शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

शाबाश आमिर!! पीपली लाइव के तोहफे के लिए(पीपली लाइव की प्रदर्शन पूर्वसमीक्षा)...------>>>दीपक 'मशाल'



जब पहली बार मैंने महंगाई के मुद्दे पर एन डी टी वी पर एक लोकगीत जिसके बोल ''सखी सइयां तो खूबई कमात है... महंगाई डायन खाए जात है....''   सुना तो आश्चर्य मिश्रित हैरानी हुई कि ये कैसे चमत्कार हो गया कि बुन्देलखंडी क्षेत्रीय भाषा को इतनी तरजीह देते हुए इन चैनलवालों ने ये बुन्देली लोकगीत ही समाचार चैनल पर गबवा दिया? लेकिन चंद दिनों बाद रहस्योद्घाटन हुआ(कम से कम मेरे लिए तो) कि ये रघुवीर यादव अभिनीत आमिर खान प्रोडक्शन की अगली फिल्म है.


खैर ये हम बुन्देलखंडीयों  के लिए तो गर्व करने लायक बात है ही कि उनकी बोली भाषा को लोगों की नज़र में लाया जाएगा(ये अलग बात है कि लोगों की नज़र उन पर जिस वजह से पड़ेगी वो सरकार के लिए सिरदर्द बन सकती है) .. आमिर वास्तव में बधाई के पात्र हैं जो आज के समय में भी शुद्ध ग्रामीण परिवेश वाली फिल्म को प्रोत्साहित कर रहे हैं.. संभव है कि इसके सफल होने पर जल्द ही बिना बनावट की चादर ओढ़े असली गावों को दर्शातीं कुछ और फ़िल्में लोगों को देखने को मिलेंगीं और इस तरह का ट्रेंड भी कुछ समय के लिए सही लेकिन चल सकता है. जिस समस्या को उठाया है वो भी  बुंदेलखंड की सबसे भयावह समस्याओं में से एक है.. अभी हाल में इसी पर तहलका पत्रिका ने भी एक विशेषांक 'बेहाल बुंदेले बदहाल बुंदेलखंड' के नाम से निकाला था.
अभी तक जितने भी ट्रेलर देखे हैं उन्हें देख के तो यही लगता है कि भले ही रघुवीर यादव के अलावा बाकी अन्य कलाकार नामी-गिरामी ना हों लेकिन थियेटर और एन.एस.डी. से चुने गए ये बेहतरीन कलाकार किसी भी स्थापित कलाकार को मुंहकी दे सकते हैं.. 
मुझे सबसे ज्यादा चकित तो उन बूढ़ी अम्मा ने किया जिन्होंने खाट पर पड़े-पड़े ही हमारे बुन्देली गाँव की नानी-दादियों (लगता है जैसे मेरी परदादी जिनका अभी कुछ साल पहले १०४-५ साल की उम्र में   देहावसान हुआ वो फिर से जीवित हो उठी हैं इन कलाकार के रूप में) को साकार कर दिया है.. हाथ हिलाते हुए उनके ताने देना सौ प्रतिशत स्वाभाविक लगते हैं.. पता नहीं कैसे किसी ग्रामीण महिला से इतना जबरदस्त अभिनय कराया गया या फिर अगर वो कोई शहरी मंजी हुईं कलाकार हैं तो कैसे उन्होंने एक ग्रामीण महिला के किरदार को इतना बारीकी से पकड़ा और निभाया.. उसी तरह नत्था की पत्नी बनी अभिनेत्री भी अपने किरदार को बड़ी खूबी से एक देहाती बुन्देलखंडी की तरह जीती लगी.
