाले ही इन माफियाओं के साथ लंच-डिनर करते देखे जाते हैं.
आखिर कब तक सिर्फ उस खनक के लिए हम अपने ही लोगों के प्राणों से खिलवाड़ करते रहेंगे जो कि तब भी यहीं थी जब हम धरती पर ना आये थे और तब भी रहेगी जब हम ना होंगे. हम सभी विश्व को खूबसूरत बनाने और जीवनशैली  को बेहतर बनाने की दिशा में एक इकाई कार्यकर्ता की तरह कार्य करें तो समाज, देश, दुनिया बदलने में ज्यादा देर नहीं लगेगी. इस सोच को दिल से निकालना होगा कि 'एक अकेले हम नहीं करेंगे तो क्या फर्क पड़ जाएगा?'.. हम सभी इसी सोच के तहत दूध की बजाय सुरम्य तालाब को पानी से भर रहे हैं, सभी यही सोच रहे हैं कि सारा गाँव तो दूध डाल रहा है एक मैं पानी डाल दूंगा तो किसे पता चलेगा. इस तरह सभी एक दूसरे को धोखा देते रहे तो हम और न जाने कितने सालों तक सिर्फ विकासशील ही बने रहेंगे.

दूसरी तरफ खाद्य और आपूर्ति विभाग को भी कड़े क़ानून बनाने, उनको पालन कराने और लोगों में जागरूकता फैलाने की सख्त आवश्यकता है. वर्ना पहले से ही हमारे यहाँ प्रति दस हज़ार व्यक्ति पर एक डॉक्टर है....
दीपक मशाल 

सोमवार, 21 मार्च 2011

ये जो भी है आपके दिल को छुएगी जरूर

यहाँ लिखी हर एक पंक्ति को आँख बंद कर एक बार दोहराएंगे तो यकीन मानिए आपको ये सब अपना सा लगेगा.. बिलकुल आपका लिखा हुआ.. आपके दिल से निकला हुआ. ये मेरा दावा है.. साथ ही कमियों की तरफ ध्यान दिलाएंगे तो मुझे भी खुशी होगी..

अलग-अलग वो बरसा छाया जो साथ था 
अरे काफिला-ए-बादल आया तो साथ था 

यहाँ की छाँव ने कितना अकेला कर दिया मुझे  
वहाँ धूप थी तो क्या मेरा साया तो साथ था 

बड़ी घुटन होती है मुझे इस खुशबू-ए-शहर में 
कहाँ है गंध माटी की मैं लाया जो साथ था 

क्यों मुझको नहीं सुहाते तेरे तन्हा सुरीले गाने 
मिरा गाना बेसुरा था पर गाया तो साथ था 

कहीं दिखता नहीं यहाँ ज़मीर मेरा खो गया है 
शहर के द्वार तक वो मेरे आया तो साथ था 

एक नेता बन गया है दूजा बन गया है आदमी 
माँ ने दोनों बच्चों को जाया तो साथ था 

तू मर गया कभी का 'मशाल' अभी ज़िन्दा है 
यूँ तो दोनों ने ही ज़हर खाया तो साथ था 
दीपक मशाल 

शनिवार, 19 मार्च 2011

फगुनाहट में हुलियाती लाल और मशाल की जुगलबंदी



आप सभी को सपरिवार होरी की हार्दिक शुभकामनाएं... फागुन की फगुनाहट से रोमांचित, ये हुलियाती और मस्ती करती लाल और मशाल की जुगलबंदी आपके सामने हाज़िर है. उम्मीद है पसंद आयेगी.


दो पलों की लेके खुशियाँ वो फिर से आ गई है 
हाँ पकी फसल की बाली लो फिर से आ गई है 

के रंग में मिले रसायन घुलते हैं उड़ रहे हैं
लो नकली खोवे की गुझिया मिरे घर से आ गई है 

मिलावट का खेल यारों इन तक तो चल भी जाता 
ये कड़वी महक मगर अब हर दिल में आ गई है 

दोस्ती औ प्यार अब बच्चे भी सीखें कैसे  
के पिचकारी रूप धर के पिस्टल सा आ गई है 

है प्रेम को जलाती हुई और सत्य को दुत्कारती 
अबकी प्रहलाद जल गया औ साबुत वो आ गई है 

नफरतों ने जिसको गूंगा सा कर दिया है 
तारीख बनके होली वो फिर से आ गई है

महंगाई ने मारा है कुछ लालच से मर गई है
अधजली लाश बनके हर घर में आ गई है 

जो बन गई है केवल दो दिन की प्यारी छुट्टी
वो फागुन की पूर्णमासी आँगन में आ गई है 

हुई मुद्दत 'मशाल' कि नहाया नहीं था वो, 
ये मुई कमबख्त होली लो फिर से आ गई है..

रंगे हैं भ्रष्ट्राचार के रंग में यहाँ नेता सभी 
रंगों को रंगने की भी अब झोली आ गई है

मिला हाथ कानून से यूँ नाचता अपराध रहा
नगाड़ों की आवाज में भी ताली आ गई है

राम और रहीम जो सदियों से मिलते आ रहे 
इनके मिलन में भी अब दलाली आ गई है

कितना विनाश हुआ संस्कृति का देख लो
शिष्टाचार की भाषा में अब गाली आ गई है

सुनते हैं गले मिलेंगे कल फिर सब ’समीर’ से
मौका भी है, दस्तूर भी है, होली आ गई है.

ओंटारियो से कोई, कोई निकला बेलफास्ट से  
हिन्दी ब्लोगिंग के मस्तानों की टोली आ गई है   

'मशाल' की ये लौ हुई तेज़ इतनी 'समीर' से
लग रहा ज्यों जमीं पे सूरज की डोली आ गई है

श्री समीर लाल एवं दीपक मशाल

 

शनिवार, 12 मार्च 2011

झील के पानी में भी वो इक रवानी ढूंढती है!!---------->>>दीपक मशाल


संयम की मूरत में उग्रता की निशानी ढूंढती है,
आस की देवी बूढ़ी रगों में जवानी ढूंढती है!
हय ढूंढती है भावनाएं कब्र के कंकाल में वो, 
झील के पानी में भी वो इक रवानी ढूंढती है!! 

कैसे तू भूली ऐ देवी काल ना सतजुग रहा अब,
जलजलों में जी रहा इंसां जो सचमुच रहा अब, 
सत्य की जय कह रहे हैं पर झूठ से भी मेल है, 
कहता कुछ है आदमी और कर कुछ रहा अब,

पूष में तो ढूंढती है तमतमाते सूर्य को और,
जेठ के महीने में वो पुरबाई सुहानी ढूंढती है!  

उसने समझा सच दिख रहा सुबह के अखबार में,  
देश प्रगति कर रहा संसार में संचार में व्यापार में, 
पर नई जमात आई है जिसने कलम बेच खाई है, 
जो करती चुपके से दलाली जनतंत्र के दरबार में, 

इसको क्या मालूम अस्ल ख़बरों की खबर क्या, 
हकीकत के दर्द में जो सनसनी कहानी ढूंढती है! 

डूबती है नब्ज़, साँस आख़िरी बस चल रही है,
रोज़ संसद में चिता गणतंत्र की जल रही है,
दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रहीं हैं कोठियां,
नींव भरने वाले की झोपड़ी पर खल रही है,  

नई दुनिया में अलग है महक आज रिश्तों की, 
तू किसलिए इनमे वही खुशबू पुरानी ढूंढती है!! 
दीपक मशाल 

तस्वीर- अमृता शेरगिल का एक सेल्फ पोर्ट्रेट 
 

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...