शनिवार, 27 मार्च 2010

अंग्रेजी घर तो चकाचक हिंदी के कमरे रीते हैं------->>>दीपक 'मशाल'

आबादी में इतने आगे होकर भी आबाद नहीं
सरकारी एडों में सुनते हम बिलकुल बर्बाद नहीं
सुनते हैं इतिहास मगर अब कहते हम इरशाद नहीं
तन से तो हम मुक्त हो गए मन से पर आज़ाद नहीं

पेट की आग बुझाने को नारी शोलों पे सिंकती है
देखो तो चौराहे पर फिर किसकी बेटी बिकती है
शाम हुई और बच्चों में जो भूख किसी को लगती है
राणा के महलों में अब भी घास की रोटी बनती है
दुग्धविहीन हैं माँ के स्तन इससे बड़ा अवसाद नहीं
आबादी में इतने.......

ये होंठ प्यास से सूख गए वो जोनी वाकर पीते हैं
अंग्रेजी घर तो चकाचक हिंदी के कमरे रीते हैं
बैठ के माँ के आँचल में हम होंठ उसी के सींते हैं
हम से अच्छे वो कुत्ते हैं जो टुकड़ों पे जीते हैं
लड़ना खुद से ही है यारों गैरों से कोई विवाद नहीं
आबादी में इतने.......

संसद में हैं खड़े भेड़िये भेड़ों की बोली लगती हैं
कुछ हिन्दू कुछ मुस्लिम हैं कुछ औरों जैसीं लगती हैं
जीवन की थाली में अब मज़हब की रोटी सजती हैं
हम कोरी भेड़ें हैं हम तो भावनाओं में बहती हैं
वोट बनेंगे कैसे गर जो होगा कोई फसाद नहीं
आबादी में इतने.......

इक डिब्बे में भरे हज़ार इक में सेठ और साहूकार
सेवा में सबकी तत्पर है देखो ये भारत की रेल
शयनयान के डिब्बे खाली और जनरल का निकले तेल
नेताओं सी अदला बदली कर दी गर तो जाओ जेल
जीना हो तो खाकी वर्दी से करना कभी विवाद नहीं
आबादी में इतने.......

मार के भईया जाओ जेल फिर कुछ दिन में पाओ बेल
शहाबुद्दीन औ पप्पू यादव यादव खेलें अक्कड़-बक्कड़ खेल
कारागार में मोबाईल है पुलिस-चोर का सुन्दर मेल
 गुण्डे पाके पुलिस सुरक्षा खूब मचाएं रेलमपेल
जीभ जो उनकी चख ना पाए ऐसा कोई सवाद नहीं
आबादी में इतने.......

हल्का हुआ कानून तराजू पल-पल देखो इत-उत डोले
 कोयले वाले शीबू भैया सीधे-सादे कुछ ना बोले
लेकर जान बेजुबान की सल्लू गाये ओले-ओले
पत्रकार साहब ने अब तो झूठे सारे चिट्ठे खोले
बिक गया चौथा स्तम्भ भी बाकी कोई विषाद नहीं
आबादी में इतने.......

बोलो-बोलो कीमत बोलो हर बाबू बिक जायेगा
राम नाम का सौदा करके हर साधू बिक जायेगा
अब भी अगर ना अंकुर फूटा चेतनाओं के बीजों से
तलवारों की नोकों से फिर इतिहास नया लिख जायेगा
और मरा पेड़ जीवित जो कर दे ऐसी कोई खाद नहीं
आबादी में इतने.......

दीपक 'मशाल'

28 टिप्‍पणियां:

  1. बोलो-बोलो कीमत बोलो हर बाबू बिक जायेगा
    राम नाम का सौदा करके हर साधू बिक जायेगा

    बिक क्या जायेगा सब बिके हुए है
    जाने कैसे ये सब अब तक टिके हुए हैं
    सुन्दर मारक रचना

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  2. तलवारों की नोकों से फिर इतिहास नया लिख जायेगा

    Bilkul sahi kaha hai deepak bhai

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  3. बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

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  4. और मरा पेड़ जीवित जो कर दे ऐसी कोई खाद नहीं
    सार्थक रचना ,मन की गहराई से उठी हुई , समाज में इतनी सडन फ़ैल चुकी है ..की अब घर के अन्दर बैठ कर काम नहीं चलेगा

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  5. जीवन की थाली में अब मज़हब की रोटी सजती हैं
    हम कोरी भेड़ें हैं हम तो भावनाओं में बहती हैं
    ......बहुत गहराई है सर जी .....
    ................
    धर्म के जानकार लोगों से माफी सहित ....
    धर्म के बारे में लिखने ..एवं ..टिप्पणी करने बाले.. तोता-रटंत.. के बारे में यह पोस्ट ....मेरा कॉमन कमेन्ट है....
    http://laddoospeaks.blogspot.com/2010/03/blog-post_27.html

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  6. बोलो-बोलो कीमत बोलो हर बाबू बिक जायेगा
    राम नाम का सौदा करके हर साधू बिक जायेगा
    अब भी अगर ना अंकुर फूटा चेतनाओं के बीजों से
    तलवारों की नोकों से फिर इतिहास नया लिख जायेगा
    और मरा पेड़ जीवित जो कर दे ऐसी कोई खाद नहीं
    आबादी में इतने.......बहुत बढ़िया

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  7. bahut hi sundar rachna ,,,bharat ki durdsha ko dikhaati hui anmol rachna....aur bhai sahab aapki photos to ek dum aapke lekh jaisa hi tahlka macha diya hai ...

