शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

'कभी मगरिब से मशरिक मिला है जो मिलेगा...(पश्चिम और पूरब के युवाओं में अंतर)-------------->>>दीपक 'मशाल'

'कभी मगरिब से मशरिक मिला है जो मिलेगा... जहाँ का फ़ूल है जो.. वहीं पे वो खिलेगा...' फिल्म जब-जब फूल खिले के गीत यहाँ मैं अजनबी हूँ का ये मुखड़ा बहुत कुछ कह जाता है.. पर यहाँ मैं थोडा हट कर आज भारत की नहीं बल्कि पश्चिम की मुखालफत करने जा रहा हूँ.. ऐसा नहीं की मैं अपने देश से प्यार नहीं करता या पश्चिम को बहुत चाहता हूँ.. लेकिन फिर भी यहाँ कई सारी बातें ऐसी देखने को मिलीं जिनके बारे में जब सोचता हूँ तो अपने आप ही मन में भारत के युवाओं और यहाँ के युवाओं के बीच तुलना होने लगती है.. कई सारी बातें हैं जो भारत दुनिया को सिखा सकता है और उसी तरह कई बातें ऐसी भी हैं जो हम दुनिया से सीख सकते हैं..
जैसे कि आप भी सोचिये कि हमारे यहाँ यूनिवर्सिटी या किसी कॉलेज में जो छात्र संगठन होते हैं उनका कॉलेज की व्यवस्था या अनुशासन बनाये रखने में कितना योगदान होता है???.. अगर मैं गलत नहीं  तो आजकल विभिन्न राजनैतिक पार्टियां इन युवाओं का उपयोग अपना वोटबैंक बनाने-बढ़ने में लगी रहती हैं और जो छात्र या संगठन अध्यक्ष/ महासचिव के लिए चुन लिया जाता है वो अपना फैदा पहले देखता है.. यहीं से नींव पड़ती है मलिन व भ्रष्ट राजनीति की.. और फिर वो छात्र नेता जल्द से जल्द किसी राजनैतिक पार्टी के झंडे तले एक बड़ा चुनाव लड़ने की सोचने लगता है.. 
जबकि यहाँ ऐसा नहीं है... बेशक महत्वाकांक्षा यहाँ के छात्र नेताओं की भी होती हैं.. लेकिन ये अपने मकसद को पूरा करने के लिए बेकार की हड़ताल और कॉलेजबंदी नहीं कराते.. सिर्फ उन्ही मुद्दों को उठाते हैं जिनमे उन्हें लगता है कि यहाँ किसी छात्र के साथ अन्याय हो रहा है जो नियमविरुद्ध है.. सिर्फ अपनी राजनीति चमकाने के लिए नारे लगाऊ नेतागीरी नहीं करते.. न ही चुनाव जीतने के लिए कट्टे-बंदूकबाजी होती है यहाँ..

यहाँ के लड़के-लड़कियों को मैंने कभी सिफारिश लगवाते नहीं देखा.. कभी प्रश्नपत्र आउट करते या नंबर बढ़वाते नहीं सुना.. अगर किसी छात्र का पिता प्रोफ़ेसर है तो भी उसमे और अन्य छात्र में कोई भेदभाव होते आमतौर पर नहीं देखा जाता.. और न ही अभिभावक खुद अपने बच्चों की नौकरी वगैरह के लिए अपने रसूख का इस्तेमाल करते पाए जाते हैं.. तो बताइए क्या इसे स्वाभिमान नहीं कहते??

ये लोग बदनाम हैं कि बहुत शराब पीते हैं.. पर यहाँ जितनी सड़क दुर्घटनाएं होती हैं वो हमारे देश से सैकड़ों गुना कम हैं... वैसे ये भी कह सकते हैं कि इस मामले में यहाँ की पुलिस सख्त है.. पर जैसे भी है है तो सही.. दुर्घटनाएं तो नहीं ही होती हैं न..

हमारे यहाँ बच्चों के बड़े होते ही उनके शादी-ब्याह की चिंता सताने लगती है.. अगर बेटी है तो समझिये लोग पैदा होते ही पैसा जोड़ने में लग जाते हैं.. पर यहाँ दहेज़ के लेन-देन जैसी बुराई भी नहीं है.. बच्चे बड़े होकर जब अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं तो योग्य जीवनसाथी चुन कर खुद ही माँ-बाप को बता देते हैं और अपने ही पैसों से अपनी शादी करते हैं.. खर्च होता है सिर्फ दूल्हा-दुल्हन का.. क्योंकि उनको अपने माता-पिता को उपहार जो देने होते हैं.. ज्यादा हुआ तो अभिभावक उनके सम्मान में भोज रख लेते हैं वरना कई बार भोज भी नवदंपत्ति अपने ही धन से आयोजित करता है..
अपनी राय दीजिए क्या इनकी ये अच्छाइयां अपनाने योग्य नहीं क्या इनको अपनाना सच में बहुत मुश्किल है???
अंत में मेरी पसंद का ये बेहतरीन गाना सुनियेगा..

