शनिवार, 16 जनवरी 2010

मिलन####### पहला भाग पढ़े बिना इसे तो मत ही पढना--दीपक मशाल

वैसे मुझे उम्मीद तो थी कि कहानी के पाठक दुनिया में ज्यादा हैं इसलिए मैंने अपनी ये पुरानी कहानी ब्लॉग पर डाली लेकिन मेरा विश्वास टूट गया, फिर भी मैं शुक्रगुज़ार हूँ रश्मिप्रभा मम्मी जी का, हरकीरत हकीर जी का, वंदना जी का और कुमारेन्द्र चाचा जी का जिन्होंने निरंतर मेरी हौसला अफजाई की, जबकि व्यस्तता के कारण मैं आजकल टिप्पणियों के लेनदेन का खेल नहीं खेल पा रहा.... लेकिन जल्दी ही आप सबके लेखन की क्लास में बैठ के कुछ सीखने जरूर आऊंगा.. तब तक के लिए आशीर्वाद चाहता हूँ, स्नेह चाहता हूँ.....

अब परिष्कृत इस उलझन में था कि जाना चाहिए भी या नहीं, वैसे स्तव्या का घर स्कूल से लौटते वक़्त रास्ते में ही तो पड़ता था मगर जाने क्यों उसकी हिम्मत जवाब दे रही थी और रोज़ उसी रास्ते से गुज़रते रहने के बावजूद आज घर लौटते हुए वो रास्ता उसे कुछ नया नया सा लग रहा था. पर जब परिष्कृत स्तव्या की गली के सामने से गुज़रा तो उसके कदम अपने आप ही धीमे हो गए. अनायास ही नजर गली के भीतर चली गई, देखा तो स्तव्या अपने घर के बाहर खड़ी हुई मुस्कुरा कर उसका स्वागत कर रही थी. परिष्कृत को उसके घर जाना ही पड़ा.
      अन्दर जाकर पता चला कि स्तव्या की बड़ी बहिन अपने साइंस चार्ट पर नामांकन को लेकर परेशान थी. स्तव्या ने ही उन्हें परिष्कृत की सुन्दर राइटिंग और आर्ट के बारे में बताकर घर बुलाने का सुझाव दिया था. जिस तरह पानी अपना रास्ता आप ही बना लेता है उसी तरह अगर हम किसी को सच्चे दिल से चाहें तो उसके करीब जाने या उसे करीब लाने के लिए बहाने ढूंढते देर नहीं लगती, ऐसा ही कुछ इन दोनों के साथ हो रहा था.
        धीरे धीरे ये सभी जान गए कि परिष्कृत और स्तव्या अच्छे दोस्त हैं पर वो दोनों भी ये बहुत अच्छी तरह से जानते थे कि उम्र बढ़ने के साथ साथ उनका समाज और समाज के ठेकेदार उनकी दोस्ती पर उंगली पर दोस्ती जरूर उठाएंगे और उन्हें उनका ज्यादा दिन का साथ रास ना आएगा क्योंकि एक लड़का था और एक लड़की.
     किशोरावस्था के समतल मैदान की तंग गलियों को पार करती हुई जिंदगी, जवानी की हसीन, रंगीन और खूबसूरत वादियों में आ चुकी थी. सारी फिजां में  रंगों, खुशबुओं और रौशनी के सिवाय कोई और चीज़ तो जैसे नज़र ही ना आती थी. आखिर जवानी है ही ऐसी उम्र जब हर युवा अपने आपको दुनिया का बादशाह समझने लगता है, अपनी हर बात पे इतना गरूर कि खुद गरूर भी शर्मा जाये. मगर इन दोनों का संसार तो एक दूसरे में ही सिमटा हुआ था, दोनों एक दूसरे के पर्याय बन चुके थे. कब हँसते-रोते, खेलते-गाते, रूठते-मनाते, एक दूसरे को समझते उनके अल्हड़पन के दिन पीछे निकल गए कुछ पता ही ना चला. अंग्रेजी में एक कहावत है कि 'टाइम फ्लाइज' सच में सुनहरे पंखों वाली चिडिया उन दोनों को दसवीं से बारहवीं और फिर बारहवीं से स्नातक तक ले गयी. चूंकि उनके कसबे में डिग्री कॉलेज ना था इसलिए दोनों एकसाथ एक ही बस में पास के शहर के डिग्री कॉलेज में पढ़ने जाने लगे. जाने कितनी ही प्रिय-अप्रिय घटनाओं ने इस दौरान इन दोनों को और भी मजबूत बंधन में जकड़ दिया. बस में एक दिन एक लड़का बराबर स्तव्या को घूरे जा रहा था, परिष्कृत से ये सब बर्दाश्त ना हुआ. बस से उतरकर परिष्कृत ने स्तव्या को कॉलेज छोड़ा और खुद वापस आकर उस लड़के का पता मालूम किया और जा भिड़ा उससे. बात जब स्तव्या को पता चली तो वो फूट-फूट कर रोई और अपनी कसम देते हुए उसने परिष्कृत को आगे से ऐसा कुछ ना करने को कहा.
          ग्रेज़ुएशन के दौरान ही परिष्कृत ने इंजीनिअरिंग कॉलेज में प्रवेश परीक्षा कि तैयारी शुरू कर दी थी. पता नहीं इसे उसकी मेहनत कहें या स्तव्या का भाग्य कि उसका आई.आई.टी. में चयन हो गया. जल्दी ही उसे आई.आई.टी. दिल्ली ज्वाइन करना पड़ा. उधर स्तव्या को कुछ सूझ ही नहीं पड़ रहा था कि परिष्कृत के स्वर्णिम भविष्य कि खुशियाँ मनाये या अपने पतझड़ जैसे वर्तमान के ग़मों में डूब जाए. परिष्कृत की क्लासेस शुरू हो गयीं थीं. क्या पता था स्तव्या को कि उसका आज का सूरज, उसका आँख का तारा कल का ईद का चाँद बन जायेगा. परिष्कृत के बिना एक-एक पल एक-एक सदी के बराबर था. उधर परिष्कृत का भी ऐसा ही हाल था शायद इसीलिये भावावेश में उसने स्तव्या को एक ऐसा पत्र लिख दिया जिसमे उसने अपने प्यार का खुल कर इज़हार किया था. आखिरकार वर्षों का धैर्य का बाँध टूट चुका था और वो खुद को ऐसा करने से रोक ना पाया.
