शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

ऐ डॉ. लव! ऐ लव गुरु!! तुम क्या समझोगे, क्या समझाओगे प्यार को..------->>>>दीपक 'मशाल'

आज प्रेम चतुर्दशी की पूर्व संध्या पर एक कविता, जो कि वास्तव में एक ताना है कुछ रेडियो चैनल वालों के लिए आपके सामने रख रहा हूँ... इसमें मैंने रेडियो पर प्रेम सिखाने या उसे बढ़ावा देने वालों से गुज़ारिश की है कि प्रेम के मामले में हस्तक्षेप ना ही करें.. मुझे डॉ. लव या लव गुरु जैसे लोगों से और उनकी अव्यवहारिक सलाहों से बड़ी ही कोफ़्त होती है...
साथ ही आपमें से जो भी लोग ये कहते हैं कि प्रेम के लिए एक दिन नहीं होना चाहिए उनसे पूछना चाहूंगा कि भगवान की पूजा के लिए तो सारे ही दिन शुभ हैं पर हम दिवाली, होली, संक्रांति क्यों मनाते हैं... जैसे उन दिनों से कोई ना कोई प्रसंग जुड़ा होता है ठीक वैसे ही इस दिन से भी जुड़ा है...

कविता-
ऐ डॉ. लव!
ऐ लव गुरु!!
तुम क्या समझोगे, क्या समझाओगे प्यार को..
खुद भी उलझोगे और उलझाओगे प्यार को
छोडो भी यार ये तुम्हारे बस की बात नहीं है
तुम्हारे बस का काम नहीं है.. तुम्हारे बस का रोग नहीं है...
ये शफक है आफताब की
किसी मयखाने की शाम नहीं है

तुम तो उलझे हो और उलझे रहोगे
खुद भी उलझोगे और लोगों को उलझाते रहोगे
हकीकत ये है कि ये समझने समझाने का खेल नहीं है
रूठने मनाने का खेल नहीं है
बार-बार छोड़ने अपनाने का खेल नहीं है
ये तो महसूस करने की चीज़ नहीं है
और समझने का खेल तो ऊपर वाले माले में होता है
और ये काम तो बीच वाले माले के हवाले है..
क्योंकि ये मोहब्बत है.

लेकिन तुम्हारे सारे काम तो
ऊपर और नीचे वाले माले में ही होते हैं....
इसलिए ऐ लव गुरु.... ऐ डॉ. लव....
जाने भी दो यार
तुम ना सिखलाओ लोगों को... तुम ना समझाओ प्यार को
रहने भी दो तुम ना उलझाओ प्यार को..

लैला-मजनूँ बनाने से नहीं बनते..
हीर-राँझा सिखाने से नहीं बनते
क्योंकि सीखने के लिए चाहिए दिमाग और सिखाने के लिए चाहिए दिमाग
और मोहब्बत दिल से होती है... हाँ मोहब्बत दिल से होती है..
अगर तुम समझा सकते हो
अगर तुम सिखा सकते हो
तड़पना दर्द में... और ठिठुरना सर्द में
तभी हाँ सिर्फ तभी मोहब्बत सिखाना तुम..
वर्ना खुदा पाक की मासूम खूबी पे
दाग ना लगाना तुम..
वैसे मैं जानता हूँ .. कि तुम बाज़ार में हो कुछ बेचोगे जरूर
प्यार नहीं छल ही सही..
इसलिए .. हाँ इसीलिए मैं कहता हूँ हाथ जोड़ के तुमसे
कि ऐ डॉ. लव, ऐ लव गुरु...
तुम क्या समझोगे.. क्या समझाओगे प्यार को..
खुद भी उलझोगे और उलझाओगे प्यार को....
दीपक 'मशाल'
चित्र साभार गूगल से...

31 टिप्‍पणियां:

  1. सच कहा ये लव गुरु क्या समझायेंगे
    बस थोड़ी टी आर पी ले आयेंगे...उन्हें प्रेम से क्या लेना देना.


    बढ़िया और सटीक रचना.

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  2. मुहब्बत कब मिटी तेरे मिटाने से
    \
    कब जलकर राख हुई मुहब्बत तेरे जलाने से।

    कब सुपुर्दे खाक हुई तेरे दफनाने से।

    जिन्दा थी, जिन्दा रहेगी
    जिन्दा है मुहब्बत जमाने से।

    तेरे मतलब जमाना... जमाने से..बरसों से..सदियों से...

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  3. लव गुरु तो कपट के समान होते हैं। गुसांई जी ने कहा है
    जलु पच सरिस बिकाई देखहु प्रीत किरीतिभलि ।
    बिलग होई रसु जाई कपट खटाई परत पुनि । ।

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  4. बहुत ही अच्छी सबक दी है आपने इनको,ये प्यार जैसे पावन संबंध को खिलवाड़ की नजर से देखते हैं ।

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  5. वाह खूब लताडा है. दीपक जी, आप बुन्देलखंड के है क्या?