सिर्फ वो ही नहीं बल्कि गाँव का हर शख्स इस तरह दिख रहा है जैसे ये कोई फीचर नहीं बल्कि दस्तावेजी फिल्म हो.. आप खुद ही देखिये नीचे ट्रेलर में 'हाथ कंगन को आरसी का'. जरा उस दृश्य पर भी गौर करना जिसमे नत्था रघवीर यादव(चरित्र का नाम पता नहीं) के पीछे धूल में डंडी घुमाते हुए मस्ती में 'तोये बिन सजनी नींद नईं आवे कैसे गुज़ारूँ रात' गाता हुआ चला जा रहा है.. क्या ऐसे दृश्य आपने किसी फिल्म में देखे हैं? या सिर्फ गाँव में ही? हाँ मगर थोड़ा मीडिया वाले दृश्यों में नाटकीयता का मोह नहीं तज पाए इसलिए वो ज़रा कमज़ोर बन पड़ते हैं.. 
ना सिर्फ अभिनय बल्कि बॉडी लेंग्वेज भी कमाल की ही लग रही है अब तक तो.. कलाकारों के मेकअप, वेश-भूषा को देख कर लगता है कि कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ी बस किसी गाँव में घुस गए और लोगों से कुछ ना कुछ बोलने भर को कह दिया और शूट करके वापस चलते बने.. :) कुछेक जगह बुन्देलखंडी के स्थान पर अन्य क्षेत्रीय भाषा में संवाद बोले गए लगते हैं.. लेकिन कोई बात नहीं ये सभी नहीं समझ पायेंगे सिवाए बुंदेलों के... :P  साथ में खड़ी बोली का प्रभुत्व रखना तो जरूरी था ही वर्ना लोग फिल्म को समझ ही ना पाते और एक जबरदस्त फिल्म सिर्फ एक क्षेत्रीय फिल्म भर बन के रह जाती..
वैसे दोस्तों इसे क्षेत्रवाद ना समझा जाए.. वो तो थोड़ा सा अपनी बोली को लोगों को सुनते देख दिल को खुशी होने लगती है इसलिए ज़रा भभक गई ये मशाल.. वर्ना मुझे हमेशा अच्छा लगता है जब भी कोई क्षेत्रीय भाषा अपनी परिधि से बाहर निकल दुनिया के और क्षेत्रों के लोगों के कान में पड़ती है. पूरा विश्वास है कि बुंदेलखंड के बदहाल किसानों की दशा को हास्य के तरीके से ही सही लेकिन दर्शाने वाली इस फिल्म को आप देखने जरूर जायेंगे और उनकी समस्या को गंभीरता से लेंगे और क्या पता कि ये हास्य के साथ-साथ अंत में जाके कोई बड़ा गहरा सन्देश भी छोड़ जावे.
पूरी टीम ने ही जी-तोड़ मेहनत की है और वो सब बधाई के पात्र हैं.. फिल्म की सफलता के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं.. और साथ ही मेरा आमिर एंड कंपनी से अनुरोध है कि यदि संभव हो सके तो फिल्म से होने वाली कमाई का आधा प्रतिशत भाग उन गरीब लोगों की मदद के लिए भी दिया जाए जो इस क्षेत्र में वास्तव में बहुत तकलीफ के दौर से गुज़र रहे हैं. अगर ऐसा होता है तो उनकी समाजसेवा की ये पहल ना सिर्फ सरकार के मुँह पर एक तमाचा होगी बल्कि फिल्म इंडस्ट्री में एक और अच्छे नए चलन को जन्म देगी, एक आदर्श बनकर उभरेगी....
चलिए आप ये ३ मिनट का ट्रेलर देखिये अब मैं भी गाता हूँ... ''तोये बिन सजनी नींद नईं आवे कैसे गुज़ारूँ रात...''

