मंगलवार, 3 नवंबर 2009

हवालात में एक मौत..+++++++++++++++दीपक 'मशाल'

पुलिसिया अत्याचार की खबरें हम आये दिन सुनते रहते हैं...... कभी किसी की सच्ची ऍफ़.आई.आर.  दर्ज नहीं की जाती, तो कभी किसी को किसी झूठे मामले में ही फंसा दिया जाता है.... ऐसे ही एक हवालात में मौत को ध्यान में रखते हुए इस कविता को लिखा गया था, जिसे आपके सामने रख रहा हूँ....

हवालात में एक मौत.....

मारा गया
फिर इक कोई हवालात में,
चीख थी उसकी सुनी
हमने भी रात में,
कहती पुलिस है
'वो बड़ा बदमाश था
पर
कुबूल करता नहीं अपराध था'.
पर वो तो बस
भूख का मारा था इक,
उसका था न घर कोई
ना माँ कोई
ना बाप था.
बाल था,
सो मजदूर भी
ना कोई रखता उसे,
पर ताप को पेट के
इस बात से क्या वास्ता,
था ढूँढने वो लग गया
कोई नया इक रास्ता.
हीरे सी चमकी थी आँखें
देख के वो तश्तरी,
छोड़ी जो थी किसी ने
थी रोटी इक उसमे पड़ी.
अंधा वो मारा भूख का
ना सूझ पाया,
न जाने कैसे हाथ को
रोटी पे पाया,
तभी
यमदूत सा था आ खड़ा,
मालिक होटल का वो साया.
बस वो घड़ी
उसके लिए मनहूस बन गई,
रोटी वो
उसके लिए थी मौत बन गई.
थी ढूंढती फिरती पुलिस
इक सरगना को,
जिसने हिला रखा था
समूचे परगना को,
करने साबित जुट गए
गिरोह का हिस्सा उसे,
अखबार में भी दे दिया
बना के एक किस्सा उसे.
इक खबर छोटी सी
प्रकाशित तो थी हुई,
आया ना उसको देखने
पर कोई इंसान था,
रौशनी थी अब मगर,
करना गुनहगार साबित उसे
खाकी वर्दी के लिए आसान था.
ऐ प्रभाकर!!
रश्मियाँ भी तेरी क्या करतीं?
जब दिलों में ही घिरा
तिमिर घनघोर था,
शोर ये उपजा कि वो इक चोर था....
शोर ये उपजा कि वो इक चोर था....
दीपक 'मशाल'
चित्र साभार गूगल से

21 टिप्‍पणियां:

  1. गरीबी जो कराए...कम है...

    मार्मिक रचना

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  2. apne adhikaaron ke liye log ladte rahenge,
    aur hawalaat mein log yun hi marte rahenge.

    ufff wo table ke niche wale band liphaphe....

    kash ham kuch kar paayein...
    rang de basanti...
    jai hind...

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  3. वाकई बड़े जिगर वाला बदमाश था वो...वरना इन बेरहमों की
    दुनिया में कदम रखने की गुस्ताखी करता...क्या हुआ जो कुत्ते की मौत मारा गया...थोड़े दिन के लिए खबरनवीसों को सुर्खियां देकर
    एहसान तो कर गया...

    जय हिंद...

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  4. deepak bhai;
    aai to thi aapko tarhi m.ki gazal ke liye badhai dene magar majboor hoon is rachana ki tareef karne ko1
    dil se wah ke sath sath aah bhi nikal rahi hai.

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  5. मार्मिक रचना दी है आज आपने तो. भूख ने तो आज तक न जाने कितनो को निगला है और फिर उसके खिलाफ तो यह व्यवस्था और भूख दोनो हो गये थे उसे तो मरना ही था.

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  6. बहुत गहरी रचना...मार्मिक!

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  7. bhookhe gareebon ka yahi haal hota aaya hai.
    desh ka maal to kotrochi jaiso ne khaya hai.

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  8. बहुत ही मार्मिक, एवं भावपूर्ण प्रस्‍तुति, बधाई ।

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  9. व्यवस्था पर चोट करती एक मार्मिक रचना , बधाई

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  10. is satya ko maine kai baar mahsoos kiya hai,kai maut mari hun........aankhen sookh gai hain,kuch kar nahi pane ki vedna hoti hai

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  11. ये रचना पढ़कर..आक्रोश..हताशा..दर्द,.असहायपन सारे भाव एक साथ आते हैं...सच को उकेरती एक यथार्थपरक रचना

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  12. पंकज मिश्र जी इस कविता में मुझे मुस्कुराने वाली तो कोई बात नहीं लगी, पता नहीं आप क्या देख के मुस्कुराये, अलबत्त आप की मुस्कराहट पे जरूर मुझे हंसी आ रही है...
    जय हिंद...

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  13. कानून के जाल में बस छोटी मछलियाँ ही फंसती हैं.
    यथार्थवादी रचना.

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  14. अगर तुकबन्दी के मोह मे न पड़ो तो कविता और अच्छी बन सकती है । पुरानी कविताएँ जस की तस लगाना जरूरी नही है उन पर और काम किया जा सकता है । अपनी पुरानी कविता के प्रति मोह नही रखना चाहिये उसे बार बार रिवाइज़ करना चाहिये ।

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  15. deepak..deri se aane ke liye maafi chahta hoon....darasal thoda kisi problem mein tha....islye waqt se nahi dekh paya......

    yeh kavita bahut achchi lagi......kaafi maarmik chitran hai.........

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  16. शोर ये उपजा की वो एक चोर था ...

    गहरी संवेदना .... |

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  17. सच को उकेरती एक यथार्थपरक रचना

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  18. बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
    आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन


    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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