मंगलवार, 21 सितंबर 2010

फैसला होने को है---------------->>>दीपक मशाल














१-


लो उठाओ दोने-कुल्हड़, ले जाओ पत्तलें
फिर न कहना कि हमको बासन* नहीं मिलता

छक कर था खाया मुखिया के बेटे की शादी में
अब अफसर से कह रहे हो राशन नहीं मिलता.

आये हो हमारे द्वारे तो देहरी पे बैठ जाओ
ये न कहना कि दलित को आसन नहीं मिलता

खुद को तो आता है नहीं जीना सुकून से 
और चीखते हो ढंग का शासन नहीं मिलता

वोटों की है जरूरत तो जमीं पे उतरे हैं वो
वर्ना बाद में तो उनका भाषन नहीं मिलता 

२-
फैसला होने को है
संदेशे भेजे जा रहे हैं-
'दुआ करो मस्जिद के हक में हो फैसला'
नारे लग रहे हैं-
'यज्ञ करो कि जीते मंदिर'
दिल बौरा गया है
अपने कान बंद कर लिए
आँखें भींच लीं उसने 
बस यही मंतर की तरह जप रहा है
आयत की तरह बुदबुदा रहा है कि 
''दुआ है इंसानों के लिए
जिन्दा जानों के लिए....''
दीपक मशाल 
*बासन- बर्तन 
 इनका बैलेंस देखकर कोई भी अपनी अंगुलियाँ दांतों तले दबा लेगा..

40 टिप्‍पणियां:

  1. Dono rachnayen gazab hain...pata nahi itna behtareen harbaar kaise kikh jate hain aap?

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  2. इतनी सामयिक रचनाये ... बहुत खूब
    "आये हो हमारे द्वारे तो देहरी पे बैठ जाओ

    ये न कहना कि दलित को आसन नहीं मिलता"

    कुछ कहने को नहीं रहा सारा अपमान ,वेदनाये समेट ली आपने

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  3. जिंदगी के कई शेड्स इस कविता में ऐसी काव्‍यभाषा में संभव हुए हैं,।

    बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

    पोस्टर!, सत्येन्द्र झा की लघुकथा, “मनोज” पर, पढिए!

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  4. बहुत बढ़िया...सामयिक और सटीक रचना

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  5. "खुद को तो आता है नहीं जीना सुकून से
    और चीखते हो ढंग का शासन नहीं मिलता"
    बराबर लिखा है दीपक भाई, हम खुद सुधर जायें तभी दूसरों को कुछ कहने का हक है।
    मंदिर मस्ज़िद वाली कविता भी बहुत शानदार लगी। एक बार तो फ़ैसले की घड़ी आ ही गई है, जो जीतेंगे वो कानून में आस्था जतायेंगे और जो पक्ष हार गया वो कानून को दोषी ठहरायेगा।

    वीडियो देखकर हीरो को सैल्यूट करने का मन करता है।

    शानदार पोस्ट के लिये बधाई, शुभकामनायें।

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  6. ग़ज़ल बहुत ही अच्छी है. एक सार्थक व्यंग्य भी है. बधाई. शुभकामना आशीर्वाद
    जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

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  7. आये हो हमारे द्वारे तो देहरी पे बैठ जाओ
    ये न कहना कि दलित को आसन नहीं मिलता

    सच उगलती पंक्तियाँ ...
    बहुत अच्छा लिखा है.

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  8. रचनायें बढ़िया लगी...

    बेलेंस तो क्या कहने!

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  9. दोनों रचनाएँ अलग अलग विषय को सामने रखती हुई ...

    आये हो हमारे द्वारे तो देहरी पे बैठ जाओ
    ये न कहना कि दलित को आसन नहीं मिलता

    यही विसंगति है ..

    ''दुआ है इंसानों के लिए
    जिन्दा जानों के लिए....'

    बस यही दुआ कबूल हो ...बहुत अच्छी प्रस्तुति

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  10. आये हो हमारे द्वारे तो देहरी पे बैठ जाओ
    ये न कहना कि दलित को आसन नहीं मिलता

    वाह किस तरह से सच्चाई सामने रख दी है बेमिसाल

    ''दुआ है इंसानों के लिए
    जिन्दा जानों के लिए....'

    यही दुआ है मेरी भी

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  11. दोनों कवितायें अच्छी हैं ,फिलहाल इंसानों और जानों की सलामती वाली दुआ के लिये ...आमीन !

