गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

शाबाशी गयी भाड़ में..... पहले ये बताओ कि मुझे धक्का किस कमीने ने दिया था------>>>> दीपक 'मशाल'

आप में से ज्यादातर लोगों ने ये चुटकला तो सुन ही रखा होगा कि- 'एक बार एक नदीं में कोई बच्चा डूब रहा था.. काफी भीड़ जमा हो गयी किनारे पर लेकिन गहरी और ठन्डे पानी वाली उस नदी में कूदने की किसी की हिम्मत ना पड़े.. सब एक दूसरे का मुँह तक रहे थे कि अचानक एक नौजवान नदी में कूदा और देखते ही देखते बच्चे को बचा के बाहर आ गया.
अब तो वो सब का हीरो बन गया.... लगे सब वाह-वाही करने और उसकी पीठ थपथपाने. मगर वो युवक बहुत गुस्से में एक पीठ थपथपाने वाले का हाथ झटक के बोला-- ''अरे शाबाशी गयी भाड़ में..... पहले ये बताओ कि मुझे नदी में धक्का किस कमीने ने दिया था????''
कल के एक गैर महत्वपूर्ण समाचार(गैर महत्वपूर्ण इसलिए कि ये मीडिया के लिए विशेष खबर हो सकती है आम आदमी के लिए अब ये कोई न्यूज़ नहीं रही) पर अचानक नज़र पड़ गयी... हुआ ये कि मीडिया महान का कहना है कि उनके माई-बाप राहुल गाँधी मुंबई की लोकल ट्रेन में चढ़े नहीं बल्कि चढ़ाये गए थे.. :) .. हुआ ये कि राहुल का प्लान था कि स्टेशन पर ही जनता-जनार्दन को दर्शन देकर कार से काफिले को आगे बढ़ाएंगे. लेकिन इतनी सुरक्षा के बावजूद जाने किसने उसे ऐसा धक्का दिया कि वो भी आम लोगों कि तरह हवा में तैरते हुए डब्बे के अन्दर पहुँच के अमरुद बन गया(वैसे वीडियो रेकॉर्डिंग में ऐसा कुछ दिखा तो नहीं). अब जो हो गया सो हो गया.. लेकिन इस बिना पूर्वनियोजित कारनामे से अच्छी खासी प्रशंसा तो मिल गयी... और राहुल कम से कम उस चुटकुले के युवक की तरह बेवक़ूफ़ तो था नहीं कि तारीफ के बाद भी चिल्लाये कि-- '' पहले ये बताओ कि धक्का किसने दिया???'' लेकिन सुनने में आया है कि जांच एजेंसियां ये पता लगाने में दिन-रात लगीं हैं कि धक्का(वैसे पहला धक्का कहना चाहिए क्योंकि उसके बाद तो सबने ही धक्के लगा के अन्दर ठेला होगा) आखिर दिया किसने?? मैं कुछ ऐसे सोच रहा था कि भाई हमारे यहाँ कई ऐसे क्षेत्र हैं कि वहां लोग पीछे से धक्का देके, पटक के चाक़ू चलाते हैं और जान निकाल के चले भी जाते हैं, चाक़ू, छुरा लहराते हुए...मगर F.I.R. लिखने के वक़्त थाने की स्याही ख़त्म हो जाती है इसलिए शिकायत ससुरी लिखी नहीं जाती... यहाँ देखो-- एक धक्के से वाह-वाही भी मिली और फिर जांच एजेंसियां उस मरदूद के पीछे पड़ गयीं सो अलग कि 'आखिर धक्का दिया तो दिया किसने'(और जिस आतंकवादी ने सारे देश के दिलों को धक्का दिया, सदमा दिया.. वो अभी तक हिन्दुस्तानी बिरयानी खा रहा है..) मेरी बात पर भरोसा नहीं तो नीचे लिंक दिया है खुद ही देख लीजिये-
राहुल को धक्का किसने मारा...

चलिए इसी बात पर प्रेम के स्वरुप को परिभाषित करती एक और कविता का कुठाराघात सहन करिए... जिसमे बताने की कोशिश कर रहा हूँ की प्यार में मैं कैसा रिश्ता चाहता हूँ.. मुलायजा फरमाएं---

देह नहीं बस नेह का रिश्ता
बिना किसी संदेह का रिश्ता
आती-जाती साँसों जैसा
एक सरल संवेग का रिश्ता
                                 उसके दिल में क्या चलता है
                                 ये खुद के दिल से जान सकूं
                                 एक स्रोत से जो निकला हो
                                 वो दर्दों के आवेग का रिश्ता
तन को वैसे आवश्यक है
हर फल का आहार मगर
दीर्घायु से जुड़ा है जैसे
इक ताज़े अवलेह का रिश्ता
                                  सबकुछ होकर भी कुछ ना हो
                                  औ कुछ ना होकर भी सबकुछ
                                  कुंती से वो जुड़ा था जैसे
                                  सूर्यपुत्र राधेय का रिश्ता
यूँ तो यथार्थ भी निर्देशक है
कितनी सारी रचनाओं का
कल्पनाओं से कवि का हो पर
ज्यों पावन सा स्नेह का रिश्ता
दीपक 'मशाल'
चित्र-साभार गूगल से...

30 टिप्‍पणियां:

  1. युवराज को भी तो अहसास होना चाहिए कि आम आदमी जीने के लिए रोज़ कितने धक्के खाता है...

    जय हिंद...

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  2. समझ सकती हू कितना गहरा विचार मन्थन किया है, आपने .....कविता के भाव बहुत हि खुबसूरत है!!
    आभार!!