27 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही informative post है...इतनी अंदर की बातें तो तुम ही बता सकते हो...और अच्छा है जो सामने ले कर आए. ये सारी बातें अनुकरणीय हैं.काश ये सारी अच्छाइयां हमारे देश के छात्रों और शिक्षकों में भी आ जाएँ.
    शायद सारी समस्या की जड़ हमारी जनसँख्या और सीमित आय के साधन ही हैं. बेरोजगारी ,'खाली दिमाग शैतान का घर' कहावत को चरितार्थ करती है. और छात्र,ये सारी खुराफातें करते हैं...और किसी ना किसी राजनितिक दल के हाथ का खिलौना बने रहते हैं.
    फिर भी कुछ अच्छी बातें...अपने शहर को साफ़-सुथरा रखना...अनुशासन ना भंग करना...ये सब तो आत्मसात कर ही सकते हैं.

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  2. और हाँ!! किस मूड में हो जो ये गाना सुनवा रहें हो...? :) :)

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  3. लेख गंभीर है पर सत्य भी ..मुझे वहां बेबी शावेर की रीति भी पसंद है ...
    गीत तो बहुत प्यारा है पर .....?

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  4. दीपक , बेशक ये सब अच्छाइयां हैं वहां । और भी बहुत सी है ।
    लेकिन कुछ बुराइयां भी हैं :
    १८ के होते ही मां बाप का घर छोड़ देना ।
    वहां पैदा होने वाले बच्चों की identity crisis
    बात बात पर तलाक की धमकी ही नहीं , तलाक ही हो जाना ।
    तलाक में पुरुष का लुट जाना ।

    फिर भी वहां रहकर वहां की अच्छाइयों का फायदा उठाओ और मस्त रहो ।

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  5. दीपक बहुत अच्छा तुलनात्मक अध्यन लिखा है वाकई कुछ अनुशाशन, अपने काम के प्रति निष्ठां और फ़र्ज़ का एहसास आदि बातें हमें इनसे सीखनी चाहिए ..अच्छी बातें सीखने में कोई गुरेज़ नहीं होनी चाहिए हाँ हर जगह अच्छाई और बुराई होती हैं तो यहाँ भी कुछ बुराइयां हैं परन्तु निश्चित तौर पर कुछ खूबियाँ भी .
    बहुत बढ़िया पोस्ट.

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  6. बस यही कहूँगी कि आपकी बात अगर युवा समझ जाये तो काफी सुधार हो सकता है ।बात सिर्फ विचारों को ध्यान में लेने की है बिना किसी भेदभाव से हर अच्छी चीज को अपनाना चाहिये चाहे फिर वो बात अपने देश की हो या परदेश की.............

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  7. जानकारी सही है...काश अच्छी बातें को सीखने में हम पीछे नहीं हटते..कम से कम छात्रों के मामले में ..

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  8. अच्छाई हमेशा अच्छाई होती है -----यहाँ या वहाँ की नहीं........और इसे हमेशा अपनाया जाना चाहिए ......

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  9. दरअसल हमारी आदत यह है कि... हम पश्चिम की निगेटिव चीज़ों को अपना लेते हैं और पोज़िटिव को नज़रंदाज़ कर देते हैं...

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  10. हम दूसरे समाज ,भिन्न नज़रिये के संपर्क में रहकर ही उसका अच्छा बुरा जान सकते हैं ! इससे हमारी चिंतन प्रणाली पर बहुत फर्क पड़ता है ! कुंवें से निकल कर समंदर में तैरना इसी को कहते हैं ! आपका तुलनात्मक आलेख है बड़े काम का !

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  11. हर जगह कुछ अच्छी और कुछ बुरी बातें है ..हमें चाहिए अच्छी चीज़ें ग्रहण करें ...वैसे इस पश्चिमी सभ्यता के बारे में यह जानकारी बढ़िया लगी...धन्यवाद दीपक जी

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  12. बिलकुल सहमत हूँ अपने देश मे सब कुछ हो सकता है आगर हमारे नेता चाहें और जनता देश भक्ति का मतलव जानती हो। वो लोग अपने देश के प्रति बहुत समर्पित होते हैं हाँ सोनी ने जिस बेबी शावर की बात की है मुझे भी वो बहुत अच्छा लगा। विडिओ की क्या बात है बहुत बहुत आशीर्वाद।

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  13. में भी बिलकुल सहमत हूँ, हमारे यहाँ संस्कृति केवल symbolic बनकर रह गयीं है, असल जिंदगी में मूल्य नहीं रहे, इधर देश से बाहर विदेशों में राजनीतिक लेवल पर ऊपर भले ही घपला हो पर बाकी लेवेल्स पर इमानदारी है, जड़ है सब समस्याओं की जनसँख्या ....इसकी वजह से बहुत आपाधापी है ...कहते हैं ना एक अनार सौ बीमार :)

