रविवार, 1 नवंबर 2009

वो आतंकवाद समझती है...******************दीपक 'मशाल'

कल आपसे वादा किया था अपनी एक पुरस्कृत कविता पढ़वाने  का वो पूरा कर रहा हूँ.... ये कविता हिन्दयुग्म की सितम्बर   माह की यूनिकवि प्रतियोगिता के लिए निर्णायकों द्वारा पसंदीदा कविता चुनी गयी थी. कोशिश की है छोटे कस्बों और महानगरों में एक लड़की के डरों को दिखाने की... और बताने की कि वो किस तरह से किन हालातों में डरते हुए जीती है और कैसे आतंकवाद समझती है..
वो आतंकवाद समझती है...

वो जब घर से निकलती है,
खुद ही
खुद के लिए दुआ करती है,
चाय की दुकान से उठे कटाक्षों के शोलों में,
पान के ढाबे से निकली सीटियों की लपटों में,
रोज़ ही झुलसती है.
चौराहों की घूरती नज़रों की गोलियाँ,
उसे हर घड़ी छलनी करती हैं.
आतंकवाद!!!!
अरे इससे तो तुम
आज खौफ खाने लगे हो,
वो कब से
इसी खुराक पे जीती-मरती है.
तुम तो आतंक को
आज समझने लगे हो
आज डरने लगे हो,
वो तो सदियों से डरती है,
ज़मीं पे आने की जद्दोज़हद में,
किस-किस से निपटती है.
तुम जान देने से डरते हो
पर वो
आबरू छुपाये फिरती है,
क्योंकि वो जान से कम और
इससे ज्यादा प्यार करती है.
तुम तो ढंके चेहरों और
असलहे वाले हाथों से सहमते हो,
वो तुम्हारे खुले चेहरे,
खाली हाथों से सिहरती है.
तुम मौत से बचने को बिलखते हो,
वो जिंदगी पे सिसकती है.
तुम्हे लगता है...
औरत अख़बार नहीं पढ़ती तो..
कुछ नहीं समझती,
अरे चाहे पिछडी रहे
शिक्षा में मगर,
सभ्यता में
आदमी से कई कदम आगे रहती है.
इसलिए
हाँ इसलिए,
हमसे कई गुना ज्यादा,
वो आतंकवाद समझती है
वो आतंकवाद समझती है....

दीपक 'मशाल'
चिता साभार गूगल से..

20 टिप्‍पणियां:

  1. bahut hi sundar likha hai deepak bhai... stree jaati ki sabse badi samasya ko isse behtar andaaz nahi diya ja sakta.. bahut khoob..

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  2. समझने से अधिक महसूस करती है
    और इस महसूसन का किसी को
    अहसास भी नहीं होने देती
    चाहे मन में भय के बीज बोती है।

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  3. दीपक,
    अच्छा लगा पढ़ कर जान कर कि इस आतंक को आतंक का नाम दिया और इसे उजागर किया...ये वो आतंकवाद है हर..गली हर नुक्कड़ पर ...बहुत ही बेशर्मी से अपना अधिपत्य बनाये हुए है और उससे पूरा समाज नज़रें चुराए हुए है..
    बहुत ही अच्छी कविता...जागरूकता पैदा करती हुई...
    खुश रहो..
    दीदी...

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  4. जमाने का समग्र रूप
    उसे आतंकवादी लगता है
    इस आतंकवाद का अपील
    कहाँ करे वो
    ----
    बहुत सुन्दर चित्रण और भाव

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  5. अच्छी कविता है यह दीपक बस थोडा शिल्प मे और काम चाहिये कुछ अनावश्यक शब्द है उन्हे निकालना होगा ।

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  6. आपकी यह कविता हिंद-युग्म पर पढ़ी थी..और दोबारा पढ़ने से इसका सौन्दर्य बढ़ता रहा..एक दम स्त्री-विमर्श कर डाला आपने..आभार

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  7. बेहतरीन कविता का दूसरी बार पढ़ना बहुत अच्छा लगा...समाज को आईना दिखाती एक संवेदशील और संदेश देती कविता...बधाई

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  8. सही कहा। मेरे दोस्त। तुम तो वायदा पूरा कर ही गए।

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  9. एक आम युवती के दिल को गहराई से व्यक्त किया है,जिसमें दुखद भय है
    और भय से मुक्ति के लिए खुद के लिए दुआ.........आँखें भर आयीं

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  10. शरद भैया मैं आपकी बात का ध्यान रखूंगा.
    जय हिंद

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  11. इस आतंकवाद की तरफ लोगों का ध्यान कम ही जाता है.
    इसलिए अच्छा उजागर किया है.
    हालाँकि आजकल हालात बदल रहे है और आज की लड़की इतनी निर्बल नहीं है.

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  12. अच्छी और सच्ची कविता दीपक्।बहुत बहुत बधाई।

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  13. Ab to padh li bade bhaia, maaf kar diziye

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  14. इसके एक एक भावों को महसूसते हुए मैंने तुम्हारी सोच को नमन किया है, आशीष से घेरा है...

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  15. एक लडकी के दर्द को मन से महसूस किया है.....एक कटु सत्य को सहजता से कह दिया है...बहुत अच्छी लगी ये रचना...बधाई

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  16. एक आम लडकी की व्यग्रता को आपने बहुत सार्थक अभिव्यक्ति दी है !
    स्कूल कॉलेज जाने वाली हर लडकी इस 'आतंकवाद' से तब से जूझ रही है जब से इस समाज ने 'सभ्य','शिक्षित'और 'विकसित'
    होने का दावा किया है ! चंद लोग उन्हें अपमानित करते हैं और शेष सब उन्हें अपमानित होते देख हर्षित होते हैं ! एक गम्भीर मुद्दे पर आपने बखूबी ध्यान आकर्षित किया है ! बधाई !

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  17. आतंक जिसमें आततायी चाहता है पूरे अंक

    पर उसे नहीं दिया जाता है एक भी अंक।

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