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  6. लव गुरु क्या खुद जानते है प्यार का अर्थ?? बहुत सुंदर लिखा आप ने धन्यवाद

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  7. काय दीपक जे प्रेम चतुर्दशी को जवाब नही । बढिया है ।

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  8. और समझने का खेल तो ऊपर वाले माले में होता है,
    और ये काम तो बीच वाले माले के हवाले है..
    क्योंकि ये मोहब्बत है...

    शादी करने के बाद ऊपर वाले माले पर ताले लग जाते हैं और चाबी पत्नी के पास रहती है, और बीच वाले माले के तो दीवाले निकल जाते हैं...
    क्योंकि ये मशक्कत है...

    जय हिंद...

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  9. हा हा हा ..
    लव गुरु, डॉ.लव ??
    मुझे तो लगता था सिर्फ फिल्म में ही सलमान खान ने ये काम किया ..और क्या सचमुच लोग इनपर विश्वास करते हैं...??
    दयनीय है यह...
    ये मज़ाक है ...न तो प्रेम कोई शिक्षा है न ही कोई बीमारी है....
    फिर इनलोगों की ज़रुरत भी क्या है...
    बहुत अच्छी चपत लगाई है तुमने...
    दीदी..

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  10. आपमें से जो भी लोग ये कहते हैं कि प्रेम के लिए एक दिन नहीं होना चाहिए उनसे पूछना चाहूंगा कि भगवान की पूजा के लिए तो सारे ही दिन शुभ हैं पर हम दिवाली, होली, संक्रांति क्यों मनाते हैं

    अरे कल से यही बात मेरे दिमाग में घूम रही थी...बहुत शुक्रिया उन्हें शब्द देने के लिए...चलो कोई तो हमखयाल मिला..

    कविता जबरदस्त्त है ...वाकई ये लव गुरु के बस की बात नहीं

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  11. ये शफक है आफताब की
    किसी मयखाने की शाम नहीं है
    .... बहुत ही खूबसूरत,प्रभावशाली व प्रसंशनीय अभिव्यक्ति ... बधाईंया!!!!!

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  12. बहुत सुन्दर और सटीक लिखा है आपने!
    प्रेम दिवस की हार्दिक बधाई!

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  13. अभी तो प्रेम में गोते लगाओ।
    बस यही ध्यान रखिये की अब के गुलाबों में रंग तो हैं , पर खुशबू न जाने कहाँ खो गई।

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  14. aaj badal gaya prem, badal gaye prem ke mayane
    kisi guru ke sikhane se nahi hota prem, ye to
    woh anubhuti hai, jo kare so jane,

    amir khusro sahab ki ye do line

    " khusro dariya prem ka,ulti ba ki dhar
    jo utra so doob gaya, jo dooba so paar"

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  15. Acchee post . Poona me hue visfot se itane vichlit rahe ki aaj kee tareekh hee nahee yad rahee .maine isee par kuch likha hai samay mile tp pad pratikriya denaa .
    Jai Bundelkhand .

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  16. लैला-मजनूँ बनाने से नहीं बनते..
    हीर-राँझा सिखाने से नहीं बनते.....yahi sach hai

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  17. वेलेंटाइन-डे पर बेहतरीन प्रस्तुति...वेलेंटाइन-डे की शुभकामनायें !!

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  18. आपका ब्लॉग यहाँ जोड़ दिया गया है। शायद आपको जानकर खुशी हो।
    ब्लॉगवुड

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  19. पहले मिले होते तो आपको ही बना लेते लव गुरू और प्रेम चतुर्दशी के दिन श्रीफ़ल देकर सम्मान भी कर देते।वैसे हमारा भी कालेज के दिनो मे एसोसियेशन था एफ़एलए फ़ेल्योर लवर एसोसियेशन्।

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  20. Daral sir yahan ke gulabon me to vaise bhi khusboo nahin aati.. Anil bhaia.. shukriya. :)
    Blogwood me apne aap hi jod lene ke liye benami ji ko bhi dhanyawad..

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  21. बहुत जोरदार .....प्रेम चतुर्थी की शुभकामनाये

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  22. बहुत बढ़िया परिभाषा प्रेम की !. शुभकामनायें !

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  23. वाह !!!.....बहुत सही कहा आपने ....प्यार का कोई गुरु नहीं होसकता .

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  24. prem to iishwar ka roop hai,sahi mayne me agr prem kiya jaye to...bahut badhiya likha aapane...badhai
    poonam

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