एक ये कविता भी बांच लेना.. ताज़ी है कल ही बनाई..





एक महकती खुशबू की तरह 
ढंके रहती थीं तुम मुझे..
तुम्हारे जाने से 
आसपास की सारी हवाएं भी चली गयीं.. 
एक निर्वात पैदा हो गया
मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन ने भी
इंकार कर दिया 
गुरुत्वाकर्षण देने से..
अब त्रिशंकु बन गया हूँ बिना हवा बिना ज़मीन के मैं
एक शून्य सा पैदा हो गया जीवन में
जिसे जब अपने हिस्से में बांटने को चाहा
तो वो शून्य भी अवचेतन से अचेतन  कर गया..
मुझे भी शून्य बना गया 
और मेरे हिस्से कुछ ना आया..
दीपक 'मशाल'


 

40 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया...जानकारी भरा आलेख...सुन्दर कविता

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  2. उम्मीद करती हूँ ----आपका संदेश आमिर तक पहुंच जाये..............

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  3. शायद ये क्षेत्रीयतावाद ही हो , बात मुझे भी जम रही है :)

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  4. बहुत अच्छी समीक्षा की है दीपक। आमिर सचमुच हटकर है।

    कविता भी बहुत अच्छी लिखी है, लेकिन भाई, लगता है कुछ गड़बड़ सी है। प्यारे, झेल जाओ जो मिले(अगर वाकई है कुछ), हिम्मत से। और मजबूत बनोगे, प्रोमिस।

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  5. समीक्षा के लिये धन्यवाद ,फिल्म जरूर देखेंगे ।

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  6. आमिर खान का ज़वाब नहीं ।
    कल ही लादेन तेरे बिन देखी । बिना किसी प्रसिद्द कलाकार के भी बड़ी दिलचस्प लगी ।

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  7. तारीफे काबिल है आमिर खान इस फिल्म के लिए ......बहुत बढ़िया प्रस्तुति ....

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  8. आजकल की फिल्मों में तो मेरी कोई विशेष रुचि नही है
    मगर आपने समीक्षा की है तो जरूर देख लेंगे!

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  9. deepak bhai ....:)

    main b hi is film par kuch likhna chah raha tha..baharhaal ..baat bas likhne bhar ki thi ..aap liikhen ya main ...baat logon tak pahunchni chahiye.... amir is film ke liye badhai ke haqdaar hai ...comercial aur art film ke beech ek setu ki tarah kaam karte hain amir...unki pichlifilme is bat ka sabut hain ...wo sirf manoranujan nahi ek swasth manoranjan karte hain ....jisme hum ek msz bhi pa jate hain ... peepli live ..ek chamtkar ki sabit hogi aisa mera manna hai ..aur shayd hi kisi chhote budget ki filom ne itna munafa kamaya hogajitna ye kare... :)

    aur han aap ki nazm ne chaaro taraf nirvaat paida hai .... bahar ka gurtviya akasrashan mere andar ke gurutviya akrshan se kam ho gaya hai ..isliye " wah " muh se bahar hi nahi aa raha hai ....heheheh

    mujhe achhi lagi har tarah se ye post... :)

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  10. sorry dipak pata nahi kyon aapka blog bahut muskil se khulta hai.....kabhi kabhi bahut samay lagta hai khulne me......bahut acchaa post. iske liye aapko badhai.

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  11. दीपक जी
    नमस्कार !
    समीक्षा और कविता के लिए साधुवाद , आप ने अंत में जो अमीर खान से अनुरोध किया है वो अगर पूरा हो जाये तो आप का प्रयास और सफल हो जायेगा , हमारी भी प्रार्थना ये है कि ऐसा हो , आमीन !
    थैंक्स

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  12. समीक्षा बहुत बढ़िया की है....और गीत से मिलती जुलती ही कविता कह गए हैं ...वहाँ सीधे शब्दों में कह दिया है कि सजनी तेरे बिना नींद नहीं आती और आपने कह दिया कि निर्वात पैदा हो गया ...गुरुत्त्वाकर्षण नहीं रहा त्रिशंकु बन गए हैं :):)


    अच्छी प्रस्तुति

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  13. @अरविन्द जी, कोशिश करता हूँ ब्लॉग को हल्का करने की, आपको अनुभव हो तो कुछ मार्ग सुझाइए.. आभारी रहूँगा..

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  14. फिल्म रोचक लगती है.
    रही बात इस प्रकार की और फ़िल्में आने की तो जैसा की बॉलीवुड की भेडचाल प्रवत्ति है ....ये फिल्म हिट हुई तो इसके जैसे २५-५० तो आ ही जाएँगी.
    लेकिन आमिर खान वाली लगन और पागलपन शायद किसी के पास नहीं होगा.
    आपका ब्लॉग वाकई धीरे खुल रहा है. मुझे सबसे बड़ा कारण टेम्पलेट में बेक ग्राउंड इमेज का होना लग रहा है ये ब्लोगर की नयी सुविधा बड़ी तकलीफदायक है इसे स्टेंडर्ड टेम्पलेट पर करके देखें .. शायद ठीक हो जाये.

