शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

मिलन

 दोस्तों,
ये कहानी जो मैंने आज से 6 साल पहले लिखी थी स्पंदन त्रिमासिक साहित्यिक पत्रिका के जुलाई-अक्टूबर २००६ अंक में प्रकाशित हो चुकी है...
कहानी बड़ी है इसलिए ३ अंकों में आपके सामने रखूंगा, स्नेह और समीक्षा दोनों चाहता हूँ..... आपकी राय निश्चित ही मेरे लेखन में सुधार लाएगी इसलिए टिप्पणी अपेक्षित है......

बदहवास सी पता नहीं किस सम्मोहन में बंधी वो इधर से उधर भागी जा रही थी. कभी इस कमरे में जाती कभी उसमे और फिर खुद ही बडबडाने लगती, पूछने लगती अपने आप से ही- ''यार मैं यहाँ क्यों आई? क्या लेना था मुझे? क्यों इतना भूल रही हूँ मैं आज? हाँ याद आया वो आर्चीज़ वाला पोस्टर जो मैं अपने कमरे में लगाने के लिए लायी थी, पता नहीं कहाँ चला गया. यहीं तो रखा था अभी.... मम्मी..... मम्मी तुम सुन रही हो ना वो मेरा आर्चीज़ वाला.......''
     ''हाँ.... हाँ स्तव्या मैं सब सुन रही हूँ और देख भी रही हूँ, सुबह से फिरकी सी यहाँ से वहां घूम रही है तू. पता नहीं क्यों इतनी खुश है? इस बार लगता है घर का कोना-कोना सजा के मानेगी, इस बार की दीवाली में कोई ख़ास बात है क्या?''
     '' उहूं .... ममा आप भी ना, मैं पहले ही बहुत परेशान हूँ, मेरा पोस्टर ना जाने कहाँ चला गया?''
     ''तूने ही तो अपनी अलमारी में उठा के रखा था, क्या अजीब सा कुटेशन था उस पर 'ट्रू लव नेवर डिपार्ट्स'.. हूंह.. रोज़ ना जाने कितने बच्चे इन्ही पोस्टरों और ऐसे ही बकवास कुटेशनों की वजह से प्यार-व्यार को हकीकत मान बैठते हैं और जब जिंदगी के धरातल पर आते हैं तब पछताने के अलावा कुछ नहीं रह जाता.''
     '' ओ..... मैं भी ना! थैंक्स मम्मी.''
अपने में ही मगन स्तव्या गुनगुनाने लगती है - ''पिया बोले..... पिया बोले........ जानूं ना''
      तभी मम्मी उसके गाने में खलल डालती हैं-
    '' अब मेरी समझ में आया, जरूर वो परिष्कृत आ रहा होगा. पाता नहीं क्या हो जाता है तुझे उसके आने की खबर सुनकर. अगर यही चलता रहा तो एक दिन सिवाय जिंदगी भर के रोने के तेरे पास कुछ भी नहीं रह जायेगा. ये लड़का तुझे कहीं का नहीं छोड़ेगा.'' मम्मी ने जैसे रंग में भंग कर दिया.
     '' ........अरे कल के दिन तेरी शादी होने वाली है, अगर तेरे ससुराल वालों को मालूम चल गया तो हम समाज में मुँह दिखाने लायक नहीं रहेंगे. अभी वक़्त है सुधर जा.... वो तो खैर मना की पापा को अभी तक कुछ नहीं पता वर्ना.....''
     गुनगुनाना बंदकर स्तव्या ऐसे मचल उठी जैसे बच्चे के हाथ से दूध की बोतल छीन ली गई हो-
      '' वर्ना...वर्ना क्या? क्या कर लेंगे वो... और क्या कर लेंगे आप लोग अगर उन्हें पता चल भी गया तो. कोई चोरी की है हमने, गुनाह किया है कोई? ईश्वर साक्षी है कि कितना पवित्र प्यार है हमारा.. वर्ना आजकल तो लोग प्यार का नाम बदनाम करते हुए क्या क्या कर बैठते हैं, प्यार का मतलब ही ना जाने क्या समझते हैं. हाँ और ये शादी जो मैं कर रही हूँ अपनी ख़ुशी से नहीं  कर रही हूँ बल्कि उसी परिष्कृत के कहने पर आप लोगों की मान मर्यादा की खातिर कर रही हूँ... उसी इ परिष्कृत के कहने पर जिसे आप सुबह-शाम गालियाँ देते नहीं थकतीं वर्ना हम तो जब चाहें तब.......''
     ''तू....तू उस कल के लड़के के लिए हम लोगों को छोड़ सकती है, यही संस्कार दिए हैं हमने तुझे?'' बात बिगड़ते देख मम्मी ने उसे संस्कारों की जंजीरों में बांधना चाहा.
