~~मुझे नहीं होना बड़ा~~
आज फिर सुबह-सुबह से शर्मा जी के घर से आता शोर सुनाई दे रहा था. मालूम पड़ा किसी बात को लेकर उनकी अपने छोटे भाई से फिर कलह हो गयी.. बातों ही बातों में बात बहुत बढ़ने लगी और जब हाथापाई की नौबत आ पहुँची तो मुझसे रहा नहीं गया. हालांकि बीच बचाव में मैं भी नाक पर एक घूँसा खा गया और चेहरे पर उनके झगड़े की निशानी कुछ खरोंचें चस्पा हो गयीं, मगर संतोष इस बात का रहा कि मेरे ज़रा से लहू के चढ़ावे से उनका युद्ध किसी महाभारत में तब्दील होने से बच गया. चूंकि मेरे और उनके घर के बीच में सिर्फ एक दीवार का फासला है, लेकिन हमारे रिश्तों में वो फासला भी नहीं. बड़ी आसानी से मैं उनके घर में ज़रा सी भी ऊंची आवाज़ में चलने वाली बातचीत को सुन सकता था. वैसे तो बड़े भाई अमित शर्मा और छोटे अनुराग शर्मा दोनों से ही मेरे दोस्ताना बल्कि कहें तो तीसरे भाई जैसे ही रिश्ते थे लेकिन अल्लाह की मेहरबानी थी कि उन दोनों के बीच आये दिन होने वाले आपसी झगड़े की तरह इस तीसरे भाई से कोई झगडा ना होता था.
जिस वक़्त दोनों भाइयों में झगडा चल रहा था तब अमित जी के दोनों बेटे, बड़ा ७-८ साल का और छोटा ४-५ साल का, सिसियाने से दाल्हान के बाहरी खम्भों ऐसे टिके खड़े थे जैसे कि खम्भे के साथ उन्हें भी मूर्तियों में ढाल दिया गया हो. मगर साथ ही उनकी फटी सी आँखें, खुला मुँह और ज़ोरों से धड़कते सीने की धड़कनों को देख उनके मूर्ति ना होने का भी अहसास होता था.
झगड़ा निपटने के लगभग आधे घंटे बाद जब दोनों कुछ संयत होते दिखे तो उनकी माँ, सुहासिनी भाभी, दोनों बच्चों के लिए दूध से भरे गिलास लेके आयी..
''चलो तुम लोग जल्दी से दूध पी लो और पढ़ने बैठ जाओ..'' भाभी की आवाज़ से उनके उखड़े हुए मूड का पता चलता था
बड़े ने तो आदेश का पालन करते हुए एक सांस में गिलास खाली कर दिया लेकिन छोटा बेटा ना-नुकुर करने लगा..
भाभी ने उसे बहलाने की कोशिश की- ''दूध नहीं पियोगे तो बड़े कैसे होओगे, बेटा..''
''मुझे नहीं होना बड़ा'' कहते हुए छोटा अचानक फूट-फूट कर रोने लगा.. ''मुझे छोटा ही रहने दो... भईया मुझे प्यार तो करते हैं, मुझसे झगड़ा तो नहीं करते..''
दीपक 'मशाल'चित्र साभार गूगल से

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