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  15. जानकारी तो बढिया है ही मगर कविता तो गज़ब की है।

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  16. फिल्म के प्रोमो रूचि जगाने में सक्षम थे ही, आपकी समीक्षा ने समाँ और तगड़ा बाँध दिया है। फिल्म तो देखनी ही पड़ेगी।
    …………..
    पाँच मुँह वाला नाग?
    साइंस ब्लॉगिंग पर 5 दिवसीय कार्यशाला।

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  17. achchha laga jaan kar aap bhi Aamir ke fan hain......:)


    Kavita, wo to aapne likhi hai to as usual achhhi hogi hi.............hia na achchhi:)

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  18. यहाँ पर स्पीड अच्छी होने की वजह से मुझे ऐसी दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ता.. लेकिन आप सब लोग कह रहे हैं तो परेशानी कई लोगों को हो रही होगी ऐसा मुझे भी लग रहा है.. शुक्रिया कीर्तिश और अरविन्द जी.. काफी कुछ हल्का तो किया है.. अब भी नहीं खुल रहा हो तो कृपया फिर बताएं..

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  19. बहुत ही बढ़िया लिखा है, दीपक...बड़ी अच्छी समीक्षा की...क्षेत्रीय भाषा की महक लिए कोई भी फिल्म हो...बहुत अच्छी लगती है...
    और पात्रों के अभिनय के बारे में सही कहा तुमने....अभी आमिर खान भी एक इंटरव्यू में कह रहें थे....कि "सारे पात्रों के अभिनय बहुत ही जीवंत हैं. हमलोग बीस साल से एक्टिंग कर रहें हैं...पर उन पहली बार कैमरा फेस करनेवालों के सामने फीके लगते हैं. खासकर उन बूढी अम्मा की एक्टिंग की बहुत तारीफ़ की,जैसा तुमने भी लिखा है...

    कविता तो बहुत सुन्दर है...बस थोड़ी उदासी का टच है...अगर ऐसी ही मनोस्थिति में रचा है...तो उस से उबार आओ...यही कामना है.

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  20. बहुत ही अच्छी समीक्षा...
    अब तो इस फिल्म को देखनी ही पड़ेगी....कल बैठे थे देखने ...'तेरे बिन लादेन' लेकिन बूट लेग कॉपी थी तो नहीं देखा....आमीर की तो बात ही अलग है...पूरे फिल्म इंडस्ट्री में वो अलग हट कर लगते हैं....
    खैर...अब बात कविता की....तो इसके लिए बात करुँगी तुमसे...
    बस खुश रहो ...
    दीदी...

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  21. आपका संदेश आमिर तक पहुंच जाये.............

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  22. समीक्षा और कविता दोनों ही बहुत अच्छी है ...!

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  23. जानकारी तो बढ़िया दी है ,,,कविता अच्छी है .....!!

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  24. बहुत बढिया समीक्षा की आपने. शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  25. मैने भी इस गीत को फ़ेस बुक पर सुना, बहुत अच्छा लगा, फ़िर ढुढां की यह गीत है किस का तो पता चला की फ़िल्म का है, लगता तो है यह फ़िल्म अच्छी ही होगी, जरुर आदमी का असली चेहरा इस फ़िल्म मै दिखाया होगा, आप दोवारा दी समीक्षा बहुत अच्छी लगी.
    धन्यवाद

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  26. उम्दा पोस्ट.
    आमीर से हमेशा कुछ नए की उम्मीद होती है. देखना पड़ेगा.

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  27. इस फिल्म को देखने का बहुत मन है मेरा भी ....और ये बुन्देलखंडी गाना तो जैसे जान है फिल्म की

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  28. देखने का मन है.

    गीत यहाँ पर है -

    http://www.youtube.com/watch?v=SQFPeIDig6s

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  29. बेहतरीन लेख ...बड़ा अच्छा हो कि आमीर एंड कंपनी इसे पढ़े और अमल में लाये ...

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  30. बढ़िया...जानकारी भरा आलेख...सुन्दर कविता

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  31. एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
    आपकी चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं!

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  32. बहुत अच्छी समीक्षा, और कविता के तो क्या कहने, बहुत सुन्दर, भैया बहुत दिनों से टूर पर था इसलिए हुई देर के लिए माफ़ी चाहता हूँ!

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  33. जब से पीपली लाइव का ट्रेलर देखा है कमबख्त तेरह अगस्त ही नहीं आ रही है...बेताबी से इंतज़ार है...आपकी पोस्ट और रचना दोनों...बेजोड़ हैं...सच्ची...
    नीरज

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  34. महाकवि उदय (आप शायद उन्हें जानते हों) आपसे इतिफाक रखते नहीं दिखते ...

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  35. वाह, बहुत खूब. आशा है पीपली में छत्‍तीसगढ़ akaltara.blogspot.com पर देखना आपको रोचक लगेगा.

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