गुरुवार, 25 मार्च 2010

कविता----------------->>>>दीपक 'मशाल'


ज़िन्दगी वेताल बनके हर रोज़ सुनाती रहती है
एक नई कहानी उसे
और शाम को.. जब वो उसका बोझ ढोते-ढोते थक जाता है
तो भयानक अट्टहास के साथ लगती है पूछने रहस्यमय जवाब
उस कहानी से उपजे.. उससे जन्मे
पुरानी दिल्ली की ज़मीं और आसमाँ के बीच के
मकड़जाली बिजली के तारों के से उलझे सवाल का

वो विक्रम की तरह मजबूर होकर
दे तो देता है कुछ तार्किक सा जवाब
मगर तब भी हार ही जाता है
वो जीत कर भी हार ही जाता है
क्योंकि जान कर भी चुप रहने पर
और बोलने पर भी
उसे खोना ही होता है कुछ तो.. सबकुछ तो

और इसी तरह चलती रहती है
ज़िन्दगी की वेताल-पचीसी
उफ्फफ्फ्फ़.. पचीसी नहीं वेताल-अनन्ती..
दीपक 'मशाल'

25 टिप्‍पणियां:

  1. यही तो ज़िन्दगी है...
    न जाने कितने मक्कड़जालों में उलझी हुई सी...
    कितना अच्छा होता अगर जीवन काम्पर्तमेंट्स में बंटीं होती ....तो बेताल सवाल भी नहीं करता और सचमुच ये वेताल-पचीसी ही होती ..क्यूंकि काम्पर्तमेंट्स जो गिनती के ही होते..
    बहुत सुन्दर कविता...यथार्थ से दो-चार करा ही गई....

    और तसवीरें तुम्हारी कमाल की हैं....आखिर मेरे भाई हो तो ऐसा तो होना ही है....:)
    बहुत सुन्दर...
    जीते रहो...!!

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  2. काबिलेतारीफ बेहतरीन

    Sanjay kumar
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  3. विक्रम बेताल के बिम्ब का यह अच्छा प्रयोग है लेकिन यह बिम्ब अब काफी पुराना हो गया है । नये बिम्बों की तलाश करते रहो ।

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  4. जिंदगी के यथार्थ को कहती अच्छी अभिव्यक्ति..

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  5. और इसी तरह चलती रहती है
    ज़िन्दगी की वेताल-पचीसी
    उफ्फफ्फ्फ़.. पचीसी नहीं वेताल-अनन्ती..

    बहुत सुन्दर !

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  6. उस ज़माने का बेताल कम से कम जवाब देने के बाद कंधे से उतर तो जाता था ...आज तो रोज नए बेताल चढ़ जाते है ...और जब घबरा कर आइना देखते है खुद से ज्यादा बेताल नज़र आते हैं

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  7. दीपक जी
    कमाल कर दिया…………।ज़िन्दगी को एक अलग ही नज़रिये से दिखा दिया।

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  8. बढ़िया प्रतीकों के माध्यम से सुन्दर काव्य रचना है!

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  9. ज़िंदगी इसी का नाम है दीपक।बहुत खूब लिखा है इतनी कम उम्र मे ज़िंदगी का निचोड़ सामने रख दिया है।

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  10. OMG. मैने अबतक जितनी भी आपकी लिखी कवितायेँ पढ़ीं हैं ..ये मुझे सबसे अच्छी लगी..what an intelligent thought...superb.

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  11. jeevan ka sach

    yahi aaj ka jeevan hai

    aap to vaise bhi kamaal likhte hain

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  12. जीवन को हूबहो चित्रित करती बेमिसाल रचना ...

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  13. वो विक्रम की तरह मजबूर होकर
    दे तो देता है कुछ तार्किक सा जवाब
    मगर तब भी हार ही जाता है
    हारना उसकी नियति है क्योकि वह आम आदमी जो है

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  14. बेताल कहानियां बचपन मै बहुत पढी, तब यह सब समझ मै नही आता था, आज समझ मै आता है कि हम सब मजबूर है...

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  15. दीपक जी ..बहुत बढ़िया प्रस्तुति....अच्छी रचना

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  16. Bahut acchi rachana....Zindagi ke kai mod par har insaan khud ko vikram ki tarah majbur hi pata hai aur chal jaata hai betaal use hamesha ki tarah..

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  17. हार जीत चलता रहे यह जीवन इक गीत।
    जीवन में संघर्ष है यही है सचमुच मीत।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  18. बहुत खूब .......बहेतरीन प्रस्तुति .

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