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  14. dear dipakji,

    bahut achchhi jaankari di aapne hum bhi vhan ke kuchh achchhi baaten apnaana chahte hain, kintu unhe apnaana bahut muskil hai, agar aaj ka yuva jagrat ho jaye to yah sambhav hai

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  15. Deepak, bahut sahi kaha.Doosare ko neeche kheench aage badhne kee hod Bharat me hai...lekin iske liye atirikt loksankhya zimmedar hai...is loksankhya ke liye poora desh zimmedar hai.Warna insani fitrat har jagah eksi hai. Gar pashchim me hod shuru ho jay to sab wahi neeti apna lenge jo Bhrat me hai...!

    Ab 'Bikhare Sitare" pe kahi baat ka jawab: Purani post me jayiye...ek saath sab mil jayega!

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  16. बढिया तुलना की है
    सही कहा जी आपने, इन्हीं बातों को हमें आयात करने की कोशिश करनी चाहिये

    प्रणाम

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  17. दीपक जी पानी ऊपर से नीचे बहता है ,अच्छे लोग हाशिये पर हैं ,गलत लोग मार्गदर्शक बने हैं। विचारणीय पोस्ट ।

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  18. अर जगह की अच्छाई और बुराई होती है और इंसान वो है जो जहाँ से भी मिले अच्छाइ को अपना ले ……………।बहुत ही उम्दा जानकारी दी है अगर यहाँ भी ऐसा होने लगे तो देश का नक्शा ही दूसरा हो।

    आज तो मेरा मनपसन्द गाना लगाया है…………शुक्रिया।

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  19. दीपक भाई बाकी तो सब बातो से आप से सहमत हुं, ओर हमारे देश मै भी यह होना चाहिये लेकिन , बहुत सी बुराईयां भी है, यहां शादी की नोबत आते आते पता नही कितनी बार यह लोग बेड मै प्यार कर लेते है, सुबह किसी से प्यार हुआ, शाम को मिले रात को इम्तेहान हुआ, सुबह जीरो..... फ़िर यहां नारी को इतनी आजादी है कि वो खुद परेशान है, ध्यान से देखे कितने % लोग शादी करते है?जर्मनी मे ५०% लोग शादी नही करते, बाकी बचे हुये लोग साथ रहना तो चाहते है, लेकिन किसी बंधन मै बंधना नही चाहते, ओर जो शादी कर लेते है, उन मे ६०% तलाक होते है, ओर तलाक होने पर आदमी तो तबाह ही हो जाता है..... इस लिये यह लोग ज्यादातर अकेले रहते है या विदेशियो से शादी कर लेते है, लेकिन ऎसा भी नही कि यह शादिया नही करते, अजी करते है, फ़िर भी हमे इन से बहुत सी चीजे सीखनी चाहिये, लेकिन अच्छी बाते ही, बहुत अच्छी बाते बताई आप ने इस पोस्ट मै धन्यवाद

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  20. deepak ji kya khoob likha..malum nahi..humko kis sanskriti ka ghamnd hai !

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  21. केवल गाना ही नहीं रचना भी अच्छी है। बधाई।

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  22. @राम त्यागी जी,
    देश से बाहर विदेशों में राजनीतिक लेवल पर ऊपर भले ही घपला हो पर बाकी लेवेल्स पर इमानदारी है, जड़ है सब समस्याओं की जनसँख्या
    बिलकुल सहमत हूँ भाई जी..
    @ श्री दराल सर
    १८ के होते ही मां बाप का घर छोड़ देना ।
    वहां पैदा होने वाले बच्चों की identity crisis
    बात बात पर तलाक की धमकी ही नहीं , तलाक ही हो जाना
    सर इसी लिए तो मैंने लिखा है ना कि कई सारी बातें हैं जो भारत दुनिया को सिखा सकता है और उसी तरह कई बातें ऐसी भी हैं जो हम दुनिया से सीख सकते हैं..

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  23. दूसरों की खूबियों को तो अपनाना चाहिये ।

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  24. एकदम सटीक लिखा है दीपक आपने। हम हर चीज को या तो स्याह देखते हैं या सफ़ेद। अच्छाई-बुराई हर जगह, हर संस्कृति में हैं। हम अनुकरण करते हैं पश्चिमी द्शों के वीकेंड कल्चर का, लेकिन वीक डेज़ में जिस डेडिकेशन से वो काम करते हैं, उसे कतई नजर अंदाज कर देते हैं।
    ऐसे ही दूसरे मामलों में है।
    संतुलित लेख, बधाई।

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  25. मैं यही चाह रहा था कि ऐसा ही कुछ तुम लिखो इसलिये कि तुम पूर्वाग्रह से मुक्त होकर लिख सकते हो ।

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