    विकास पाण्डेय
    www,vicharokadarpan.blogspot.com

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  8. ये होंठ प्यास से सूख गए वो जोनी वाकर पीते हैं
    अंग्रेजी घर तो चकाचक हिंदी के कमरे रीते हैं
    बैठ के माँ के आँचल में हम होंठ उसी के सींते हैं
    हम से अच्छे वो कुत्ते हैं जो टुकड़ों पे जीते हैं
    लड़ना खुद से ही है यारों गैरों से कोई विवाद नहीं

    आपकी मान्यता पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

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  9. हर पंक्ति दाद मांगती है, इसलिए चंद पंक्तियां दे कीमत कम नहीं करुँगा.

    बहुत उम्दा रचना!! वाह!!

    ढेर तस्वीर लगा लिए हो उड़नतश्तरी टाईप खुद की बाजू में. :)

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  10. इंकलाबी रंग, जज्बाती रंग।
    कुछ बदले बदले नजर आए मशाल भाई।

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  11. hamesha ki tarah DHAAAAAAAAAAAAAAARAAAAAAAAAAAAAAAADAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAARRRRRRRRRRRRRRRR

    Asheerwad
    -------------

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  12. पेट की आग बुझाने को नारी शोलों पे सिंकती है
    देखो तो चौराहे पर फिर किसकी बेटी बिकती है
    शाम हुई और बच्चों में जो भूख किसी को लगती है
    राणा के महलों में अब भी घास की रोटी बनती है
    दुग्धविहीन हैं माँ के स्तन इससे बड़ा अवसाद नहीं
    आबादी में इतने.......
    वाह वाह जबाब नही , बहुत सुंदर रचना
    धन्यवाद

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  13. हम खुद इसके हैं ज़िम्मेदार सही चिन्तंन

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  14. राजनैतिक और सामजिक मुद्दों को उठाती सार्थक रचना....

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  15. title बहुत ही अच्छा चुना और कविता की तारीफ के लिए शब्द कम पड़ रहे है. बहुत से मूद्दे एक कविता में पिरो दिए है.

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  16. afsos to ise baat ka hai ki aisee umdaa soch wale rajneeti me aana hee nahee chahte.Jo dhara pravah chal raha hai sabhee bas useeke sath bah rahe hai.......aur aam janata jo paros diya jata hai....usee me kaam chala rahee hai.....khusur pusur hotee hai.par awaz koi nahee uthata.krantee
    badlav lane se aaega sirf chintan se nahee.......sashakt rachana.....mujhe to jhakjhor gayee.......
    yuva varg kee soch se aashavst hoo bharat ka bhavishy ab ujval nazar aa raha hai.......

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  17. कविता की तो बात ही क्या, इसका शीर्षक ही बड़ा सार्थक है ।
    आपने सचाई बयान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.. पर, यू नो This happens in India only :)


    @ Apanatva इन्हें राजनीति मे आने का अपनत्व सँदेश न ही दें, वरना यह उल्टा राग अलापने को बाध्य हो जायेंगे ! राजनीति में ऎसे मुखर चेतना का क्या काम ?

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  18. आज इंसान का धर्म,
    दूसरे को सुखी देखकर जलना,
    अपना ही राग अलापते रहना,
    अपनों की ही टांग खींचना,
    इंसानियत छोड़ और सब कुछ करना...

    जय हिंद...

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  19. अब भी अगर ना अंकुर फूटा चेतनाओं के बीजों से
    तलवारों की नोकों से फिर इतिहास नया लिख जायेगा
    क्या कविता लिखी है...वाह..वाह...हर पंक्ति दाद देने लायक...
    बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति

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  20. सावधान और सचेत करती सुंदर रचना

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  21. dipakji jo aapki kavita ek baar pad le
    vah sirf intjar karta hai. aapki kavitaon ka

    is kavita ko padkar poore shareer main ek hulchal si paida kardi, is kavita par mare paas shabd nahin hain ki mai kya bolun,
    ek aur dil ko chholene bali kavita

    aapka dhanyabad

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  22. डॉ. अमर सर शायद सही कह रहे हैं आप.. राजनीति उन्ही लोगों के हाथ में रहने देना चाहिए जो उसे स्वहित में इस्तेमाल कर रहे हैं..

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  23. hmari aaj ki smajik rajnaitik vyvstha par bahut hi karara vygy hai .
    achhi rachna

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  24. काफी कुछ कह जाति है ये व्यंग्य और कटाक्ष के बीच कि रचना

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  25. सचमुच एक मशाल की तरह जलती एक ख़ूबसूरत रचना . वाह आनंद आ गया . बधाई दीपक जी .

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