       लेकिन जब बुरा वक़्त आता है तो अकेला नहीं आता, अपने साथ अपने यार, दोस्त और रिश्तेदारों को भी लेके ही आता है. परिष्कृत का इकरारनामा स्तव्या की मम्मी के हाथों लग गया. मम्मी ने परिष्कृत को बहुत भला-बुरा कहा और स्तव्या से एक दूरी बना ली जैसे उसने कोई पाप किया हो, वो अछूत हो गई हो. वैसे भी बचपन से ही उसे और भाई-बहिनों कि तुलना में कम ही प्यार मिला था, कहीं ना कहीं ये भी एक कारण था उसका परिष्कृत से प्यार पाकर उसकी तरफ खिंचे चले जाने का.
   स्तव्या के लिए 'योग्य वर' कि खोज तेज़ कर दी गयी.  एक तरफ स्तव्या के लिए सरगर्मियों से लड़के की खोज चल रही थी तो दूसरी तरफ इन दोनों की मोहब्बत परवान चढ़ रही थी.वे दूर थे तो सिर्फ शरीर से, दिल से तो इतने करीब थे कि दूर रह कर भी दोनों एक दूसरे कि धडकनें सुन सकते थे.
     ये उनकी मोहब्बत की पाकीजगी ही थी जो उन्होंने कभी हदें पार नहीं कीं, कभी जो स्पर्श होता तो महज़ एक दूसरे को ढाढस बंधाने के लिए ही होता.
     ना जाने कितने ही रिश्ते नकार चुकी थी स्तव्या, हर लड़के में कोई ना कोई नुक्श निकाल ही देती. पर एक दिन ऐसा आया कि घरवालों ने उसकी एक ना चलने दी. पुलकित नाम था लड़के का पी.सी.एस. अधिकारी था, खानदान, मान मर्यादा दुनिया की नज़रों से देखा जाये तो सब कुछ मगर स्तव्या कि नज़रों से कुछ भी नहीं, क्योंकि जो नज़रें हीरे की चमक जानती हों उन्हें सूरज की  रौशनी में चमकते कांच के टुकड़े नहीं लुभा सकते थे. खैर, वो दिन भी आया जब लड़के वाले उसे देखने आये.... उसे प्रदर्शनी कि वस्तु की माफिक सजा-धजा के पेश किया गया और बाजारू  चीज़ की तरह चुन लिया गया. लाख कोशिश कि स्तव्या ने... यहाँ तक कि पुलकित को भी समझाया मगर इस बार.....
            लगा के जैसे ख्वाबों का अंतरमहल ढह गया. अब कोई ऐसा पल ना रहता जब आँख में नमी ना रहे. उसकी उदासी को देख बाहर के लोगों के साथ साथ रिश्तेदार और घर के सदस्य भी ताने कसने लागे. ऐसे समय में कोई सहारा था तो सिर्फ परिष्कृत.
         बातों ही बातों में एक दिन परिष्कृत ने उसे समझाया कि-
     ''शायद यही नियति है- 'वे' नहीं चाहते कि इस जीवन में हम एक दूसरे के जीवन साथी बन  कर रहें, मगर मन से तो हमें कोई नहीं रोक सकता ना, मन से तो हम कब के एक दूसरे के जीवनसाथी बन चुके हैं. अब तन का मिलन हो या ना हो कोई फर्क तो नहीं पड़ता.'' परिष्कृत को ईश्वर पर अटूट विश्वास था, परमपिता को अपने पिता मानता वो और उन्हें ईश्वर या खुदा कहके नहीं बल्कि 'वे' या 'उन्हें' कह कर ही संबोधित करता था और यहाँ भी ईश्वर को ही 'वे' कहा था उसने.
       एक क्षण को स्तव्या को लगा कि परिष्कृत भी उससे छुटकारा पाना चाहता है. लेकिन अगले ही पल परिष्कृत ने कहा-
  ''एक बात हमेशा याद रखना, जिंदगी में कभी परेशानियों से हार मत मानना, कभी किसी ज़ुल्म के आगे सिर मत झुकाना और कभी कोई ऐसा कदम मत उठाना कि........''
   ''परिष्कृत....''
  ''मेरी जिंदगी तुम्हारी जिंदगी से जुड़ी है और हाँ हम मिलेंगे जरूर, भले ही कुछ देर हो जाये.... अब चाहे वो देर कुछ महीनों की हो, कुछ वर्षों की या कुछ ज़न्मों की...... हम इंतज़ार कर लेंगे..''
   ''मगर मैं अपने आप को ज़रा भी तैयार नहीं कर पा रही कि कैसे उस शख्स से बात किये बिना सारी उम्र बिता पाउंगी, जिसके बिना एक पल भी नहीं बिता सकती, एक सांस भी नहीं ले पाती...''
    ''तुम ऐसा क्यों समझ रही हो स्तव्या कि ये सिर्फ हमारे साथ हो रहा है. अरे दुनिया की खातिर जो खुद राधा से जुदा हो गए, जो इक जान होकर भी दो जिस्मों में रहे, शायद उनकी भी यही मर्ज़ी है कि हम भी उनके नक्शेकदम पर चलें और फिर हम इतने स्वार्थी भी तो नहीं बन सकते कि अपनी ख़ुशी की खातिर अपने मम्मी-पापा कि खुशियों का गला घोंट देन, सच्चा प्यार मतलबी नहीं होता स्तव्या, वो तो क़ुरबानी देना जानता है.''
         ''मगर मैं तुम्हारी ये सब दर्शन की बातें नहीं समझ सकती जान, प्लीज.....''
अचानक किसी ने तेज़ी से कमरे का दरवाजा खटखटाया..............