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  12. दीपक
    एक बार फिर शानदार प्रस्तुति।
    दोनो ही रचनाये सामयिक और सत्यबोध कराती हैं।
    दिल मे उतर गयीं कुछ चुभते हुये।

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  13. ''दुआ है इंसानों के लिए
    जिन्दा जानों के लिए....'

    hum bhi dua karte hain
    bane masjid, bane mandir,
    kuchh bhi bane, par naa chale lathi khanjar

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  14. दोनों ही रचनाएँ अपने आप में लाज़वाब ।
    ऊपर से वीडियो के तो क्या कहने !
    बहुत खूब ।

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  15. दोनों रचनाएं एक से बढ़ कर एक हैं और मन की पीड़ा को जागृत करती हैं ! वीडियो भी कमाल का है ! इतनी सुन्दर अभिव्यक्ति के लिये आपको बधाई !

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  16. बस , जबरदस्त कह सकता हूं । बधाई ।

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  17. दोनों रचनाएं....इनमे आक्रोश ,क्षोभ और पीड़ा खूब झलकती है.
    मन के भावों को बड़े प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करने की अच्छी क्षमता है तुममे.

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  18. SUNDAR VICHAR.SUNDAR SOCH. AAJ ISI TARAH K CHINTAN KI ZAROORAT HAI BHARAT KO. SHABASH DEEPAK, ISI DISHA ME AAGE BARHATE RAHO. UTHAYE RAKHO MASHAAL. ...O BHARAT MAAN K LAAL...

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  19. चेहरे नहीं इनसान पढ़े जाते हैं,
    मज़हब नहीं ईमान पढ़े जाते हैं,
    भारत ही ऐसा देश है,
    जहां गीता और कुरान साथ पढ़े जाते हैं...

    जय हिंद...

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  20. भावनाएँ सीधे हृदय में उतर गई....
    बहुत खूब दीपक जी.

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  21. poems are great so is the video.http://pratibhameanstalent.blogspot.com/

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  22. अयोध्या का फ़ैसला राजनीति करने वालों के लिए वरदान सिद्ध होने वाला है .....

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  23. दोनों रचनाएँ बहुत सुन्दर हैं

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  24. खुद को तो आता है नहीं जीना सुकून से
    और चीखते हो ढंग का शासन नहीं मिलता

    Wonderful lines!

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  25. पहिला कविता का हर छंद बिगुल है सच्चाई का...अऊर दूसरा फैसला तो टल गया!! यह भी करिस्मा है!!

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  26. अच्छी रचना दीपक जी...लेकिन मंदिर-मस्जिद का ये मसला फिर टल गया है...इसमें मध्यस्थता की संभावना नजर आ रही है...खैर इस मुद्दे पर कुछ भी कहना अदालत की अव्हेलना होगी...
    शायद आपने ये कविता सुनी/पढ़ी होगी
    ''मंदिर मस्जिद गिरजाघर ने बांट दिया भगवान को
    धरती बांटी सागर बांटा मत बांटो इंसान को...मत बांटो इंसान को''

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  27. बड़ी प्रासंगिक कवितायेँ हैं दोनों..... बहुत उम्दा

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  28. दीपक भाई,
    आरज़ू चाँद सी निखर जाए, ज़िन्दगी रौशनी से भर जाए।
    बारिशें हों वहाँ पे खुशियों की, जिस तरफ आपकी नज़र जाए।
    फैसला हो या न हो, आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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  29. बहुत अच्छी लगी दोनो कवितायें जन्मदिन की ढेरों बधाईयाँ और आशीर्वाद।

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  30. जन्मदिन मुबारक दीपक जी .......!!

    ओह ...ये बैलेंस तो गज़ब के दिखाए आपने ..... ......!!

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  31. प्रिय दीपकजी को,

    जन्म-दिन की बहुत बहुत बधाई एवं ढेरों हार्दिक शुभ-कामनाएं

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  32. प्रिय भाई
    दीपक 'मशाल' जी

    ~*~जन्म दिवस पर हार्दिक बधाई एवम् मंगलकामनाएं!
    शुभकामनाएं !!~*~



    शुभाकांक्षी
    राजेन्द्र स्वर्णकार

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  33. दोनों ही रचनाएं ...एक से बढ कर एक है!...लेकिन दोनों का स्थान प्रथम है!

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