बुधवार, 10 मार्च 2010

~~मुझे नहीं होना बड़ा~~------->>>>दीपक 'मशाल'

~~मुझे नहीं होना बड़ा~~

आज फिर सुबह-सुबह से शर्मा जी के घर से आता शोर सुनाई दे रहा था. मालूम पड़ा किसी बात को लेकर उनकी अपने छोटे भाई से फिर कलह हो गयी.. बातों ही बातों में बात बहुत बढ़ने लगी और जब हाथापाई की नौबत आ पहुँची तो मुझसे रहा नहीं गया. हालांकि बीच बचाव में मैं भी नाक पर एक घूँसा खा गया और चेहरे पर उनके झगड़े की निशानी कुछ खरोंचें चस्पा हो गयीं, मगर संतोष इस बात का रहा कि मेरे ज़रा से लहू के चढ़ावे से उनका युद्ध किसी महाभारत में तब्दील होने से बच गया. चूंकि मेरे और उनके घर के बीच में सिर्फ एक दीवार का फासला है, लेकिन हमारे रिश्तों में वो फासला भी नहीं. बड़ी आसानी से मैं उनके घर में ज़रा सी भी ऊंची आवाज़ में चलने वाली बातचीत को सुन सकता था. वैसे तो बड़े भाई अमित शर्मा और छोटे अनुराग शर्मा दोनों से ही मेरे दोस्ताना बल्कि कहें तो तीसरे भाई जैसे ही रिश्ते थे लेकिन अल्लाह की मेहरबानी थी कि उन दोनों के बीच आये दिन होने वाले आपसी झगड़े की तरह इस तीसरे भाई से कोई झगडा ना होता था.
जिस वक़्त दोनों भाइयों में झगडा चल रहा था तब अमित जी के दोनों बेटे, बड़ा ७-८ साल का और छोटा ४-५ साल का, सिसियाने से दाल्हान के बाहरी खम्भों ऐसे टिके खड़े थे जैसे कि खम्भे के साथ उन्हें भी मूर्तियों में ढाल दिया गया हो. मगर साथ ही उनकी फटी सी आँखें, खुला मुँह और ज़ोरों से धड़कते सीने की धड़कनों को देख उनके मूर्ति ना होने का भी अहसास होता था.
झगड़ा निपटने के लगभग आधे घंटे बाद जब दोनों कुछ संयत होते दिखे तो उनकी माँ, सुहासिनी भाभी, दोनों बच्चों के लिए दूध से भरे गिलास लेके आयी..

''चलो तुम लोग जल्दी से दूध पी लो और पढ़ने बैठ जाओ..'' भाभी की आवाज़ से उनके उखड़े हुए मूड का पता चलता था
बड़े ने तो आदेश का पालन करते हुए एक सांस में गिलास खाली कर दिया लेकिन छोटा बेटा ना-नुकुर करने लगा..

भाभी ने उसे बहलाने की कोशिश की- ''दूध नहीं पियोगे तो बड़े कैसे होओगे, बेटा..''

''मुझे नहीं होना बड़ा'' कहते हुए छोटा अचानक फूट-फूट कर रोने लगा.. ''मुझे छोटा ही रहने दो... भईया मुझे प्यार तो करते हैं, मुझसे झगड़ा तो नहीं करते..''
दीपक 'मशाल'
चित्र साभार गूगल से

40 टिप्‍पणियां:

  1. मार्मिक. बच्चे कभी-कभी कितनी बड़ी बात कर बैठते हैं.

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  2. dipak bhai...bahut sahi kaha.....aksar bade ladte hue bhul jate hein ki bache unhe dekh rahe hei.....aksar dekha hei, bado ko ladte hue dekh, bache ro padte hei.....bechare komal maan pyar umad ata hei unhe dekhkar.....

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  3. दिल तो बच्चा है , काश सबका दिल बच्चे की तरह साफ हो

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  4. बेहद मार्मिक ...यही होता है ...बच्चे शुरू से जो माहोल देखते हैं उनके व्यक्तित्व पर उसका असर पड़ता है..
    दीपक.! आपके ब्लॉग पर ये ऊपर से टपकते दिल अच्छे तो बहुत लगते हैं पर पोस्ट पढने में बहुत असुविधा होती है :)शब्दों के बीच में टपक पड़ते हैं और फ्लो टूट जाता है

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  5. बहुत खूब परिवारों में छोटे बड़े भाई के बीच छोटे बड़े को लेकर झगड़े जरुर होते हैं ... और यह भी सत्य है की बड़ा कोई नहीं होना चाहता . नाइस

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  6. किसी कवि(शायद दुष्यंत...पर sure नहीं हूँ) ने कहा था..."मेरे अंदर का मासूम बच्चा
    इन बड़ों की दुनिया देख
    बड़ा होने से डरता है"
    और ये तो सचमुच ही बच्चे थे,कैसे ना डरते?

