मंगलवार, 7 सितंबर 2010

दुल्हन के जेवर आज भी गिनते हैं हर जगह------------->>>दीपक मशाल

तुम्हारे दिल की अब धड़कन, हमारे साथ क्यों ना है
कभी होती थी जो लब पे, वो अब बात क्यों ना है

नहीं लगता साथ होकर भी, अब तुम साथ हो मेरे
मिरे हाथों में होता था जो, वो अब हाथ क्यों ना है

नहीं चंदा कहीं दिखता, सितारे भी नदारद हैं
कभी जन्नत सी होती थी, वो अब रात क्यों ना है

कि क्यों फैला है सन्नाटा, बिरादर तेरी बस्ती में
संगीत है ना गीत है, अरे वो साज़ क्यों ना है

नहीं बरसा है सावन फिर, हैं पत्ते सूखते सारे
गया भादों भी आधा पर, यहाँ बरसात क्यों ना है

अंधेरों की कई फूँकें, ये दीपक लील बैठी हैं
क्यों हाथों में है फिर शम्मा, मशाल हाथ क्यों ना है.
दीपक मशाल

दुल्हन के जेवर आज भी गिनते हैं हर जगह
दुल्हे के तेवर आज भी मिलते हैं हर जगह
कमते हैं जेवरात तो बढ़ते हैं तेवरात
बाबुल के सर आज भी झुकते हैं हर जगह


दीपक मशाल

34 टिप्‍पणियां:

  1. कि क्यों फैला है सन्नाटा, बिरादर तेरी बस्ती में
    संगीत है ना गीत है, अरे वो साज़ क्यों ना है

    वाह दीपक जी बहुत बढ़िया प्रस्तुति....

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  2. सुन्दर भावों को बखूबी शब्द जिस खूबसूरती से तराशा है। काबिले तारीफ है।

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  3. बाबुल के सर हमेशा ही झुकेंगे यह सच है . बहुत सुन्दर शब्दो का शोध

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  4. जैसे उदासी भी आई जबरदस्ती,
    आज शायरी में वो बात क्यों न है ?

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  5. अंधेरों की कई फूँकें, ये दीपक लील बैठी हैं
    क्यों हाथों में है फिर शम्मा, मशाल हाथ क्यों ना है.
    behtareen....

    दुल्हन के जेवर आज भी गिनते हैं हर जगह
    दुल्हे के तेवर आज भी मिलते हैं हर जगह
    कमते हैं जेवरात तो बढ़ते हैं तेवरात
    बाबुल के सर आज भी झुकते हैं हर जगह
    lajabaab...
    bahut gahre utri ye panktiyan.

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  6. तुम्हारे दिल की अब धड़कन, हमारे साथ क्यों ना है
    कभी होती थी जो लब पे, वो अब बात क्यों ना है

    --
    बहुत खूब!
    हर शेर लाजवाब है!

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  7. ऐसे तो हर बात ही लाजवाब है पर इसका क्या कहना
    "नहीं बरसा है सावन फिर, हैं पत्ते सूखते सारे
    गया भादों भी आधा पर, यहाँ बरसात क्यों ना है"
    पर क्या करें मन पत्तों सा सूखता है और ऑंखें किसी सावन भादों को नहीं बस बरसना ही जानती हैं

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  8. ख़ूब कहा
    बहुत ख़ूब कहा जी,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

    हर पंक्ति में खूबसूरती है और हर शब्द में महक..........

    वाह !
    वाह !
    वाह !

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  9. कमते हैं जेवरात तो बढ़ते हैं तेवरात
    बाबुल के सर आज भी झुकते हैं हर जगह

    ध्रुव सत्य है भाई

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  10. वाह जी बहुत सुंदर लिखा, धन्यवाद

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  11. बहुत अच्छे दीपक, लेकिन हम इसे पढ रहे हैं तो ’क्यों ना’ की जगह ’नहीं’ कर दिया है, इजाजत है न? हा हा हा।
    बाबुल के सर वाली आखिरी पंक्तियां बहुत अच्छी लगीं।

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  12. आखिरी पंक्तियां बहुत अच्छी लगीं।
    Thanks for b'day wishes

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  13. बहुत बढ़िया ...अंतिम पंक्तिय बहुत संवेदनशील ..