तीसरा और आखिरी किश्त जो कि सबसे महत्वपूर्ण है और कहानी का चरमोत्कर्ष है, अवश्य पढियेगा लेकिन आज नहीं कल.... विदा दीजिये..
आपका ही-
दीपक मशाल


 

14 टिप्‍पणियां:

  1. यह अंश कुछ स्क्रिप्ट लेवल के लग रहे हैं यानि कि उसने ये कहा...उसने ऐसा किया....इसके बजाय थोडा सा विस्तार देते हुए कहानी को और अच्छा बनाया जा सकता है मसलन, परिष्कृत के मनोभावों को व्यक्त करने के लिये कुछ नेरेशन, स्तव्या के बातों से कुछ निराशा आदि....फिर भी अच्छा प्रयास है।

    जारी रहें।

    परिष्कृत, स्तव्या, पुलकित ये नाम जरूर कुछ अलग और नये किस्म के लग रहे हैं।

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  2. आपके अनुरोध पर पहला भाग पढ़ने के बाद ही इसे पढ़ा.
    कहानी काफी रोचक और अच्छी है.
    पात्रों का रंग-रूप, जाती-समाज, देश-काल और शहर का चित्रण भी कहानी में होता तो यह और भी जीवंत हो जाती.
    एक स्थान पर पत्र की जगंह पात्र टंकित हो गया है, सुधार लें.
    ..स्तव्या को एक ऐसा पात्र लिख...
    तीसरे अंक की बेसब्री से प्रतीक्षा रहेगी...
    ..बधाई.

