बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

दौड़ के आओ.. देखो कौन दम तोड़ रहा है???? ----->>>>>>>>>दीपक 'मशाल'

माहौल बड़ी तेजी से बदल रहा है.. शहर बढ़ रहे हैं और संवेदनाएं घट रही हैं......
ये सब किसी दिलचस्प फिल्म का क्लाइमेक्स नहीं बल्कि बदलते परिवेश का सच है. आज के लोगों को पड़ोसियों का पता या
ख्याल रखना तो गुज़रे ज़माने की बातें हो गई हैं साहब.. आलम ये है कि बड़े शहरों में कई लोगों को तो ये तक नहीं पता
चलता कि उनके बच्चे किस क्लास(कक्षा) या स्कूल(विद्यालय) में पढ़ रहे हैं.. या उन लोगों के खुद के माँ-बाप किस हालत में हैं. यह बात तो सभी को पता है कि ये अर्थयुग है.. मगर इसका मतलब ये तो बिलकुल नहीं कि सिर्फ और सिर्फ पैसों के पीछे ही भागा जाये. सारे विश्व में आज मानवीय संवेदनाएं डॉलर्स, पौंड या रुपये की चकाचौंध के आगे हथियार डालती नज़र आ रही हैं.. ऐसे में कई बच्चे अपने माँ-बाप के प्रेम के दो बोल सुनने को तरसते रहते हैं. वे प्रेम ना पा पाने के कारण उचित परवरिश व देखरेख के अभाव में खीझकर, एकाकी जीवन से ऊबकर हिंसक और अपराधी प्रवृत्तियों की ओर मुखातिब होते हैं. लग रहा है जैसे हमारी भावनाएं, संवेदनाएं दम तोड़ रही हैं और हमारा ध्यान कहीं और है.. किसी के पास समय नहीं है. शहरियों के लिए तो एक बिलकुल सटीक टिप्पणी किसी ने की थी कि- 'इनके पास तो मरने का भी टाइम नहीं भाई..'
समाज में पुनः संवेदना की जान फूंकने के लिए उरई की 'इप्टा' इकाई ने १० साल पहले एक नाटक की रचना की  थी... नाम था 'ढाई आखर प्रेम के'.. जिसमे कि गिरते मानवीय मूल्यों की वास्तविकता दर्शाई गयी थी. यह एक सच्ची कहानी पर आधारित नाटक था जिसमे कि एक काफी लब्ध-प्रतिष्ठित उद्योगपति अपने बच्चे को टयूशन पढ़ाने वाले अध्यापक को एक दिन जब बच्चे को कबीर के दोहे 'ढाई आखर प्रेम का' अर्थ समझाते देखता है तो आगबबूला हो जाता है और उसे नीति के दोहे पढ़ाने से मना कर देता है साथ ही हिदायत देता है कि बच्चे को सिर्फ और सिर्फ चक्रवृद्धि ब्याज और गणित इत्यादि विषय पढ़ाये जाएँ. उसका मानना था कि हिंदी और उसके दोहे बच्चे का मन भटका कर उसे वैराग्य का रास्ता दिखलायेंगे जो कि सबके लिए घातक है..
कुछ समय पश्चात् उस अध्यापक की नियुक्ति किसी अन्य शहर में हो जाती है. १२ वर्ष निकल जाते हैं.. एक दिन जब उस अध्यापक का उसी शहर में पुनः आगमन होता है तो वो उस उद्योगपति से मिलने जाता है. उसके घर पहुँच कर देखता है कि सारा नज़ारा ही बदला हुआ है.. उस पूंजीपति ने वृद्धावस्था और बीमारी के चलते खाट पकड़ ली होती है.. अध्यापक से मिलकर वह फूट-फूट कर रोने लगता है... उसे अपने जीवन की इस सबसे बड़ी गलती का बड़ा प्रायश्चित होता है कि उसने मानवीय संवेदनाओं को ज़रा भी तवज्जो ना दी. उसे लगता है कि उसने भयंकर भूल की. आज वह अपने इकलौते बेटे से त्रस्त था क्योंकि उसका पुत्र भी उसी की तरह धनलोलुप बन चुका था. वह अपने पिता की दवाओं और डॉक्टरों का इंतज़ाम तो कर देता था लेकिन खुद उनके पास कभी ना जाता क्योंकि उसे खुद अपने ही पिता से घिन आती, उनके रोगी शरीर की दुर्गन्ध वो बर्दाश्त ना कर पाता था.  इस प्रकार अंतिम समय में ही सही लेकिन उस व्यापारी को मानवीय संवेदनाओं का मूल्य पता चलता है. लेकिन हमारे पास तो अभी समय है और यदि हम अभी भी चेत जाएँ तो मानवता पैसे पर पुनः हावी हो सकती है, वर्ना भविष्य का मानव सिर्फ एक मशीन बनकर रह जायेगा जो धन-दौलत के ईंधन से चलता होगा..
साथ में एक कविता फ्री----
आज की तेज़ बारिश और कडकडाती सर्दी ने
हमें कल की गुनगुनाती धूप की कीमत तो बता दी,
जिसे हमने जाया कर दिया था यूँ ही
किसी अब याद ना पड़ने वाले कारण की दौड़-धूप में...
काश तब समझ पाते और ले पाते लुत्फ़
उस धूप के चार दिनों का
जो गिनती के मिले दिनों में
सबसे सुहाने दिन थे.. पर अब तो निकल गये शायद..
चलो अब सर्दी के तकलीफ भरे दिन ही
खुशी से जी लें यारों..
चाय, समोसे, पकौड़े और चटपटी चटनियों के संग ही सही..
पर जियें तो......  :)
दीपक 'मशाल'