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  14. मजाल भाई, मुआफी चाहता हूँ.. और वादा करता हूँ अगली बार ऐसी गलती नहीं होगी कि आपको निराश होना पड़े..

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  15. कि क्यों फैला है सन्नाटा, बिरादर तेरी बस्ती में
    संगीत है ना गीत है, अरे वो साज़ क्यों ना है

    -अच्छा शेर निकाला है. बहुत बढ़िया.

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  16. दीपक जी, गजल का भाव सब बहुत अच्छा है...कहीं कहीं बहर से बाहर है शेर..लेकिन बात दिल को छूती है...अऊर अंत में शेर का पूँछ त हम जईसा बेटी के बाप ही समझ सकते हैं!!

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  17. tumhaari kavitayein hamesha hi saarthak vishayon par hoti hain..
    bahut hi jaagruk insaan ho tum
    accha lagta hai tumhein padhna..
    khush raho..
    didi..

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  18. बाबुल के सर आज भी झुकते हैं हर जगह|
    अकेले यही मिसरा पूरी ग़ज़ल कि दाद पाने कि कुव्वत रखता है|
    बेहतरीन
    ब्रह्माण्ड

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  19. क्या कहने बहुत उम्दा ग़ज़ल हर शेर काबिले तारीफ है और बेटी के पिता की वेदना को बखूबी बयां किया आपने ...

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  20. नहीं बरसा है सावन फिर, हैं पत्ते सूखते सारे
    गया भादों भी आधा पर, यहाँ बरसात क्यों ना है

    दर्द को शब्द दे दिये।

    दुल्हन के जेवर आज भी गिनते हैं हर जगह
    दुल्हे के तेवर आज भी मिलते हैं हर जगह
    कमते हैं जेवरात तो बढ़ते हैं तेवरात
    बाबुल के सर आज भी झुकते हैं हर जगह

    क्या कहूं इस पर ……………बदलाव अभी सिर्फ़ कुछ पन्नों मे ही सिमटा हुआ है बाकी सब जगह यही तो हाल है ………………वक्त को भी वक्त लगेगा बदलने मे।

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  21. दुल्हन के जेवर आज भी गिनते हैं हर जगह
    दुल्हे के तेवर आज भी मिलते हैं हर जगह
    कमते हैं जेवरात तो बढ़ते हैं तेवरात
    बाबुल के सर आज भी झुकते हैं हर जगह
    बिलकुल सही कहा पूरी कविता लाजवाब है। आशीर्वाद।

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  22. तुम्हारे दिल की अब धड़कन, हमारे साथ क्यों ना है
    कभी होती थी जो लब पे, वो अब बात क्यों ना है

    क्या बात है इस पंक्ति को तो सुर में ढाला जा सकता है....:)
    बेहतरीन रचना..

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  23. दुल्हन के जेवर आज भी गिनते हैं हर जगह
    दुल्हे के तेवर आज भी मिलते हैं हर जगह
    कमते हैं जेवरात तो बढ़ते हैं तेवरात
    बाबुल के सर आज भी झुकते हैं हर जगह ..

    दिल को छू गयी ये पंक्तियाँ ... सच कहा है ... अभी बहूत दूर है दिल्ली इस विषय पर कम से कम ...

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  24. कुछ नहीं बदला!...सब कुछ वही है!...नारी भी वही है, पुरुष भी वही है!...साज-शृंगार और पहनावे में बदलाव, तो उपरी तौर का बदलाव है.....मानसिकता तो वही सदियों पुरानी है!...बहुत सुंदर प्रस्तुति!

    उत्तर देंहटाएं
  25. अंतिम पंक्तियाँ सारा सच बयां कर गयीं ,...और कुछ कहने को बचा ही नहीं ...

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  26. भाई आखिर में तो मन को छू गये ।

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  27. कुछ अधूरे से शब्द ...अधूरेपन को बयान करते हुए !

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  28. दर्द को शब्दों में बयां करती बेहद अच्छी रचना दीपक जी...

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