     '' इन्हीं संस्कारों और खोखले आदर्शों ने तो........'' तुनकते हुए स्तव्या अपने कमरे में चली गई और अन्दर से दरवाज़ा बंद कर लिया. उसकी आँखों से गर्म पानी का सोता फूट पड़ा. कहते हैं चुपके चुपके रो लेने से मन का खुलता लावा बिना किसी उद्वेग के धीरे धीरे निकलता रहता है.. वर्ना कभी एक साथ निकला तो ज्वालामुखी की तरह तबाही फैला देता है... . ना जाने आंसुओं के बोझ से या थकावट ज्यादा होने की वजह से उसकी आँखें बंद हो रही थीं. भारी पलकों से वह अपने अतीत की ओर उड़ चली.
  स्कूल में थी वो...... जब पहली बार परिष्कृत को देखा था. एक मध्यमवर्गीय परिवार का सीधा-सादा, भोला सा लड़का. सुनते हैं, अरे सुनते क्या पढ़ते भी आये हैं हमेशा से कि पहली नज़र का प्यार खरा प्यार होता है, लेकिन उन दोनों को तब तक ये बात पता भी ना थी कि प्यार जैसी भी कोई चीज़ होती है. जानते भी होंगे तो उतना ही जितना टी.वी. सीरिअल्स या फिल्मों में देख रखा था. छोटे से कस्बे का एक छोटा सा स्कूल जिसमे की दोनों पढ़ते थे.
      सच कहें तो उस कच्ची उम्र में होने वाला प्रेम अगर आकर्षण ना हो तो वही सच्चा प्यार होता है, जैसे राधा-श्याम का , मीरा-मोहन का प्यार... या ऐसा प्यार जिसके लिए अमृता प्रीतम जी ने लिखा है कि-
 'तेरे प्यार की एक बूँद जो इसमें मिल गई बस इसीलिए मैंने जिंदगी का ज़हर पी लिया..'
      खरे सोने से ज्यादा खरा, सच से कहीं ज्यादा सच्चा वो प्रेम जिसकी एक बूँद तमाम जिंदगी के ज़हर रुपी दुखों को नाकाम कर देती है, जिसमे दूर दूर तक वासना नहीं होती. गलत नहीं होगा अगर कहें कि वो दैवीय प्रेम था. अल्हड़पन में या तो सहज विपरीत लिंगी आकर्षण होता है या फिर सीधा वो प्रेम जिसे रब, मोहब्बत, इश्क, ईश्वर और ना जाने क्या क्या कहा गया है. और फिर इसे प्रेम के अलावा और क्या कहेंगे आप, जो दर्ज़ा ९ के बच्चों की छोटी सी उम्र से शुरू होकर बिना किसी शारीरिक स्पर्श के या स्वार्थ के १४ वर्षों के बाद भी जारी और आज भी उतना ही ताज़ा... जितना की अधखिला 'लाल गुलाब'.... . इतने वर्षों में कोई स्पर्श हुआ भी है तो वो है मन का मन से स्पर्श, रूह का रूह से स्पर्श.
   दोनों ने बचपन के आँगन को पारकर किशोरावस्था की गलियों में कदम रखे थे लेकिन बचपना अभी भी उसी तरह था जैसे सूरज निकलने के थोड़ी देर बाद तक भी अस्तांचल में चाँद तेजहीन मगर स्पष्ट दिखाई पड़ता है. पता नहीं क्या ढूंढती रहती थी स्तव्या परिष्कृत के मासूम, भोले से चेहरे में. एक बार तो क्लास में पढ़ाते हुए टीचर ने उसे टोका भी था-
        '' तुम्हारा मन पढ़ाई में कम, पीछे देखने में ज्यादा लगता है स्तव्या.'' पर पढ़ाई में हमेशा अब्बल रहती थी सो कोई ज्यादा कुछ ना कह पाता था.
        दूसरी तरफ स्तव्या के मन में पनप रहे प्रेम के बीज से अनभिज्ञ सा परिष्कृत अपने यार-दोस्तों में ही खोया रहता था, वो तो उसके ही किसी दोस्त ने एक दिन 'भांप' लिया और मजाक-मजाक में परिष्कृत से पूछा-
    ''क्या चक्कर है गुरु? स्तव्या तेरी तरफ बहुत देखती है पीछे मुड़-मुड़ के?'' शायद उसी दिन से परिष्कृत ने भी गौर करना शुरू किया. सच तो ये था कि मन ही मन वो भी स्तव्या को चाहता था मगर कभी-कभी सोचता कि-
      '' कहीं ये मेरा वहम तो नहीं, हाँ वहम ही होगा, वर्ना स्तव्या जैसी इंटेलिजेंट और खूबसूरत लड़की मुझ जैसे अतिसाधारण से लड़के को क्यों चाहेगी?''