25 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सही बात कही है आपने, आज हम ने जो सबसे ज्यदा खोया है, वो है... मानवता !सन्सकारो का पतन हमारी हार ही तो है!!
    रानीविशाल

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  2. मानवीय मूल्य शिक्षा की प्राथमिकताओं में अवश्य होना चाहिये.
    सोचने को मजबूर करती रचना
    साधुवाद !
    मेरा मोबाईल नम्बर : 9818330191

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  3. संवेदन-शून्य हो चुके लोगों की असलियत को उजागर करने के लिए जो आपने यह रचना की है उसके लिये आपको साधुवाद।

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  4. यथार्थ ही उकेरा है..बहुत उम्दा!

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  5. बोया पेड़ बबूल का तो आम कहा से खाए ...बच्चों को जो संस्कार दिए जाते हैं , वही लौट कर वापस आते हैं ...
    संवेदनशीलता पर बहुत सटीक चिंतन ..
    सरल सहज कविता बहुत अच्छी लगी ..

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  6. जियो मेरे शेर क्या बात कही है , कविता ने तो मन को छू लिया , सच कहूं तो कभी कभी तो बहुत अफ़सोस होता है कि यार बेकार ही पढ लिख कर शहर आ बसे ....मगर कुछ तो मजबूरियां रही होंगी
    अजय कुमार झा

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  7. दीपक जी, मानवीय संवेदना जागृत करने वाला स‍ाहित्‍य आज कोई भी अपने बच्‍चों को नहीं पढ़ाना चाहता। परिणाम हम सब भुगत रहे हैं। दुनिया से प्रेम ही समाप्‍त होता जा रहा है। बस रह गयी है प्रतिस्‍पर्द्धा। अच्‍छी पोस्‍ट बधाई।

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  8. बहुत बढ़िया .....आज इस आधुनिकता के युग में हम मानवता से दूर होते जा रहे है .

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  9. सरल सहज कविता बहुत अच्छी लगी ..

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  10. Bahut accha laga aapka ye lekh........jaisee swayam kee sonch hogee aap apane charo taraf vaise hee log paenge..... . Ye meree soch hai......

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  11. पर जियें तो...... :)
    ...........ye khyaal is tarah sugbuga rahe hain ki wah aangan, wah khel , wah samay aayega.....shuruaat hui thi sugbugane kee humse, ab tumsab ho piche....to tumhare piche kee pankti jaag hi jayegi

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  12. कितनी सच्ची बात कही है दीपक ! हम अपने बच्चों को वही पढने पर जोर देते हैं जिससे उन्हें अच्छा पैसा कमाने की उपलब्धि हासिल हो...मानवीय मूल्य तो जैसे खो से गए हैं शिक्षा व्यवस्था से.फिर आखिर वही पाएंगे जो बो रहे हैं..
    बहुत सार्थक पोस्ट.ओए भूत ही खुबसूरत कविता... शुभकामनाये

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  13. बहुत अच्छी अभिव्यक्ति है यह । इस नाटक की याद ताज़ा हो गई ।

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  14. dear dipakji
    bahut sahi likha aapne, manviya samvednaye
    aaj manav manav na raha, manav machine ho gaya
    hai, aaj manav ne apne liye itni absyaktayen utpann karli hain ki, woh har waqt unhi ko pura karne mai laga rahta hai, woh kahan samaj mai uthta vaithta hai, kahan ek doosre ko samjhta hai, aaj achhhe living standard ke liye (sirf unke liye jo sirf dikhabe mai vishwas rakhte hain) insan pata nahi kitni manviya samvednayon ko kuchalta hai.... ek sochniya vishay hai,


    dekh tere sansar ki halat kya ho gayi bhagvan
    kitna nahi poora ka poora badal gaya insan

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  15. बड़े बड़े शहरों में ऐसा ही होने लगा है--मूल्यह्रास.

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  16. Chaliye jaan kar khushee hui ki kam se kam itne log to hain jo samvednaon ke ghatne se dukhi hain..

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  17. ye problem tezi se badh rahi hai..bahut hi badiya tarike se likha hai..

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  18. आपकी बात बिलकुल सही है।हम जैसा बच्चो को दे रहे हैं, वैसा आगे हमे मिलना है।बडे शहरों का बुरा हाल है! मै तो एक लाख की आबादी वाले गांव नुमा शहर में रहता हूं, पर महानगरों की बयार यहां भी अपना रंग जमाने लगी है ।

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  19. ye 21th century hai, kahan lage hain aap samvedna ki baat karne. khud ko chot lagne par vedna hoti hai wo kya kam hai?

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  20. अब ओ इंसान मशीन होता जा रहा है लगता है।बहुत सही लिखा दीपक ये अच्छे लेखक होने का ही नही अच्छे इंसान होने का भी सबूत है।

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