मंगलवार, 10 नवंबर 2009

कुछ छुटपुंजी कवितायेँ............दीपक 'मशाल'

    आजकल देश में इतनी सुन्दर सुन्दर घटनाएं हो रही हैं की सुन के और उन्हें सीधे प्रसारित होते देख के मन जिस तरह से खिन्न होता है वो सिर्फ मन ही जानता है...... जिस हिन्दी को हम मातृभाषा, राष्ट्रभाषा कहते हैं उसका ऐसा निरादर हो रहा है की कुछ कहते नहीं बनता, हिन्दी में शपथ लेना अपने ही देश में अपराध हो गया  ..और उससे भी दो कदम बढ़के ये कि सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता ये सब होने से........ ना केंद्र ना राज्य सरकार को....... इधर राजधानी में शीला दीक्षित की सह पे कानून की कमियों का फ़ायदा उठा के कांग्रेसी नेता की हत्यारी औलाद उस मनु शर्मा को खुलेआम घूमने की आज़ादी मिल रही है...... कुछ मन ही नहीं करता लिखने, कहने का..... मन कहता है की जब तक कुछ कर नहीं सकते तो लिखने का फ़ायदा क्या????
इसलिए नया तो कुछ नहीं है... कुछ पहले की टूटी फूटी रचनाएँ हैं जो डायरी के आगे, पीछे और किसी कोने में पड़ी मिल गयीं..... एक नज़र मार लीजिये और छत्रपति शिवाजी का नाम डुबोने वाले कपूतों से सम्बंधित समाचार सुनियेगा फिर से जाके...

१- इस दुनिया में
    जीने का
    अब मन ही नहीं करता,
    मैं मर जाता
    मगर,
    ना जाने कितने ख्वाबों से
    बेवफाई हो जाती...

२- मैं
    परिंदों के शहर से आया हूँ,
    देखना
    सय्याद कोई 
    देख ना ले,
    हर घड़ी 
    जागता रहता हूँ मैं,
    कोई हौसले के परों को
    नोंच ना ले.....
    मशर्रत की छाँव में 
    पलता रहा हूँ मैं,
    आफताब-ए-नफरत
    ये कहीं भांप ना ले.... 

३- मैं
    अपनी जेब में
    एक आइना रखता हूँ हरदम,
    जब भी कोई
    अच्छा कहता है मुझे,
    इक बार
    चेहरा देख जरूर लेता हूँ......

४- छोटा सा तो
    मिला है जीवन
    और
    करने को कितने काम,
    कहते ना रह जाएँ कहीं हम
    तेरे अल्लाह, मेरे राम....
    कब के हैं
    हम निकले घर से,
    कुछ तो हासिल करके जाएँ,
    खाने-रहने के फेरों में,
    ढल ना जाए
    यूं ही शाम.......

दीपक 'मशाल'

20 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर है आपकी ये रचनाएँ. बहुत कोमल और भावपूर्ण.

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  2. सभी गहरी और जबरदस्त!!

    आईना रखना...वाह!! कितनी उम्दा सोच है!

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  3. बहुत गंभीर रचनाएँ - आईना तो जबर्दस्त है, एक दम दिल में उतर गई।

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  4. बहुत से ख्वाब टूट न जाएँ....
    छोटी-छोटी रचनाओं में आमजन की व्यथा है, बधाई.

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  5. सरकार देश के सवा अरब लोगों को डैटाकॉर्ड बनाने के साथ-साथ एक एक पॉकेट आइना भी तोहफे में दे...सब खुद की
    हकीकत को ही देखते रहें, देश की हकीकत अपने आप सुधर जाएगी...

    जय हिंद...

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  6. दीपक जी, आपकी बात में सच्‍चाई है, गहराई है। बस सब मूक होते जा रहे हैं।

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  7. बधाई, बहुत सुंदर तरीके से आपने अपने विचार रक्खे

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  8. ये छुटपुंजी कविताएं तो गजब ढ़ा रही हैं भाई। बधाई।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  9. Deepak जी ..
    maharaashtr में जो huva पूरे भारत वासियों के लिए शर्म की बात है ........... राजनीति और नेता दोनों ने मिल कर बस स्वार्थ के चलते राष्ट्र भाषा के साथ ये खेल खेला है .......... सच में मन khinn है बहुत .........
    आपकी baaten बहुत ही gahri और सच हैं ........

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  10. bahut sundar rachnayen. jara shayyar ka matlab clear kar den . main sayyad soch raha hoon.

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  11. Bhool ki or dhyan dilane ke liye aapka bahut bahit shukriya Satya.... a vagrant ji, wo sayyad hi hai galti se shayyar ho gaya..
    Jai Hind...

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  12. har kshanika samudra kee shant garjana hai .....lahron sa uttap, bahut hi badhiyaa

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  13. vaah bhaanaje kyaa likhaa hai laajavaab shubhakaamanaayen aaj itanaa hi

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  14. Sabhi chanikaayein shaandaar hain...
    jeewan ki sacchai uker rahin hain...
    aur haan' aaina' to rakhna bhi chahiye itne handsom , smart ho beech beech mein dekh lene se khud par yakeen aur badh jata hai...
    :):):)
    Didi

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  15. Khwabon se bewafaayee...

    Aaina dekh lena (Yaad dila gayi meree apni eachna"pahlese ujale)

    Sayyad koyi dekh na le...waah! Chashme -dad-door...kya likhte hain! Eersha hotee hai..samarth lekhkon ne daad dee hai..badhayee ho!

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  16. राजनीति की बातें पढ़ता हूँ तो मगज खराब हो जाता है
    इन की करतूतें ऐसी होती हैं कि आग कहीं लगती हो आँच आ ही जाती है
    छोड़िए इन्हें मैं कहाँ भटक गया
    आया था आपकी बेहतरीन रचनाओं से प्रभावित होकर
    ऊपर की चंद पंक्तियों में अटक गया!
    आपकी सभी रचनाएँ बेहद प्रभावशाली हैं
    ...बधाई।

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