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  3. राहुल गाँधी का किस्सा तो खैर प्रायोजित है..:)

    कविता

    यूँ तो यथार्थ भी निर्देशक है
    कितनी सारी रचनाओं का
    कल्पनाओं से कवि का हो पर
    ज्यों पावन सा स्नेह का रिश्ता

    बहुत सुन्दर!

    उत्तर देंहटाएं
  4. राजनीति जो न कराये.

    देह नहीं बस नेह का रिश्ता
    बिना किसी संदेह का रिश्ता
    और फिर बिना सन्देह का रिश्ता ही तो पावन होता है.
    बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  5. आप का यह रंग भी भा गया। मशाल नाम सार्थक कर दिया आप ने।
    फागुन में देह के रिश्ते पर भी कुछ रचिए भाई।
    :)

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  6. देह नहीं बस नेह का रिश्ता
    बिना किसी संदेह का रिश्ता
    आती-जाती साँसों जैसा
    एक सरल संवेग का रिश्ता
    ...सुंदर पंक्तियाँ

    उत्तर देंहटाएं
  7. सूर्यपुत्र राधेय का रिश्ता

    अद्भुत

    धक्के की राजनीति तो चलती ही रहेगी।

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  8. पता नहीं क्यों ....मुझे लगता है राजनीत वाले लोग ढकोसला जायदा करते है .कविता बहुत अच्छी है

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  9. deepak ji
    rajniti ko to goli maro ........magar kavita ke bhav bahut hi prabal hain aur kuch panktiyon ne to man moh liya ......shayad ha rdil ki pukar wo hi panktiyan hoti hain magar samajhne wala dil hi nhi milta kahin shayad.

    देह नहीं बस नेह का रिश्ता
    बिना किसी संदेह का रिश्ता
    आती-जाती साँसों जैसा
    एक सरल संवेग का रिश्ता

    उसके दिल में क्या चलता है
    ये खुद के दिल से जान सकूं
    एक स्रोत से जो निकला हो
    वो दर्दों के आवेग का रिश्ता

    gazab ki prastuti.

    उत्तर देंहटाएं
  10. आती-जाती साँसों जैसा
    एक सरल संवेग का रिश्ता
    ...सुंदर पंक्तियाँ

    उत्तर देंहटाएं
  11. Sahab jee maza aa gaya..
    kair prashan to abhi bhi wahin hay
    kis kamine ne mujhe dhakka diya?

    Mujhe lagata hay ki ham sabhi ke paas ek prashan puchne ka mauka ho to wo prashan hoga

    kis kamine ne mujhe dhakka diya?

    उत्तर देंहटाएं
  12. dear dipakji,

    aaj ka neta abhinenta se bhi bada abhineta
    abhineta karta sabka manoranjan, aur neta karta
    sirf aur sirf jhooth ka pradrasan, abhineta kare manoranjan to bajti hai, wah-wah aur tali
    aur kare neta dikhabe ka pradrasan to nikle sirf aur sirf moonh se Ga.................

    GAADI BULA RAHI HAI SHITI BAJARAHI
    CHALNA HI JINDGI HAI, CHALTI HI JA RAHI HAI...

    उत्तर देंहटाएं
  13. rajniti to khair rajniti hai...par kavita....or kavi dono kamal hain.

    यूँ तो यथार्थ भी निर्देशक है
    कितनी सारी रचनाओं का
    कल्पनाओं से कवि का हो पर
    ज्यों पावन सा स्नेह का रिश्ता
    bahut sundar.

    उत्तर देंहटाएं
  14. Are baba Rahul ko jaane do...lekin kavita bahut sundar likhi hai..
    bilkul nirmal vichaar..
    bas girijesh ji ki baat mat sunana...mere bhai ko bigaad rahe hain...kahbar lena hai unki :)
    hamesha ki tarah sundar..
    khus raho..
    didi..

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  15. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  16. इसको कुछ इस तरह भी कहते हैं "अंधे के हाथ बटेर लगना"
    क्यों सही है?
    वैसे आजकल सभी इसी जुगाड़ में हैं कि कोई धक्का दे और हमें शाबासी मिले.
    अच्छा खासा व्यंग्य कह सकते हैं इसे.
    कविता तो हमेशा की तरह ही.................
    जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

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  17. हा हा हा ! हमें तो टाइटल पढ़कर ही मज़ा आ गया।
    इससे आगे क्या कहें।

    उत्तर देंहटाएं
  18. तन को वैसे आवश्यक है
    हर फल का आहार मगर
    दीर्घायु से जुड़ा है जैसे
    इक ताज़े अवलेह का रिश्ता
    waah kya kahne vyang aur kavita dono ke.

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  19. bahut hi accha topic liya hai...vaise bhi Rahul Gandhi ko local train mein bhi koi problem nahi hui...VIP ke liye to vaha par bhi sab problem khatam kar di jati hai...agar problem koi face karta hai to vo hai AAM JANTA......poem is also nice...

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  20. chutkule ke saahare hi badi baat kah gaye..aur kavita to bahut hi sundar likhi hai...bas apratim

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  21. अरे दीपक भईया मीडिया है जो चाहे वह केह दे । आपकी कविता , बस क्या कहूँ शायद इसके लिए शब्द ही ना मिंले , इससे ज्यादा कुछ भी नहीं कह पाऊंगा बस लाजवाब । रही बात फागुन में देह की बात कृपया ये बतये कि क्या विदेशों में भी फागुन का खूमार छाता है ।

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  22. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 13.02.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  23. बहुत पवित्र विचारों से सजी सुन्दर रचना....भाव विभोर करती हूँ...

    उत्तर देंहटाएं

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