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  3. Deepak tum aa gaye ho accha laga dekh kar..
    indino thode se vyast ho gaye hain...isliye nahi aa paa rahe hain...
    tumse baat bhi nahi hui hai...bura mat manana..
    bas monday tak free ho jaayenge...
    fir ek baar tumko dekh kar bahut accha laga
    baat karni hai..
    didi..

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  4. सुबह उठ कर इत्मिनान से पढ़ते हैं...लौट आये कि नहीं<?? पुस्तक विमोचन की बधाई..

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  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  6. Sateesh ji Devendra ji, aapka anubhav mere bahut kaam ka hai... main bahut aabhari hoon ki aap logon ne itne gaur se kahani ko padha aapke sujhaaye anusaar sudhaar laaunga,,, aise hi behtari ki or le jane me madad karte rahen... Ji Didi maine kal phone kiya tha par aap busy rahi hongeen, India se to baat kar hi nahin paya..
    Sameer sir vimochan ho gaya, aapke aasheerwad se sab kushal hua vaise abhi kshetreeya level par hi kiya(samay aur mudra ki kami saamne aa gayi, paisa transfer hi nhin kar paya UK account se :( )
    aapki copy jald hi bhejni hai..

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  7. मुझे न जाने क्यों परिष्कृत में दीपक की लौ जलती नज़र आ रही है...

    इस किश्त ने कभी कभी में अमिताभ का राखी गुलजार से कहा वो डॉयलॉग याद आ गया...हमें कोई हक नहीं बनता,
    हम अपने मां-बाप के अरमानों की चिता पर अपने ख्वाबों के महल खड़े करें...

    (दीपक, तुमने लंबा ब्रेक लिया, इसलिए ब्लॉगवुड को भी पुराने मोड पर आने में थोड़ा वक्त लग सकता है...तुम लिखने
    में नियमित हुए नहीं, फिर सब दिल की बात सुनने-सुनाने तुम्हारे ब्लॉग पर होंगे...ज़रा सब्र तो कर मेरे यार...

    अगली किश्त का बेसब्री से इंतज़ार...

    जय हिंद...

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  8. kya beta bich mein hi rok dete ho......bahut hi achha lag raha hai.....kahin koi uban nahi, toota silsila nahi hai.......milte hain kal

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  9. दीपक मुझे भी यही बात लगी थी जो पंचम जी ने कही है सिर्फ इस कडी मे। नेरेशन से कहानी और रोचक हो जाती है। इस मे बहुत स्पेस था कि इसे विस्तार दिया जा सकता था
    दूसरी बात पाँचवें और छठे पहरे मे कुछ भावनात्मक वार्तालाप के लिये बहुत जगह है। किशोरावस्था वाले पहरे मे जहां वो दोनो इकठे पढने जाने लगे थे वहां कुछ घटनाओं का जरूर उल्लेख करना चाहिये था वो जीवन को दिशा देने का निर्नायक मोद था उसे जरूर विस्तार चाहिये था। कहानी बहुत अच्छी है खुशदीप जी ने भी सही कहा है। नायक मे तुम ही नज़र आते हो। बाके तुम ने काहानी पढने की बात कही तो ये जानो कि ब्लाग जगत सारा साहित्य की नज़र से नहीं लिखा जाता यहां लोगों के पास समय कम है सब अपनी ही रफ्तार मे भागे जा रहे हैं कहीं भी देख लो कहानितों या उपन्यास पर बहुत कम टिप्पणियां होती हैं इस से मायूस नहीं होना है कभी न कभी बहुत लोग इन्हें पढेंगे जरूर। ये सभी कहानीकारों के साथ होता है। अगली कडी का बेसब्री से इन्तज़ार रहेगा। आशीर्वाद ।

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  10. deepak ji

    kahani mein sarasta bani huyi hai.......prem ki pradhanta hai aur uska swaroop divya hai jaisa hi hona bhi chahiye tabhi to prem ki sarthakta hai varna jismani prem to har koi karta hai .........kahani bahut hi rochak hai bas ab agli kadi ka besabri se intzaar hai.........?????

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  11. Maasi ji aage se in sab baton ka dhyaan rakhoonga, aap logon se dheere dheere parpakva lekhan bhi seekh loonga..
    Vandana Maam nirantar aapka margdarshan mil raha hai.. bahut bahut shukriya.
    Jai Hind...

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  12. भई मजेदार थी यह कड़ी भी अब अगली कड़ी पर जाते हैं।

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