गुरुवार, 5 नवंबर 2009

क्या त्रियोदशी भोज निहायत ही आवश्यक प्रथा है???????????????????दीपक 'मशाल'

क्या त्रियोदशी भोज निहायत ही आवश्यक प्रथा  है??????????????????????????????? .............................. समयाभाव से इस पर विस्तृत चर्चा नहीं कर पा रहा हूँ मगर १-२ दिन बाद करेंगे अवश्य. हाल फिलहाल इस सामाजिक बुराई पे लिखी १ कविता आपके सामने है---

परम्परा की चाल ने.....
एक, दो, तीन, चार,
पांच, छः.....
पूरे तेरह विप्र
थे विराजमान उस पंक्ति में...
रसस्वादन के लिए,
दिवंगत आत्मा की शांति के
नाम पर आयोजित
उस त्रियोदशी भोज में.
तभी बोले इक विप्र देव
हो जाता भोजन ये स्वादिष्ट,
जो कम होता नमक कुछ रायते में.....
अरे कैसे ये पाषाण से 
सख्त हैं लड्डू बने ये?
फूटे थे उदगार ये
एक और ब्राह्मण देव के....
थी सुन रही आशिर्वचन ये
बैठी हुई दहलीज पे, 
इक मूर्ति सी श्वेताम्बरा,
खोया था जिसने सर से साया
अपने ह्रदय के नाथ का
वो थी बनी विधवा नयी
और अब नाम पे इस भोज के
थी खो चुकी वो घोंसला,
जिसमे था जीवन पला...
चिपेटती जाती ह्रदय से
अपने ह्रदय के अंश को....
दुःख था उसे कैसे बढ़े,
लेकर वो अपने वंश को...
कौन था दोषी मगर
उसके इस विध्वंश का,
पति तो गया था छोड़ के
छीना था उसको काल ने,
सर से छत छीनी मगर
परम्परा की चाल ने,
सर से छत छीनी मगर
परम्परा की चाल ने.....
दीपक 'मशाल'

20 टिप्‍पणियां:

  1. कर्ज लेकर ही सही दस्तूर तो निभाने है...
    मरने वाला तो एक बार मरा,
    जीने वालों के लिए तो मरने के सौ बहाने है...

    जय हिंद...

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  2. सच्चाई बयाँ करती बेहतरीन रचना।

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  3. सदियों पूर्व किसी अच्‍छे ध्‍येय से शुरू किए गए रीति रिवाजों को ढोना आज बेवकूफी ही मानी जाएगी .. बहुत सही जगह पर दृष्टि डाली है आपने !!

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  4. Dipak .....sachchai bayaan karne wali ek bahut hi khoobsoorat aur behtareen rachna..........


    -------------------------

    Dipak........... tumhe call lagane ka socha tha.....par mobile change kiya hai......to tumhara number us purane mobile ke fone buk mein hi chala gaya hai.... plz apna number email kar dena.......

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  5. बहुत ही गहराई लिये हुये हर शब्‍द,वास्‍तविकता के बेहद निकट भावमय प्रस्‍तुति ।

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  6. बहुत शशक्त रचना...दीपक जी बधाई इस सामाजिक बुराई की और इशारा करने पर....
    नीरज

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  7. ho sakta hai kabhi aawashyak rahaa ho? iske peechhe hamne kuchh karan khoje bhi hain, kabhi bataayenge.
    kaal ke sath ismen bhi badlaaw aana chahiye tha kintu aaya nahin, aaj ye katai aawashyak athwa anivarya nahin.

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  8. सच को उजागर करती रचना है।बहुत सुन्दर रचना है।

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  9. दीपक जी
    इतना भी दर्द न उडेलो कि सहना हो मुश्किल. सच है परम्पराओं ने हमे सदियो से जकडे रखा है और हम हकीकत जानते हुए भी इन्ही के पीछे अब तक भाग रहे है.
    बहुत सुन्दर रचना लिखी है यथार्थ

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  10. kya aapko nahin lagta ki is burai ke khilaaf hamen hi agaaz karne ki jaroorat hai, jyada nahin to kam se kam itna to kar hi sakte hain ki ye pratha un logon par lagoo na ki jaye jo ise nibhane me saksham nahin hain...
    Jai Hind...

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  11. ये प्रथा हमेशा से ही मुझे खलती है.....खास करके भोज...
    हैरानी की बात यह है कि इसी तरह की प्रथा यहाँ कनाडा में भी अंग्रेजों में होते हुए देखती हूँ......
    इस खान-पान की प्रथा को पार्टी में तब्दील होते वक्त भी नहीं लगता.....और हंसी-ठठा का माहौल बन जाता है....दिवंगत की याद को उसी वक्त हवा में काफूर होते देख कर आई हूँ एक हफ्ते पहले ही.....
    नाम बहुत खिन्न हुआ और आज तुम्हारी यह कविता पढ़ ली...
    दीपक ...बहुत सही बात कही...
    दीदी....

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  12. हमारी कुरीतियों को उकेरती मार्मिक रचना

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  13. aisi kureetiyon ko tilanjali de deni chahiye.

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