सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

कोहरे के दिनों के लिए खास-----चित्र सहित-------->>>>>>>दीपक 'मशाल'

कोहरे के दिनों के लिए एक खास क्षणिका-

१-
सूरज भी लगता है चंदा
कोहरे का कुछ ऐसा फंदा
आज नज़र वालों को देखा
चलते राह में होके अंधा.

२-
क़त्ल मुजरिम ने किया है
सजा मुलजिम ने पायी है
बेवफा हैं वो लकीरें
जिनसे तेरी आशनाई है
कौन करता जिरह उसके लिए
जिससे काजी की रंजिशाई है
उस शमा का क्या मतलब
जिसके जलते ही सुबहा आई है

३-
ज़िंदगी और ख्वाहिशें कुछ ऐसे मिल गयीं
के मुद्दतों से ख्वाहिशें पैदा हुई नहीं
मचलती नब्ज़ देख के कह गया हकीम
ख्वाहिशें बाकी रहीं बस ज़िन्दगी नहीं..

४-
काश कोई दीवार न होती
तेरी मेरी हार न होती
जीने को जी लेते हम भी
जो तेरी कमी हरबार न होती..

दीपक 'मशाल'
चित्र- अपनी तूलिका से..

21 टिप्‍पणियां:

  1. वह दीपक जी बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति .......कोहरे का विस्तार अहसास पूर्ण है

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  2. वाह..बहुत खूब...सुंदर क्षणिकाएँ....धन्यवाद दीपक जी

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  3. क़त्ल मुजरिम ने किया है
    सजा मुलजिम ने पायी है
    बेवफा हैं वो लकीरें
    जिनसे तेरी आशनाई है

    बहुत सुंदर एक टिप्पणी के साथ पसंद फ़्री ।:)

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  4. बहुत खूब दीपक भईया , ऐसा लगा कि जैसे हम कोहरे मे हैं ,

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  5. काश कोई दीवार न होती
    तेरी मेरी हार न होती
    जीने को जी लेते हम भी
    जो तेरी कमी हरबार न होती..

    -बहुत बेहतरीन!

    उत्तर देंहटाएं
  6. ज़िंदगी और ख्वाहिशें कुछ ऐसे मिल गयीं
    के मुद्दतों से ख्वाहिशें पैदा हुई नहीं
    मचलती नब्ज़ देख के कह गया हकीम
    ख्वाहिशें बाकी रहीं बस ज़िन्दगी नहीं..

    Kuch kar gujarane ka ye machalta sa ahsaas bahut hi pyara laga.....badhai

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  7. बेहतरीन क्षणिकाएं ।
    सुन्दर पेंटिंग।

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  8. अरे वाह इतनी सुन्दर रचना पढने को मिले तो क्या बात हो , बहुत ही लाजवाब रचना लगी आपकी , खासकर शब्दो का संयोजन ।

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  9. मचलती नब्ज़ देख के कह गया हकीम
    ख्वाहिशें बाकी रहीं बस ज़िन्दगी नहीं..

    छा गये भाई , बढिया रचना

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  10. वो पहले की तरह नहीं मिलता
    तू से आप कहने लगा है
    ए शोहरत
    तूने मुझे मेरा यार छीन लिया।

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  11. अच्छी चीज देखकर कुछ कहने का मन हो गया था। यार।

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  12. Happy bhai aap azeez hain mere yahan jo bhi kahte hain dil khush ho jata hai...

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  13. खूबसूरत शेर । एक से बढ़कर एक ।

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  14. कवितायें अच्छी है लेकिन छन्द का बन्धन होने के कारण केवल तुकबन्दी होकर रह गई हैं इसलिये जल्द ही इस बन्धन से मुक्त हो तो बेहतर ।

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  15. काश कोई दीवार न होती
    तेरी मेरी हार न होती
    जीने को जी लेते हम भी
    जो तेरी कमी हरबार न होती..

    बहुत अच्छी और सुंदर पंक्तियों के साथ बहुत ..... सुंदर पोस्ट....

    नोट: लखनऊ से बाहर होने की वजह से .... काफी दिनों तक नहीं आ पाया ....माफ़ी चाहता हूँ....

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  16. बढिया प्रस्तुति।

    ज़िंदगी और ख्वाहिशें कुछ ऐसे मिल गयीं
    के मुद्दतों से ख्वाहिशें पैदा हुई नहीं
    मचलती नब्ज़ देख के कह गया हकीम
    ख्वाहिशें बाकी रहीं बस ज़िन्दगी नहीं..

    उत्तर देंहटाएं

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