    छोटे से कसबे में को एजुकेशन का मतलब सिर्फ यहीं तक सीमित था कि क्लास में लडकियां आगे वाली कतार में बैठें और लड़के पीछे की बाकी सीटों पर. नोट्स-वोट्स लेना देना तो रहने ही दो , अगर कोई साधारण सी बात करते भी पकडे जाएँ तो हाय तौबा मच जाये, अगले दिन सारे स्कूल भर के लड़कों को मसाला मिल जाये. इधर आजकल तो शहरों में पब्लिक स्कूलों के बच्चे सातवीं, आठवीं तक पहुँचते-पहुँचते अपनी उम्र से दस-पंद्रह साल ज्यादा 'समझदार' हो जाते हैं और वीडियो कैमरे वाले मोबाइल फोन्स ने उनकी समझ का दुनिया से परिचय भी करा दिया है.

  एक दिन क्लास ख़त्म होने के बाद परिष्कृत के करीब से निकलते हुए चुपके से उसने परिष्कृत को घर आने का निमंत्रण दिया.... एक लड़के ने जब ये सुना तो कानोंकान बात फ़ैल गई. अब सब लड़के परिष्कृत को देख कर गाना गाने लगे-
  'शायद मेरी शादी का ख्याल... मन में आया है... इसीलिए.. मम्मी ने मेरी..........'
अब परिष्कृत इस उलझन में था कि जाना चाहिए भी या नहीं, वैसे स्तव्या का घर स्कूल से लौटते वक़्त रास्ते में ही तो पड़ता था मगर............
(शेष अगले अंक में)
आपका ही-
दीपक 'मशाल'


10 टिप्‍पणियां:

  1. Dipak ji,

    Aapki kahani padhi ....ek lambi tippni likhi thi par n jane kyon pesi nahin ho rahi .....bahut achha likhte hain aap ....Amrita ki jodi panktiyaa aapke sahity prem ko darshati hain ....bdhai ....!!

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  2. Rashmi Maam kahani badi hone ki wajah se 3 kishton me rakh raha hoon thodi kal aur thodi parson post karoonga..
    Jai Hind...

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  3. kahani ke bhav bahut hi gahan hain aur prem ka swaroop jo dikh raha hai uske to kahne hi kya........shayad yahi prem ka sachcha swaroop hai.......agli kadi ka besabri se intzaar hai.

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  4. कहानी हम पूरी कर के तुम्हारा मजा खराब कर दें?????
    बढ़िया काम किया, अब कुछ दिन गद्य में अपने हुनर को दिखाओ.
    हमारा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है.......
    जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

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  5. और फिर इसे प्रेम के अलावा और क्या कहेंगे आप, जो दर्ज़ा ९ के बच्चों की छोटी सी उम्र से शुरू होकर बिना किसी शारीरिक स्पर्श के या स्वार्थ के 14 वर्षों के बाद भी जारी और आज भी उतना ही ताज़ा... जितना की अधखिला 'लाल गुलाब'.... . इतने वर्षों में कोई स्पर्श हुआ भी है तो वो है मन का मन से स्पर्श, रूह का रूह से स्पर्श...

    दीपक तुम 14 साल की बात कर रहे हो, ये वो अनुभूति है जो उम्र भर ऐसा कोई दिन नहीं जाता, जिस दिन आपसे दूर जाती हो...ये वो अहसास है जिसकी खुशबू महसूस ही की जा सकती है, बयां नहीं की जा सकती...

    अगली किश्तों का बेसब्री से इंतज़ार...

    जय हिंद...

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  6. दीपक कथानक, कथ्य, शैली ,और शिल्प से कहीं भी ये नहीं झलकता कि तुम ने बहुत पहले ये कहानी लिखी थी या शुरू के लेखन मे लिखी गयी है। कहानी के हर पहलू को तुम ने सजगता से संवारा है। इसका प्रवाह और रोचकता पाठक को बान्धे रखती है। बहुत अच्छी चल रही है अब अगली कडी पढती हूँ। कुछ व्यस्तता के और कुछ 2 दिन कम्पयूटर खराब रहा तुम्हारी पोस्ट देख न पाई थी। बहुत बहुत आशीर्वाद । संवेदनाओं के प्रतीकों को भी खूब इस्तेमाल किया है

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  7. आज आपकी कहानी पढ़ रहे हैं, बहुत बढ़िया अब आगे की कड़ी पर जाते हैं।

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  8. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

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