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  7. Bahut acchi post ...nishachal man duniya ki chaturaiyon se dur hota hai isiliye agyan me bhi bahut bada sach kah jata hai....

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  8. एक आम घटना कितना ख़ास सन्देश दे गई ,बच्चों को तो कह देते है "नो बेटा गन्दी बात " पर बड़ों को कौन समझाए

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  9. दीपक ठीक यही बात बहुत बार मन में आई खासकर जब एक ही कमीज निक्कर बदल बदल कर पहनते अपने भाई से दुनियादारी की बहुत सी बातों की समझ हुई
    अजय कुमार झा

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  10. ''मुझे छोटा ही रहने दो... भईया मुझे प्यार तो करते हैं, मुझसे झगड़ा तो नहीं करते..'' काश हम इन बच्चो से ही कुछ सीख ले, दीपक बहुत सुंदर बात कह दी आप ने अपने इस लेख मै.
    धन्यवाद

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  11. सच है भाई हम भी तो बड़े होकर पछ्ता रहे हैं

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  12. bahut bahut bahut hi acchi laghu-katha...
    hamse to acche bacche hi hain...unse hi kuch seekh lein ham..
    bahut hi saarthak sandesh diya hai tumne...
    accha laga...
    didi..

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  13. bhai jaisa payr nahi gar taqrar na hoto.

    kaha gya hai,

    ek sarthak sandeshi huyi laghukatha.

    aabhar

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  14. बहुत ही सुंदर पोस्ट, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  15. बच्चे की बात बिलकुल सही है मै तो आक़्प बचपन मे लौट जाना चाहती हूँ क्या है कोई तरीका? बहुत भावमय प्रसंग है आशीर्वाद ।

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  16. बहुत ही मार्मिक व शिक्षाप्रद लगी कहानी ।

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  17. स्वार्थ बचपन में भी होता है...लेकिन ये पेंसिल, कलर, खिलौने, खाने-पीने की चीज़ें, मां-बाप के प्यार को लेकर होता है...जो जो इंसान बड़ा होता है भौतिकतावादी सुख के लिए और लालची होता जाता है, पहले अपने लिए, फिर अपनी संतान के लिए...ये मैक्सिमम अपने लिए हासिल करने की प्रवृत्ति ही टकराव में तब्दील होती है...क्योंकि अपने मैक्सिमम का मिनीमम में बदलने का डर अपने सगों से ही ज़्यादा होता है, इसलिए टकराव भी वहीं सबसे ज़्यादा होता है...

    पूत कपूत तो का धन संचय,
    पूत सपूत तो का धन संचय...

    जय हिंद...

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  18. गज़ब बहुत बड़ा सन्देश,बहुत ही सराहनीय,छोटा बच्चा तो अनजाने में बहुत बड़ी बात कह गया.

    विकास पाण्डेय
    www.विचारो का दर्पण.blogspot.com

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  19. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  20. Khushdeep bhaia, aapne is tarah ke jhagdon ka mool bata diya.. chand shabdon me behatreen vivechan kar diya us karan ka..
    Abhar..:)
    Jai hind...

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  21. ab bachhe bade ho gaye aur bade
    ab cachhon ke jaisa vahvhar karne lage hain

    sahi hai yadi dil main prem ho to koi bhi
    na chhota na bada

    dhanyabad

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  22. हमारा आचरण बच्चों को कितना प्रभावित करते है...मार्मिक संदर्भ.


    मेरे अंदर का मासूम बच्चा
    इन बड़ों की दुनिया देख
    बड़ा होने से डरता है...

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  23. हम समाज में बड़े भाइयों को भी देख रहे हैं जैसा आपने चित्र में भी बताया है और अपने परिवारों में भी। छोटे भाइयों को भी देख रहे हैं जो प्‍यार से लड़ते भी हैं तो साथ रहते भी हैं। यह सत्‍य है कि आज छोटे भाइयों को देखकर हमेशा मन डर सा जाता है कि ये भी क्‍या बड़े होकर भौतिक संसाधनों के लिए आपस में बैर साध लेंगे? अच्‍छी पोस्‍ट।

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  24. बड़ों की बेवकूफियों का बच्चों पर बहुत जल्दी विपरीत प्रभाव पड़ता है।
    सही लेखन।

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  25. बच्चे मन के सच्चे
    सारे जग की आँख के तारे

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  26. aapki laghukathaa jivan ki sachchaai bataa gai balman jesa dekhataa hai.vesaa hi aachran karne lagtaa hai .yah aacharan kab aadat ban jaataa hai pataa hi nahi chaltaa?

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  27. स्तब्ध कर दिया आखिरी लाइन ने दीपक , लगता बच्चे बेहद समझदार हैं बिना किसी कलुषित भावना के !

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